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सिर्फ मेंढ़क व घोंघे ही खाता है गिद्ध प्रजाति का यह प्रवासी पक्षी – Mobile Pe News

सिर्फ मेंढ़क व घोंघे ही खाता है गिद्ध प्रजाति का यह प्रवासी पक्षी

आमतौर पर संरक्षित वन क्षेत्रों में पाया जाने वाला प्रवासी पक्षी लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क अब कृषि क्षेत्रों में भी आबाद हो रहा है। प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक डॉ. गोपी सुन्दर ने इन पक्षियों पर शोध के बाद बताया कि अब तक यह माना जाता था कि संरक्षित घने क्षेत्रों में ही गिद्ध प्रजाति का लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क संरक्षित रहता है और फलता-फूलता है।

मानवीय गतिविधियां खास तौर से कृषि इन पक्षियों एवं वन्यजीवों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होता है परन्तु शोध के बाद यह पाया गया कि वन क्षेत्र के बाहर अब कृषि क्षेत्रों में भी ये पक्षी व वन्यजीव आबाद हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तक माना जाता था कि अति संकटापन लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क की आबादी घने जंगलों में ही संरक्षित हैं। पहले यह कहा जाता था कि तालाबों में खेती करने से पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है परन्तु नेपाल के लुंबिनी क्षेत्र (बुद्ध की जन्मस्थली) एवं कपिलवस्तु के कृषि क्षेत्रों में यह प्रजाति बहुत फल-फूल रही है। डॉ. गोपीसुंदर के नेतृत्व में नेशनल ज्योग्राफिक की एक शोध परियोजना के तहत पक्षी विज्ञानियों के दल ने यह निरीक्षण किया कि यह स्टॉर्क बड़ी कॉलोनी नहीं बनाता है अपितु यह छोटी-छोटी 10 से 20 घोंसलों की कॉलोनियां ही बनाता है।

पक्षी की जरूरत घोंसला बनाने के लिए पेड़ और चूजों के लिए भोजन की मांग स्थानीय कृषकों द्वारा संरक्षित पीपल, बरगद व सेमल के पेड़ से हो जाती है और किसानों की मिश्रित चावल एवं गेहूं की खेती से भोजन हेतु मेंढ़क व घोंघे मिल जाते हैं। डा गोपीसुंदर के निर्देशन में काठमाण्डू के पास खोपा कॉलेज के दो छात्र रोशिला और बिजय, कॉलेज सलाहकार कमल गोसाई, क्षेत्रीय सहयोग कैलाश जेसवाल और प्रकृति संरक्षण फाउण्डेशन के दो वैज्ञानिक स्वाति कितूर ने 101 घोसलों का 250 घंटों तक निरीक्षण किया और पाया कि उनमें 162 चूजों ने जन्म लिया जो एक सुखद आश्चर्य की बात है।

इससे एक नई जानकारी प्रकाश में आई कि कृषि क्षेत्र के तालाब भी पक्षियों के आर्द्र भूमि की मांग को पूरा करते है। कृषि को वन्यजीवों के अस्तित्व में खतरा न मानकर इससे इनकी आबादी में वृद्धि हुई। इस शोध से ज्ञात हुआ कि नये वैज्ञानिकों के लिए शोध का क्षेत्र घने संरक्षित वन ही नहीं अपितु कृषि क्षेत्रों में भी यह शोध किया जा सकता है। शोध का विवरण अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका यूएसए द्वारा प्रकाशित वाटर बर्ड और ब्रिटेन द्वारा प्रकाशित वाइल्ड फॉलव में प्रकाशित हुआ है। डॉ. गोपीसुंदर ने बताया कि नेपाल सरकार इस योजना के तहत सेमल के बढ़ावे व संरक्षण के लिए कृषकों को अनुदान देती है। इससे कृषक सेमल का वृक्षारोपण करते है और इसे संरक्षित रखते हैं। इस कांटेदार रूई के पेड़ पर लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क घोंसला बनाना पसंद करते हैं।