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जब सजा के रूप में सिपहसालार का कीमा बनाकर कौवों को खिलाया गया

आधुनिक युग में पूरी दुनिया में कानून—व्यवस्था कायम रखने के लिए लिखित नियम कायदे बने हुए हैं, लेकिन भारत में मुगलकाल में ऐसे कायदे—कानून नहीं थे। उस वक्त में बादशाह के मुंह से निकली बात ही कानून होता था और इसके चलते तब दंड देने के तरीके ऐसे—ऐसे तरीके आजमाए जाते थे कि आज की दुनिया उन्हें देख ले तो भय से थर—थर कांपने लगे। ऐसा ही एक दंड तब के बादशाह अकबर ने अपने एक मध्यम दर्जे के सिपहसालार को दिया था। 

 

हुआ यूं कि अकबर के मध्यम दर्जे के सिपहसालार ख्वाजा हसन ने मेवाड़ के उस वक्त तक युवराज प्रताप को भाड़े के हत्यारों के माध्यम से खत्म कराने की डींग भरे दरबार में हांकी थी। अकबर ने तत्काल आवश्यक धन देकर उसे मिशन पर रवाना भी कर दिया, लेकिन करीब दो माह की कोशिशों के बावजूद वह और उसके भाड़े के हत्यारे प्रताप का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके। 

 

असफल ख्वाजा हसन जब दरबार में लटका हुआ मुंह लेकर आया तो अकबर के क्रोध का पारावार नहीं रहा और उसने ख्वाजा को मृत्यु दंड सुना दिया। अभी सैनिक उसे लेकर जा ही रहे थे कि अकबर ने उन्हें रोक दिया और कहा कि इसकी फांसी नहीं दी जाए बल्कि इसके अंगों के टुकड़े—टुकड़े करके उनका कीमा बनाकर कौवों को खिलाया जाए। 

 

अकबर के मुंह से यह सुनते ही ख्वाजा हसन तो थर—थर कांपने लगा लेकिन इसके साथ ही पूरे दरबार में भी सन्नाटा छा गया। सजा का ऐलान करके अकबर तो दरबार से उठकर चला गया और जल्लाद उसे पकड़कर उस कत्लखाने में ले गए जहां कैदियों के गंडासे से टुकड़े—टुकड़े किए जाते थे। कत्लखाने में लेकर जल्लादों ने पहले उसके 20 टुकड़े किए और बाद में उसका कीमा बनाकर कौवों को खिला दिया।

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