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ये है वो मंदिर, जहां खम्भा फाड़ कर प्रकट हुए नृसिंह भगवान और बचाई थी अपने भक्त प्रह्लाद की जान

अपने भक्त प्रह्लाद की जान बचाने और उसके पिता राक्षसराज हिरण्यकश्प को मारने के लिए जिस खम्भे को फाड़कर अवतार लिया था, वह स्थान पूर्वी राजस्थान के एक कस्बे में आज भी मौजूद है लेकिन पूरी तरह जर्जर होने से अब वहां आने — जाने पर रोक लगा दी गई है। इसी कस्बे के बाहरी इलाके में वह कुंड भी मौजूद है जिसमें एकत्रित किए गए लकड़ियों के ढेर पर हिरण्यकश्प की बहन होलिका भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठी थी। यह कस्बा है दिल्ली—मुम्बई रेल लाइन पर बसा हिण्डौन। करौली जिले में आने वाले इस कस्बे के नाम के बारे में किवदंती है कि इसका नाम पहले हिरण्यकश्यप की नगरी था जो कालां​तर में छोटा होते होते हिण्डौन में बदल गया। 

 

पौराणिक इतिहास के अनुसार हिण्डौन हिरण्यकश्यप की राजधानी था। यहां के पुराने इलाके में एक जमाने में हिरण्यकश्यप का भव्य महल था और वह यहीं से अपने राज्य का संचालन करता था। जहां हिरण्यकश्यप का महल है, वहां से यही कोई पांच सौ मीटर दूर वह कुंड है जिसमें सबसे पहले होली जलाई गई थी। यह कुंड आज भी प्रह्लाद कुंड के नाम से जाना जाता है। एक जमाने में इस कुंड में हमेशा दो हाथियों के डूबने लायक पानी रहता था। अब यह सूख गया है। इसी कुंड के पास नृसिंह मंदिर है। इसके अलावा यहां से बारह किलोमीटर दूर एक और बड़ा नृसिंह मंदिर है। 

 

पौराणिक तथ्यों के अनुसार हिरण्यकश्यप जब अपने पुत्र प्रह्लाद को समझाते—समझाते हार गया कि वह भगवान का स्मरण नहीं करे तो एक दिन उसने क्रोध में भरकर उसे मार दिए जाने का आदेश दे दिया। लेकिन उसकी बहन होलिका ने इससे प्रजा में विद्रोह की आशंका को देखते हुए भाई को सुझाव दिया कि वह अपनी उस ओढ़नी को ओढ़कर अग्नि में बैठ जाएगी जो उसे वरदान के रूप में ब्रह्मा से मिली थी। यह ओढ़नी फायर प्रूफ थी अर्थात उसे ओढ़ लेने से होलिका पर अग्नि का असर नहीं होता था। 

 

योजना के अनुसार एक दिन इसी प्रह्लाद कुंड में होलिका ओढ़नी ओढ़ने के बाद प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि प्रवेश कर गई लेकिन भगवान की कृपा से होलिका की ओढ़नी उड़ गई और वह अग्नि में जल मरी। प्रह्लाद हंसते—हंसते अग्नि से बाहर आ गए। इसी की याद में आज पूरे भारत में होलिका दहन किया जाता है।

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