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टेराकोटा के घोड़े और बैल ने यूरोप में झंडे गाड़े, ऊंट और बकरी भी पीछे नहीं

सदियों पुरानी पारंपरिक कला टेराकोटा को जीआई टैग के साथ ही बौद्धिक संपदा अधिकारों के एक घटक का दर्जा मिल गया है। टेराकोटा ऐसी कला है जिसमें कुम्हार हाथ से विभिन्न जानवरों की मूर्ति जैसे कि घोड़े, हाथी, ऊंट, बकरी, बैल आदि बनाते हैं।

टेराकोटा शिल्प को जीआई टैग

टेराकोटा शिल्प को पिछले गुरुवार को जीआई टैग दिया गया था। इसके लिये गोरखपुर के औरंगाबाद गुलेरिया के लक्ष्मी टेराकोटा मूर्तिकला केंद्र ने आवेदन किया था। खासकर सजे-धजे टेराकोटा घोड़े न सिर्फ इन इलाकों की पहचान हैं, बल्कि दुनिया में भी इन्होंने अपनी कला के झंडे गाड़े हैं। कुम्हार चाक पर अलग-अलग हिस्सों को आकार देने के बाद में उन्हें जोड़ कर एक आकृति तैयार करता है। शिल्प कौशल के कुछ प्रमुख उत्पादों में हौदा हाथी, महावतदार घोड़ा, हिरण, ऊँट, पाँच मुँह वाले गणेश, एकल-हाथी की मेज, झाड़ लटकती हुई घंटियाँ आदि हैं। पूरा काम हाथों से किया जाता है। कारीगर प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं। रंग लम्बे समय तक तेज रहता है।

पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकार

स्थानीय कारीगरों द्वारा डिजाइन किए गए टेराकोटा काम की 1,000 से अधिक किस्में हैं। गोरखपुर में शिल्पकार मुख्य रूप से गोरखपुर के चरगवां ब्लॉक के भटहट और पडऱी बाजार, बेलवा रायपुर, जंगल एकला नंबर-1, जंगल एकला नंबर -2, औरंगाबाद, भरवलिया, लंगड़ी गुलेरिया, बुढाडीह, अमवा, एकला आदि गाँवों में बसे हुए हैं। गौरतलब है कि जीआई टैग को औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिए पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों के एक घटक के रूप में शामिल किया गया है।

दार्जिलिंग टी जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई का विनिमय विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं पर समझौते का तहत किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं का भौगोलिक सूचक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 के तहत किया जाता है, जो सितंबर 2003 में लागू हुआ था। वर्ष 2004 में दार्जिलिंग टी जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद है। जीआई का उपयोग कृषि उत्पादों, हस्तशिल्प, औद्योगिक उत्पादों आदि के लिए किया जाता है।

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कार्बेट के हाथी अब स्वच्छ शौचालयों में मल त्याग करेंगे, गैंडे के लिए भी बनेंगे वाशरूम

उत्तराखंड राज्य वन्य जीव परिषद (बोर्ड) ने कार्बेट और राजाजी राष्ट्रीय पार्क के बाघों और हाथियों की अधिकतम धारण क्षमता का अध्ययन कराने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अध्यक्षता में बोर्ड की 14वीं बैठक में कई निर्णय लिए गए। इसमें कार्बेट टाइगर रिजर्व में प्रायोगिक तौर पर गैण्डे का रिइन्ट्रोडक्शन करने और मानव वन्य जीव संघर्ष से प्रभावित गांवों में वॉलण्टरी विलेज प्रोटेक्शन फोर्स की स्थापना जल्द से जल्द किये जाने के निर्देश दिये गये। साथ ही यह भी तय किया गया कि हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर बंदरों को पीड़क घोषित करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा। गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान में गरतांग गली ट्रेल में मार्ग निर्माण उसके प्राचीन स्वरूप को बनाए रखते हुए करने का निर्णय लिया गया। प्रदेश में संरक्षित क्षेत्रों के निकट स्थित टोंगिया तथा अन्य ग्रामों में सोलर लाईट, शौचालय जैसी आवश्यक सुविधाएं नियमानुसार उपलब्ध करवाने के काम को प्राथमिकता से करने के भी निर्देश दिये गये।

गैण्डे के रिइन्ट्रोडक्शन के संबंध में प्रस्तुतिकरण में बताया गया कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की भौगोलिक तथा पर्यावरणीय परिस्थितियां गैण्डे के अनुकूल है। गैण्डे द्वारा मानव के साथ संघर्ष की जीरो सम्भावना होती है और यह अन्य जीवों के लिए भी सहायक होता है। इससे राज्य में पर्यटन गतिविधियां भी काफी बढ़ेंगी। इस पर बोर्ड द्वारा कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में प्रायोगिक तौर पर गैण्डे का रिइन्ट्रोडक्शन पर सहमति दी गई।
मछलियों को पकड़ने में अवैधानिक तरीकों के प्रयोग को रोकने के लिए युवक मंगल दलों, महिला मंगल दलों, वन पंचायतों का सहयोग लिया जाए। संरक्षित क्षेत्रों से दूसरे स्थानों पर बसाए जाने पर वन्य ग्रामों के लोगों भूमि संबंधी वही अधिकार मिलने चाहिए जो कि उन्हें अपनी पहले की भूमि पर प्राप्त थे। इसके लिए भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा जाए।

राज्य वन्य जीव बोर्ड द्वारा संरक्षित क्षेत्रों के अंतर्गत तथा संरक्षित क्षेत्रों के 10 किलोमीटर की परिधि में आने वाली वन भूमि हस्तांतरण तथा अन्य प्रकरणों पर स्वीकृति प्रदान की गई। इनमें लखवाड़ बहुउद्देशीय परियोजना के निर्माण के लिए अधिग्रहीत भूमि की राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड से अनुमति प्राप्त करने के लिए प्रस्ताव भेजने, रूद्रप्रयाग के उखीमठ नगर पंचायत में पेयजल योजना के लिए पाईप लाईन बिछाने की अनुमति, जनपद अल्मोड़ा में एनटीडी-कफड़खान मोटरमार्ग के दो किलोमीटर से ग्राम भूल्यूड़ा सब्जी उत्पादन क्षेत्र हेतु मोटरमार्ग का नवनिर्माण, रामनगर-लालढांग मोटर मार्ग के नौ किलोमीटर तथा 13 किलोमीटर में सेतु का निर्माण, सोनप्रयाग से त्रिजुगीनारायण तथा कोठियालसैण से ऊषाड़ा तक मोटरमार्ग के किनारे ओएफसी लाईन बिछाए जाने की अनुमति के लिए प्रस्ताव भेजना प्रमुख हैं।

बैठक में वन मंत्री डा.हरक सिंह रावत, विधायक ससुरेश राठौर, दीवान सिंह बिष्ट, प्रमुख सचिव आनंद बर्द्धन, मुख्य वन संरक्षक जयराज, पुलिस महानिदेशक, कानून व्यवस्था अशोक कुमार सहित वन विभाग के अधिकारी और राज्य वन्य जीव परिषद के अन्य सदस्य उपस्थित थे।

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जयमल और पत्ता ने छुडा दिए थे औरंगजेब के पडदादा के छक्के (पार्ट-10)

आपसी फूट की वजह से भले ही मुगलों ने भारत पर कब्जा कर लिया था, लेकिन चित्तौड के दो ऐसे वीर भी थे, जिन्होंने औरंगजेब के पडदादा अकबर के छक्के छुडा दिए थे। चित्तौड के वे वीर थे जयमल और पत्ता। युद्ध के मैदान में उनकी तलवारों के जौहर को फिर अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों की कोई भी पीढी भुला नहीं पाई थी और इसी वजह से दिल्ली के लालकिले के दरवाजे पर जयमल और पत्ता की मूर्तियां लगवा ​दी गई थी। इतिहासकारों के मुताबिक वे मूर्तियां उन्हें हर समय याद दिलाती रहती थी कि भारत भूमि वीरों से खाली नहीं है। फ्रांसीसी यात्री बर्नियर के यात्रा वृतांत के अनुसार किले में शाही महलसरा और अनेक महल है, लेकिन इससे आप यह न समझे कि यह फ्रांस के ल्वायर या स्पेन के स्क्यूलियर की भांति है क्योंकि यहां की कोई वस्तु यूरोप की इमारतों से नहीं मिलती। किले के दरवाजे पर कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसका वर्णन किया जाय। हां, उसके दोनों ओर दो बड़े बडे पत्थर के हाथी बनाकर खड़े किए गए है। जिनमें से एक पर चित्तौड के सुविख्यात राजा जयमल और दूसरे पर उनके भाई पत्ता की मूर्ति है।

यह दोनों भाई बडे वीर और पराक्रमी थे, इनकी माता इनसे भी अधिक बहादुर थी। यह दोनों भाई अकबर से इतनी बहादुरी से लड़े थे कि इनका प्रलय तक संसार में अमर रहेगा। जिस समय शहंशाह अकबर ने इनके शहर को चारों ओर से घेर लिया तो इन्होंने बड़ी वीरता से उनका सामना किया और इतने बड़े बादशाह के सामने पराजय स्वीकार करने की अपेक्षा उन्होंने अपनी तथा माता की जान दे देना उत्तम समझा और यही कारण है कि उनके दुश्मनों ने भी उनकी मूर्तियों को चिन्ह स्वरूप रखना उचित समझा। वह दोनों हाथी जिन पर यह दोनों वीर बैठे हैं, बड़े शानदार है, उन्हें देखकर मेरे दिल में उनका ऐसा आतंक समाया जिसका कि मै वर्णन नहीं कर सकता।

इस फाटक से होकर किले में जाने पर आगे एक लम्बी चौडी सड़क मिलती है। जिसके बीचों बीच पानी की नहर बहती है और उसके दोनों ओर पांच या छह फ्रांसीसी फुट ऊंचा और चार फीट चौडा चबूतरा पेरिस के पौण्ट नीयोफ की भांति बना हुआ है और जिसको छोडकर दोनों ओर बराबर महराबदार दालान बनते चले गये हैं जिनमें भिन्न भिन्न विभागों के दारोगा और छोटी श्रेणी के ओहदेदार बैठे हुए अपना काम करते रहते हैं और वह मनसबदार भी जो रात के समय पहरा देने आते हैं इसी पर ठहरते हैं पर इनके नीचे से आने जाने वाले सवारों और साधारण लोगों को इससे कोई कष्ट नहीं होता।

किले की दूसरी ओर के फाटक के अंदर की ओर भी ऐसी ही लम्बी चौड़ी सड़क है ओर उसके दोनों ओर वैसे ही चबूतरे हैं पर मेहराबदार दालानों के स्थान में वहां दुकाने बनी हुई है और सच पूछिये तो यह एक बाजार है जो लदाव की छत के कारण जिसमें ऊपर की ओर हवा और प्रकाश के लिये रोशनदान बने हुए है गर्मी और बरसात के कारण बड़े काम का है। इन दोनों सडकों के अतिरिक्त इसके दाहिने और बाएं ओर भी अनेक छोटी छोटी सउके है जो उन ममकानों की ओर जाती हैं जहां नियमानुसार उमरा लोग सप्ताह में एक दिन बारी बारी से पहरा दिया करते हैं।

यह मकान जहां उमरा लोग चौकी देते हैं अच्छे हैं क्योंकि यह लोग उन्हें अपने ही व्यय से सजाते हैं। यहां बडे बडे दीवानखाने हैं और उनके सामने बाग हैं। जिनमें छोटी छोटी नहरे, हौज और फव्वारे बने हुए हैं। जिस अमीर की नौकरी होती है, उसके लिए भोजन शाही खासे में से आता है। जब भोजन आता है तब अमीर को धन्यवाद और सम्मानस्वरूप महल की ओर मुंह करके तीन बार आदाब बजा लेना अर्थात जमीन तक हाथ ले जाकर माथे तक लाना होता है।

इसके अतिरिक्त भिन्न स्थानों में सरकारी दफतरों के लिये दीवानखाने बने हुए है ओर ख्ेामें लगे हैं जिनमें प्रत्येक में किसी अच्दे कारीगर की निगरानी में काम हुआ करता है। किसी में चिकनदोज, जरदोज आदि काम करते हैं। किसी में सुनार, किसी में चित्रकार और नक्काश, किसी में रंगसाज, बढई और खरादी, किसी में दर्जी और मोची, किसी में कमखाब और मखमल बुनने वाले जुलाहे जो पगडियां बनाते, कमर के बांधने के फूलदार पटके ओर जनाने पायजामों के लिए बारीक कपड़ा बनाते हैं, बैठते हैं। यह कपड़ा इतना महीन होता है कि केवल एक ही रात व्यवहार में लाने से बेकाम हो जाता है।

पच्चीस और तीस रुपये मूल्य का होता है और जब इन पर सुई से बढिया जरी का काम किया जाता है तो इनका मूल्य और अधिक हो जाता है। यह सब कारीगर सवेरे से आकर अपना अपना काम करते ओर शाम को अपने घर चले जाते हैं और इनहीं कामों में उनका जीवन व्यतीत हो जाता है और जिस अवस्था में वह जन्म लेता है उससे उन्नत अवस्था में होने की चेष्टा भी नहीं करता। सुनार का लड़का सुनार होता है और शहर का हकीम अपने पुत्र को हकीमी ही सिखलाता है ओर यहां तक कि कोई व्यक्ति अपने लडके व लडकी का विवाह अपने पेशे वालों के अतिरिक्त और किसी के घर नहीं करता। इस नियम का पालन मुसलमान भी वैसा ही करते हैं जैसा कि हिन्दू, इसलिए बहुत सी सुन्दर लडकियां कुंवारी ही रह जाती है पर यदि उनके मा बाप चाहें तो उन लडकियों का विवाह बहुत ही अच्छी जगह हो सकता है।

बर्नियर की जुबानी, औरंगजेब की दिल्ली की कहानी, जी हां 1656 से 1667 की अवधि के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथियाया था, तब आज की पुरानी दिल्ली और तब की देहली कैसी थी, लालकिले के सुरक्षा इंतजाम, शासन की तत्कालीन प्रणाली, कामगारों की हालत, बादशाह के रहन—सहन समेत तमाम पहलुओं की जानकारी उस फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर की कलम से लिखी गई थी जिसने औरंगजेव के शासनकाल में 11 साल भारत की धरती पर गुजारे थे। उसी कहानी को अपने पाठकों के लिए बर्नियर के शब्दों में ज्यों का त्यों दस किश्तों में पेश किया जा रहा है।

इस स्टोरी के शेष भाग यहां पर क्लिक कर पढ़ें:

पार्ट — 1 : तोप का एक गोला और लालकिला धराशायी
पार्ट — 2 : लालकिले के बाहर से दी जाती थी चौकी
पार्ट — 3 : औरंगजेब का डर दिखा भोले हिन्दुओं को खूब लूटते थे फर्जी ज्योतिषी
पार्ट — 4 : चांदनी चौक में मुसलमानों का बोलबाला
पार्ट — 5 : औरंगजेब के शासन में जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी हिन्दू स्त्रियां
पार्ट — 6 : औरंगजेब के टैक्स के डर से गरीब मुसलमान और सिपाही भी नहीं खाते थे मांस
पार्ट — 7 : सिर्फ मेवे खाते थे औरंगजेब के मुसलमान सरदार
पार्ट — 8 : अत्याचारी औरंगजेब के शासन में बेकाबू हो गए थे कसाई
पार्ट — 9 : औरंगजेब पीता बढिया शराब, हिन्दुओें के हिस्से में ठर्रा

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औरंगजेब पीता बढिया शराब, हिन्दुओें के हिस्से में ठर्रा (पार्ट — 9)

अपने शासनकाल में हिन्दुओं पर कहर बरपाने वाले औरंगजेब के राज में बढिया शराब मुस्लिम दरबारियों, अमीरों, उमरावों के नसीब में ही थी। जिन हिन्दुओं को शराब पीने की आदत थी, उन्हें गुड से बनी देशी शराब से ही संतोष करना पडता था। फ्रांसीसी यात्री बर्नियर के यात्रा वृतांत के अनुसार फ्रांस में भोजन का प्रधान अंग मानी जाने वाली मदिरा देहली की किसी दुकान में नहीं मिलती। जो मदिरा यहां देशी अंगूर की बन सकती है वह भी नहीं मिलती क्योंकि मुसलमानों के कुरान और हिन्दुओं के शास्त्रों में उसका पीना वर्जित है। मुगल राज्य में जो मदिरा शीराज और कनारी टापू से आती है अच्छी होती है। शीराजी मदिरा ईरान से खुश्की के रास्ते बन्दर अब्बास और वहां से जहाज के द्वारा सूरत पहुंचती ओर वहां से देहली आती है। शीराज से देहली तक मदिरा आने में 46 दिन लगते हैं।

किनारी टापू से मदिरा सूरत होती हुई देहली तक आती है। पर यह दोनों मदिराएं इतनी महंगी होती है कि इनका मूल्य ही इन्हें बदमजा कर देता है। एक शीशी जो तीन अंग्रेजी बोतलों के बराबर होती है, 15 या 16 रुपए की आती है। जो मदिरा इस देश में बनती है और जिसके यहां के लोग अर्क कहते हैं बहुत ही तेज होती है, वह गुड़ से भभके से खींचकर बनाई जाती है और बाजार में नहीं बिकने पाती और धर्मविरुद्ध होने के कारण आंग्रेजों व ईसाइयो के अतिरिक्त इसे कोई भी नहीं पी सकता।

यह अर्क ठीक वैसा ही है जैसा पोलेण्ड के लोग अनाज से बनाते हैं और जिसके जरा सा अधिक पीने से मनुष्य बीमार पड़ जाता है। समझदार आदमी यहां तो सादा पानी पीयेगा या नींबू का शरबत जो यहां सहज ही में मिल जाता है और हानिकारक भी नहीं होता। इस गर्म देश में लोगों को मदिरा की आवश्यकता भी नहीं होती। मदिरा न पीने और बराबर पसीने आते रहने के कारण यहां के लोग सर्दी, छूतिया बुखार, पीठ का दर्द आदि रोगों से बचे रहते हैं और जो ऐसे रोगी यहां आते है, वह शीघ्र ही अच्छे भी हो जाते हैं।

बर्नियर की जुबानी, औरंगजेब की दिल्ली की कहानी, जी हां 1656 से 1667 की अवधि के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथियाया था, तब आज की पुरानी दिल्ली और तब की देहली कैसी थी, लालकिले के सुरक्षा इंतजाम, शासन की तत्कालीन प्रणाली, कामगारों की हालत, बादशाह के रहन—सहन समेत तमाम पहलुओं की जानकारी उस फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर की कलम से लिखी गई थी जिसने औरंगजेव के शासनकाल में 11 साल भारत की धरती पर गुजारे थे। उसी कहानी को अपने पाठकों के लिए बर्नियर के शब्दों में ज्यों का त्यों दस किश्तों में पेश किया जा रहा है।

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पार्ट — 1 : तोप का एक गोला और लालकिला धराशायी
पार्ट — 2 : लालकिले के बाहर से दी जाती थी चौकी
पार्ट — 3 : औरंगजेब का डर दिखा भोले हिन्दुओं को खूब लूटते थे फर्जी ज्योतिषी
पार्ट — 4 : चांदनी चौक में मुसलमानों का बोलबाला
पार्ट — 5 : औरंगजेब के शासन में जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी हिन्दू स्त्रियां
पार्ट — 6 : औरंगजेब के टैक्स के डर से गरीब मुसलमान और सिपाही भी नहीं खाते थे मांस
पार्ट — 7 : सिर्फ मेवे खाते थे औरंगजेब के मुसलमान सरदार
पार्ट — 8 : अत्याचारी औरंगजेब के शासन में बेकाबू हो गए थे कसाई
पार्ट — 10: जयमल और पत्ता ने छुडा दिए थे औरंगजेब के पडदादा के छक्के

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अत्याचारी औरंगजेब के शासन में बेकाबू हो गए थे कसाई (पार्ट – 8)

भारत पर करीब पचास साल से ज्यादा शासन करने वाले अत्याचारी औरंगजेब के काल में मुसलमान कसाई इतने बेकाबू हो गए थे कि वे बकरे के मांस में ऐसे जानवरों के मांस की मिलावट करके बेचते थे जिन्हें हिन्दू तो क्या मुसलमान भी खाना पसंद नहीं करते थे। फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर के यात्रा वृतांत के अनुसार बाजार में बहुत तरह का कबाब और कलिया बिकता है पर मुझे विश्वास नहीं हे कि वह किसी अच्छे जानवर का मांस हो, क्योंकि मैं जानता हूं कि कभी कभी यह मांस ऊंट, घोडे या बीमार पशुओं का भी होता है। देहली की प्रत्येक गलियों में मांस बिकता है पर कभी कभी बकरी के धोखे में भेड़ का मांस भी दे देते हैं।

यद्यपि बकरी व अन्य पशुओं के मांस का स्वाद बुरा नहीं होता पर वह कुछ गर्म होता है। बादी करता है और देर से पचता है। बकरी के बच्चे का मांस सबसे अच्छा होता है पर वह बाजार में नहीं मिलता। इससे जीवित बच्चा खरीदना पड़ता है। बडी कठिनता तो यहां यह है कि सुअर का मांस शाम तक नहीं ठहरता और दूसरी यह कि जानवर दुबले मिलते हैं, जिससे उनके मांस का स्वाद बिगड़ जाता है। बाजार में कसाइयों की दुकानों पर भी दुबली बकरियां का मांस मिलता है जो बहुधा कठोर होता है।

 

इस देश के लोगों में दया अधिक है और इसी कारण मुर्गी बाजार में नहीं दिखाई देती। पर नहीं मालूम यह दया उन मनुष्यों के भाग्य में क्यों नहीं होती जो जनाने मकानों के लिए खोजा बनाते हैं। चिडिया बाजार में अनेक प्रकार अच्छी और सस्ती मिलती है। कबूतर भी मिलते हैं पर बच्चे नहीं मिलते। इसका कारण यही हे कि यहां के लोग बच्चों को मारना बडी निष्ठुरता का कार्य समझते हैं। तीतर भी मिलते हैं पर हमारे देश के तीतरों से छोटे होते हैं।

लेकिन जाल में फंसा कर और पिंजरों में बंद करके लाये जाने के कारण वे ऐसे अच्छे नहीं होते जैसे और अनेक पशु। यही अवस्था यहां मुरगाबियों और खरगोशों की होती है। जो जीवित पकड़े जाकर पिंजरों में भरे हुए शहर में आते हैं। देहली के मछुए अपने कार्य में ज्यादा चतुर नहीं है, फिर भी यहां के बाजारों में राहू और सिंघाडा मछली अच्छी होती है। जाड़े के दिनों में मछुए कम मछलियां पकड़ते हैं, कारण यह कि यहां के लोग सर्दी से उतना ही डरते हैं जितना हम लोग गर्मी से। जाडे के दिनों में यदि कोई मछली बाजार में दिखलाई दे तो ख्वाजासरा उन्हें स्वयं खरीद लेते हैं, वह लोग इसे बहुत पसंद करते हैं पर इसका कोई कोई विशेष कारण मालूम नहीं है।

बर्नियर की जुबानी, औरंगजेब की दिल्ली की कहानी, जी हां 1656 से 1667 की अवधि के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथियाया था, तब आज की पुरानी दिल्ली और तब की देहली कैसी थी, लालकिले के सुरक्षा इंतजाम, शासन की तत्कालीन प्रणाली, कामगारों की हालत, बादशाह के रहन—सहन समेत तमाम पहलुओं की जानकारी उस फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर की कलम से लिखी गई थी जिसने औरंगजेव के शासनकाल में 11 साल भारत की धरती पर गुजारे थे। उसी कहानी को अपने पाठकों के लिए बर्नियर के शब्दों में ज्यों का त्यों दस किश्तों में पेश किया जा रहा है।

इस स्टोरी के शेष भाग यहां पर क्लिक कर पढ़ें:

पार्ट — 1 : तोप का एक गोला और लालकिला धराशायी
पार्ट — 2 : लालकिले के बाहर से दी जाती थी चौकी
पार्ट — 3 : औरंगजेब का डर दिखा भोले हिन्दुओं को खूब लूटते थे फर्जी ज्योतिषी
पार्ट — 4 : चांदनी चौक में मुसलमानों का बोलबाला
पार्ट — 5 : औरंगजेब के शासन में जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी हिन्दू स्त्रियां
पार्ट — 6 : औरंगजेब के टैक्स के डर से गरीब मुसलमान और सिपाही भी नहीं खाते थे मांस
पार्ट — 7 : सिर्फ मेवे खाते थे औरंगजेब के मुसलमान सरदार
पार्ट — 9 : औरंगजेब पीता बढिया शराब, हिन्दुओें के हिस्से में ठर्रा
पार्ट — 10: जयमल और पत्ता ने छुडा दिए थे औरंगजेब के पडदादा के छक्के

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सिर्फ मेवे खाते थे औरंगजेब के मुसलमान सरदार (पार्ट – 7)

औरंगजेब के शासन की आंखों देखी लिखने वाले फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने लिखा है कि दिल्ली में एक बाजार ऐसा है जिसमें केवल मेवा बिकता है। गर्मी के दिनों में इन दुकानों में ईरान, बलख, बुखारा और समरकन्द के मेवे बादाम, पिस्ता, किशमिश, बैर, शफ्तालू और अनेक प्रकार के सूखे फल और जाड़े के दिनों में रूई की तहों से लपेटे हुए बढिय़ा ताजे अंगूर जो उन देशों से आते हैं और नाशपाती तथा कई तरह के अच्छे सेब ओर सर्दे (अंजीर) जो जाड़े भर बिकते रहते हैं, भरे होते हैं। ये मेवे बहुत महंगे मिलते हैं। इसका अन्दाज आप इसी से लगा सकते हैं कि एक सर्दा पौने चार रुपये का मिलता है और इतना महंगा होने पर भी यहां के लोग और मेवों की अपेक्षा इसे अधिक पसंद करते हैं।

गर्मी के दिनों में देशी खरबूजे बहुत सस्ते मिलते हैं पर ये कुछ अधिक स्वादिष्ट नहीं होते। हां वे खरबूजे जिनका बीज ईरान से मंगवाया और यहां बोया जाता है, बहुुत अच्दे होते हैं। इतना होने पर भी अच्छे और स्वादिष्ट खरबूजे यहां बहुत कम मिलते हैं क्योंकि यहां की जमीन उनके अनुकूल नहीं है ओर उसके बीज भी एक वर्ष बाद बिगड़ जाते हैं। गर्मी के दिनों में आम यहां बहुत सस्ते और अधिकता से मिलते हैं पर देहली में जो आम पैदा होता है वह न तो कुछ ऐसा अच्छा ही होता है न बुरा। सबसे अच्छा आम बंगाल, गोलकुण्डा और गोवा से आता है जो वास्तव में बहुत अच्छा होता है ओर जिसकी बराबरी कोई मिठाई नहीं कर सकती। तरबूज यहां बारहोंमास रहता है पर जो तरबूज देहली में पैदा होता है वह नरम और फीका होता है, इसकी रंगत भी अच्छी नहीं होती।

शहर में हलवाइयों की दुकानें अधिकता से हैं पर मिठाई उनमें अच्छी नहीं बनती, उन पर गर्द पड़ी होती है और मक्खियां भिन-भिनाया करती है। नानबाई भी बहुत है पर यहां के तन्दूर हमारे यहां के तन्दूरों से बहुत ही भिन्न और बहुत बड़े होते हैं और इसी कारण तो रोटी न अच्छी होती है और न भली—भांति सेंकी हुई। पर जो रोटी किले में बिकती है वह कुछ अच्छी होती है। अमीर लोग तो अपने मकानों ही पर रोटियां बनवा लेते हैं। उनमें दूध, मक्खन और अण्डा डाला जाता है इससे वह और भी अधिक स्वादिष्ट हो जाती है। यद्यपि वह बहुत फूल जाती है पर स्वाद उसका जली हुई रोटी सा होता है। यह रोटी साधारण केक की तरह होती है।

बर्नियर की जुबानी, औरंगजेब की दिल्ली की कहानी, जी हां 1656 से 1667 की अवधि के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथियाया था, तब आज की पुरानी दिल्ली और तब की देहली कैसी थी, लालकिले के सुरक्षा इंतजाम, शासन की तत्कालीन प्रणाली, कामगारों की हालत, बादशाह के रहन—सहन समेत तमाम पहलुओं की जानकारी उस फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर की कलम से लिखी गई थी जिसने औरंगजेव के शासनकाल में 11 साल भारत की धरती पर गुजारे थे। उसी कहानी को अपने पाठकों के लिए बर्नियर के शब्दों में ज्यों का त्यों दस किश्तों में पेश किया जा रहा है।

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पार्ट — 1 : तोप का एक गोला और लालकिला धराशायी
पार्ट — 2 : लालकिले के बाहर से दी जाती थी चौकी
पार्ट — 3 : औरंगजेब का डर दिखा भोले हिन्दुओं को खूब लूटते थे फर्जी ज्योतिषी
पार्ट — 4 : चांदनी चौक में मुसलमानों का बोलबाला
पार्ट — 5 : औरंगजेब के शासन में जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी हिन्दू स्त्रियां
पार्ट — 6 : औरंगजेब के टैक्स के डर से गरीब मुसलमान और सिपाही भी नहीं खाते थे मांस
पार्ट — 8 : अत्याचारी औरंगजेब के शासन में बेकाबू हो गए थे कसाई
पार्ट — 9 : औरंगजेब पीता बढिया शराब, हिन्दुओें के हिस्से में ठर्रा
पार्ट — 10: जयमल और पत्ता ने छुडा दिए थे औरंगजेब के पडदादा के छक्के

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औरंगजेब के टैक्स के डर से गरीब मुसलमान और सिपाही भी नहीं खाते थे मांस (पार्ट- 6)

भारत पर मुगल शासन के दौरान औरंगजेब के डर से गरीब मुसलमान और उसकी फौज के पैदल सिपाही मांस नहीं खा पाते थे क्योंकि उन्हें डर रहता था कि मांस खरीदने पर औरंगजेब के जासूसों की नजर पड गई तो उन पर कई तरह के कर लाद दिए जाएंगे। फ्रांसीसी यात्री के यात्रा वृतांत के अनुसार अच्छे घरों में बैठने के लिए फर्श के ऊपर रुई का भारी और चार अंगुल मोटा गददा बिछा रहता है जिस पर गर्मी के दिनों में अच्छा कपड़ा और जाड़़े के दिनों में रेशमी कालीन बिछाया जाता है। इस दीवानखाने में अच्छे स्थान पर एक या दो छोटे गददे पडे रहते हैं जिन पर रेशम के हल्के काम की सूजनी जिसमें सुनहरी और रूपहली जरी की धारियां होती है, पड़ी रहती है।

इस पर मालिक या प्रतिष्ठित लोग जो उनसे मिलते आते हैं, बैठते हैं। प्रत्येक गददे पर कमखाव का एक तकिया पड़ा रहता है। इसके अतिरिक्त और लोगों के लिये दालान में इधर उधर कमखाब, मखमली और फूलदार रेशमी तकिये पड़े होते हैं। दालान में चारों ओर जमीन से डेढ या दो गज ऊंचे भांति भांति के सुन्दर ताक बने होते हैं जिनमें अच्छे अच्छे चीनी के बर्तन और गुलदान रखे जाते हैं। दालान की छत पर बहुत से बेलबूटे बने होते हैं और उन पर मुलम्मा किया होता है, पर मनुष्य या किसी और जीवित पदार्थ की तस्वीर उन पर नहीं होती क्योंकि यह बात मुसलमानी धर्म में वर्जित है।

भारत की राजधानी के मकान चाहे यूरोप के मकानों के समान नही हो, पर हां जो चीजे यूरोप के शहरों की मुख्य सुन्दरता का कारण है वह बडी बडी दुकानें हैं जो देहली में नहीं है। यह शहर एक बडे और जबर्दस्त बादशाह के दरबार का स्थान है जहां पर कि बहुमूल्य चीजो की अच्छी दुकानों का होना आवश्यक है पर फिर भी यहां कोई ऐसा बाजार नहीं है जैसा फ्रांस का सेंट डेनिस है और जिसके समान का बाजार कदाचित एशिया भर में न होगा।

बहुमूल्य वस्तुएं यहां प्राय: मालखानों में रखी रहती है और इंगलैण्ड की तरह भडकदार ओर बहुमूल्य असबाबों से दुकानें कदाचित ही कभी सजाई जाती हों। यदि किसी एक दुकान में पश्मीना, कमखाब, जरीदार मन्दीलें और रेशमी कपडे आदि हैं तो पास ही कोई पच्चीस दुकानों में चावन, दाल, घी, तेल और गेहूं आदि अनेक प्रकार के अनाज जो न केवल हिन्दुओं के खाद्य पदार्थ हैं जो मांस कभी नहीं खाते वरन् गरीब मुसलमान और बहुत से सिपाही भी यही खाते हैं, बोरियों में भरे हुए रखे होते हैं।

बर्नियर की जुबानी, औरंगजेब की दिल्ली की कहानी, जी हां 1656 से 1667 की अवधि के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथियाया था, तब आज की पुरानी दिल्ली और तब की देहली कैसी थी, लालकिले के सुरक्षा इंतजाम, शासन की तत्कालीन प्रणाली, कामगारों की हालत, बादशाह के रहन—सहन समेत तमाम पहलुओं की जानकारी उस फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर की कलम से लिखी गई थी जिसने औरंगजेव के शासनकाल में 11 साल भारत की धरती पर गुजारे थे। उसी कहानी को अपने पाठकों के लिए बर्नियर के शब्दों में ज्यों का त्यों दस किश्तों में पेश किया जा रहा है।

इस स्टोरी के शेष भाग यहां पर क्लिक कर पढ़ें:

पार्ट — 1 : तोप का एक गोला और लालकिला धराशायी
पार्ट — 2 : लालकिले के बाहर से दी जाती थी चौकी
पार्ट — 3 : औरंगजेब का डर दिखा भोले हिन्दुओं को खूब लूटते थे फर्जी ज्योतिषी
पार्ट — 4 : चांदनी चौक में मुसलमानों का बोलबाला
पार्ट — 5 : औरंगजेब के शासन में जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी हिन्दू स्त्रियां
पार्ट — 7 : सिर्फ मेवे खाते थे औरंगजेब के मुसलमान सरदार
पार्ट — 8 : अत्याचारी औरंगजेब के शासन में बेकाबू हो गए थे कसाई
पार्ट — 9 : औरंगजेब पीता बढिया शराब, हिन्दुओें के हिस्से में ठर्रा
पार्ट — 10: जयमल और पत्ता ने छुडा दिए थे औरंगजेब के पडदादा के छक्के

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औरंगजेब के शासन में जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी हिन्दू स्त्रियां (पार्ट – 5)

मुगल शासकों के सबसे बदमिजाज चेहरे औरंगजेब के शासनकाल में सुंदर स्त्रियों को मुसलमानों से बचाने के लिए हिन्दुओं ने पर्दा प्रथा को इतनी कडाई से लागू कर दिया कि जब कभी उनके घास—फूस से बने घरों में आग लग जाती थी तो पर्दे की वजह से वे घरों से बाहर निकलने की अपेक्षा जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी। फ्रांसीसी यात्री बर्नियर के यात्रा वृतांत के अनुसार शहर के गली-कूचों में मनसबदारों, हाकिमों और धनिक व्यापारियों के मकान है और उनमें भी बहुधा अच्छे ओर सुन्दर है। पर ईंट या पत्थर के बने मकान बहुत ही कम और कच्चे या घास फूस के बने अधिक हैं। इतना होने पर भी वे सुन्दर और हवादार है। बहुत से मकानों में चौक और बाग होते हैं। इनमें सब प्रकार की सुख सामग्री वर्तमान रहती है। जो मकान घास-फूस के बने होते हैं वह भी अच्छी तरह सफेदी की हुई होती है।

इन अनगिनत छोटे छोटे घास-फूस के मकानों में जो प्राय: बड़े बड़े मकानों के आसपास और उनसे मिले हुए होते हैं, साधारण नफर, खिदमतगार और नानबाई आदि जो बादशाह के लश्कर के साथ जाया करते हैं, रहते हैं। इन्हीं के कारण नगर में प्राय: आग लगती है। गतवर्ष तीन बार ऐसी आग लगी कि तेज हवा के कारण जो यहां गर्मी के दिनों में चला करती है, कोई साठ हजार छप्परों पर पानी फिर गया और कुछ ऊंट, घोडे तथा पर्देदार स्त्रियां आग लगने के कारण जल मरी थी। उनमें इतना साहस नहीें था कि भागकर बच जायें। इन कच्चे और घास-फूस के मकानों के कारण ही मैं समझता हूं कि देहली मानों कुछ देहातों का समूह या फौज की छावनी है, पर भेद इतना है कि यहां कुछ थोडा सा सामान आराम का भी है।

अमीरों के मकान प्राय: नदी के किनारे और शहर के बाहर है। इस गरम देश में वही मकान अधिक अच्छा समझा जाता है जिसमें सब प्रकार का आराम मिले और चारों ओर से विशेषकर उत्तर से अच्छी तरह हवा आती हो। यहां वही मकान अच्छे कहे जाते हैं जिनमें एक अच्छा बाग, पेड़ और हौज हो और दालान के अन्दर या दरवाजे में छोटे छोटे फौव्वारे और तहखाने हों। इन तहखानों में बड़े बड़े पंखे लगे होते हैं और गर्मी के दिनों में जब सन्ध्या को दोपहर से चार या पांच बजे तक हवा ऐसी गरम होती है कि सांस नहीं लिया जाता, यहां बहुत ही आराम मिलता है पर तहखानों की अपेक्षा लोग खशखानों को अधिक पंसद करते हैं।

यह छोटे-छोटे साफ कमरे होते हैं जो एक प्रकार की खुशबूदार घास की जड़ों से बाग में हौज के निकट इस अभिप्राय: से बनाये जाते हैं कि नौकर चमड़े की डोलचियों में भर-भरकर अच्छी तरह उन पर पानी छिडकें और उन्हें तर कर सके। जिस मकान के चारों ओर ऊंचे ऊंचे दालान हो, चारों ओर की हवा उनमें आती हो और वे किसी बाग के अन्दर बने हों तो वे बहुत अधिक पसंद किये जाते हैं। वास्तव में कोई बढिया मकान ऐसा नहीं है जिसमें घर वालों के सोने के लिए आंगन न हो। वर्षा या आंधी के समय या सवेरे जब ठण्डी हवा चलती या ओस पडऩे लगती है तो पलंग को खिसकाकर अंदर कर लेते हैं। यह ओस यद्यपि बहुत अधिक नहीं होती तो भी बदन में पैठ जाती है।

बर्नियर की जुबानी औरंगजेब की दिल्ली की कहानी, जी हां 1656 से 1667 की अवधि के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथियाया था, तब आज की पुरानी दिल्ली और तब की देहली कैसी थी, लालकिले के सुरक्षा इंतजाम, शासन की तत्कालीन प्रणाली, कामगारों की हालत, बादशाह के रहन—सहन समेत तमाम पहलुओं की जानकारी उस फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर की कलम से लिखी गई थी जिसने औरंगजेव के शासनकाल में 11 साल भारत की धरती पर गुजारे थे। उसी कहानी को अपने पाठकों के लिए बर्नियर के शब्दों में ज्यों का त्यों दस किश्तों में पेश किया जा रहा है।

इस स्टोरी के शेष भाग यहां पर क्लिक कर पढ़ें:

पार्ट — 1 : तोप का एक गोला और लालकिला धराशायी
पार्ट — 2 : लालकिले के बाहर से दी जाती थी चौकी
पार्ट — 3 : औरंगजेब का डर दिखा भोले हिन्दुओं को खूब लूटते थे फर्जी ज्योतिषी
पार्ट — 4 : चांदनी चौक में मुसलमानों का बोलबाला
पार्ट — 6 : औरंगजेब के टैक्स के डर से गरीब मुसलमान और सिपाही भी नहीं खाते थे मांस
पार्ट — 7 : सिर्फ मेवे खाते थे औरंगजेब के मुसलमान सरदार
पार्ट — 8 : अत्याचारी औरंगजेब के शासन में बेकाबू हो गए थे कसाई
पार्ट — 9 : औरंगजेब पीता बढिया शराब, हिन्दुओें के हिस्से में ठर्रा
पार्ट — 10: जयमल और पत्ता ने छुडा दिए थे औरंगजेब के पडदादा के छक्के

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तोप का एक गोला और लालकिला धराशायी (पार्ट — 1)

औरंगजेब मतलब एक ऐसा कटटरपंथी जिसने अपने शासनकाल में हिन्दू धर्म की चूलें हिला दी थी। उसी औरंगजेब के शासन पर काबिज होने के दौरान भारत यात्रा पर आए एक फ्रांसीसी यात्री ने उसके शासनकाल के दौरान की घटनाओं को अपने यात्रा वृतांत में दर्ज किया है। वृतांत के अनुसार ​दिल्ली के जिस लालकिले की चहुं ओर चर्चा थी, वह साधारण तोपखाने की मार झेलने लायक भी नहीं था। वृतांत के अनुसार शहर देहली चौरस जमीन पर जमुना के किनारे चन्द्राकार बसा हुआ है। नदी को छोडकर जिस पर नावों का पुल बंधा है, बाकी तीनों ओर रक्षा के लिए पक्की शहर पनाह बनी हुई है। अगर उन बुर्जो पर से जो शहर पनाह के किनारे सौ सौ कदमों पर बने हुए हैं या उस कच्चे पुश्ते पर से जो चार या पांच फ्रांसीसी फुट ऊंचा है, देखा जाए तो यह शहर पनाह बिल्कुल ही अपूर्ण है क्यों न तो इसके निकट कोई खाई और न ही कोई रक्षा का उपाय है।

यह शहर पनाह नगर और किले दोनों को घेरे हुए हैं तथा उसकी लम्बाई इतनी अधिक नहीं है जितनी लोग समझते हैं। क्योंकि तीन घंटों में मैं उसके चारों ओर फिर आया हूं, मेरे घोडे की चाल तीन प्रति घंटे से अधिक नहीं थी। मैं इसमें शहर के आसपास की उन बस्तियों को नहीं मिलाता जो बहुत दूर तक लाहौरी दरवाजे की ओर चली गई है और न पुरानी देहली के उस बचे हुए बडे भाग को और न उन तीन चार बस्तियों को मिलाता हूं जो शहर के पास हैं क्योंकि उन्हें भी उसी में में मिला लेने से शहर की लम्बाई इतनी बढ़ जाती है कि यदि शहर के बीचों-बीच एक सीधी रेखा खींची जाए तो वह साढ़े चार मील से भी अधिक होगी।

किला जिसमें शाही महलसरा और मकान अर्ध गोलाकार सा है। इसके सामने जमुना नदी बहती है। किले की दवार ओर जमुना नदी के बीच में बडा रेतीला मैदान है जिसमें हाथियों की लडाई दिखाई जाती है और अमीरो, सरदारों और हिन्दू राजाओं की फौज बादशाह के देखने के लिए खड़ी की जाती है जिन्हें बादशाह महल के झरोखों से देखा करता है।

किले की दीवार अपने पुराने ढंग के गोल बुरजों के कारण शहर पनाह से मिलती जुलतीहै। यह ईंट और लाल पत्थर की बनी हुई है जो संगमरमर से मिलता-जुलता होता है इसलिए शहरपनाह की अपेक्षा यह अधिक सुन्दर है। यह शहर पनाह से ऊंची और सुदृढ़ भी है। इस पर छोटी छोटी तोपें चढ़ी हुई है जिनका मुंह नगर की ओर है। नदी की ओर को छोडकर किले के सब ओर पक्की और गहरी खाई बनी हुई है। इसके बांध मजबूत पत्थर के बने है। यह खाई हमेशा पानी से भरी रहती है और इसमें मछलियां बहुत अधिकता से हैं। यद्यपि यह इमारत देखने में बहुत दृढ़ मालूम होती है पर वास्तव में यह दृढ़ नहीं है ओर मेरी समझ में एक साधारण तोपखाना इसे गिरा सकता है।

बर्नियर की जुबानी औरंगजेब की दिल्ली की कहानी, जी हां 1656 से 1667 की अवधि के दौरान जब बादशाह औरंगजेब ने अपने भाइयों को मौत के घाट उतारकर सिंहासन हथियाया था, तब आज की पुरानी दिल्ली और तब की देहली कैसी थी, लालकिले के सुरक्षा इंतजाम, शासन की तत्कालीन प्रणाली, कामगारों की हालत, बादशाह के रहन—सहन समेत तमाम पहलुओं की जानकारी उस फ्रांसीसी यात्री फ्रांसुआ बर्नियर की कलम से लिखी गई थी जिसने औरंगजेव के शासनकाल में 11 साल भारत की धरती पर गुजारे थे। उसी कहानी को अपने पाठकों के लिए बर्नियर के शब्दों में ज्यों का त्यों दस किश्तों में पेश किया जा रहा है।

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पार्ट — 2 : लालकिले के बाहर से दी जाती थी चौकी
पार्ट — 3 : औरंगजेब का डर दिखा भोले हिन्दुओं को खूब लूटते थे फर्जी ज्योतिषी
पार्ट — 4 : चांदनी चौक में मुसलमानों का बोलबाला
पार्ट — 5 : औरंगजेब के शासन में जिंदा जल मरना ज्यादा पसंद करती थी हिन्दू स्त्रियां
पार्ट — 6 : औरंगजेब के टैक्स के डर से गरीब मुसलमान और सिपाही भी नहीं खाते थे मांस
पार्ट — 7 : सिर्फ मेवे खाते थे औरंगजेब के मुसलमान सरदार
पार्ट — 8 : अत्याचारी औरंगजेब के शासन में बेकाबू हो गए थे कसाई
पार्ट — 9 : औरंगजेब पीता बढिया शराब, हिन्दुओें के हिस्से में ठर्रा
पार्ट — 10: जयमल और पत्ता ने छुडा दिए थे औरंगजेब के पडदादा के छक्के