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17 साल पहले मौत का तांडव करने वाले सार्स का सगा भाई है कोरोना

संसार के शक्तिशाली देशों को घुटने पर ला चुका कोरोना वायरस 17 साल पुराने सार्स का सगा भाई है। इस बार उसके ज्यादा मारक होने का यही कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोरोना फैमिली का यह वायरस पिछले दो बार के मुकाबले ज्यादा ताकतवर होकर आया है और उसने म्युटेशन के जरिए स्वयं को ज्यादा घातक बना लिया है। 2003 में आए सार्स कोविड-1 और 2013-14 में आए मर्स वायरस से मौजूदा वायरस की समानता क्रमश: 70 और 50 प्रतिशत तक है। पहले के दोनो वायरस घातक तो थे लेकिन वे व्यापक तबाही नहीं फैला पाए थे। क्योंकि कोविड-1 पूरी तरह ग्लोबल होने से पहले ही दम तोड़ गया था और 2013-14 का मर्स सऊदी अरब तक सीमित रह गया था।
कोरोना वायरस का मौजूदा स्वरूप बेहद घातक है। उसने 45 वर्ष से अधिक उम्र के इंसानों को उसी तरह मौत के घाट उतारा है जिस तरह लगभग एक सदी पहले प्लेग ने उनका भक्षण किया था। अनुमान है कि पिछले चार माह में कोरोना संक्रमण के चलते पूरी दुनिया में भगवान को प्यारे हुए लगभग ढाई लाख इंसानों में से 80 प्रतिशत 45 से 80 साल के हैं।

बूढ़ों के लिए मौत का दूसरा नाम है कोरोना

इन दिनों कोविड-19 के रोगियों की जान बचाने में जुटे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कार्डियक थोरासिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजीत जैन के मुताबिक पूरी दुनिया में अभी तक कोरोना संक्रमितों की मृत्यु का जो आंकड़ा सामने आ रहा है, उसमें 25 साल से कम उम्र के संकमितों की संख्या एक प्रतिशत है। 25 से 44 साल तक के मृतकों का आंकड़ा अभी तक छह प्रतिशत पर टिका हुआ है लेकिन 45 से 60 साल तक संक्रमितों की मृत्यु दर 15 प्रतिशत तक जा पहुंची है। सबसे ज्यादा मौत 65 वर्ष से अधिक उम्र के रोगियों की हो रही है। इस उम्र के संक्रमितों में से आधे ठीक होने की अपेक्षा काल के गाल में समा जाते हैं।
डा. अजीत के मुताबिक तीनो वायरस एक ही जींस के हैं इसलिए विशिष्ट दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाने के बावजूद परम्परागत दवाएं इलाज में काम ली जा रही हैं। इन दवाओं के बल पर ही कोरोना से मुक्त होने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन इससे यह महामारी नियंत्रण में नहीं आ रही है।
उन्होंने बताया कि सीवियर एक्यूट रेस्पेरेटिरी सिंड्रोम अर्थात सार्स वायरस सात तरह का है। इनमें 2003 में आया सार्स कोविड-1, 2013-14 में आए मर्स वायरस और 2019 में आए कोविड-19 से दुनिया का परिचय हो चुका है। इसके अलावा कोरोना फैमिली के चार अन्य वायरस के नाम क्रमश: ह्यूमन कोरोना वायरस ओएच 43, ह्यूमन कोरोना वायरस एनएल 63, ह्यूमन कोरोना वायरस 229ई, ह्यूमन कोरोना वायरस एचयूके1 हैं। डा. अजीत जैन के अनुसार 2016 में डब्ल्यूएचओ ने भविष्यवाणी की थी कि कोरोना फैमिली के ये वायरस दुनिया में कभी भी महामारी फैला सकते हैं। भविष्यवाणी के बाद रिसर्च प्रोग्राम और दवा बनाने के प्रयास शुरू हो गए थे। इसीलिए उम्मीद है कि कोरोना का इलाज जल्द ही खोज लिया जाएगा।

प्रोटीन बढ़ाते है मौत का खतरा

डा. जैन के अनुसार दुनिया को सबसे ज्यादा घबराहट कोरोना संक्रमितों की मौत की बढ़ती दर से है। 2003 में चाइना के यूनान से शुरू हुए सार्स कोविड-1 के दौर में मौत की दर 9 प्रतिशत थी। दस साल बाद 2013-14 में आई मर्स महामारी में मौत की दर 35 प्रतिशत थी, लेकिन उसका फैलाव नहीं होने से दुनिया को ज्यादा चिंता नहीं हुई थी। इस बार यह पूरी दुनिया में फैल गया है और इसकी औसत मृत्यु दर भी 15 प्रतिशत है। कोविड-19 वायरस में चार तरह के प्रोटीन स्पाइक प्रोटीन, एनवल्व, मेमरिन और न्यूक्लोसाइट हैं और ये हाइरिस्क ग्रुप (डायबिटीज, हाइपर टेंशन,हृदय रोग) के मरीजों के मरने का खतरा बढ़ा देते है।

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कोरोना वायरस के सबसे आसान शिकार हैं मधुमेह के रोगी, ये चूर्ण बचाएगा उनकी जान

अगर आप डायबिटिक अर्थात मधुमेह के रोगी हैं तो कोरोना काल में सबसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत आपको ही है क्योंकि डायबिटिज आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करती है और कोरोना वायरस को ऐसे ही मानव शरीरों की तलाश रहती है जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो। ऐसे इंसानों के शरीर कोरोना के प्रवेश को रोक पाने में नाकाम होते हैं और वह आसानी से उनके फेफड़ों तक जा पहुंचता है।
आयुर्वेद विशेषज्ञ मंदीप जायसवाल के अनुसार कोरोना से निपटने के लिए लागू किया गया लॉकडाउन मधुमेह रोगियों को दोहरी परेशानी लेकर आया है। एक तरफ वे मॉर्निंग वाक नहीं कर पा रहे हैं तो दिनचर्या बिगड़ जाने से उनका खानपान नियंत्रित नहीं रह गया है।
डॉ. मंदीप ने बताया कि मधुमेह से पीडि़त रोगियों को इस समय ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। इस रोग से ग्रसित लोगों को हल्का व आधा पेट भोजन करना चाहिए। सुबह का नाश्ता भरपूर करना चाहिए। रात का खाना आठ बजे से पहले तथा आधा पेट करना चाहिए तथा रात के खाने के दो घंटे बाद ही सोना चाहिए।
डा. जायसवाल ने कहा कि मधुमेह रोगियों को दवाओं का नियमित सेवन करना चाहिए। आज के समय में बाहर टहलने की मनाही है इसलिए घर पर ही टहलें। कब्ज न हो, इसका विशेष ध्यान रखना है। इसके लिए खाना खाने के एक घंटे बाद गुनगुने पानी का सेवन करें। यदि दवा की जरूरत है तो भोजन करने से पहले हिंगवाष्टक चूर्ण तथा भोजन करने के एक घंटे बाद त्रिफला चूर्ण क्वाथ का सेवन अवश्य करें।
उन्होंने बताया कि भोजन से एक घंटे पहले हरिद्रा, आमलकी, दालचीनी, गिलोय, मेथी, चिरायता को बराबर मात्रा में मिलाकर इसका चूर्ण बनाकर लगातार सेवन करने से मधुमेह नियंत्रित रहती है। यदि शुगर बढ़ी है तो भोजन करने के एक घंटे बाद निशाकथाकादि कशाय फलाकत्रादि कशाय का सेवन इसमें फायदा मिलता है।
डॉ. जायसवाल के अनुसार डायबिटीज में विशेष रूप से दूध तथा दूध के अन्य विकार (पनीर इत्यादि) तथा दही आदि भी कम मात्रा में और जहां तक संभव हो दोपहर से पहले लेने चाहिए। फिर भी डायबिटीज नियंत्रित नहीं हो रहा है तो डाक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

उन्होंने बताया कि हम एलोपैथिक दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो निगरानी जरूरी होती है क्योंकि शरीर में प्रतिक्रियाएं बढ़ जाती हैं। ऐसे में हमें एलोपैथिक दवाओं की डोज कम करने की आवश्यकता होती है।

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Intake of fruits and vegetables: दिमाग को देनी है ताकत तो करें इन फल और सब्जियों का सेवन

Intake of fruits and vegetables:  फल और सब्जियां शारीरिक और मानसिक समस्याओं से निजात दिलाती हैं। एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि फलों और सब्जियों का संबंध कम होती याददाश्त और दिल की बीमारियों का खतरा कम करने से होता है।

शोध ऑस्ट्रेलियाई शहर सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में किया गया है। Intake of fruits and vegetables: शोध में एक लाख 39 हजार लोगों को शामिल किया गया था। शोध के दौरान कुछ खास फूड ग्रुप्स, मेमोरी लॉस और दिल की बीमारी वाले लोगों के बीच गहरा संबंध पाया गया। अध्ययन में सामने आया कि प्रोटीन से भरपूर चीजें खाने से याददाश्त तेज होती है। शोध के परिणाम को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित किया गया है।

डिमेंशिया नामक बीमारी की ये वजह

Intake of fruits and vegetables:  शोध के आंकड़ों के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया के चार लाख 59 हजार लोग डिमेंशिया नामक बीमारी से पीड़ित हैं। विशेषज्ञों ने अध्ययन में पाया कि फल और सब्जियों का कम सेवन करने वाले लोग डिमेंशिया से पीड़ित है। इनमें दिल से जुड़ी बीमारियां, हाइपरटेंशन और डायबिटीज जैसी घातक बीमारियों के लक्षण पाए गए। डिमेंशिया ऑस्ट्रेलियाई लोगों की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन चुकी है।

डाइट में शामिल करें ज्यादा फल और सब्जियां

Intake of fruits and vegetables:  विशेषज्ञों कहना है कि लोगों को अपनी लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करने की जरूरत है ताकि याददाश्त को लेकर कोई दिक्कत न आए। अगर लोगों को घातक बीमारियों से बचना है तो उन्हें जंक फूड छोड़कर हेल्दी फूड का सेवन करना होगा और डाइट में ज्यादा से ज्यादा फल और सब्जियों को शामिल करना होगा।

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ड्रैगन फ्रूट डायबिटीज पर कसता है शिकंजा, हृदय रो​गी भी पाते हैं राहत

ड्रैगन फ्रूट मधुमेह नियंत्रित रखता है। इसमें मोटापा दूर करने वाले तत्व भी पाए जाते हैं तथा यह कई प्रकार के हृदय रोगों को भी ठीक कर सकता है। यह फल बीमारियों से लड़ता है। ड्रैगन फ्रूट कैक्टस प्रजाति के एक पौधे का फल है जिसे सुपर फूड भी कहा जाता है। क्योंकि इसमें कैंसर सहित कई बीमारियों से लड़ने की क्षमता है और इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। वर्तमान में वियतनाम ड्रैगन फ्रूट का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। ड्रैगन फ्रूट के पौधे कैक्टस फैमिली के होने के कारण बहुत ज्यादा गरमी और ठंड को भी आसानी से झेल सकते हैं। साथ ही यह कम पोषक तत्वों वाली मिट्टी में भी जीवित रह सकते हैं और इसे पानी की भी बहुत कम आवश्यकता होती है। ड्रैगन फ्रूट के एक फल का वजन 300 से 600 ग्राम तक हो सकता है।

दुनियाभर में ड्रैगन फ्रूट की मुख्यतः तीन प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें लाल छिलका और सफेद गूदा, लाल छिलका और लाल गूदा और पीला छिलका और सफेद गूदे वाले ड्रैगन फ्रूट शामिल हैं। ड्रैगन फ्रूट की सभी प्रजातियों में गूदों के अनगिनत कीवी जैसे बीज होते हैं, जिसे गूदे के साथ ही खाया जाता है। ड्रैगन फ्रूट का स्वाद हल्का मीठा होता है। ड्रैगन फ्रूट के पौधे का इस्तेमाल सजावटी पौधे के तौर पर भी किया जाता है। पौधे में मई-जून के महीने में फूल आते हैं और अगस्त से दिसंबर के महीने तक फल लगते हैं। ड्रैगन फ्रूट के फूल रात में ही खिलते हैं। इसके फूल का इस्तेमाल चाय बनाने में फ्लेवर के लिए किया जा सकता है। इसके तने के गूदे का इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधन बनाने के लिए किया जाता है। भारत में पुणे सहित कई हिस्सों में इसकी खेती की जा रही है।

ये कहता है आयुर्वेद

ड्रैगन फ्रूट में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व पाए जाते हैं जो कैंसर सहित कई बीमारियों से बचाव में सक्षम हैं। इसमें फ्लू से लड़ने वाला विटामिन सी पाया जाता है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। 100 ग्राम ड्रैगन फ्रूट में 11 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 1.1 ग्राम प्रोटीन, 0.4 ग्राम वसा, 3 ग्राम फाइबर, 20.5 मिलीग्राम विटामिन सी, 1.9 मिलीग्राम आयरन, 0.05 मिलीग्राम विटामिन बी2, 0.04 मिलीग्राम विटामिन बी1, 22.5 मिलीग्राम फोस्फोरस, 8.5 मिलीग्राम कैल्शियम और 0.16 मिलीग्राम विटामिन बी3 पाया जाता है। एक शोध के अनुसार, ड्रैगन फ्रूट में पॉलीफीनॉल और फ्लावोनोइड पाया जाता है जो कई प्रकार के कैंसर की कोशिका को बनने और बढ़ने से रोकने में कारगर है। एक अध्ययन बताता है कि ड्रैगन फ्रूट में बड़ी मात्रा में फाइबर पाया जाता है जो कि पाचन शक्ति बढ़ाता है। ड्रैगन फ्रूट का नियमित सेवन तनाव को दूर करता है और मधुमेह को भी नियंत्रित रखता है। एक अध्ययन बताता है कि ड्रैगन फ्रूट में मोटापा दूर करने वाले तत्व पाए जाते हैं तथा यह कई प्रकार के हृदय रोगों को भी ठीक कर सकता है।

रेसिपी व्यंजन

पिताया आइसक्रीम
सामग्री:
ड्रैगन फ्रूट (पिताया) : 1 नग
क्रीम : 200 मिलीलीटर
चीनी (पिसी हुई) : 100 ग्राम
केला : 2 नग
किशमिश : 10-12
वनीला एसेंस : 4 बूंद
विधि: फ्रेश क्रीम को 6-8 घंटे तक फ्रीजर में रखकर छोड़ दें। इलेक्ट्रिक बीटर और एक बड़े कटोरे/भगोने को भी फ्रिज में 6-8 घंटे तक ठंडा करें। अब एक भगोने में बर्फ के 18-20 क्यूब्स रखकर उसमें ठंडा किए गए कटोरे को रखें और उस कटोरे में फ्रीज की गई क्रीम को उड़ेल दें। क्रीम के पतले भाग को अलग कर लें।

अब इलेक्ट्रिक बीटर से एक ही दिशा में घुमाते हुए हाई मोड पर 15 मिनट तक क्रीम को बीट करते रहें। जब क्रीम फूलकर दोगुना हो जाए तो इसमें पिसी हुई चीनी और वनीला एसेंस मिलाएं और 10 मिनट के लिए बीट करें और तैयार क्रीम को फ्रीजर में रख दें।

अब ड्रैगन फ्रूट को बीच से काटकर उसका गूदा एक चम्मच से निकाल लें और इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। केले को भी छीलकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें। अब क्रीम वाले भगोने में ड्रैगन फ्रूट और केले के टुकड़ों को डालकर इलेक्ट्रिक बीटर से 10 मिनट के लिए बीट करें। अब एक कंटेनर में मिश्रण को डालकर 2 घंटे के लिए फ्रीज करें।

फिर इसे फ्रीजर से निकालकर हैंड मिक्सर से हिलाएं, जिससे आइसक्रीम पर जमी बर्फ टूट जाए। अब कंटेनर को फिर से 6-8 घंटे के लिए फ्रीज करें। आइस स्कूप से निकालकर और किशमिश से सजाकर परोसें।

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गर्मियों में त्वचा को झुलसने से बचाएगा फालसे का शरबत, खून की शर्करा को करता है कम

फालसे का शरबत गर्मी में त्वचा को झुलसने से बचाता है और बुखार के उपचार में भी काम आता है। फालसा एक जामुनी रंग का करीब एक सेंटीमीटर व्यास का एक गोल फल होता है, जिसमें बीज के ऊपर गूदे की एक बेहद पतली परत होती है। इसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है।
फालसे की झाड़ी में कांटे नहीं होते और पके फालसों को हाथों से चुना जाता है। उसे अधिक दिनों तक बचाकर रखना भी सम्भव नहीं होता, क्योंकि ये जल्दी सड़ जाते हैं।

ठंडक का अहसास करवाते हैं फालसे

फालसा तिलासिया परिवार का एक फल है और इसके पेड़ झाड़ीनुमा होते हैं। तिलासिया परिवार में करीब 150 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से फालसा एकमात्र ऐसा फल है जिसे खाया जाता है। फालसा भारत का स्वदेशी फल है। इसे नेपाल, पाकिस्तान, लाओस, थाइलैंड और कम्बोडिया में भी उगाया जाता है। इसके पेड़ को ऑस्ट्रेलिया और फिलिपींस में खरपतवार के तौर पर जाना जाता है। फालसे मई-जून के महीने में पकते हैं। फल बहुत नाजुक होते हैं और इसे आसानी से लम्बी दूरी तक लेकर नहीं जाया जा सकता। इस कारण इसका उपभोग मुख्यतः स्थानीय तौर पर ही किया जाता है। बड़े शहरों के निकट ही इसका उत्पादन सीमित है। फालसे के पेड़ मुख्य रूप से आम और बेल के बागानों में स्थान भरने के लिए उगाए जाते हैं। गर्मी के महीनों में इसके फल और इससे बना शरबत ठंडक का अहसास करवाते हैं। बहुत अधिक पके हुए फल शरबत बनाने के लिए ज्यादा ठीक होते हैं।

मधुमेह रोगियों के खून में शर्करा की मात्रा नियंत्रित

आयुर्वेद के अनुसार, फालसा का शरबत गर्मी के मौसम में त्वचा को झुलसने से बचाता है और बुखार के उपचार में भी काम आता है। फालसा हृदय के लिए अच्छा होता है। यह मूत्र संबंधी विकारों और सूजन के उपचार में भी कारगर है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने यह पाया है कि फालसा का सेवन मधुमेह रोगियों के खून में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है और विकिरण के प्रभाव से होने वाली क्षति से बचाव भी कर सकता है। फालसे में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन, फास्फोरस, विटामिन ए, बी और सी पाया जाता है।
इसके स्वाद के कायल कई लोग इसके कठोर बीज को भी चबा जाते हैं। इस फल के बीज के तेल में एक प्रकार का वसा अम्ल (लिनोलेनिक ऐसिड) पाया जाता है, जो मनुष्य के शरीर के लिए बेहद उपयोगी है। फालसे में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन, फास्फोरस, विटामिन ए, बी और सी पाया जाता है।

फालसे का हेल्थ ड्रिंक

फालसे की खेती किसानों के बीच लोकप्रिय नहीं है, क्योंकि इसकी खेती के तरीकों के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। कुछ अध्ययन बताते हैं कि गोबर और खाद के उपयोग से इसकी उपज बढ़ाई जा सकती है। हालांकि इसके बावजूद एक पेड़ प्रतिवर्ष 10 किलो से अधिक उपज नहीं दे पाता। यह भी कहा जाता है कि उपज बढ़ाने के लिए पेड़ों की छंटाई की जानी चाहिए, लेकिन अधिकतम उपज पाने के लिए छंटाई की क्या हद होगी, इसका अध्ययन किया जाना बाकी है। वर्तमान में फालसे की खेती छोटे रकबे में पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और बिहार में होती है। यद्यपि फालसे की खेती को लोकप्रिय बनाया जा सकता है, क्योंकि इसके पौधे अनुपजाऊ मिट्टी में भी पनप सकते हैं। इसके पौधे सूखा रोधी होते हैं और अधिक तापमान पर भी जीवित रह सकते हैं। मिट्टी के कटाव को रोकने के साथ ही इसका उपयोग हवा के बहाव को बाधित करने के लिए भी किया जाता है। फालसे के पौधे की पतली शाखाओं का इस्तेमाल टोकरी बनाने में किया जा सकता है। इसकी छाल में एक चिपचिपा पदार्थ पाया जाता है, जिसका उपयोग गन्ने के रस को साफ करने के लिए किया जा सकता है, जिससे इस काम के लिए प्रयुक्त रसायनों के इस्तेमाल से बचा जा सके। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के तहत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन ने हाल ही में जम्मू क्षेत्र में फालसे के पेड़ों को उगाने की पहल शुरू की है, जिससे इस स्वादिष्ट फल को इस क्षेत्र से विलुप्त होने से बचाया जा सके। संस्थान ने फालसे से एक प्रकार का हेल्थ ड्रिंक बनाने की तकनीक विकसित की है, जिसे वैष्णो देवी मंदिर जाने के रास्ते में तीर्थयात्रियों को बेचा जा रहा है।

रेसिपी व्यंजन

फालसा शरबत
सामग्री
फालसे: 200 ग्राम
गुड़: 25 ग्राम
काला नमक: स्वादानुसार
भुना हुआ जीरा: 2 चुटकी

विधि: फालसे को अच्छी तरह से धोकर गूदे से बीज को अलग कर लें। अब गूदे को एक छन्नी की सहायता से अच्छे से निचोड़कर इसका रस निकाल लें। एक बड़े कटोरे में ठंडा पानी, गुड़, काला नमक और भुना व दरदरा पिसा हुआ जीरा मिलाएं। अब इस घोल में निचोड़े गए फालसे का रस मिलाएं और परोसें।

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ऐसे बनाएं अंजीर की खीर

अंजीर अपने स्वाद के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। अंजीर के पत्ते का रस क्षय रोग के उपचार में भी कारगर है। अंजीर में प्रचुर मात्रा में वसा रहित फाइबर पाया जाता है, जो ह्रदय संबंधी रोगों से बचाता है। अंजीर का सेवन यकृत और तिल्ली से संबंधित रोगों के उपचार में कारगर है। यहां हम आपको अंजीर की खीर बनाने की रेसिपी की जानकारी दे रही हैं। तो बनाइए अंजीर की खीर और रोगों से मुक्ति की शुरूआत कर दीजिए।

अंजीर की खीर की रेसिपी

सामग्री
ताजा अंजीर : 1 कप
सूजी: 1/4 कप
मावा: 1/2 कप
चीनी: 1 कप
घी: 2 बड़ा चम्मच
दूध: 1 लीटर
केसर: 1/4 छोटा चम्मच
इलाइची पाउडर: 1/4 छोटा चम्मच
बादाम, पिस्ता, काजू : 10-10 नग

विधि: बादाम, काजू और पिस्ता को गरम पानी में भिगोकर पांच मिनट के लिए रख दें। अब दोनों को छीलकर बारीक काट लें। इसके बाद एक कड़ाही में घी डालकर सूजी को 2-3 मिनट तक भूनें। इसमें बारीक कटे बादाम, पिस्ता और काजू डालकर 2 मिनट तक और भूनें। इसके बाद इसमें दूध डालकर मिश्रण को गाढ़ा होने तक पकाएं। अब इसमें चीनी और केसर को डालकर अच्छी तरह पकाएं। बारीक कटे ताजे अंजीर के टुकड़े, इलाइची पाउडर और कद्दूकस किया हुआ मावा डालकर 3 मिनट तक पकाएं। बारीक कटे पिस्ता और बादाम से सजाकर परोसें।

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शरीर की हड्डियों में अगर घुुस गया है गठिया तो अंजीर खाइए, छू मंतर हो जाएगा दर्द

अंजीर अपने स्वाद के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। अंजीर गूलर प्रजाति का एक स्वादिष्ट फल है। अंजीर के पेड़ कम पोषक तत्वों वाली मिट्टी में भी उगाए जा सकते हैं और सूखा प्रवण क्षेत्र में भी आसानी से पनप सकते हैं। अंजीर अपने स्वाद के लिए दुनियाभर में मशहूर है। ताजे और सूखे अंजीर से अनेक प्रकार के व्यंजन भी बनाए जाते हैं। अंजीर के पेड़ों में फल अमूमन अगस्त से अक्टूबर के बीच लगते हैं। अंजीर के पेड़ों पर फूल नहीं लगते, सीधे फल ही लगते हैं।

सबसे पहले उगाया था

अंजीर उन फलों में से एक है, जिसके पेड़ों को मनुष्यों ने सबसे पहले उगाया था। मनुष्य ने अंजीर को गेहूं और बार्ली से भी पहले उगाना शुरू कर दिया गया था। प्राचीन ग्रीस में अंजीर बड़े पैमाने पर उगाया जाता था। अरस्तू ने ध्यान दिलाया कि जानवरों की तरह ही अंजीर के पेड़ों में भी लैंगिक भिन्नता पाई जाती है। इसका अर्थ है कि अंजीर के पेड़ दो तरह के होते हैं- पहला, जिस पर फल लगते हैं और दूसरा, जो पहले प्रकार के पेड़ पर फल लगने में मदद करते हैं।

आदम और हव्वा ने खाया

कैलिफोर्निया की जलवायु अंजीर उत्पादन के लिए बिल्कुल मुफीद है। कैलिफोर्निया अंजीर उत्पादन में अग्रणी है। आदम और हव्वा ने जब ज्ञान वृक्ष के फल को खाया, इसके बाद ही उनमें शर्म की अनुभूति ने जन्म लिया। जिसके कारण उन्होंने अपने अंगों को अंजीर के पत्तों से ढंक लिया था। प्राचीन नग्न कलाकृतियों में जननांगों को अंजीर के पत्तों से ढंका दिखाया जाता रहा है।

बवासीर और गठिया से भी बचाता है

कुरान में अंजीर को जन्नत से उतरा पेड़ बताया गया है। कुरान के सूरा 95 का शीर्षक अल-तिन है, जिसका अर्थ अंजीर होता है। कुरान में अंजीर के बारे में पैगम्बर मुहम्मद साहब कहते हैं, “यदि मुझे किसी ऐसे फल के बारे में बताना हो, जो कि जन्नत से उतरा हो, तो मैं अंजीर का नाम लूंगा, क्योंकि इस स्वर्गिक फल में कोई गुठली नहीं होती और यह फल बवासीर और गठिया जैसे रोगों से भी बचाता है।
अंजीर कई पोषक तत्वों से भरपूर फल है, जिसके नियमित सेवन से इंसान न सिर्फ स्वस्थ रह सकते हैं, बल्कि यह कई प्रकार की बीमारियों के उपचार में भी कारगर है। अंजीर में विटामिन बी, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, मैंगनीज, फोस्फोरस, पोटाशियम, सोडियम और जिंक प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो मानव शरीर को कई प्रकार की बीमारियों से लड़ने में मदद करते हैं। अंजीर के औषधीय गुणों की पुष्टि वैज्ञानिक शोधों ने भी की है।

क्षय रोग के उपचार में कारगर

अंजीर के पत्ते का रस क्षय रोग के उपचार में कारगर है। एक शोध बताता है कि अंजीर का सेवन कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोक सकता है। एक अध्ययन के अनुसार, अंजीर में प्रचुर मात्रा में वसा रहित फाइबर पाया जाता है, जो ह्रदय संबंधी रोगों से बचाता है। अंजीर का सेवन यकृत और तिल्ली से संबंधित रोगों के उपचार में कारगर है।

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शरीर को रोगों से दूर रखता है मडुआ का हलवा, ये है इसकी रेसिपी

मेहनतकश आबादी के भोजन के रूप में मशहूर मडुआ में इतनी औषधीय ताकत है कि वह मानव शरीर को कई रोगों से दूर रखता है। यह मधुमेह नाशक अन्न है। इसे हलवे के रूप में खाया जाता है। पेश है मडुआ का हलवा बनाने की रेसिपी:—

 

रेसिपी
व्यंजन: मड़ुआ का हलवा
सामग्री:
मडुआ का आटा – 1 कप
चीनी – 4 चम्मच
घी – 3 चम्मच
काजू – 6
बादाम – 6
किसमिश – 8
पानी – 2 कप
विधि: सबसे पहले चूल्हे पर कड़ाही रखें और इसे गर्म होने दें। कड़ाही गर्म होने पर इसमें मंडुआ का आटा डालकर हल्का भूरा होने तक भूनें। जब आटे से सोंधी खुशबू आने लगे तो इसमें घी डालें और अच्छी तरह से मिलाएं।
अब इसमें काजू, किशमिश और बादाम को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर मिलाएं और 2 मिनट तक भूनें। इसके बाद कड़ाही में चीनी और पानी डालें और करछी से अच्छी तरह से मिलाते रहें ताकि गांठ न बन पाए। अब आंच धीमी करके पानी सूखने तक करछी से हिलाते रहें। पानी सूख जाने पर कड़ाही को चूल्हे से उतार लें। सूखे मेवे से सजाएं और परोसें।

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मडुआ, खाने वालों को छू नहीं सकती डायबिटिज, हृदय रोग भी रहता है दूर

प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और फाइबरयुक्त मड़ुआ नामक अन्न इतनी ऊर्जा प्रदान करता है कि इंसान कई घंटों तक बिना थके मेहनत कर सकता है। इसी वजह से इस अन्न को पहाड़ में रहने वाले चाव से खाते हैं। मड़ुआ को काफी दिनों तक स्टोर करके रखा जा सकता है क्योंकि यह खराब नहीं होता।

कैल्शियम, आयरन और फाइबर

मड़ुआ समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर भी उगाया जा सकता है। इसमें आयरन एवं अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में हैं। इसमें सूखे को झेलने की अपार क्षमता है और करीब 10 साल तक भंडारित किया जा सकता है। मड़ुआ में कीड़े नहीं लगते। इसलिए सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए मड़ुआ जीवन-रक्षक की भूमिका निभा सकता है। मड़ुआ की घास मवेशियों के चारे के लिए भी उपयुक्त होती है क्योंकि इसमें करीब 61% पोषक तत्व पाए जाते हैं। मड़ुआ का इस्तेमाल कुष्ठ और यकृत संबंधी रोगों के उपचार के लिए पारंपरिक औषधि के तौर किया जाता है। मड़ुआ में कैल्शियम, आयरन और फाइबर पाया जाता है इसलिए यह अन्य अनाजों की तुलना में अधिक ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम है। मड़ुआ के यही गुण इसे नवजात शिशुओं और बुजुर्गों के लिए उपयुक्त खाद्य पदार्थ बनाते हैं।

शरीर में ऊर्जा को जल्दी से लौटा देती है मड़ुआ की रोटी

तमिलनाडु में मड़ुआ को देवी अम्मन (मां काली का एक स्वरूप) का एक पवित्र भोजन माना जाता है। देवी अम्मन से जुड़े हर पर्व-त्योहार में महिलाएं मंदिरों में मड़ुआ का दलिया, जिसे कूझ कहा जाता है, बनाती हैं और गरीबों और जरूरतमंदों में बांटती हैं। कूझ कृषक समुदाय का मुख्य भोजन है जिसे कच्चे प्याज और हरी मिर्च के साथ खाया जाता है। व्रत के बाद मड़ुआ की रोटी शरीर में ऊर्जा को जल्दी से लौटा देती है। नेपाल में मडुआ के आटे की मोटी रोटी बनाई जाती है। मड़ुआ से बीयर, बनाई जाती है। श्रीलंका में नारियल के साथ मड़ुआ की मोटी रोटी बनाई जाती है और मसालेदार मांस के साथ खाया जाता है। मड़ुआ का सूप भी बनाया जाता है, जिसे करक्कन केंदा के नाम से जाना जाता है। वियतनाम में मड़ुआ का इस्तेमाल औषधि के तौर पर महिलाओं के प्रसव के दौरान किया जाता है। कई जगहों पर मड़ुआ का इस्तेमाल शराब बनाने के लिए भी किया जाता है।

खून में प्लाज्मा ट्रायग्लायसराइड्स को कम करता है मड़ुआ

मड़ुआ प्रोटीन, विटामिन और कार्बोहाइड्रेट का मुख्य स्रोत है और यह मानव शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्वों की पूर्ति कर सकता है। कई प्रकार के रोगों से बचाव में भी सहायक है। अमेरिकन डायबिटीज एसोशिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार मड़ुआ को अपने दैनिक आहार में शामिल करने वाली आबादी में मधुमेह रोग होने की आशंका बहुत कम होती है। मड़ुआ में चावल और गेहूं के मुकाबले अधिक फाइबर पाया जाता है और यह ग्लूटन मुक्त भी होता है, जिसके कारण यह आंतों से संबंधित रोगों से बचाता है। एक शोध के अनुसार, मड़ुआ का सेवन हृदय संबंधी रोगों से बचाव में कारगर है क्योंकि यह खून में प्लाज्मा ट्रायग्लायसराइड्स को कम करता है। मड़ुआ खाने वाली आबादी में खाने की नली के कैंसर होने की संभावना कम हो जाती है।

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मधुमेह रोगियों को पैर और तलवे की झनझनाहट से राहत दिलाता है बेर

Plum relieves diabetics from tingling of feet: बेर के पेड़ शुष्क और अर्द्धशुष्क इलाकों में पाए जाते हैं। बेर का फल हरे रंग का होता है और पकने पर लाल हो जाता है। बेर पकने का समय दिसंबर से मार्च तक होता है। यह मुख्यतः शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। इसे तमिल में नरी एलान्धई और हिंदी में झरबेरी कहा जाता है। बेर की दोनों प्रजातियां दक्षिण एशियाई देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल-के साथ ही अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भी पाई जाती हैं। भारत में यह हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में मिलते हैं। बेर का पेड़ मंदिरों में लगाए जाने वाले महत्वपूर्ण पेड़ों में से एक है। बेर का फल भगवान शिव को अर्पण किया जाता है और महाशिवरात्रि के समय इसे बेल के समान ही महत्त्व दिया जाता है।

 

बेर में अनेक औषधीय तत्व

Plum relieves diabetics from tingling of feet: यह फल विटामिन और खनिजों से लबरेज है। इसमें विटामिन के, कैल्शियम, मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। बेर में कुछ जैविक अम्ल भी पाए जाते हैं, जैसे-सक्सीनिक और टार्टरिक अम्ल। बेर में अनेक प्रकार के औषधीय तत्व पाए जाते हैं, जिसकी पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधान भी करते हैं। एक शोध इसके कैंसर-रोधी गुणों की पुष्टि करता है। बेर के गूदे का सेवन मधुमेह की वजह से होने वाले तंत्रिका क्षरण से बचाव करता है। इस बीमारी में पैर और तलवे की धमनियों में तेज दर्द होता है। बेर के इस गुण की पुष्टि इंडियन जर्नल ऑफ बेसिक मेडिकल साइंसेस में प्रकाशित शोध में की गई है।

 

चेचक और खसरे के उपचार में लाभकारी

Plum relieves diabetics from tingling of feet: बेर के पेड़ की छाल और पत्ते का इस्तेमाल चेचक और खसरे के उपचार में लाभकारी है। एक अध्ययन के अनुसार, बांग्लादेश के पारंपरिक वैद्य बेर के पत्तों और छाल को उबालकर उस पानी को पीड़ित व्यक्तियों पर छिड़कते हैं। तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले के पारंपरिक वैद्य भी बेर के पत्तों और छाल को उबालकर और उस पानी को नहाने के पानी में मिलाकर स्नान करने की सलाह देते हैं। इससे बदन दर्द में आराम मिलता है।

दस्त और हैजा के उपचार में सक्षम

Plum relieves diabetics from tingling of feet: एक शोध के अनुसार, इस फल को सुखाकर और पीसकर भी खाया जाता है। बेर के पेड़ की कोंपलों को छांव में सुखाकर इसका पाउडर बनाया जाता है। इस पाउडर को पानी में घोलकर बने मिश्रण का उपयोग विटामिन सी कमी से होने वाले रोग स्कर्वी के उपचार के लिए किया जाता है। एक अध्ययन बताता है कि बेर के पेड़ की छाल का पाउडर घाव के उपचार में कारगर है। बेर के पेड़ की जड़ से बना घोल दस्त और हैजा के उपचार में सक्षम है।