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जब राजस्थान का यह राजपूत राजा ब्रिटेन के महाराजा के चरणों में हो गया था लोटपोट, कटा दी थी देश की नाक

हमलावर मुसलमानों विशेषकर मुगलों की ताकत को तलवारों से तौलने वाले और भारत भूमि पर प्राण न्यौछावर करने वाले वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप, मराठा ताकत के प्र​तीक शिवाजी समेत अन्य वीरों के बीच राजस्थान की एक रियासत ऐसी भी थी जिसके राजाओं ने न सिर्फ राजपूत राजाओं का सिर शर्म से झुका दिया था बल्कि स्वजातीय राजाओं के वध में मुगलों का साथ भी दिया था। पूरे देश में ऐसे राजाओं की एक लम्बी सूची थी जिनमें तत्कालीन जयपुर रियासत के राजा सिरमौर थे। आमेर के राजाओं ने वक्त आने पर मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के खिलाफ मुगल बादशाह अकबर के दरबारी बनकर हल्दीघाटी में राजपूतों के वंशनाश का युद्ध भी लड़ा था।

उसी जयपुर रियासत के राजा ने 1911 में भी ऐसी ही हरकत करके पूरे देश को शर्मसार कर दिया था। हुआ यूं कि अंग्रेजों की गुुलामी के दौर में 1911 में ब्रिटेन के राजा जार्ज पंचम तख्तनशीनीं के बाद पहली बार भारत आए थे। गुलाम भारत के तमाम राजा, महाराजाओं के साथ ही सेठ साहूकार, अंग्रेजी ओहदे पाने वाले धनपशुओं को तख्तनशीनी की खुशी में दिल्ली में लगने वाले दरबार में शामिल होने का न्योता भेजा गया था। पूरे देश के राजा, महाराजाओं के साथ ही सेठ, साहूकार, ओहदेदार समारोह में आए और बाकायदा जार्ज पंचम के सम्मान में लगाए गए बड़े दरबार में शामिल हुए। दरबार में सबसे पहले राजा, महाराजाओं को जार्ज पंचम के समक्ष पेश होने का मौका दिया गया।

राजा, महाराजा अपने साथ लाए गए तोहफों के साथ एक—एक करके सिंहासन पर विराजमान जार्ज पंचम के सामने पेश होते और अपनी तलवार के साथ आते और झुककर सलाम करने के बाद उल्टे पैर वापस लौट जाते। हैदराबाद के निजाम के बाद बड़ौदा महाराज गायकवाड़ जार्ज के सामने गए और सिर को हल्की सी जुम्बिश देकर उल्टे पैर लौटने की अपेक्षा जार्ज पंचम को पीठ दिखाकर वापस लौट गए। इससे अंग्रेज नाराज हो गए और गायकवाड़ की गद्दी जाते—जाते बची। गायकवाड़ के बाद नम्बर आया जयपुर का। जयपुर के महाराजा ने न सिर्फ अपनी तलवार जार्ज पंचम के पैरों के पास रख दी बल्कि स्वयं भी उनके समक्ष दंडवत होकर धरती पर लेट गए।

जयपुर के महाराजा की इस हरकत की तत्कालीन राजे समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई लेकिन जयपुर के महाराजा पर कोई फर्क नहीं पड़ा और वे मूंछों पर ताव देते हुए जयपुर वापस आ गए। आते ही उन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ रहे स्वतंत्रता सेनानियों पर जुल्म और तेज कर दिए। जयपुर के महाराजा की इस हरकत को मध्यप्रदेश के जबलपुर के प्रख्यात स्वत़ंत्रता सेनानी सेठ गोविंद के कार्यकलापों पर पद्मा बिनानी फाउंडेशन की ओर से प्रकाशित पुस्तक ‘गोविंद की गति गोविंद…’ में विस्तार से लिपिबद्ध किया गया है।

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