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भगवान के चरणों की अपेक्षा खेतों में नष्ट हो रहे हैं सुगंध के साथ सौंदर्य के प्रतीक फूल

कोविड 19 ने भगवान के चरणों में अर्पित किए जाने वाले फूलों की ऐसी दुर्गति की है कि वे अब खेतों में ही अंतिम सांस लेने को मजबूर है। सुगंध के साथ सौंदर्य के प्रतीक फूलों के कारोबार को देश में जारी लाकडाउन ने भारी नुकसान पहुंचाया है और बागों में फूलों के साथ साथ किसानों के चेहरे भी मुरझा गये हैं।

गंगा-यमुना के कछारी क्षेत्र में बसा नैनी फूलो की खेती के लिए उपजाऊ माना जाता है। यहां गुलाब, गेंदा, गुलाब, सूरजमुखी, चमेली के फूलों की खेती की जाती है। लॉकडाउन के कारण मंडियों में फूलों की आवक बंद होने से प्रतिदिन लाखों रूपये मूल्य के फूल का कारोबार चौपट हो गया है। फूलों की खेती कर किसान अच्छी कमाई करते हैं लेकिन शादी विवाह के दौर में लॉकडाउन होने से फूलों का कारोबार बंद हो गया जिससे बड़ी समस्या उत्पन्न हो गयी। फूलों की खेती से परोक्ष और अपरोक्ष तौर पर कम से कम 1500 से 2000 लोग जुड़े हुए है।

गुलाब की खेती को तवज्जो

एक उद्यान अधिकारी के अनुसार चाका, सबहा, सोनई का पुरवा और धनपुर समेत कई गांवों में फूलों की खेती से किसान लाभ कमाते हैं। चाका गांव के किसान तो गेहूं, धान आदि की फसल छोड़कर गुलाब की खेती को तवज्जों दे रहे हैं। नैनी में यमुनापार के अरैल, गंजिया, देवरख, खरकौनी, मवइया, कटका और पालपुर समेत करीब 40-45 से अधिक गांवो में फूल की खेती होती है। सामान्य दिनों में तडके पुराने यमुना पुल के पास और गऊघाट में फूल मंडी सज जाती थी। फूलों की सप्लाई शहर के अलावा कौशांबी, प्रतापगढ़, जौनपुर, वाराणसी, पडोसी राज्य मध्य प्रदेश के रींवा, कोलकत्ता और छत्तीसगढ़ तक महक भेजी जाती है। महामारी के कारण घोषित लॉकडाउन से इन्हें खरीदने वाला कोई नहीं है। फूलों की तरह खिला रहने वाला किसानों का चेहरा कारोबार ठप होने से मुरझा गया है। छोटे से लेकर बड़े मंदिर, देवालय और तीर्थस्थल तक, सब बंद पड़े हैं।

बर्बाद हो गया यह सीजन 

हर तरह के आयोजनों पर पूरी तरह रोक है। ऐसे में फूल किसानों और कारोबारियों का यह सीजन बर्बाद हो गया है। नवरात्रि के दिनों में फूलों की डिमांड ज्यादा होती है। लेकिन, इस बार सब ठप्प होने से काफी नुकसान हुआ है। फूलों की बिक्री बंद होने से किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। पौधों पर सूखते फूलों को देखकर कोरोना के कारण किस्मत को कोसने को मजबूर हैं। उन्होने बताया कि किसानों को पौधों को बचाने के लिए फूलों को तोड़कर खेत में गिराना पड़ रहा है।

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Mahashivratri(archaeological evidence)2020 : आठ हजार साल पहले हडप्पा और मोहनजोदडो सभ्यता भी मनाती थी महाशिवरात्रि, ये हैं उसके पुरातात्विक प्रमाण

​देश के शिवालयों में जब शुक्रवार 21 फरवरी को महाशिवरात्रि पर्व मना रहे श्रद्धालु भगवान शंकर से अपनी और अपने परिवार की सलामती तथा समृद्धि मांग रहे होंगे तब कुछ श्रद्धालुओं के मन में यह प्रश्न भी उपज रहा होगा कि समस्त संसार को भयमुक्त करने वाले भगवान शंकर कब और कितने हजार वर्ष पूर्व प्रकट हुए थे और क्या है उसके पुरातात्विक प्रमाण?

 

सिंधु घाटी से मिले हैं नंदी और शिवलिंग

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त अवशेष शिव पूजा के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। सिंधु घाटी से नंदी और शिवलिंग का पाया जाना इसका प्रमाण है। शोधानुसार यह सभ्यता 8000 साल पुरानी थी। प्राचीन शहर मेसोपोटेमिया, असीरिया, मिस्र (इजिप्ट), सुमेरिया, बेबीलोन और रोमन सभ्यता में भी शिवलिंग की पूजा किए जाने के सबूत मिले हैं।

आयरलैंड के तारा हिल में रखा है शिवलिंग

आयरलैंड के तारा हिल स्थित एक लंबा अंडाकार रहस्यमय पत्थर रखा हुआ है, जो शिवलिंग की तरह ही है। इसे भाग्यशाली पत्थर कहा जाता है। कहते हैं कि मक्का का संग-ए-असवद भी एक शिवलिंग ही है जो बहुत ही प्राचीन है। तुर्की में एक रूमी के मकबरे के बाहर गार्डन में एक अजीब तरह का गोल पत्थर है। उसे 4700 वर्ष पुराना शिवलिंग माना जाता है। भारत में हजारों वर्ष पुराने सैंकड़ों शिवलिंग हैं जिनकी मंदिरों में पूजा अर्चना होती है। 12 ज्योतिर्लिंग के शिवलिंग इसका उदाहरण हैं। अरब के मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी और इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। इस्लाम से पहले मध्य एशिया का मुख्य धर्म पीगन था। यह धर्म हिंदू धर्म की एक शाखा ही थी जिसमें शिव पूजा प्रमुख थी।

आदिवासियों के देवता हैं शिव

ईरान को प्राचीन काल में पारस्य देश कहा जाता था। इसके निवासी अत्रि कुल के माने जाते हैं। अत्रि ऋषि भगवान शिव के परम भक्त थे जिनके एक पुत्र का नाम दत्तात्रेय है। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया।
भगवान शिव को आदिदेव, आदिनाथ और आदियोगी कहा जाता है। आदि का अर्थ सबसे प्राचीन प्रारंभिक, प्रथम और आदिम। शिव आदिवासियों के देवता हैं। शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। कहते हैं कि शिव ने इन शिष्यों को लगभग 40 हजार वर्ष पूर्व तैयार किया था। जहां तक ऐतिहासिक और पौराणिक प्रमाणों की बात है तो जैन इतिहास के अनुसार जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म 599 ईस्वी पूर्व हुआ था। उनसे 250 वर्ष पूर्व भगवान पार्श्वनाथ हुए थे। अर्थात आज से 2869 वर्ष पहले पार्श्वनाथ हुए। पार्श्वनाथ के समय शिव की पूजा होती थी।

सात हजार साल पहले राम ने की थी रामेश्वरम में शिव पूजा

इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईस्वी पूर्व हुआ था। 5132 वर्ष पहले कृष्ण हुए थे। उनके काल में भी शिव की पूजा होती थी। भगवान श्रीराम का जन्म 5114 ईस्वी पूर्व हुआ था। आज से 7134 वर्ष पहले राम हुए थे। उनके काल में भी शिव की पूजा होती थी। उन्होंने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। श्रीराम के पूर्वज वैवस्वत मनु का काल 6673 ईसा पूर्व का है जिनके काल में जल प्रलय हुई थी। यानि 8693 वर्ष पहले उनके अस्तित्व था। उनके काल में भी शिव और विष्णु की पूजा होती थी। सम्राट ययाति का उल्लेख वेद और पुराणों में मिलता है। अनुमानित रूप से 7200 ईस्वी पूर्व उनका अस्तित्व था। अर्थात 9220 वर्ष पूर्व वे हुए थे। उनके काल में भी ब्रह्मा, विष्णु और शिव की पूजा का प्रचलन था। ययाति प्रजापति ब्रह्मा की 10वीं पीढ़ी में थे।

मनु के काल में भी होती थी शिव पूजा

इतिहास के अनुसार स्वायंभुव मनु लगभग 9057 ईस्वी पूर्व हुए थे। संभवत: इससे पूर्व हो सकते हैं। मतलब 11007 वर्ष पूर्व या लगभग 12 हजार वर्ष पहले। उनके काल में भी शिव की पूजा होती थी। लगभग 12 से 13 हजार ईस्वी पूर्व प्रजापति ब्रह्मा के होने की बात कही जाती है। अर्थात 15 हजार वर्ष पूर्व। इससे पूर्व ब्रह्मा और भी कई हुए हैं। उनके काल में भी शिव की पूजा का प्रचलन था। भगवान नील वराह के अवतार का काल लगभग 16 हजार ईस्वीपूर्व का माना गया है। अर्थात 18 हजार वर्ष पूर्व। वराह कल्प के प्रारंभ में भी शिव थे। हिन्दू धर्म की पुन: शुरुआत वराह कल्प से ही मानी जाती है जो कि 13800 विक्रम संवत पूर्व प्रारंभ हुआ था। इसके पूर्व महत् कल्प, हिरण्य गर्भ कल्प, ब्रह्म कल्प और पद्म कल्प बीच चुके हैं।

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Mahashivratri vishesh 2020: सिद्धियों का आश्रय स्थल है बिल्वपत्र का वृक्ष

Mahashivratri vishesh 2020: बिल्वपत्र भोले-भंडारी को चढ़ाना एवं 1 करोड़ कन्याओं के कन्यादान का फल एक समान है। बेल का वृक्ष संपूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल है। इस वृक्ष के नीचे स्तोत्र पाठ या जप करने से उसके फल में अनंत गुना की वृद्धि के साथ ही शीघ्र सिद्धि की प्राप्ति होती है। इसके फल की समिधा से लक्ष्मी का आगमन होता है। बिल्वपत्र के सेवन से कर्ण सहित अनेक रोगों का शमन होता है। बिल्व पत्र सभी देवी-देवताओं को अर्पित करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है।

इस दिन नहीं तोड़े बिल्वपत्र

लिंगपुराण में बिल्वपत्र को तोड़ने के लिए चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति काल एवं सोमवार को निषिद्ध माना गया है। शिव या देवताओं को बिल्वपत्र प्रिय होने के कारण इसे समर्पित करने के लिए किसी भी दिन या काल जानने की आवश्यकता नहीं है। जिस दिन तोड़ना निषिद्ध है उस दिन चढ़ाने के लिए साधक को एक दिन पूर्व ही तोड़ लेना चाहिए। बिल्वपत्र कभी बासी नहीं होते। ये कभी अशुद्ध भी नहीं होते हैं।
बिल्वपत्र के वे ही पत्र पूजार्थ उपयोगी हैं जिनके तीन पत्र या उससे अधिक पत्र एकसाथ संलग्न हों। त्रिसंख्या से न्यून पत्ती वाला बिल्वपत्र पूजन योग्य नहीं होता है। प्रभु को अर्पित करने के पूर्व बिल्वपत्र की डंडी की गांठ तोड़ देना चाहिए। सारदीपिका के ‘स्युबिल्व पत्रमधो मुखम्’ के अनुसार बिल्वपत्र को नीचे की ओर मुख करने (पत्र का चिकना भाग नीचे रहे) ही चढ़ाना चाहिए। पत्र की संख्या में विषम संख्या का ही विधान शास्त्रसम्मत है।

बिल्वपत्र चढ़ाने के शुभ फल

शिवरात्रि, श्रावण, प्रदोष, ज्योतिर्लिंग, बाणर्लिंग में इसे भगवान रुद्र पर समर्पित करने से अनंत गुना फल मिलता है। किसी भी पूजन में या शिव पूजन में बिल्वपत्र का अनंत गुना फल मिलता है। किसी भी पूजन में या शिव पूजन में बिल्वपत्र का उपयोग अति आवश्यक एवं पापों का क्षय करने वाला होता है। यदि किसी कारणवश बिल्वपत्र उपलब्ध न हो तो स्वर्ण, रजत, ताम्र के बिल्वपत्र बनाकर भी पूजन कर सकते हैं। ऐसा करने का फल भी वनस्पतिजन्य बिल्वपत्र के समकक्ष है।
पुराणों में उल्लेख है कि 10 स्वर्ण मुद्रा के दान के बराबर एक आक पुष्प के चढ़ाने से फल मिलता है। 1 हजार आक के फूल का फल एवं 1 कनेर के फूल के चढ़ाने का फल समान है। 1 हजार कनेर के पुष्प को चढ़ाने का फल एक बिल्व पत्र के चढ़ाने से मिल जाता है। इसके वृक्ष के दर्शन व स्पर्श से ही कई प्रकार के पापों का शमन हो जाता है तो इस वृक्ष को कटाने अथवा तोड़ने या उखाड़ने से लगने वाले पाप से केवल ब्रह्मा ही बचा सकते हैं।

बिल्वपत्र चढ़ाने के नियम

यदि बिल्वपत्र पर चंदन या अष्टगंध से ॐ, शिव पंचाक्षर मंत्र या शिव नाम लिखकर चढ़ाया जाता है तो फलस्वरूप व्यक्ति की दुर्लभ कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। कालिका पुराण के अनुसार चढ़े हुए बिल्व पत्र को सीधे हाथ के अंगूठे एवं तर्जनी (अंगूठे के पास की उंगली) से पकड़कर उतारना चाहिए। चढ़ाने के लिए सीधे हाथ की अनामिका (रिंग फिंगर) एवं अंगूठे का प्रयोग करना चाहिए।

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maha shivratri (Mahashivratri vrat katha) 2020: महाशिवरात्रि व्रत कथा में जानिए राजा चित्रभानु कैसे मिला शिवलोक

maha shivratri (Mahashivratri vrat katha) 2020: महाशिवरात्रि व्रत का बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इस साल महाशिवरात्रि का व्रत शुक्रवार (21 फरवरी 2020) को रखा जाएगा। इस महाशिवरात्रि पर लगभग 117 साल बाद एक अद्भुत संयोग बन रहा है। शनि स्वयं की राशि मकर में है और शुक्र अपनी उच्च की राशि मीन में होंगे जो कि एक दुर्लभ योग है। इस दिन भगवान शिव की आराधना करने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होती है और अत्यंत शुभ फल प्राप्त होता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव की आराधना करने से उनके भक्तों के सारे पाप और संकट दूर होते हैं।

महाशिवरात्रि 21 फरवरी 2020 को शाम को 5 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर अगले दिन यानी 22 फरवरी दिन शनिवार को शाम 07 बजकर 9 मिनट तक रहेगी। जो श्रद्धालु मासिक शिवरात्रि का व्रत करना चाहते है, वह इसे महाशिवरात्रि से शुरू कर सकते हैं।

ये है महाशिवरात्र व्रत कथा-

शिव पुराण के अनुसार, प्राचीन काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर चुका सका। इससे क्रोधित साहूकार ने चित्रभानु को पकड़कर कैद कर लिया। संयोग से उस दिन महाशिवरात्रि थी। मुश्किल में फंसे शिकारी ने भगवान शिव का स्मरण करते-करते सारा दिन गुजार दिया। अगले दिन चतुर्दशी को पास में हो रही भगवान शिव की कथा भी सुनी। तभी शाम तक साहूकार आया और उससे अगले दिन तक कर्ज चुकाने की बात कर मुक्त कर दिया।

शिवलिंग पर गिर गए बिल्व पत्र

इधर भूख-प्यास से व्याकुल शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा। बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जिस पर शिकारी द्वारा तोड़े हुए बिल्व पत्र गिर रहे थे। शिकारी को इस बात की खबर नहीं थी। मचान बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। रात्रि बीतते ही एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची। कि तभी शिकारी धनुष पर तीर चढ़ाकर उसका शिकार करने लगा। तभी हिरणी बोली,’मैं गर्भवती हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। एक साथ दो जीवों की हत्या करना ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मुझे अपना शिकार बना लेना। शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।

निर्मल हो गया शिकारी का हिंसक हृदय

कुछ देर के इंतजार के बाद एक अन्य हिरणी वहां से गुजरी जिसे देख शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने निवेदन किया, ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने प्रिय से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’ शिकारी को दया आ गई और उसने उसे भी उसे जाने दिया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई। कुछ देर बाद पहले वाली हिरणी फिर से वापस आई तो शिकारी ने उसे अपना शिकार बनाना चाहा लेकिन हिरणी ने कहा, मैं बच्चों को उसके पिता के पास छोड़ दूं इसके बाद मुझे शिकार बनाना। लेकिन इस बार शिकारी मानने को तैयार न हुआ। बोला मैं पहले भी तुम्हें छोड़ चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करो, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। अनजाने में की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला।

मृग परिवार को दे दिया जीवनदान

शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया। अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।

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Maha Shivaratri (Abhishek of Panchamrit) 2020: महाशिवरात्रि पर पंचामृत से अभिषेक करने पर होगी सौभाग्य में वृद्धि, पितृदोष से मिलेगी मुक्ति

Maha Shivaratri (Abhishek of Panchamrit) 2020: भगवान शिव और मां पार्वती का विवाहोत्सव महाशिवरात्रि पर इस बार कई दुर्लभ संयोग बन रहे हैं। इनके चलते महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ का पूजन, रूद्राभिषेक, व्रत और जागरण कई गुना अधिक फलदायी होगी।

पंचामृत और अनार रस से अभिषेक

महाशिवरात्रि पर पंचामृत और अनार रस से भगवान का अभिषेक करने पर सौभाग्य की वृद्धि और पितृदोष से मुक्ति मिलेगी। साथ ही अकौन के फूल के साथ अबरख व ईत्र अर्पित करने से ऐच्छिक मनोकामना की पूर्ति और वैवाहिक बाधाएं दूर होंगी।

बना है दुर्लभ संयोग :

महाशिवरात्रि पर शनि और चंद्रमा के साथ मकर राशि में रहने से पंच महापुरुष योग में से एक शश राजयोग और विष योग का निर्माण होगा। मकर राशि में शनि बर्गोत्तम होगा। ऐसा महासंयोग इसके पूर्व वर्ष 1961 में भी महाशिवरात्रि पर बना था। इस तिथि पर सभी ग्रहों के चार स्थानों पर रहने से भगवान शिव से जुड़ा केदार योग भी बनेगा। इन खास संयोगों के बनने से शिव आराधना और विशेष सिद्धि में सफलता मिलेगी। वहीं देवगुरु बृहस्पति अपनी राशि धनु में और दैत्य गुरु शुक्राचार्य अपनी उच्च राशि मीन में रहेंगे।

21 को ही मनेगी महाशिवरात्रि :

महाशिवरात्रि शुक्रवार 21 फरवरी को ही मनेगी। फागुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी युक्त चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है। सूर्य पुराण के अनुसार इस दिन शिव धरती पर भ्रमण करने निकलते हैं।
इसलिए शिवरात्रि का पूजन व व्रत करने से वर्षभर के शिवरात्रि के समान फल की प्राप्ति होती है। लगातार चौदह वर्ष तक शिवरात्रि का व्रत-पूजन करने से एक हजार अश्वमेघ यज्ञ के समान व सौ वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।

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Mahashivratri (2020) par sarson ke tel se kare shivling ka abhishek: महाशिवरात्रि पर सरसों के तेल से करें शिवलिंग का अभिषेक, कुंडली के तमाम दोषों का होगा निवारण

Mahashivratri (2020) par sarson ke tel se kare shivling ka abhishek: फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि शुक्रवार 21 फरवरी को महाशिवरात्रि पर सूर्य कुंभ राशि और चंद्र मकर राशि में होगा तब महाशिवरात्रि मनाई जाएगी। महाशिवरात्रि 21 फरवरी की शाम 5:20 मिनट पर शुरू होगी और 22 फरवरी को शाम सात बजकर दो मिनट पर समाप्त होगी। रात्रि में पूजन का समय 12 बजकर नौ मिनट से रात्रि एक के बीच रहेगा।

 

दूध-दही से अभिषेक करें

Mahashivratri (2020) par sarson ke tel se kare shivling ka abhishek: महाशिवरात्रि पर इस बार 117 साल बाद फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को एक नायाब संयोग बन रहा है। शनि मकर में है और शुक्र अपनी उच्च की राशि मीन में होंगे। अगर किसी को अपना सूर्य मजबूत करना है सरकारी कामों में सफलता प्राप्त करनी है तो तांबे के लोटे में जल मिश्रित गुण से शिवलिंग का अभिषेक करें, वैवाहिक जीवन मधुर बनाने के लिए जोड़े से पति पत्नी शिवलिंग का अभिषेक करें, अगर कुंडली में मंगल पीड़ित है तो शिवलिंग का अभिषेक हल्दी मिश्रित जल से करें, अगर कुंडली में बुध की स्थिति खराब है तो शिव पार्वती की पूजा करें पूजन के बाद 7 कन्याओं को भोजन कराएं एवं जल और तुलसी पत्र चढ़ाएं, कुंडली में शुक्र को मजबूत करने के लिए दूध-दही से अभिषेक करें, कुंडली में शनि ग्रह पीड़ित है तो सरसों के तेल से अभिषेक करें, राहु ग्रह को मजबूत करने के लिए जल में 7 दाना जौ मिलाकर अभिषेक करें। Mahashivratri (2020) par sarson ke tel se kare shivling ka abhishek:

केतु को मजबूत करेगा जल में शहद

Mahashivratri (2020) par sarson ke tel se kare shivling ka abhishek: केतु ग्रह को मजबूत करने के लिए जल में शहद मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें। कुंडली में चंद्रमा को मजबूत करने के लिए कच्चे दूध से अभिषेक करें। गुरु ग्रह को मजबूत करने के लिए माथे पर और नाभि पर केसर का तिलक लगाएं। केसर मिश्रित जल चढ़ाएं शिवलिंग में सबसे ज्यादा एनर्जी पाई जाती है। इसके साथ 108 बार ओम नम: शिवाय का जाप करें।

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Mahashivratri(Shiva-Parvati marriage Celebration) 2020: ये है महाशिवरात्रि मनाने का ठोस कारण, महादेव ने वैराग्य छोड़कर गृहस्थ जीवन में किया था प्रवेश

Mahashivratri(Shiva-Parvati marriage Celebration) 2020: भगवान शिव-पार्वती के विवाह का उत्‍सव महाशिवरात्रि 21 फरवरी को देश भर में धूमधाम से मनाए जाने की तैयारी है। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने होती है, लेकिन शिव-पार्वती के विवाह की वर्षगांठ के रूप में महाशिवरात्रि साल में एक बार ही मनाई जाती है। फाल्‍गुन मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी को शिव और शक्ति के मिलन उत्‍सव के रूप में मनाते हैं। क्या आपको पता है कि महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है, इसके पीछे की घटना क्या है।

 

शिवजी प्रकट हुए थे

Mahashivratri(Shiva-Parvati marriage Celebration) 2020: पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था। ऐसा शिवलिंग जिसका न तो आदि था और न अंत। बताया जाता है कि शिवलिंग का पता लगाने के लिए ब्रह्माजी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए। दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला।

ऐसे हुई ज्‍योर्तिंलिंगों की उत्‍पत्ति

Mahashivratri(Shiva-Parvati marriage Celebration) 2020: एक कथा यह भी है कि महाशिवरात्रि के दिन ही शिवलिंग विभिन्न जगहों पर प्रकट हुए थे। उनमें से हमें केवल 12 जगह का नाम पता है। इन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंग के नाम से जानते हैं। महाशिवरात्रि के दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में लोग दीपस्तंभ लगाते हैं। दीपस्तंभ इसलिए लगाते हैं ताकि लोग शिवजी के अग्नि वाले अनंत लिंग का अनुभव कर सकें। यह जो मूर्ति है उसका नाम लिंगोभव, यानी जो लिंग से प्रकट हुए थे। ऐसा लिंग जिसकी न तो आदि था और न ही अंत।

शिव और शक्ति के मिलन की रात

Mahashivratri(Shiva-Parvati marriage Celebration) 2020: महाशिवरात्रि को पूरी रात शिवभक्त अपने आराध्य जागरण करते हैं। शिवभक्त इस दिन शिवजी की शादी का उत्सव मनाते हैं। मान्यता है कि महाशिवरात्रि को शिवजी के साथ शक्ति की शादी हुई थी। इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। शिव जो वैरागी थी, वह गृहस्थ बन गए। माना जाता है कि शिवरात्रि के 15 दिन पश्चात होली का त्योहार मनाने के पीछे एक कारण यह भी है।

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Maha Shivratri mrityunjaya upasana 2020: मौत से लगता है डर तो इस महाशिवरात्रि करें शिव के मृत्युंजय स्वरूप की उपासना

Maha Shivratri mrityunjaya upasana 2020: देवाधिदेव महादेव की महिमा निराली है इसलिए इन्हें देवों का देव कहा गया है। शिव पुराण में कहा गया है कि इनका हर रूप कल्याणकारी है। जिस पर भोलेनाथ की कृपा होती है उसके जीवन में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती है। भोलेनाथ भक्तों के लिए अपना दरबार हमेशा खुला रखते हैं। शिव के हर स्वरूप की महिमा अलग-अलग है। पुराणों में भगवान शिव के जिन स्वरूपों का वर्णन है वे निम्न प्रकार हैं:—

 

Maha Shivratri mrityunjaya upasana 2020:

मृत्युंजय:

भगवान शिव के मृत्युंजय स्वरूप की उपासना से मृत्यु पर भी विजय पाया जा सकता है। मृत्युंजय स्वरूप में भगवान शिव अमृत कलश के साथ भक्तों की रक्षा करते हैं। इनकी उपासना से अकाल मृत्यु को भी टाला जा सकता है। मृत्युंजय की पूजा से आयु की रक्षा और उत्तम सेहत का वरदान मिलता है। मृत्युंजय मंत्र- “ॐ हौं जूं सः” है।

महादेव:

Maha Shivratri mrityunjaya upasana 2020: शिव के इस स्वरूप से ही सभी देवताओं की उत्पत्ति हुई। साथ ही भगवान शिव के इस स्वरूप से ही शक्ति का उद्भव हुआ। सम्पूर्ण देवी-देवताओं की उत्पत्ति करने के कारण इन्हें महादेव कहा जाता है। कहते हैं कि भगवान शिव के इस स्वरूप की उपासना से सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा इनकी पूजा से ग्रहों की दशा ठीक रहती है।

नीलकंठ:

Maha Shivratri mrityunjaya upasana 2020: भगवान शिव के इस स्वरूप की महिमा बहुत निराली है। कहते हैं कि जब अमृत के लिए समुद्र मंथन हुआ था तब भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष को पीया था। शिव ने विष इसलिए पीया था कि संसार की रक्षा हो सके। हलाहल विष के पीने से शिव जी का कंठ नीला हो गया था। इस कारण इन्हें नीलकंठ कहा जाता है। शिव के इस स्वरूप की उपासना से शत्रु बाधा नहीं रहती है। इनके इस स्वरूप का मंत्र’- “ॐ नमो नीलकंठाय” है।

आशुतोष:

 

Maha Shivratri mrityunjaya upasana 2020: इस स्वरूप में भगवान शिव अपने भक्तों की भक्ति से बहुत जल्द खुश होते हैं। जल्द प्रसन्न होने के कारण इन्हें आशुतोष कहा गया है। मान्यता है कि मानसिक परेशानियों से निजात पाने के लिए आशुतोष स्वरूप की उपासना खास है। भगवान शिव के इस स्वरूप का मंत्र- “ॐ आशुतोषाय नमः” है।

रुद्र:

 

Maha Shivratri mrityunjaya upasana 2020: भगवान शिव के इस स्वरूप को रुद्र इसलिए कहा गया है कि इनमें संहारक शक्ति है। मान्यता है कि भगवान शिव के इस स्वरूप की भक्ति से मनुष्य में वैराग्य भाव उत्पन्न होता है। शिव के रुद्र स्वरूप की उपासना का मंत्र- “ॐ नमो भगवते रुद्राय” है।

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Mahashivratri 21 february 2020: देवों के देव महादेव को इस महाशिवरात्रि ऐसे करें प्रसन्न? इसलिए किया जाता है रुद्राभिषेक

Mahashivratri 21 february 2020:  इस बार यह त्योहार 21 फरवरी को मनाया जायेगा। इस दिन शश योग बनने से ये शिवरात्रि काफी विशेष मानी जा रही है। धार्मिक मान्यताओं अनुसार शिव और पार्वती के मिलन की रात्रि के महाशिवरात्रि कहा जाता है। महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा रात्रि के समय करना सबसे उत्तम माना गया है। Shiv Puja Vidhi

 

Maha shivratri 21 february 2020 (Mahashivratri) 2020 : हिंदू धर्म में भगवान शिव की अराधना का पर्व महाशिवरात्रि खास माना गया है। साल में आने वाली सभी शिवरात्रियों में से फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि का सबसे अधिक महत्व है।  Shiv Puja Vidhi

महाशिवरात्रि का शुभ मुहूर्त (Maha Shivratri Puja Muhurat):

शिवरात्रि की पूजा रात के समय की जाती है। जिसके लिए निशिता काल मुहूर्त सबसे उत्तम माना गया है। ये मुहूर्त 12:09 एएम से 01:00 एएम (22 फरवरी) तक रहेगा। शिवरात्रि व्रत के पारण का समय 22 फरवरी को 06:54 ए एम से 03:25 पी एम तक रहेगा। इस दिन चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 21 फरवरी शाम 05:20 पी एम पर हो जायेगा जिसकी समाप्ति 22 फरवरी की शाम 07:02 पी एम पर होगी।

महाशिवरात्रि पूजा के अन्य मुहूर्त…

रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय – 06:15 पी एम से 09:25 पी एम
रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय – 09:25 पी एम से 12:34 ए एम, फरवरी 22
रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय – 12:34 ए एम से 03:44 ए एम, फरवरी 22
रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय – 03:44 ए एम से 06:54 ए एम, फरवरी 22

(Shiv Puja Vidhi):

पूजा करने से पहले स्नान

शिवरात्रि के दिन भक्तों को शाम के समय पूजा करने से पहले स्नान कर लेना चाहिए। इस दिन शिव भगवान की पूजा रात्रि के समय करना सबसे उत्तम माना गया है। शिवरात्रि पूजा रात्रि के समय एक बार या चार बार की जा सकती है। पूजा के लिए सुबह स्नान करके भगवान शंकर को पंचामृत से स्नान कराएं। उसके बाद भगवान शिव को केसर युक्त जल 8 बार अर्पित करें। महाशिवरात्रि पर पूरी रात दीपक जलाकर रखें। शिव को चंदन का तिलक लगाकर तीन बेलपत्र, भांग, धतूरा, जायफल, फल, मिष्ठान, इत्र चढ़ाएं। केसर युक्त खीर बनाकर भोग लगाएं। पूजन के समय ॐ नमो भगवते रूद्राय, ॐ नमः शिवाय रूद्राय् शम्भवाय् भवानीपतये नमो नमः मंत्र का जाप करें। Shiv Puja Vidhi

 

रुद्राभिषेक का महत्व:

 

महाशिवरात्रि के दिन कई लोग भगवान शिव को खुश करने के लिए रुद्राभिषेक करवाते हैं। रुद्राभिषेक का मतलब है भगवान रुद्र का अभिषेक यानी कि शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों का उच्चारण करते हुए उनका अभिषेक करना। भगवान शिव का एक रूप रुद्र भी माना गया है। मान्यता है कि भगवान शिव का ये रूप लोगों के संकट दूर करता है। पौराणिक कथा अनुसार भगवान विष्णु और ब्रह्माजी ने रुद्राभिषेक किया था। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु की नाभि से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी को जब विष्णु भगवान ने उनकी उत्पत्ति का रहस्य बताया तो ब्रह्माजी ये मानने को तैयार नहीं हुए और दोनों में विवाद छिड़ गया और दोनों में युद्ध होने लगा। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का न तो आदि था और न अंत। ब्रह्मा और विष्णु जी ने इस लिंग के आधार और अंत तक पहुंचने की कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता हासिल न हो पाई। उन्होंने अपनी हार मान ली और लिंग का अभिषेक किया। जिससे भगवान शिव खुश हुए। कहा जाता है कि यहीं से रूद्राभिषेक आरंभ हुआ।

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Mahashivratri 2020 tarikh: इसलिए मनाई जाती है महाशिवरात्रि? इस दिन ये करना होता है

Mahashivratri 2020 tarikh: महाशिवरात्रि के दिन शिव के भक्त कांवड़ से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं।  महाशिवरात्रि के व्रत से जीवन में पाप और भाग का नाश होता है।

Mahashivratri 2020 tarikh:

शिवरात्रि हर महीने चतुर्दशी तिथि को पड़ती है लेकिन फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी महाशिवरात्रि कहते हैं। महाशिवरात्रि के दिन शिव के भक्त कांवड़ से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि का व्रत महिलाओं के लिए खास महत्व का है। मान्यता है कि अविवाहित कन्या विधिपूर्वक इस व्रत को रखती हैं तो शादी शीघ्र ही हो जाती है। विवाहित महिलाएं अपने सुखद वैवाहिक जीवन के लिए भी इस व्रत को धारण करती हैं। महाशिवरात्रि के विषय में मान्यता है कि इस दिन शिव और पार्वती का विवाह हुआ था। इस साल महाशिवरात्रि 21 फरवरी, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी।

महाशिवरात्रि का ये है महत्व:

ईशान संहिता के मुताबिक महाशिवरात्रि के दिन ज्योर्तिलिंग के रूप में शिव प्रकट हुए थे। इसलिए इस पर्व को महाशिवरात्रि के रूप में मनाते हैं। कहते हैं कि महाशिवरात्रि के व्रत से जीवन में पाप और भाग का नाश होता है। इसलिए इस व्रत को व्रतों का राजा कहा गया है।

महाशिवरात्रि पर ये करना चाहिए:

महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे अच्छा दिन माना गया है। इस दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करनी चाहिए। शिव-पूजन के लिए किसी शुद्ध पात्र (बर्तन) में जल भर कर उसमें गाय का दूध, बेलपत्र, धतूरे, अक्षत डालकर शिव लिंग पर चढ़ाएं। इसके अलावा महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को दूध या गंगाजल से अभिषेक करना बहुत शुभ माना गया है।
महाशिवरात्रि के शुभ मुहूर्त

चतुर्दशी तिथि आरंभ- शाम 5 बजकर 20 मिनट पर (21 फरवरी)

चतुर्दशी तिथि समाप्त- शाम 07 बजकर 02 मिनट पर (22 फरवरी)

पूजा में ध्यान रखें ये बातें

महाशिवरात्रि पर शिव की पूजा में विशेष सावधानी रखी जाती है। शिव पूजन के समय शिवलिंग पर भस्म चढ़ाना शुभ माना गया है। शिव को बिल्व पत्र बहुत प्रिय होता है। इसलिए शिव जी को बेल का पत्ता (बिल्व पत्र) अवश्य अर्पण करना चाहिए। इसके अलावा शिव-पूजन में धतूरा का इस्तेमाल भी करना चाहिए।