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कॉलेजियम व्यवस्था में कोई भाई-भतीजावाद नहीं,इस पूर्व न्यायाधीश ने कहा

नयी दिल्ली | उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मदन बी लोकुर ने दो न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति प्रदीप नंदराजोग और न्यायमूर्ति राजेंद्र मेनन को नजरंदाज करने पर बुधवार को निराशा तो जतायी, लेकिन कॉलेजियम व्यवस्था नाकाम होने की किसी भी आशंका को निर्मूल करार दिया।न्यायमूर्ति लोकुर ने यहां कंस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि राजस्थान और दिल्ली उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों, क्रमश: न्यायमूर्ति नंदराजोग और न्यायमूर्ति मेनन को उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत न किये जाने के फैसले से वह निराश हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में कॉलेजियम के 12 दिसम्बर के फैसले को वेबसाइट पर नहीं डाला गया, लेकिन कॉजेलियम व्यवस्था फिलहाल नाकाम नहीं हुई है और यहां किसी तरह का कोई भाई-भतीजावाद नहीं है।

न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा, “मुझे नहीं पता कि मेरी सेवानिवृत्ति के बाद कौन से अतिरिक्त दस्तावेज आये, लेकिन मुझे नहीं लगता कि कॉलेजियम व्यवस्था नाकाम हो गयी है। कॉलेजियम में स्वस्थ चर्चा होती है और सहमति-असहमति इसका हिस्सा है।”उल्लेखनीय है कि कॉलेजियम ने दोनों न्यायाधीशों को नजर अंदाज करते हुए उनकी जगह दूसरे न्यायाधीशों को पदोन्नत करने का फैसला लिया था, जिसे लेकर काफी विवाद था। गत 12 दिसम्बर को जिस कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति नंदराजोग और न्यायमूर्ति मेनन के नाम पर विचार किया था उसमें न्यायमूर्ति लोकुर भी शामिल थे। न्यायमूर्ति लोकुर गत माह के अंत में सेवानिवृत्त हुए हैं।

सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधीशों को दिये जाने वाले पदों के बारे में उन्होंने कहा कि कई ऐसे संवैधानिक निकाय हैं, जहां उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को नियुक्त करने के प्रावधान हैं, फिर ऐसे पदों पर सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर उठाया गया विवाद बेतुका है। यदि ऐसा है तो पहले ऐसे कानूनों में संशोधन करना पड़ेगा।

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