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ये है जम्मू—कश्मीर की असली तस्वीर, जितना भारत के पास उससे ज्यादा 85 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा जमाए बैठा है पाकिस्तान

भारत के विभाजन और पाकिस्तान के अलग देश बनने के पहले जम्मू कश्मीर डोगरा रियासत थी और इसके महाराजा हरि सिंह थे। अगस्त 1947 में पाकिस्तान बना और करीब दो महीने बाद करीब 2.06 लाख वर्ग किलोमीटर में फैली जम्मू कश्मीर की रियासत भी बंट गई। इसके बाद के 72 सालों में यानी अब तक दुनिया काफी बदल गई है। जम्मू कश्मीर की लकीरों में भी बदलाव आया है लेकिन नहीं बदली है तो इसे लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तब से शुरू हुई तनातनी और खींचतान। दोनों देश जम्मू और कश्मीर के लिए कई बार मैदान-ए-जंग में भी उतर चुके हैं। पाकिस्तान का कश्मीर के जिस हिस्से पर नियंत्रण है, वो उसे ‘आज़ाद कश्मीर’ बताता है।
1947 में जब पाकिस्तान की तरफ से खुद को ‘आज़ाद आर्मी’ बताने वाली कबायली फ़ौज कश्मीर में दाखिल हुई तब महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और राज्य के विलय के प्रस्ताव पर दख्तखत किए। भारतीय सेना जब तक कश्मीर पहुंची तब तक जम्मू और कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान के कबायली कब्ज़ा कर चुके थे और वो रियासत से कट चुका था। “पहले सीज़फायर के बाद जो हिस्सा पाकिस्तान के पास आया, उससे यहां दो हिस्सों में हुकूमत बनीं। एक आज़ाद कश्मीर था। एक गिलगित बल्तिस्तान। हुकूमत आज़ाद ए कश्मीर 24 अक्टूबर 1947 को बनाई गई। 28 अप्रैल 1949 को हुकूमत के प्रेसिडेंट ने एक समझौते के तहत गिलगित बाल्टिस्तान का एक बड़ा इलाक़ा पाकिस्तान को दिया। लगभग पूरी आबादी मुसलमान है। पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर और गिलगित बल्तिस्तान जम्मू और कश्मीर रियासत के ही हिस्से थे। मौजूदा दौर में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के पास 5134 वर्ग मील यानी करीब 13 हज़ार 296 वर्ग किलोमीटर इलाका है। इसकी सरहदें पाकिस्तान, चीन और भारत प्रशासित कश्मीर से लगती हैं। मुज़फ़्फ़राबाद इसकी राजधानी है और इसमें 10 ज़िले हैं। वहीं गिलगित बल्तिस्तान में 28 हज़ार 174 वर्ग मील यानी करीब 72 हज़ार 970 वर्ग किलोमीटर इलाक़ा है। गिलगित बल्तिस्तान में भी दस ज़िले हैं। इसकी राजधानी गिलगित है। इन दोनों इलाकों की कुल आबादी 60 लाख के करीब है और लगभग पूरी आबादी मुसलमान है। पाकिस्तान ने समझौतों का बार-बार उल्लंघन किया है। अभी भारत के लिए कहा जा रहा है कि 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर का स्टेटस बदल दिया। सबसे बड़ी बात है कि पाकिस्तान ने इसका (समझौते का) उल्लंघन किया था। मार्च 1963 में पाकिस्तान ने कश्मीर का एक इलाका चीन को दे दिया। ये करीब 1900 वर्ग मील था। ये भी समझौते का उल्लंघन था। फिर 1949 का कराची समझौता था, जहां गिलगित बल्तिस्तान के लोग उसमें शामिल भी नहीं थे और जो कथित आज़ाद जम्मू और कश्मीर था, उनके नेतृत्व ने वो इलाका पाकिस्तान को सौंप दिया। उनका कोई हक़ नहीं बनता था। मगर पाकिस्तान ने उस इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया। चीन इसके पहले 1962 में भी जम्मू और कश्मीर के एक हिस्से (अक्साई चीन) पर अधिकार कर चुका था। अब भी इस इलाके को बेहद कम अधिकार हासिल हैं और लगभग पूरा नियंत्रण पाकिस्तान के पास है। गिलगित बल्तिस्तान को पाकिस्तान ने अलग स्टेटस दिया। वहां पर शुरू में जम्हूरियत नहीं थी। 2009 में उन्हें पहला सेटअप दिया गया। गिलगित बल्तिस्तान की असेंबली है जिसे क़ानून बनाने का अधिकार है, फिर भी उसके पास बेहद सीमित अधिकार हैं।

 

गिलगित-बल्तिस्तान की सीमा चीन से लगती है। ये इलाका चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के मुख्य रास्ते पर है और चीन यहां अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है। गिलगित बल्तिस्तान का स्टेटस बदलने की एक वजह इसे भी माना जा रहा है और स्थानीय लोग विरोध भी जाहिर करते रहे हैं। गिलगित बल्तिस्तान में 1947-48 में बहुसंख्यक आबादी शिया थी। 1970 से ही गिलगित बल्तिस्तान में स्टेट सब्जेक्ट रूल को हटा दिया गया था। वहां बाहर के लोगों को बसा कर उन्होंने कोशिश की है कि वहां शिया बहुल स्थिति को बदला जाए। स्थानीय लोग विरोध करते हैं। जब कराकोरम हाईवे बन रहा था या फिर सीपेक के प्रोजेक्ट तैयार हो रहे थे तो बहुत विरोध हुआ। अब भी ऐसे संगठन हैं, जो गिलगित बल्तिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की आज़ादी के लिए मुहिम चला रहे हैं। आज़ाद कश्मीर और गिलगित बल्तिस्तान के अंदर जो लोग हैं वो पाकिस्तान की फौज को काबिज फ़ौज समझते हैं। यहां बड़ी मूवमेंट खुद मुख्तार (स्वायत्त) कश्मीर के लिए चलाई जा रही है। इसमें एक दर्जन से ज़्यादा नेशनलिस्ट संगठन शामिल हैं, जिसमें पांच छह सक्रिय तंजीम हैं।
डोगरा राज के बाद जो पाकिस्तानी कबायली घुसे जिन्होंने कश्मीर के बँटवारे की बुनियाद रखी और कश्मीर को गुलाम भी किया। उसकी बहाली के लिए कश्मीर के लोग जद्दोजहद कर रहे हैं। ऐसे अभियान पाकिस्तान के उन दावों पर सवाल उठाते हैं जिनमें कहा जाता है कि उसके नियंत्रण वाला ‘कश्मीर आज़ाद’ है। पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में हमेशा से बरायनाम चुनाव होते रहे हैं और 1974 से संसदीय प्रणाली लागू है। सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री और राज्य का प्रमुख राष्ट्रपति होता है। आईन साज़ असेंबली वो होती है जो आईन यानी संविधान बनाए। कानून साज़ वो होती है जो कानून बनाए और कानून एक आईन के तहत ही बनाए जाते हैं। इस असेंबली के पास सिर्फ़ कानून के तहत ही इख्तियारात हैं। इनके पास आईन (संविधान) मौजूद ही नहीं। इनका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई स्टेटस नहीं है। ये ऐसी हुकूमत है जिसे पाकिस्तान की सरकार के अलावा दुनिया भर में कहीं भी माना नहीं जाता। अगर सच्ची बात की जाए तो रियासत जम्मू कश्मीर की इस असेंबली की पोजीशन अंगूठा लगवाने से ज्यादा नहीं है। पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकारों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। बीते दशक में इस इलाके में आए भूकंप के बाद ह्यूमन राइट्स वाच ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट में दावा किया था, “आज़ाद कश्मीर में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाकिस्तान सरकार की ओर से कड़ा नियंत्रण है। नियंत्रण की ये नीति चुनिंदा तरह से इस्तेमाल की जाती है। पाकिस्तान स्थित ऐसे चरमपंथी संगठन जो जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की हिमायत करते हैं, उन्हें खुली छूट हासिल है। ख़ासकर 1989 से कश्मीर की आज़ादी बात करने वालों को दबाया जाता है।
आज़ाद कश्मीर (वो) बिल्कुल आज़ाद नहीं है। सारा कंट्रोल पाकिस्तान के हाथ में है। वहां की जो काउंसिल है, उसका चेयरमैन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री है। वहां की सेना नियंत्रण करती है। वो लाइन ऑफ कंट्रोल के करीब है, तो वहां 1989 से बेशुमार कैंप चल रहे हैं। वहां वो ट्रेनिंग भी करते हैं। वहां लॉन्च पैड हैं, जहां से भारत में घुसपैठ होती है। ये आर्मी कैंप के साथ जुड़े हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के खामोश रहने से पाकिस्तान को मनमानी का मौका मिलता है। लोग खुश नहीं हैं पाकिस्तान से। वो पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते। लेकिन उनका कोई सपोर्ट नहीं है। कोई सुनवाई नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उन पर ध्यान नहीं दे रही तो पाकिस्तान अपनी मनमानी करता जा रहा है।

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