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सुप्रीम कोर्ट के आदेश से दलित जातियों को धीरे से लगा जोर का झटका, नहीं मिलेगा पदोन्नति में आरक्षण

सरकारी महकमों में हजारों खाली पदों पर भर्ती नहीं हो पाने की समस्या से जूझ रहे देश के दलित समुदाय को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से तगड़ा झटका लगा है। उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण न तो मौलिक अधिकार है, न ही राज्‍य सरकारें इसे लागू करने के लिए बाध्‍य है।

 

 

पदोन्नति में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने अपने एक निर्णय में कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं है और इसके लिए राज्य सरकारों को बाध्य नहीं किया जा सकता। Reservation in promotion: न्‍यायालय भी सरकार को इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्‍छेद 16(4) तथा (4ए) में जो प्रावधान हैं, उसके तहत राज्‍य सरकार अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के अभ्‍यर्थियों को पदोन्‍नति में आरक्षण दे सकती हैं, लेकिन यह फैसला राज्‍य सरकारों का ही होगा। Reservation in promotion: अगर कोई राज्‍य सरकार ऐसा करना चाहती है तो उसे सार्वजनिक सेवाओं में उस वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी के संबंध में डाटा इकट्ठा करना होगा, क्योंकि आरक्षण के खिलाफ मामला उठने पर ऐसे आंकड़े अदालत में रखने होंगे, ताकि इसकी सही मंशा का पता चल सके, लेकिन सरकारों को इसके लिए बाध्‍य नहीं किया जा सकता।

प्रमोशन में आरक्षण नहीं देगी उत्तराखंड सरकार

पीठ का यह आदेश उत्‍तराखंड उच्च न्यायालय के 15 नवंबर 2019 के उस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई के दौरान आया है जिसमें उसने राज्‍य सरकार को सेवा कानून, 1994 की धारा 3(7) के तहत एससी-एसटी कर्मचारियों को पदोन्‍नति में आरक्षण देने के लिए कहा गया था, जबकि उत्‍तराखंड सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था।
यह मामला उत्‍तराखंड में लोक निर्माण विभाग में सहायक इंजीनियर (सिविल) के पदों पर पदोन्नति में एससी/एसटी के कर्मचारियों को आरक्षण देने के मामले में आया है, जिसमें सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था, जबकि उच्च न्यायालय ने सरकार से इन कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने को कहा था। राज्य सरकार ने इस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। Reservation in promotion: उच्च न्यायालय ने कहा था कि सहायक अभियंता के पदों पर पदोन्नति के जरिये भविष्य में सभी रिक्त पद केवल एससी और एसटी के सदस्यों से भरे जाने चाहिए। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के दोनों फैसलों को अनुचित करार देते हुए निरस्त कर दिया है।

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अगर पुलिस ने नहीं रचा होता ये षड़यंत्र तो अमेरिका के कान काट लेता भारत

अगर 1994 में ये षड़यंत्र नहीं रचा जाता तो अंतरिक्ष विज्ञान में भारत अमेरिका के कान काट रहा होता. लेकिन भारत की भ्रष्ट पुलिस ने मात्र चंद रुपयों के लिए भारत के इस सपने को धूल—धूसरित कर दिया और एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक को गद्दार साबित करने में पूरी ताकत लगा दी. हां ये मजेदार तथ्य है कि ऐसा भारत में ही हो सकता है कि किसी को गोपनीय तकनीक हनी ट्रेप में फंसकर बेचने के आरोप में गिरफ्तार करके लगातार पीटा जाए और बाद में सुप्रीम कोर्ट पूरी चार्जशीट को फर्जी करार दे. इतना ही नहीं स्वयं भारत सरकार उन्हें पद्म भूषण सम्मान भी दे और भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के लिए बदनाम केरल सरकार उन्हें गैरकानूनी गिरफ्तारी के लिए करोड़ों का मुआवजा भी चुकाए.
बिल्कुल ऐसा ही इसरो के एक वैज्ञानिक के साथ 26 साल पहले हुआ जब वे क्रायोजनिक इंजन बनाकर भारत को अं​तरिक्ष विज्ञान में अमेरिका से आगे ले जाना चाहते थे.

30 नवंबर 1994 को जब 53 वर्षीय नांबी नारायणन को गिरफ्तार किया गया उस वक़्त इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान) के क्राइजेनिक रॉकेट इंजन कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे थे। कुछ ही घंटों के भीतर अख़बार उन्हें ‘गद्दार’ कह रहे थे. एक ऐसा गद्दार जिसने मालदीव की दो महिलाओं के हनी ट्रैप के फंसकर रूस से भारत को मिलने वाली टेक्नॉलजी पाकिस्तान को बेच दी थी. इसरो में काम करते हुए नारायणन ने तेज़ी से प्रगति की. उन्हें अमरीका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में रॉकेट से जुड़ी तकनीक का अध्ययन करने के लिए स्कॉलरशिप भी मिली. वहां से पढ़ाई के एक साल बाद वो भारत लौटे और वापस आकर फिर से इसरो में काम करने लगे.
नारायणन ने इसरो में काम करना शुरू किया तब यह अपने शुरुआती दौर में था. सच कहें तो किसी तरह का रॉकेट सिस्टम विकसित करने की हमारी कोई योजना थी ही नहीं. अपने एयरक्राफ़्ट उड़ाने के लिए हम अमरीका और फ़्रांस के रॉकेट इस्तेमाल करने की योजना बना रहे थे. हालांकि ये प्लान बाद में बदल गया और नारायणन भारत के स्वदेशी रॉकेट बनाने के प्रोजेक्ट में अहम भूमिका निभाने लगे.

साल 1994 तक उन्होंने एक वैज्ञानिक के तौर पर बड़ी मेहनत से काम किया. तब तक, जब तक नवंबर 1994 में उनकी ज़िंदगी पूरी तरह उलट-पलट नहीं गई. नारायणन की गिरफ़्तारी से एक महीने पहले केरल पुलिस ने मालदीव की एक महिला मरियम राशीदा को अपने वीज़ा में निर्धारित वक़्त से ज़्यादा समय तक भारत में रहने के आरोप में गिरफ़्तार किया था. राशीदा की गिरफ़्तारी के कुछ महीनों बाद पुलिस ने मालदीव की एक बैंक कर्मचारी फ़ौज़िया हसन को गिरफ़्तार किया. इसके बाद एक बड़ा स्कैंडल सामने आया.
स्थानीय अख़बारों ने अपनी ख़बरों में लिखा मालदीव की ये महिलाएं भारतीय रॉकेट से जुड़ी ‘गुप्त जानकारियां’ चुराकर पाकिस्तान को बेच रही हैं और इसमें इसरो के वैज्ञानिकों की मिलीभगत भी है. फिर ये दावे भी किए जाने लगे कि नांबी नारायणन भी मालदीव की औरतों के हनी ट्रैप के शिकार हुए वैज्ञानिकों में से एक हैं. औपचारिक रूप से गिरफ़्तार किए जाने के बाद नारायणन को अदालत में पेश किया गया.
जांचकर्ता उन्हें पीटते थे और पीटने के बाद एक बिस्तर से बांध दिया करते थे. वो उन्हें 30 घंटे तक खड़े रहकर सवालों के जवाब देने पर मजबूर किया करते थे. उन्हें लाइ-डिटेक्टर टेस्ट लेने पर मजबूर किया जाता था, जबकि इसे भारतीय अदालतों में सबूत के तौर पर मान्यता नहीं है.

नारायणन ने पुलिस को बताया था कि रॉकेट की ख़ुफ़िया जानकारी ‘काग़ज के ज़रिए ट्रांसफ़र नहीं की जा सकती’ और उन्हें साफ़ तौर पर फंसाया जा रहा है. उस समय भारत शक्तिशाली रॉकेट इंजन बनाने के लिए क्राइजेनिक टेक्नॉलजी को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा था और इसलिए जांचकर्ताओं ने नारायणन की बातों पर भरोसा नहीं किया. इस मामले में नारायणन को 50 दिन गिरफ़्तारी में गुजारने पड़े थे. वो एक महीने जेल में भी रहे. जब भी उन्हें अदालत में सुनवाई के लिए ले जाया जाता, भीड़ चिल्ला-चिल्लाकरक उन्हें ‘गद्दार’ और ‘जासूस’ बुलाती.
हालांकि नारायणन की गिरफ़्तारी के एक महीने बाद भारत की केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) ने केरल से यह मामला ले लिया.
नारायणन ने सीबीआई के जासूसों से बताया कि वो जिन भी जानकारियों से काम करते थे उनमें से कोई जानकारी ‘क्लासिफ़ाइड’ नहीं थी. एक जासूस ने नारायणन से इस बारे में माफ़ी भी मांगी थी. उसने कहा था, “मुझे मालूम नहीं कि इतना कुछ कैसे हो गया, हमें इसका बहुत दुख है. आख़िरकार 19 जनवरी 1995 को नांबी नारायणन को ज़मानत मिली . नारायणन के अलावा पांच अन्य लोगों पर भी जासूसी और पाकिस्तान को रॉकेट तकनीक बेचने का आरोप लगा था. इसरो में काम करने वाले डी ससिकुमार, दो अन्य भारतीय पुरुष (रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के एक कार्यकर्ता और एक कॉन्ट्रैक्टर) और मालदीव की दो महिलाओं को भी इस सिलसिले में गिरफ़्तार किया था. सीबीआई के मामला बंद किए जाने के बावजूद, राज्य सरकार ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की और सुप्रीम कोर्ट गई. लेकिन साल 1998 में इसे पूरी तरह ख़ारिज कर दिया गया.
इन सबके बाद नारायणन ने उन्हें ग़लत तरीके से फंसाने के लिए केरल सरकार पर मुक़दमा कर दिया. मुआवज़े के तौर पर उन्हें 50 लाख रुपए दिए गए. अभी पिछले महीने केरल सरकार ने कहा कि वो ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी और उत्पीड़न के मुआवज़े के तौर पर उन्हें एक करोड़ 30 लाख रुपए और देगी. साल 2019 में नांबी नारायणन को भारत सरकार के प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केरल पुलिस की भूमिका की जांच के आदेश दिए. नारायणन और पांच अन्य लोगों के ख़िलाफ़ इस तरह की साज़िश क्यों रची गई, यह आज भी रहस्य बना हुआ है. शायद यह षड्यंत्र किसी प्रतिद्वंद्वी अंतरिक्ष शक्ति ने रचा होगा ताकि भारत की रॉकेट टेक्नॉलजी को विकसित होने से रोका जा सके. बाद में यही तकनीक अंतरिक्ष में भारत की सफलता के लिए वरदान साबित हुई. क्या इसके पीछे वो देश थे जो भारत के कम ख़र्च में सैटेलाइट लॉन्च करने से घबराए हुए थे? या फिर ये सिर्फ़ भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार का नतीजा था?

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अब तो लटकना ही होगा फांसी पर क्योंकि सुप्रीम कोर्ट नहीं सुनना चाहता याचिका

नयी दिल्ली. निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले के गुनहगार मुकेश की फांसी से बचने की आखिरी कोशिश बुधवार को उस वक्त नाकाम हो गई, जब उच्चतम न्यायालय ने दया याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ उसकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) निरस्त कर दी।
इधर निर्भया कांड के एक अन्य गुनहगार अक्षय कुमार ने उच्चतम न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन (सुधारात्मक याचिका) दायर कर फांसी को टलवाने की कोशिश की है।

न्यायमूर्ति आर भानुमति, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की विशेष खंडपीठ ने मुकेश की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि उसकी याचिका में कोई आधार नहीं दिखता। न्यायालय ने निर्भया कांड के गुनहगार मुकेश की दया याचिका राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने को चुनौती देने वाली अपील पर मंगलवार को फैसला सुरक्षित रख लिया था। खंडपीठ ने मुकेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश और दिल्ली सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
देश को दहला देने वाले निर्भया कांड के एक अन्य गुनहगार अक्षय कुमार ने अब उच्चतम न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन (सुधारात्मक याचिका) दायर किया है।

यह याचिका मंगलवार की देर शाम दाखिल की गई थी। इस बारे में हालांकि आज न्यायालय परिसर में वकील ए. पी. सिंह ने पत्रकारों को जानकारी दी। सिंह ने ही अक्षय की ओर से याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने सजा कम करने की मांग की है। अक्षय के पास हालांकि अभी राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाने का संवैधानिक अधिकार मौजूद है। इस मामले में अभी चौथे दोषी पवन की ओर से क्यूरेटिव याचिका दाखिल नहीं की गई है। इधर निर्भया मामले के दोषियों द्वारा लगातर कानून का सहारा लेकर फांसी टालने के मामले में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज कहा कि वे इस मामले में संसद से अनुरोध करेंगे कि कानून में जरुरी बदलाव कर ऐसे अपराधियों की फांसी की सजा पर तुरंत क्रियान्वयन किया जाये।
चौहान ने ट्वीट कर कहा ‘ मासूम बिटियाओं के साथ बलात्कार जैसे घिनौने अपराध करने वालों का सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। मैं संसद से अनुरोध करता हूँ कि क़ानून में ज़रूरी बदलाव कर ऐसा किया जाए कि ऐसे अपराधियों को बिना कोई देरी किए मिली हुई फाँसी की सजा का क्रियान्वयन तुरंत हो।’ पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा ‘जैसा कि कहा गया है कि न्याय मिलने में हुई देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। यही सब क़ानूनी दाँवपेंच के चलते जनता हैदराबाद में हुए एनकाउंटर पर ख़ुशियाँ मनाती है। उसको त्वरित न्याय और उचित सजा मानती है। जनता का ये आक्रोश समाज में अराजकता पैदा कर सकता है।

 

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चिदम्बरम की जमानत याचिका पर ईडी को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने आईएनएक्स मीडिया धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम की जमानत याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को बुधवार को नोटिस जारी किए।

न्यायमूर्ति आर भानुमति की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने चिदम्बरम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुनने के बाद ईडी को नोटिस जारी करके जवाब तलब किया।न्यायलय ने मामले की सुनवाई के लिए 26 नवंबर की तारीख मुकर्रर की है और ईडी को उससे पहले तक जवाब सौंपने को कहा है।

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राफेल पर झूठ के लिये पूरे देश से माफी मांगे राहुल ,योगी आदित्यनाथ

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद राफेल विमान खरीद में झूठ बोलने के लिये आज कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से माफी मांगने को कहा ।

मुख्यमंत्री ने यहां संवाददताओं से कहा कि राफेल विमान खरीद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाते हुये लगातार झूठ बोला और देश की जनता को गुमराह करने की कोशिश की । उन्होंने अपने झूठ में उस देश के प्रधानमंत्री का भी जिक्र कर दिया जहां से विमान खरीदा गया है।

उन्होंनें सवाल उठाया कि इस तरह पूरे देश से झूठ बोलने वाला व्यक्ति क्या जनप्रतिनिधि होने लायक है । उन्होंने कहा कि अपने झूठ के लिये राहुल गांधी को पूरे देश से माफी मांगनी चाहिये ।

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अयोध्या के इस पेड़ पर रोजाना उगता है राम का नाम, भक्त दिन रात करते हैं पेड़ की पूजा

श्रीराम की नगरी अयोध्या में कण कण में राम बसते हैं, यहां तक कि पेड़ भी इससे अछूते नहीं हैं। ऐसा ही एक पेड़ अयोध्या गोरखपुर मार्ग पर तकपुरा गांव के एक खेत में है जिसकी टहनियों, छालियों और तने पर राम नाम लिखा है। इसे किसी ने पेड़ पर कुरेदा या लिख नहीं है बल्कि नाम खुद ही उग आये हैं।

जैसे जैसे लोगों को इसकी जानकारी हुई लोग यहां पूजा करने लगे और ये आस्था का केंद्र बन गया। पेड़ कब उगा या लगाया गया, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार दशकों पहले पेड़ पर राम नाम लिखा देखा गया।

पहले तो लोगों ने सोचा कि शायद किसी ने ऐसा कर दिया हो लेकिन जब हर तने पर राम नाम लिखा देखा गया तो लोगों को इस पर विश्वास हुआ। उसके बाद यहां रोज पूजा होने लगी। साल में एक बार यहां मेला भी लगता है। मान्यता है कि यहां पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है।

इधर श्रीरामजन्मभूमि पर विराजमान रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येन्द्र दास ने कहा है कि अब रामलला का मंदिर बनने से कोई रोक नहीं सकता है। यह ऐतिहासिक फैसला आज आया है। रामजन्मभूमि पर विराजमान रामलला के भव्य मंदिर के निर्माण को कोई ताकत रोक नहीं सकती है। उच्चतम न्यायालय के पांच एकड जमीन मुस्लिम पक्ष के फैसले पर अमल कराना सरकार का काम है।
यह हार जीत का मामला नहीं है। इस फैसले ने मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है। सत्य की जीत हुयी है और सामाजिक समरसता के लिये इसे सभी समुदायों को स्वीकार करना होगा तभी देश की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा। राममंदिर का शिलान्यास हो चुका है। अब बस शिलायें रखने की देर है। यह फैसला संतो और मार्गदर्शक मंडल की बैठक के बाद ले लिया जायेगा। फैजाबाद के सांसद लल्लू सिंह ने कहा कि यह पूरे देश की जीत है।

उधर बाबरी मस्जिद के मुद्दई इकबाल अंसारी ने अयोध्या में विवादित रामजन्मभूमि मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का इस्तकबाल करते हुये कहा कि राम मंदिर निर्माण में सहयोग की दरकार पर वह सबसे पहले आगे आयेंगे। अंसारी ने कहा कि राम पर किसी का जातीय हक नहीं है। वह सबके हैं। अगर मंदिर निर्माण के लिये कोई उनसे मदद की मांग करता है तो वह उस पर जरूर विचार करेंगे।

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रामलला की जीत का आधार बना पुरातत्व विज्ञान, आसान नहीं था पुरातत्व विज्ञानियों की खोज को नकार देना

अयोध्या पर फ़ैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि पुरातत्व विज्ञान को नकारा नहीं जा सकता। बाबरी मस्जिद के नीचे एक संरचना पाई गई है जो मूलतः इस्लामिक नहीं थी। जहां पर बाबरी मस्जिद के गुंबद थे वो जगह हिन्दू पक्ष को मिली।
अदालत ने कहा कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ अलग उपयुक्त ज़मीन दी जाए। ज़मीन पर हिंदुओं का दावा उचित है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर अयोध्या पर एक कार्ययोजना तैयार करने का कहा है। कोर्ट ने कहा है कि बनायी गई ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को शामिल करना है या नहीं ये फ़ैसला केंद्र सरकार करेगी।

 

निर्मोही अखाड़ा का दावा खारिज। आस्था के आधार पर मालिकाना हक़ नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब ज़िलानी ने कहा कि वो फ़ैसले से असंतुष्ट हैं लेकिन साथ ही उन्होंने शांति बनाए रखने की अपील भी की। बाबरी मस्जिद के नीचे एक संरचना पाई गई है जो मूलतः इस्लामिक नहीं थी। विवादित भूमि पर अपने फ़ैसले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि पुरातत्व विज्ञान को नकारा नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर फ़ैसला सुना दिया है। अदालत ने बाबरी मस्जिद के गुंबद की जगह हिन्दू पक्ष को देने का फ़ैसला किया है। जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने 40 दिनों तक इस पर सुनवाई की थी। पाँच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से फ़ैसला सुनाया।
जस्टिस रंजन गोगोई ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के शीर्ष के अधिकारियों को बुलाकर मुलाक़ात की थी और फ़ैसले के दिन क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर निर्देश दिया था। अयोध्या में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं।

अंदर के चबूतरे पर कब्ज़े को लेकर गंभीर विवाद रहा है। 1528 से 1556 के बीच मुसलमानों ने वहां नमाज़ पढ़ जाने का कोई सबूत पेश नहीं किया। बाहरी चबूतरे पर मुसलमानों का क़ब्ज़ा कभी नहीं रहा। 6 दिसंबर की घटना से यथास्थिति टूट गई। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस स्थान के इस्तेमाल का सबूत नहीं दे पाया। बाहरी चबूतरे पर हमेशा से हिन्दुओं का क़ब्ज़ा रहा। ऐतिहासिक यात्रा वृतांतों को भी ध्यान में रखा गया है। ऐतिहासिक यात्रा वृतांत बताते हैं कि सदियों से मान्यता रही है कि अयोध्या ही राम का जन्मस्थान है। हिन्दुओं की इस आस्था को लेकर कोई विवाद नहीं है। आस्था उसे मानने वाले व्यक्ति की निजी भावना है।
वो इमारत काले रंग के स्तंभों पर खड़ी थी। ASI ने एक विशेषज्ञ संस्था के तौर पर ये नहीं कहा था कि नीचे जो ढाँचा मिला है उसे ढहाया गया था। ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला क़ानून के सिद्धांतो के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।

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सरयू में डुबकी के बाद गर्म जलेबियों और पकौड़ों का लुत्फ उठा रहे हैं अयोध्या आए रामभक्त

विवादित रामजन्मभूमि पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से पहले अवाम कितना भी बेचैन हो लेकिन अयोध्या में शनिवार की सुबह आम दिनों की तरह सामान्य है।
उच्चतम न्यायालय आज सुबह 1030 बजे रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला सुनायेगी। हालांकि स्थानीय लोगों में इस ऐतिहासिक फैसले को लेकर कतई हड़बड़ाहट नहीं लगती। कई लोगों को देर सुबह तक पता भी नहीं था कि फैसला आज आने वाला है। यहां के लोग शहर में अमन और शांति चाहते है और देश के लोगों से न्यायालय के फैसले को एक सुर में मानने की अपील करते हैं।

राम भक्तों को फैसला सुनने से ज्यादा पवित्र सरयू नदी में आस्था की डुबकी लगाने की जल्दी है। हाथों में कपड़ों की पोटली थामे श्रद्धालुओं की टाेलियां सरयू के घाटों की तरफ हर दिन की तरह बढ़ी चली जा रही हैं। बाजारों में रौनक आम दिनो की तरह ही है। बुधवार को चौदह कोसी परिक्रमा समाप्त होने के बाद शुक्रवार को श्रद्धालुओं ने पंचकोसी परिक्रमा भी पूरे विधिविधान से पूरी की।
परिक्रमा का सिलसिला समाप्त होने के बाद भी हजारों की तादाद में बाहर जिलों से आये श्रद्धालु विभिन्न आश्रमों पर ठहरे हैं। यहां बाजार आम दिनो की तरह खुली हैं। स्नान ध्यान के बाद लोगबाग मिष्ठान भंडारों पर लजीज जलेबियों का लुत्फ ले रहे है। गर्मागर्म पकौडियों का चटखारा ले रहे हैं। पूजन सामग्री समेत अन्य जरूरत की चीजों की दुकाने सजी हुयी हैं।

शहर में भीड़भाड़ है और दो पहिया वाहनों के लिये कोई रोकटोक नहीं है हालांकि ऐहतियात के तौर पर जिला प्रशासन ने बाहर से आने वाले चार पहिया वाहनो के प्रवेश में प्रतिबंध लगा दिया है। पुलिस के वाहन सड़कों पर गश्त कर रहे है हालांकि इससे यहां विचरण करने वाले तीर्थयात्रियों को कोई परेशानी नही है। नया घाट से हनुमान गढी तक पैदल यात्रियों और दोपहिया वाहनों के आवागमन में कोई प्रतिबंध नहीं है हालांकि विवादित स्थल को बैरीकेडिंग लगाकर सील कर दिया गया है।

न्यायालय के फैसले के मद्देनजर धर्मशालाओं और आश्रमों में ठहरे यात्रियों से घरों को लौटने की सलाह दी गयी है। इसके लिये नयाघाट में अस्थायी बस अड्डा बनाया गया है जहां विभिन्न बस डिपो की बसें यात्रियों को ले जाने के लिये तैयार खडी हैं।

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फिर बरस पड़ा सुप्रीम कोर्ट, पूछा क्या वहां जंगलराज है, सरकार कानून का राज चाहती है

​देश की अंतिम अदालत सुप्रीम कोर्ट आए दिन नेताओं को फटकार लगाता है लेकिन नेता हैं कि सुधरने का नाम ही नहीं लेते। अब उसके निशाने पर आया है उत्तरप्रदेश। कोर्ट की एक पीठ ने एक मंदिर से जुड़े प्रबंधन पर सुनवाई के दौरान उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से पेश एडिशनल एडवोकेट जनरल से कहा कि हम उत्तर प्रदेश सरकार से तंग आ चुके हैं। क्या उत्तर प्रदेश में जंगलराज है! जो वहां के वकीलों को पता ही नहीं है कि किस नियम के तहत काम किया जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर मामलों में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकीलों के पास संबंधित प्राधिकरण का कोई उचित निर्देश नहीं होता।

पीठ ने बुलंदशहर के सैकड़ों वर्ष पुराने एक मंदिर से जुड़े प्रबंधन के मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश एडिशनल एडवोकेट जनरल से पूछा कि क्या राज्य में कोई ट्रस्ट या सहायतार्थ ट्रस्ट एक्ट है! क्या वहां मंदिर और सहायतार्थ चंदे को लेकर कोई कानून है! उत्तर प्रदेश सरकार के वकील ने कहा कि इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है। इस पर नाराज होकर पीठ ने कहा कि ऐसा लगता है कि राज्य सरकार चाहती ही नहीं है कि वहां कानून का राज हो।
पीठ ने कहा कि लगता है वहां जंगलराज है; हम यूपी सरकार से परेशान हो गए हैं। हर दिन ऐसा देखने को मिलता है कि सरकार की ओर से पेश वकीलों के पास उचित निर्देश नहीं होते हैं। फिर चाहें वह दीवानी मामला हो या आपराधिक। पीठ ने पूछा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है! नाराज पीठ ने 2009 के इस मामले में अब उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को तलब किया है!

पीठ ने कहा, ‘हम सीधे मुख्य सचिव से जानना चाहते हैं कि क्या यूपी में मंदिर और सहायतार्थ चंदे को लेकर कोई कानून है! पीठ ने मुख्य सचिव को मंगलवार (22 अक्टूबर) को पेश होने को कहा है! यह मामला बुलंदशहर के करीब 300 वर्ष पुराने श्री सर्वमंगला देवी बेला भवानी मंदिर के प्रबंधन से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें बुलंदशहर के एक मंदिर के चढ़ावे को वहां काम करने वाले पंडों को दे दिया गया था।

इन आरोपों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मंदिर के प्रबंधन के लिए एक बोर्ड बनाया था, लेकिन इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ा और इस तरह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट में मंदिर की ओर से उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ याचिका दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला गलत है और मंदिर के बोर्ड के गठन के लिए किसी तरह के कानून का पालन नहीं किया गया।

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तीन तलाक विधेयक पर बहस के दौरान ओवैसी ने विरोध में दिया हिन्दुओं का उदाहरण

नयी दिल्ली । तीन तलाक पर रोक लगाने से संबंधित नया विधेयक विपक्ष के कड़े विरोध और मत विभाजन के बाद शुक्रवार को लोकसभा में पेश कर दिया गया। इस दौरान विधेयक के गुणदोषों एवं प्रक्रियागत मसलाें पर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के बीच तीखी तकरार हुई।

मुस्लिम महिला (अधिकारसंरक्षण) विधेयक 2019 को सदन में पेश करने की कार्यवाही आरंभ हुई तो ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन के सदस्य असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि वह इस विधेयक पर आपत्ति व्यक्त करना चाहते हैं। इस पर अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आपत्ति तभी की जा सकती है जब विधेयक को कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद सदन में पेश कर दें।

ओवैसी की आपत्ति को कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी सहित कई विपक्षी नेताओं का समर्थन मिला। प्रसाद ने कहा कि विधेयक मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए है। उच्चतम न्यायालय ने तीन तलाक की प्रथा को अवैध बताते हुए कहा था कि इस बारे में सरकार को कानून बनाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद भी 229 ऐसे मामले आये हैं। उन्हाेंने कहा कि नये कानून से तलाक की इस प्रथा का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।

कांग्रेस के शशि थरूर, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के एन के प्रेमचंद्रन और ओवैसी ने आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा कि इससे कई संवैधानिक प्रावधानों और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।प्रसाद ने इन आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा कि तीन तलाक राेकने के लिए विधेयक को 2017 और 2018 में दो बार इसी सदन से पारित किया जा चुका है और यह मुस्लिम महिलाओं के सम्मान के बारे में है।

औवेसी ने कहा, “अगर आप मुस्लिम महिलाओं की इतनी चिंता करते हैं तो आप सबरीमला के मुद्दे पर हिन्दू महिलाओं के बारे में चिंता क्यों नहीं करते।” बाद में उन्होंने इस विधेयक को पेश किए जाने से पहले मत विभाजन की मांग की। मत विभाजन में 186 सदस्यों ने समर्थन में और 74 सदस्यों ने इसके विरोध में वोट दिया। बहुमत के समर्थन को देखते हुए विधेयक पेश किया गया।वर्ष 2017 और 2018 में भी तीन तलाक से संबंधित विधेयक लोकसभा में दो बार पारित किया गया था लेकिन राज्यसभा में अटक गया था । सोलहवीं लाेकसभा भंग होने के बाद संबंधित विधेयक राज्यसभा में स्वत: निरस्त हो गया था और नया विधेयक 21 फरवरी को जारी अध्यादेश के स्थान पर लाया गया है।