मुर्दा खाने वालों को चाव से खाते हैं भारत के ये आदिवासी, डर के कारण 50 किलोमीटर तक घोंसला नहीं बनाते गिद्ध

आंध्र प्रदेश के बपाटला कसबे के बांदा आदिवासियों के लिए गिद्ध वैसे ही खाने लायक चीज है जैसे हममें से कुछ लोगों के लिए मुर्गी! बांदा गिद्ध को ही नहीं, बल्कि कौए को भी खाते हैं लेकिन बत्तख, क्रौंच, हंस को हाथ तक नहीं लगाते।


किसी भी गांव या शहर में गिद्ध स्थिर पंखों पर बहुत ऊंचे चक्कर काटते हुए या मरे जानवरों पर भीड़ लगाते हुए दिख जाएंगे। परंतु बपाटला के चारों ओर लगभग 50 किलोमीटर की दूरी तक गिद्ध बिरले ही मिलेंगे क्योंकि बांदा आदिवासी सबको चट कर गए हैं।

एक साथ दस गिद्धों का शिकार

बांदा वासी गिद्धों को बड़े-बड़े जालों में पकड़ते हैं। बहुत ही मजबूत धागे से बने और लकड़ी के चौखट पर तने ये जाल एक-साथ दस गिद्धों को पकड़ सकते हैं। जाल के छेद बैडमिंटन के जालों के छेद जितने बड़े होते हैं। चमर गिद्ध (वाइटबेक्ड वल्चर), राजगिद्ध (किंग वल्चर) और गोबर गिद्ध (स्केवेंजर वल्चर), गिद्धों की ये तीनों सामान्य जातियां इनका शिकार बनती हैं।

अंडे और चूजे भी चुराते हैं

बांदा गिद्धों के घोंसलों से अंडों और चूजों को भी चुराते हैं। इनके लिए वे ऊंचे चट्टानों पर चढ़ जाते हैं जहां ये घोंसले होते हैं। गिद्ध इन मानव शत्रुओं से इतने डरते हैं कि उन्होंने बांदा इलाकों में घोंसला बनाना ही छोड़ दिया है। यहां पिछले दस वर्षों में एक भी घोंसला नहीं मिला है।