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Central Board of Secondary Education (CBSE) Top schools: ये हैं देश के टॉप CBSE स्कूलों की सूची, बच्चों को बना देते हैं जीनियस

Central Board of Secondary Education (CBSE) Top schools:आज के समय में माता-पिता बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए लाखों रुपये खर्च करते हैं, लेकिन इसके बाद भी सही और अच्छे स्कूल का चयन नहीं कर पाते हैं। हम यहां देश के टॉप (Central Board of Secondary Education) Top schools(CBSE): सीबीएसई स्कूलों की सूची लेकर आए हैं। अपने बच्चों को यहां एड​मिशन दिलाइए और उन्हें जीनियस बनाने के रास्ते पर भेज ​दीजिए।

 

DAV स्कूल
Central Board of Secondary Education (CBSE) Top schools: CBSE से संबद्ध टॉप स्कूलों में पहला नाम DAV ग्रुप ऑफ स्कूल्स का है। इनमें भी DAV सीनियर सेकेंडरी स्कूल, मोगप्पैर अव्वल है। 1989 में DAV ग्रुप ऑफ स्कूल्स के तहत स्थापित इस स्कूल को तमिलनाडु आर्य समाज एजुकेशनल सोसायटी चेन्नई मैनेज करती है। स्कूल में अच्छी क्लास, प्रयोगशालाएं हैं।

झारखण्ड का यह स्कूल भी टॉप
Central Board of Secondary Education (CBSE) Top schools: CBSE से संबद्ध टॉप स्कूलों में रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ, देवघर झारखंड लड़कों का आवासीय विद्यालय है। इसकी स्थापना 1922 में हुई थी। स्कूल छात्र के व्यक्तित्व विकास पर जोर देता है। इसी के चलते इसे भारत के टॉप CBSE स्कूलों में स्थान मिला है। स्कूल में बड़ा परिसर और प्रयोगशालाएं हैं। एक प्रशिक्षण और प्लेसमेंट सेल भी है।

DPS का जवाब नहीं
Central Board of Secondary Education (CBSE) Top schools: दिल्ली पब्लिक स्कूल (DPS) के सभी स्कूल का नाम टॉप स्कूलों की सूची में है, लेकिन नई दिलली के आरके पुरम का दिल्ली पब्लिक स्कूल सबसे टॉप है। 1972 में स्थापित इस स्कूल CBSE में प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा और एक साक्षात्कार देना होता है।

इस स्कूल का भी काफी नाम
Central Board of Secondary Education (CBSE) Top schools: चिन्मय अंतर्राष्ट्रीय आवासीय विद्यालय (CIRS), कोयंबटूर 1996 में स्थापित किया गया था। स्कूल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में विश्वास करता है। बच्चे को शारीरिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक स्तर पर ढालने का प्रयास करता है।

(KVS) केवीएस और जेएनवी है बेहतरीन
Central Board of Secondary Education (CBSE) Top schools: सरकारी स्कूलों की बात करें तो केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) और जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) की गिनती स्वयं CBSE नायाब हीरे के तौर पर करता है। JNV में प्रवेश के लिए जवाहर नवोदय विद्यालय चयन परीक्षा होती है। इसकी वेबसाइट पर जाकर पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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शरीर की शुगर को खा जाती है चमत्कारी चिरौंजी, खांसी में भी असरकारक

चिरौंजी मतलब चमत्कार। खाने में स्वादिष्ट आकार में छोटा सा चिरौंजी नामक सूखा मेवा आयुर्वेद की कई दवाओं का आधार होने के साथ ही स्वयं भी छोटे—मोटे वैद्य से कम नहीं है। इसके सेवन से मधुमेह के उन रोगियों का दवाओं से पीछा छूट सकता है जिन्हें खा—खाकर वे थक गए हैं। बिल्कुल ये हम नहीं वर्ष 2010 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित एक शोध कह रहा है कि चिरौंजी का इस्तेमाल खांसी के उपचार के लिए और शक्तिवर्धक के तौर पर किया जाता है। चिरौंजी के तेल का उपयोग चर्मरोग के इलाज में भी कारगर है। वर्ष 2013 में ट्रॉपिकल जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल रिसर्च में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया कि चिरौंजी का नियमित सेवन मधुमेह के रोगियों के रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है। एनल्स ऑफ बायोलॉजिकल रिसर्च नामक जर्नल में वर्ष 2011 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, चिरौंजी के फल और छाल से बना लेप सर्पदंश के उपचार में कारगर है। फार्माकॉलॉजी ऑनलाइन जर्नल में वर्ष 2010 में प्रकाशित शोध ने भी चिरौंजी की जड़ से बनी दवा से अतिसार के उपचार की पुष्टि की थी। चिरौंजी खांसी, अतिसार और मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद है। चिरौंजी का इस्तेमाल मेवे की तरह होता है और स्थानीय बाजारों में ऊंची कीमत पर इसे बेचा जाता है।

चिरौंजी के पेड़ मुख्यतः ऊष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के शुष्क इलाकों में पाए जाते हैं। लेकिन उन्हें समुद्र तल से 1,200 मीटर की ऊंचाई तक वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सदाबहार श्रेणी के चिरौंजी के पेड़ जंगलों में 18 मीटर तक ऊंचे हो सकते हैं। भारत में इसके पेड़ बागानों में भी उगाए जाते हैं।

गाय के दूध में पीसकर पीते हैं आदिवासी

चिरौंजी का वानस्पतिक नाम बुकानानिया लांजन है और अंग्रेजी में ‘आमंडेट’ के नाम से जाना जाता है। चिरौंजी भारत में झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के वाराणसी व मिर्जापुर जिलों में पाया जाता है।
चिरौंजी का फल पियार 4-5 महीने में पकता है और इसे अप्रैल-मई के महीने में तोड़ा जाता है। तोड़ने के बाद हरे रंग का फल काला पड़ जाता है। चिरौंजी निकालने के लिए इस फल को रात भर पानी में डालकर रखा जाता है और इसके बाद जूट के बोरे से रगड़-रगड़कर बीज अलग कर लिया जाता है। इसके बाद इसे पानी से अच्छी तरह से धोकर धूप में सुखाया जाता है।
झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी चिरौंजी का इस्तेमाल घाव के उपचार के लिए करते हैं। चिरौंजी इन आदिवासियों के जीवनयापन का एक बड़ा साधन भी है। उत्तर प्रदेश सोनभद्र के आदिवासी समुदाय के लोग चिरौंजी के पेड़ से गोंद और लाख इकट्ठा करके बाजार में बेचकर आय कमाते हैं। आंध्र प्रदेश के कुछ आदिवासी चिरौंजी के गोंद को गाय के दूध में मिलाकर पीते हैं। उनका मानना है कि इससे गठिया का दर्द दूर होता है। पिछले कुछ दशकों से चिरौंजी की मांग शहरी बाजारों में बढ़ने की वजह से इसका बड़ी मात्रा में संग्रह और पेड़ों की गलत तरीके से छंटाई की वजह से जंगलों में चिरौंजी के पेड़ तेजी से कम हुए हैं।

त्रिदोषहर भी मानता है आयुर्वेद

चरक संहिता, भाव प्रकाश, चक्रदत्त और चिरंजीव वनौषधि के अनुसार चिरौंजी का नियमित सेवन शरीर में कफ, वात और पित्त को नियंत्रित रखता है और खून को भी साफ रखता है। आयुर्वेद में चिरौंजी के तेल से दवाई बनाई जाती है। हृदय रोग और खांसी के उपचार में काम आता है। साथ ही मस्तिष्क के लिए टॉनिक का भी काम करता है।
चिरौंजी के पेड़ की छाल का इस्तेमाल चमड़े की सफाई के लिए किया जाता है। चिरौंजी का पेड़ बड़ी मात्रा में गोंद का उत्पादन करता है। इस गोंद का इस्तेमाल सस्ती औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है। खराब गुणवत्ता के कारण इसकी लकड़ी का इस्तेमाल जलावन के तौर पर या चारकोल बनाने में किया जाता है।

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झारखंड पर पांच साल तक अपराधियों ने शासन किया! इस रिपोर्ट में है पूरी डिटेल!

अगर आपको देश को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स और झारखंड इलेक्शन वाच की रिपोर्ट पर भरोसा है तो जान ​लीजिए कि झारखंड में बीते पांच साल अपराधियों ने शासन किया। राज्य विधानसभा के 38 विधायकों के खिलाफ संगीन आपराधिक मामले और 11 के खिलाफ अन्य तरह के मामले पेंडिंग हैं और विभिन्न अपराधों के इन्हीं आरोपियों ने प्रदेश के लिए न सिर्फ बजट पास किया बल्कि कई कानून भी बनाए। झारखंड विधानसभा के 79 विधायकों में से 49 यानी 62 प्रतिशत विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं और उनमें से 38 के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं।

भारतीय जनता पार्टी के मनीष जायसवाल सबसे अमीर विधायक हैं और उनकी कुल संपत्ति 18 करोड़ रुपए से ज्यादा है जबकि दूसरे और तीसरे स्थान पर कांग्रेस के देवेंद्र कुमार सिंह तथा आलमगीर आलम हैं जिनकी कुल संपत्ति 10 करोड़ और छह करोड़ रुपए से अधिक है।
एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म तथा झारखंड इलेक्शन वाच की एक रिपोर्ट के अनुसार भाजपा के 36 विधायकों में से 11 आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं जबकि कांग्रेस के आठ विधायकों में से पांच आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के 18 विधायकों में से 11 आपराधिक पृष्ठभूमि हैं। झारखंड विकास मोर्चा के आठ में से पांच विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं।

 

रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान विधायकों में से तीन के खिलाफ हत्या के मामले दर्ज हैं जबकि 10 के खिलाफ हत्या के प्रयास के मामले दर्ज हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 79 में से 41 यानी 52 प्रतिशत करोड़पति हैं जिनमें भाजपा के 21 तथा झामुमो के नौ, कांग्रेस के पांच तथा झाविमो के तीन सदस्य करोड़पति हैं। इन विधायकों की औसत संपत्ति 1.84 करोड़ रुपए है।

विधानसभा के नौ सदस्यों ने अभी तक अपनी आय घोषित नहीं की है इनमें अमित कुमार मंडल की कुल संपत्ति पांच करोड़ 49 लाख से ज्यादा है लेकिन उन्होंने आयकर फाइल नहीं किया है। हलफनामे में 28 विधायकों ने अपनी शिक्षा के बारे में जानकारी दी है और उनकी शिक्षा आठवीं से 12वीं उत्तीर्ण हैं जबकि 50 विधायक स्नातक हैं।

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इन राज्यों में छप्पर फाड़कर मिले वोट, गिनने वालों के भी थक गए थे हाथ

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने दावे के अनुरूप हिन्दी पट्टी के 14 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में से 10 में उसने अकेले दम पर और दो राज्यों में अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल कर ली है। भाजपा चुनाव से पहले कह रही थी कि इस बार उसका लक्ष्य 50 प्रतिशत वोट का है और हिंदी पट्टी के यह कारनामा कर दिखाया। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा को 49.56 प्रतिशत मत मिले हैं और उसने 62 सीटें जीती हैं। पिछले चुनाव में राज्य में उसे 42.63 प्रतिशत मत मिले थे और 71 सीटें उसकी झोली में गयी थीं।

अन्य राज्यों में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली, चंडीगढ़, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में उसने अकेले ही 50 प्रतिशत से ज्यादा मतों पर कब्जा किया है। महाराष्ट्र और बिहार में उसने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 50 प्रतिशत से अधिक सीटों पर कब्जा किया है। गुजरात में पार्टी को 62.21 प्रतिशत मत मिले और सभी 26 की 26 सीट उसकी झोली में गयी। पिछली बार 60.11 प्रतिशत मतों के साथ उसने सभी सीटें जीती थीं। राजस्थान में 58.47 प्रतिशत मतों के साथ पार्टी में 25 में से 24 सीटों पर अपना परचम लहराया है। पिछली बार वहाँ 55.61 प्रतिशत मत हासिल कर उसने सभी 25 सीटों पर कब्जा किया था।

मध्य प्रदेश में भाजपा को 58 प्रतिशत मत मिले और उसने 29 में से 28 सीटें जीतीं। पिछली बार 54.76 प्रतिशत मतों के साथ उसे 27 सीट मिली थी। हरियाणा में पार्टी ने अपने प्रदर्शन में जबरदस्त सुधार किया है। पिछली बार 34.84 प्रतिशत मत के साथ सात सीट जीतने वाली पार्टी ने 58 प्रतिशत वोट के साथ सभी सात सीटों पर अपना परचम लहराया। झारखंड में भाजपा को 50.96 प्रतिशत मत मिले और उसने 11 सीटें जीतीं। पिछली बार उसने राज्य में 40.71 प्रतिशत मत हासिल किया था और उसे 12 सीटें मिली थीं।

पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी 50 प्रतिशत का आँकड़ा पार कर लिया। पिछली बार उसे 46.63 प्रतिशत मत मिले थे और इस बार यह आँकड़ा 56.56 प्रतिशत पर पहुँच गया। यहाँ वह सभी सात सीटों पर अपना कब्जा बनाये रखने में कामयाब रही। चंडीगढ़ की एक मात्र सीट पर भी उसका मत प्रतिशत 42.49 से बढ़कर 50.64 पर पहुँच गया। उत्तराखंड में पार्टी ने सभी पाँच सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है और मत प्रतिशत 55.93 से बढ़ाकर 61.01 प्रतिशत करने में कामयाब रही। हिमाचल प्रदेश में भी वह अपनी सभी चार सीटें बचाने में कामयाब रही। यहाँ उसका मत प्रतिशत 53.85 से बढ़कर 69.11 पर पहुँच गया। महाराष्ट्र में भाजपा का शिवसेना से गठबंधन है। वहाँ भाजपा को 27.59 प्रतिशत और शिवसेना को 23.29 प्रतिशत वोट मिले हैं। इस प्रकार यहाँ भी दोनों मिलकर 50 प्रतिशत का आँकड़ा पार करने में सफल रही। पिछली बार राज्य में भाजपा को 27.56 प्रतिशत और शिवसेना को 20.82 प्रतिशत मत मिले थे।

बिहार में भाजपा को 23.58 प्रतिशत और उसकी सहयोगी दलों जनता दल (यू) को 21.81 प्रतिशत तथा लोक जनशक्ति पार्टी को 7.86 प्रतिशत मत मिला है। पिछली बार भाजपा को 29.86 प्रतिशत और लोजपा को 6.50 प्रतिशत मत मिले थे जबकि जदयू उस समय भाजपा के खिलाफ खड़ी थी। सिर्फ पंजाब और जम्मू-कश्मीर में वह 50 प्रतिशत के लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी। पंजाब में भाजपा शिरोमणी अकाली दल (एसएडी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। वहाँ भाजपा को 9.63 प्रतिशत मत और दो सीट तथा एसएडी को 27.45 प्रतिशत मत और दो सीट मिली। जम्मू-कश्मीर में भाजपा भले ही 50 प्रतिशत का आँकड़ा नहीं छू पायी हो, लेकिन इसके काफी करीब पहुँचने में कामयाब रही। वहाँ भाजपा को 46.39 प्रतिशत मत मिले जबकि पिछली बार 32.65 प्रतिशत मत मिले थे। यहाँ पार्टी ने पिछली बार की तरह ही तीन सीट जीती है।

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बोकारो जिले के पिंड्राजोरा थाना क्षेत्र में पंचायत के मुखिया ने गोली चलाई ये था बड़ा कारण

झारखंड में बोकारो जिले के पिंड्राजोरा थाना क्षेत्र के घटियाली पूर्वी पंचायत के मुखिया ने एक जुलूस के दौरान दो युवकों को गोली मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया। पुलिस अधीक्षक कार्तिक एस ने यहां बताया कि मुखिया निरंजन कपरदार ने मनसा पूजा के जुलूस के दौरान देर शाम राकेश सेन और रामटी कपरदार को गोली मार दी

crime
crime

 

जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गयें। उन्होंने बताया कि आरोपी मुखिया पूर्व में एक अपराधिक मामले में जेल जा चुका है और उसी मामले में राकेश और रामटी ने कोर्ट में गवाही दी थी। इसी से नाराज मुखिया निरंजन ने इस घटना को अंजाम दिया है। कार्तिक ने बताया कि घायलों को बोकारो सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना को अंजाम देने के बाद मुखिया मौके से फरार हो गया । उन्होंने बताया कि आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस छापेमारी कर रही है।

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05 जून 2019 तक झारखंड हो जाएगा प्लास्टिक मुक्त,इस बड़े नेता ने किया दावा

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने दावा किया कि अगले एक साल में राज्य को प्लास्टिक से से मुक्त कर दिया जाएगा। दास ने यहां विश्व पर्यावरण दिवस पर आयोजित बीट प्लास्टिक पोल्यूशन कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुये कहा कि 05 जून 2019 तक झारखंड को प्लास्टिक मुक्त कर दिया जाएगा। उन्होंने सवा तीन करोड़ झारखंडवासियों से आह्वान किया कि वे राज्य को प्लास्टिक मुक्त कर दें।कार्यालय हो, घर हो या बाजार, गांव हो, बस्ती हो या नगर प्लास्टिक कहीं भी ना दिखे। उन्होंने कहा कि जन भागीदारी से प्लास्टिक उपयोग के विरुद्ध जनान्दोलन शुरू होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि विश्व भर में पर्यावरण प्रदूषण ऐसे हो रहे हैं

plastic free.

कि मछलियां मर रही हैं और नदियों में जहर घुल रहा है। भारतीय संस्कृति में धरती हमारी मां है और आने वाली संततियों के लिए धरती और उसके पर्यावरण की रक्षा का प्रण लें।उन्होंने कहा कि प्लास्टिक को पूर्णतः प्रकृति में मिलने पांच सौ से एक हजार वर्ष लगता है तथा इस दौरान कई विषैली गैस उत्सर्जित होती है।प्लास्टिक की रिसाइकिलिंग का संयंत्र झारखंड में लगेगा।सभी बिजली संयंत्रों की बाध्यता होगी कि वे रिसाइकल पानी का उपयोग करें।उन्होंने कहा कि उपयोग किए गए पानी को रिसाइकल कर विद्युत संयंत्र को उपयोग के लिए दिया जाए।दास ने कहा कि जल, जंगल, जमीन और जलवायु की रक्षा के साथ झारखंड को ग्रीन ईकोनोमी का राज्य बनाया जाएगा।

वनोत्पाद को तथा उसके उपयोग को बढ़ावा देना होगा।गांव, बस्ती एवं शहर से लेकर विश्वस्तर पर इसके लिए बाजार बनाने की जरूरत है।बांस, लकड़ी की लुग्दी, सन, सीमल, साल पत्ता, महुआ पत्ता को बढ़ावा दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने 01 जून 2018 को प्लास्टिक के इन्ही विकल्पों को सुझाया है। उन्होंने कहा कि साहेबगंज तथा पाकुड़ में जूट की खेती को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

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झारखंड में 24 मई से 07 जून 2018 तक जल संचयन पखवाड़ा मनाया जायेगा

झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि उनकी सरकार ने राज्य में जल संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चलायें है ताकि इसके माध्यम से किसानों की आय दुगुनी की जा सके। दास ने यहां मेराल गांव में जल संचयन पखवाड़ा के शुभारंभ कार्यक्रम को संबोधित करते हुये कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट निर्देश राज्य सरकारों को प्राप्त हुआ है

Water harvesting
Water harvesting

 

कि प्रदेश के तालाबों का जीर्णोद्धार कार्य बरसात से पूर्व कर लिया जाए ताकि जल संरक्षण कर कृषि कार्य और भूमीगत जल का संवर्धन सुनिश्चित हो सके।उन्होंने कहा कि इस बात को ध्यान में रखते हुए 24 मई से 07 जून 2018 तक जल संचयन पखवाड़ा मनाया जायेगा। पखवाड़ा के तहत राज्य भर के दो हजार निजी और सरकारी तालाबों का जीर्णोद्धार होगा। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसानों की आय दुगुनी करने के साथ ही आधुनिक खेती का बढ़ावा देना चाहती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आजादी मिलने और झारखंड राज्य गठन के 18 वर्ष गुजर जाने के बाद भी प्रदेश की सिंचाई क्षमता मात्र 13 प्रतिशत ही है। यह चिंता का विषय है,

इसमें सुधार लाने की जरूरत है। यह पखवाड़ा सिंचाई की प्रतिशत को बढ़ाने एवं किसानों के आर्थिक विकास में सहायक होगा। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास है सिंचाई के साधन में बढ़ोतरी हो और किसान एवं गरीबों के जीवन मे बदलाव आये। वर्षा जल कैसे संरक्षित हो इस दिशा में राज्य का हर व्यक्ति सोचे। समय रहते हमें इस दिशा में ठोस पहल मिलकर करनी होगी।

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झारखंड से शुरू हुये पत्थलगढ़ी आन्दोलन ने अब छत्तीसगढ़ में पसारे पैर

झारखंड से शुरू हुये आदिवासियों के पत्थलगढ़ी आन्दोलन ने अब छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के चार गांवों में भी अपने पैर पसार लिए हैंसूत्रों के मुताबिक आदिवासियों को जल जंगल जमीन पर उनका अधिकार के नाम पर एकजुट करने के इस आन्दोलन को अब पड़ोस के सरगुजा और रायगढ़ जिले के गांवों में भी विस्तार करने की तैयारी शुरू कर दी गई है।

Pathaldhari Movement
Pathaldhari Movement

 

जिले के बगीचा विकासखंड अन्तर्गत बच्छरांव, गैलूंगा, कलिया और बुटूंगा गांव के लोगों ने यहां शासकीय कर्मचारियों के प्रवेश प्रतिबंधित के सूचना बोर्ड लगा दिए हैं। इन गांवों के अलावा आस पास के अन्य गांवों में भी इस आन्दोलन का विस्तार करने के लिए ग्रामीणों की बैठकों का दौर शुरू हो गया है। बगीचा एसडीएम हितेश कुमार बघेल ने बताया कि यहां के ग्रामीण अचंल में पत्थलगढ़ी आन्दोलन की खबरों के बाद स्थिति पर नजर रखी जा रही है। अब तक इस अंचल के सभी गांवों में स्थिति पूरी तरह सामान्य है।

ग्राम पंचायत कलिया की महिला सरपंच प्रसन्नचित टोप्पों ने कहा है कि 5 वीं अनुसुचि के नाम पर किया जा रहा पत्थलगढ़ी आन्दोलन को लेकर पड़ोसी राज्य झारखंड तथा अन्य राज्यों से आए लोगों ने गांव में बैठकें ली थी। इसके बाद गांव की सरहद पर शासकीय कर्मचारी, मीडिया तथा अन्य लोगों को बगैर अनुमति के प्रवेश लेने की मनाही करने की सूचना दर्ज की गई थी।  उन्होने कहा कि हालांकि पत्थर के बोर्ड स्थापित करने के बाद भी गांवों में सभी लोगों की पहले की तरह ही आवाजाही हो रही है।

उन्होने कहा कि इन गांवों में राजस्व, वन विभाग के कर्मचारी बेखोफ आवाजाही कर अपना काम कर रहे हैं।वहीं बगीचा के समीप का बच्छरांव तथा अन्य 3 गांवों में भी पत्थर के बोर्ड बना कर सूचना दर्ज कर दी गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पत्थलगढ़ी आन्दोलन से जुड़े बाहर के लोग यहां ग्रामीणों की बैठक लेकर जल ,जंगल जमीन पर आदिवासियों का अधिकार की बात करके उन्हे शासन से बगावत करने की बात कह रहे हैं, लेकिन ज्यादातर ग्रामीण इस आन्दोलन में अभी तक रूचि नहीं ले रहे हैं।

राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष कृष्णकुमार राय ने आरोप लगाया कि पत्थलगढ़ी के माध्यम से ईसाई मिशनरी अपना समाप्त हो रहा वजूद को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होने कहा कि झारखंड और छत्तीसगढ़ में आदिवासियों का धर्मान्तरण की घटना बन्द हो जाने के बाद ईसाई मिशनरियों ने ही यह नया कारनामा शुरू किया है।

राय ने कहा कि जशपुर जिले में ईसाई मिशनरी पहले भी इसी तरह के षड़यंत्र कर ग्रामीणों को भड़काने का काम कर चुकी है।इन आरोपों पर जशपुर जिले में कुनकुरी के बिशप स्वामी ईमानुवेल केरकेटटा ने कहा कि चुनाव से पहले भाजपा के लोग आरोप लगाते रहे हैं। इस बार भाजपा ने पत्थलगढ़ी आन्दोलन को लेकर मसीही समुदाय को बदनाम करने की साजिश शुरू कर दी है। पत्थलगढ़ी की घटना का ईसाई धर्म से कोई लेनादेना नहीं है।

 

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अजब गजब खबर: अंडे डेढ हजार और वजन सिर्फ सौ ग्राम

क्या आप जानते हैं कि मात्र सौ ग्राम से कुछ अधिक वजन की तिलापिया एक बार में डेढ हजार से अधिक अंडे दे सकती है। खाने में बेहद स्वादिष्ट तिलापिया नामक मछली की इस खूबी की वजह से ही अब बंगाल से झारखंड तक इस मछली को किसान खूब पाल रहे हैं। तिलापिया प्रजाति की मछली दस साल तक जीवित रह सकती है और इसका वजन पांच किलो तक हो सकता है।

देश के विभिन्न हिस्सों विशेष कर पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश ,तमिलनाडु और झाारखंड में व्यावसायिक पैमाने पर तिलापिया का पालन शुरु किया गया है। झारखंड सरकार इस मछली के पालन करने वाले किसानों प्रोत्साहन राशि भी दे रही है। इस किस्म की मछली के पालन के पीछे किसानों की बढ़ती रुचि का बड़ा कारण यह है कि इनके पालन का खर्च कम है अौर इसकी प्रजनन क्षमता अधिक है। इस किस्म की मछलियों की अमेरिका, यूरोप और जापान में निर्यात की भारी संभावना है।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार तेजी से बढने वाली मछली की इस किस्म का पालन विश्व के 85 देशों में किया जा रहा है तथा विभिन्न देशों इसके पालन में तेजी आयी है। तिलापिया की कुल 70 किस्में विश्व में पायी जाती है जिनमें से नौ प्रजातियों का व्यावसायिक पालन किया जाता है। इनमें मोजाम्बिक तिलापिया, नीली तिलापिया, नाईल तिलापिया, जंजीबार तिलापिया और लाल बेली तिलापिया प्रमुख है।

उथले जल में रहना पसंद करने वाली यह मछली सर्वभक्षी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें तीव्र प्रजनन क्षमता है और पांच छह माह में ही लैंगिक रुप से परिपक्व हो जाती है । उसके शरीर के भार के अनुरुप होती है । एक सौ ग्राम वजन वाली तिलापिया करीब एक सौ अंडे देती है जबकि 100 ग्राम से 600 ग्राम वजन की मादा 1000 से 1500 अंडे देती है । नाईल प्रजाति की मछली दस साल तक जीवित रह सकती है और इसका वजन पांच किलो तक हो सकता है।

तिलापिया के नर का विकास और वजन तेजी से बढने के कारण वैज्ञानिकों ने आनुवांशिक हेरफेर, मानवीय लैंगीकरण और प्रत्यक्ष हार्मोनल लिंग उत्क्रमण विधि से मोनोसेक्स (केवल नर) तैयार करने की तकनीक विकसित कर ली है।

देश में 1970 से नाईल तिलापिया का पालन शुरु किया गया था। वर्ष 2005 में यमुना नदी में मामूली संख्या में छोड़ा गया था लेकिन दो साल में ही इसका अनुपात नदी में कुल मछली प्रजातियों का लगभग 3.5 प्रतिशत हो गया था। गंगा नदी में तिलापिया का अनुपात कुल मछली प्रजातियों का करीब सात प्रतिशत है।

विशेषज्ञों के अनुसार छिछले पानी में रहने के कारण किसान इसका पालन धान के खेतों में भी कर सकते हैं। तालाब में यदि मोनोसेक्स का पालन किया जाता है और नियमित रुप से आहार के साथ ही पूरक आहार दिया जाता है तो एक हेक्टेयर के तालाब में एक साल में इसका उत्पादन 8000 किलोग्राम तक हो सकता है। तिलापिया का पालन अन्य देसी मछलियों के साथ भी किया जा सकता है। पिंजरा में भी इसका पालन किया जाता है।