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देश के इस अस्पताल ने बदले दस मुर्दों के घुटने, छड़ी के सहारे चलाकर भी दिखाया

मुर्दो के घुटने का ऑपरेशन करके देश विदेश के डॉक्टरों ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मरीज़ों के घुटने बदलने की शल्य चिकित्सा की। एम्स देश का एकमात्र अस्पताल है। जहां मुर्दो के ऊपर घुटने का ऑपरेशन कर घुटने बदलने की शल्य चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाता है। गत 10 वर्षों से प्रशिक्षण हर साल होता है। यह प्रशिक्षण धीरे-धीरे इतना लोकप्रिय हो गया है कि अब तक विदेश से 60-70 डाक्टर एम्स आकर प्रशिक्षण ले चुके हैं। कल समाप्त हुए इस प्रशिक्षण में देश-विदेश के 70 डॉक्टरों ने भाग लिया।

 

मुर्दों के घुटने पर शल्य चिकित्सा का प्रयोग करने की शुरुवात करने वाले एम्स के हड्डी विभाग के प्रोफेसर डॉ सी एस यादव ने बताया कि रविवार की कार्यशाला में मिस्र नेपाल अरब के देशों से भी कई डॉक्टर आये थे। दस मुर्दों के दोनों पांव के घुटने का ऑपरेशन करके इन डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया गया। ये लावारिश मुर्दे होते है और इनके घुटने पर लेप लगाकर इन्हें नरम बनाया जाता है। हर मुर्दे पर 15000 रुपये खर्च होते हैं। इसी तरह डेढ़ लाख खर्च कर इन्हें ऑपेरशन के लायक बनाया जाता है क्योंकि मरने के बाद घुटने कड़े हो जाते हैं उन्होंने बताया कि मरीजों के घुटने बदलने के लिए कृत्रिम घुटने अमरीका से मंगाए जाते हैं जिनकी कीमत 80 हज़ार रुपये तक होती है और दोनों घुटने बदलवाने पर एम्स में ढाई लाख तक खर्च होता है लेकिन निजी अस्पताल में पांच लाख लग जाते हैं।

कृत्रिम घुटने 10 साल आराम से चल जाते है। नब्बे प्रतिशत ऑपेरशन सफल होते है बाकी डॉक्टर पर निर्भर करता है कि वह कितना सफल ऑपरेशन करता है। देश में अच्छे डॉक्टरों की बहुत कमी है। घुटने का ऑपरेशन महिला डॉक्टर नहीं करती केवल पुरुष डॉक्टर इस क्षेत्र में हैं। एम्स में प्रशिक्षण के लिए हर साल 150 से ऊपर डॉक्टरों के आवेदन आते हैं लेकिन हम लोग 60-70 का ही चयन करते हैं निजी डॉक्टरों को हम नहीं बुलाते।

उन्होंने कहा कि मुर्दों के घुटने का ऑपेरशन कर डॉक्टर बेहतर तरीके से सीखते हैं लेकिन मुर्दों की व्यवस्था करना मुश्किल होता है। उसके लिए कई तरह के नियमों का पालन करना होता है और अनुमति लेनी होती है फिर मुर्दों का अंतिम संस्कार भी करना होता है लेकिन इराक, रूस, अफ्रीका जैसे देशों के डॉक्टर यहां सीखने आ रहे है और यह लोकप्रिय होता जा रहा है देश में दूसरे अस्पतालों में यह व्यवस्था नहीं है।

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