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कोरोना जांच के नाम पर घाटे की भरपाई की फिराक में है निजी अस्पताल!

लॉकडाउन में लगभग बंद हो गए निजी अस्पताल फिर से खुलते ही घाटे की भरपाई मरीजों पर कोरोना टेस्ट का भार डालकर करने की तैयारी में हैं। जानकारी के अनुसार निजी अस्पताल अपने यहां इलाज के लिए आने वाले सभी मरीजों को कोरोना जांच के लिए बाध्य करेंगी और प्रति जांच पांच हजार तक वसूलेंगे। हैल्थ सेक्टर के जानकारों का कहना है कि कोरोना के एक टेस्ट की लागत अधिकतम एक हजार रुपए आती है और बड़े पैमाने पर टेस्ट करने पर यह और घट जाती है लेकिन निजी अस्पताल उसकी कीमत अधिकतम वसूलने पर जोर देंगे।

जांच से होगी कमाई

मेडिका ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के चेयरमैन आलोक राय के अनुसार इन जांचों में लागत के अलावा केवल 10 फीसदी मार्जिन मिलेगा। राय ने कहा, ‘वे इसे आमदनी के एक बड़े स्रोत के रूप में नहीं देखते हैं क्योंकि उन्हें समय-समय पर अपने डॉक्टरों और कर्मचारियों की भी जांच करनी होगी। इस तरह मरीज की एक बार जांच होगी और डॉक्टरों की बार-बार करनी होगी। इस तरह जो कमाई होगी, वह आंतरिक जांच में चली जाएगी।

कम आएगी जांच की लागत

दूसरी ओर निजी अस्पतालों की जांच की लागत भी घटेगी क्योंकि नमूने लेने की लागत काफी कम है। उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि अस्पतालों के लिए हर मरीज की पीसीआर जांच की लागत 1000 रुपये से अधिक नहीं होगी। हालांकि अस्पतालों के ज्यादा पैसा वसूलने पर प्रशासन की नजर है। हालांकि कुछ अस्पताल शृंखलाएं धीरे-धीरे सुधार को लेकर सतर्क हैं। अस्पतालों को लोगों और बेडों के बीच दूरी बढाऩी होगी और कर्मचारियों को बारी-बारी से काम पर बुलाना होगा। बड़ी अस्पताल शृंखलाओं के राजस्व में विदेशी मरीजों का हिस्सा करीब 10 से 12 फीसदी है। मगर ऐसे मरीजों के लिए अस्पतालों को कुछ इंतजार करना होगा।

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कोरोना रोगियों को दी जा रही दवा के तीन डोज की कीमत 1.80 लाख

मुम्बई में कोरोना संक्रमण से जूझ रहे रोगियों को बचाने के लिए टोसिलीजुमैब दवा दी जा रही है, उसके तीन डोज की कीमत एक लाख अस्सी हजार रुपए है। इस दवा के परिणाम अच्छे आए हैं लेकिन इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करने से पहले इसकी कीमत रास्ते का रोडा बन गई है।

आइटोलिजुमैब का कोरोना के उपचार में इस्तेमाल

जानकारी के अनुसार हाल ही दो दवा कंपनियां रॉश और बायोकॉन भी कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए दवाएं पेश करने की होड़ में शामिल हो गई हैं। रॉश की गठिया रोग की सिप्ला द्वारा बेची जाने वाली दवा एक्टेम्रा (टोसिलिजुमैब) को कोविड-19 मरीजों में सूजन दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं बायोकॉन अपनी सोरायसिस की दवा आइटोलिजुमैब में बदलाव लाकर इसका कोरोना वायरस के उपचार में इस्तेमाल कर रही है।

टोसिलीजुमैब का भी उपयोग

दोनों दवाओं का परीक्षण मुंबई के नायर हॉस्पिटल और किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) हॉस्पिटल में गंभीर रूप से बीमार कोरोना मरीजों पर किया जा रहा है। रॉश की टोसिलीजुमैब का इस्तेमाल कर रहे नायर हॉस्पिटल में दो मरीजों के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार दिखा है और उन्हें वेंटिलेटर से हटाया जा सकता है। वहीं केईएम में भी मरीज को बायोकॉन की आइटोलिजुमैब दवा दी गई।

मरीजों में बनता है साइटोकिन

मणिपाल हॉस्पिटल्स में इंटरवेंशनल पलमोनोलॉजी ऐंड स्लीप मेडिसिन के एचओडी सत्यनारायण मैसूर के अनुसार मुंबई में, कोरोनावायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अब तक टोसिलिजुमैब का इस्तेमाल कोविड-19 मरीजों में ज्यादा साइटोकिन बनने से रोकने के लिए इंटरल्यूकिन-6 के तौर पर किया जा रहा था। अब इसे आइटोलिजुमैब के तौर पर पुन: तैयार कर इसका परीक्षण किया जा रहा है। मणिपाल हॉस्पिटल्स कर्नाटक में गठित कोविड-19 कार्यबल का भी सदस्य है।

एक खुराक की कीमत लगभग 60,000 रुपये

वृहनमुंबई नगरपालिका (बीएमसी) ने 120 से ज्यादा उन मरीजों पर इन दवाओं को आजमाने का निर्णय लिया है जिनकी उसने पहचान की है और उसका मानना है कि इन दवाओं से उन्हें लाभ मिल सकता है। लेकिन समस्या कीमत को लेकर है। इसकी एक खुराक की कीमत लगभग 60,000 रुपये है। इस दवा की तीन खुराक लेने के लिए मरीज को 1.8 लाख रुपये चुकाने की जरूरत होगी। आईटोलिजुमैब को अलजुमैब ब्रांड नाम के तहत भारत में 2013 में बायोकॉन ने तैयार करके पेश किया। इस दवा को गंभीर त्वचा रोग सोरायसिस के इजाज के लिए विकसित किया गया था।

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डब्ल्यूएचओ की भविष्यवाणी: कोरोना वैक्सीन नहीं बना पाएंगे वैज्ञानिक!

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि वैज्ञानिक जिस तरह एचआईवी और डेंगू की वैक्सीन नहीं बना पाए हैं, वैसे ही हो सकता है कि वे कोरोना की वैक्सीन बनाने में भी नाकाम हो जाएं।

आशंका ने बढ़ाई लोगों की चिंता

विश्व स्वास्थ्य संगठन में कोविड-19 के विशेष दूत डॉ.डेविड नैबोरो ने कहा, यहां कुछ वायरस हैं जिनकी कोई वैक्सीन नहीं है। हम यह मान कर नहीं चल सकते कि वैक्सीन आ जाएगी और अगर यह आती भी है तो क्या सभी तरह की सुरक्षा और क्षमता के मानकों पर खरा उतरती है। उल्लेखनीय है कि डब्ल्यूएचओ चीफ भी कोरोना वायरस को लेकर भयावह भविष्यवाणी करते रहे हैं और अब एक्सपर्ट की इस आशंका ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

तीन करोड़ की हो चुकी है एचआइवी से मौत

सीएएन की रिपोर्ट के मुताबिक नैबोरो ने कहा, ‘सबसे बुरी स्थिति यह हो सकती है कि कभी कोई वैक्सीन ही न हो। उन्होंने कहा कि लोगों की उम्मीदें बढ़ रही हैं और फिर खत्म हो रही हैं, क्योंकि आखिरी मुश्किलों से पहले ही कई समाधान फेल हो जा रहे हैं। चार दशकों से अब एचआईवी से 3.2 करोड़ लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन दुनिया उसका वैक्सीन नहीं ढूंढ पाई है। वहीं, डेंगू की बात की जाए तो यह हर साल चार लाख लोगों को प्रभावित करता है। वहीं, कुछ देशों में 9-45 साल के लोगों के लिए डेंगू का वैक्सीन मौजूद है।

इन दो दवाओं से कम हुआ कोरोना का असर

एक अध्ययन के मुताबिक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन के साथ एजिथ्रोमाइसिन का कॉम्बिनेशन कोरोना के असर को कम कर सकता है। कई देशों में दोनों दवाओं के इस्तेमाल के अच्छे नतीजे मिले हैं। भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक कोरोना वायरस का इलाज अभी तक नहीं मिल पाया है। देश में एक होम्योपैथिक दवा की भी फोटो और दवा का नाम खूब वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि यह दवा कोरोना वायरस के इलाज में कारगर है। इस दवा का नाम आर्सेनिक एलबम 30 है। सोशल मीडिया में चल रहे मैसेज में कहा गया है कि कोरोना वायरस एक तरह का वायरल इंफेक्शन है, जिसको होम्योपैथिक दवा आर्सेनिक एलबम 30 से नियंत्रित किया जा सकता है।

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इजरायल और इटली का दावा, हमारे वैज्ञानिकों ने बना लिया है कोरोना वैक्सीन

विश्‍वव्‍यापी कोरोना महामारी के बीच इजरायल के रक्षा मंत्री नफ्ताली बेनेट ने दावा किया है कि उनके देश के मुख्य जैविक अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के लिए एक एंटीबॉडी विकसित करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। उन्‍होंने कहा कि अब इसके पेटेंट और बड़े पैमाने पर संभावित उत्‍पादन के बारे में काम चल रहा है। इधर इटली ने भी दावा किया है कि उसने दुनिया का पहला कोरोना वायरस वैक्सीन विकसित कर लिया है जो मनुष्यों पर काम करता है। रोम के एक अस्पताल में किए गए परीक्षणों के अनुसार, कोरोना वायरस वैक्सीन में चूहों में उत्पन्न एंटीबॉडी होते हैं जो मानव कोशिकाओं पर काम करते हैं।

चूहों के शरीर में विकसित हुआ एंटीबॉडी

एक रिपोर्ट के मुताबिक, इटली कोविड-19 की वैक्सीन बनाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है जो इंसानों पर भी असरदार है। यह रिपोर्ट रोम के ‘इंफेक्शियस डिसीज स्पैलनज़ानी हॉस्पिटल’ में हुए एक परीक्षण पर आधारित है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कोरोना वायरस वैक्सीन ने चूहों के शरीर में एंटीबॉडीज जेनरेट की है जिसका असर इंसान की कोशिकाओं पर भी होता है।

इटली में वैक्सीन का परीक्षण

दवा बनाने वाली एक फर्म ‘ताकीज़’ के सीईओ लिगी ऑरिसिशियो ने इटली की एक न्यूज एजेंसी के हवाले से कहा, यह इटली में वैक्सीन का परीक्षण करने वाले उम्मीदवारों का सबसे एडवांस स्टेज है। वैक्सीन का परीक्षण करने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों का इस्तेमाल किया था। सिंगल वैक्सीनेशन के बाद उन्होंने चूहों के शरीर में एंटीबॉडीज़ को विकसित होते देखा जो मानव कोशिकाओं को प्रभावित करने वाले कोरोनो वायरस को ब्लॉक कर सकता है।
दुनियाभर में 100 से ज्यादा वैक्सीन का ट्रायल प्री-क्लीनिकल ट्रायल पर हैं और उनमें से कुछ का इंसानों पर प्रयोग शुरू किया गया है। इस महामारी के फैलने का सबसे बड़ा कारण यह है कि अब तक इसकी दवा ईजाद नहीं हो सकी है।

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कागज की इस स्ट्रिप से एक घंटे में होगी कोरोना की जांच

सीएसआईआर ने कागज की ऐसी स्ट्रिप बनाई है जिससे मात्र एक घंटे में कोरोना की जांच की जा सकेगी। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने कागज की स्ट्रिप के जरिए कोरोना वायरस का टेस्‍ट करने की तकनीक को ‘फेलुदा’ नाम दिया है। बड़े पैमाने पर फटाफट टेस्टिंग (रैपिड मास टेस्टिंग) के लिए इसका इस्‍तेमाल होगा। इसके लिए सीएसआईआर और टाटा संस ने हाथ मिलाया है। उम्‍मीद है कि मई के अंत तक इस तकनीक के जरिये टेस्टिंग का काम शुरू हो जाएगा। यह तकनीक पूरी तरह भारत में बनी है। ‘फेलुदा’ को कोरोना महामारी को काबू में करने के लिए बनाया गया है। इसके जरिये बड़े पैमाने पर टेस्टिंग की जा सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा है कि यह किफायती है। इसे इस्‍तेमाल करना आसान है और इसके लिए महंगी क्‍यू-पीसीआर मशीनों की जरूरत नहीं पड़ती है।

बताया जाता है कि इस तकनीक के जरिये डेढ़ से दो घंटे में कोविड टेस्ट मुमकिन है और कीमत भी 500 रुपये के आसपास आएगी। ‘फेलुदा’ को सीएसआईआर की इंस्‍टीट्यूट ऑफ जेनोमिक्‍स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) ने विकसित किया है। सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी मांडे के मुताबिक आईजीआईबी जैसी सीएसआईआर की प्रयोगशालाएं ‘डीप साइंस’ पर काम कर रही हैं। वे उन्‍नत तकनीकों को विकसित कर रही हैं। उन्‍होंने टाटा ग्रुप जैसे प्रमुख उद्योग घराने के इस मुहिम में शामिल होने पर खुशी जताई। सीएसआईआर-आईजीआईबी और टाटा संस ने इसे लेकर एक एमओयू पर हस्‍ताक्षर किए हैं। यह कोविड-19 की सटीक और बड़े पैमाने पर टेस्टिंग के लिए किट के विकास की लाइंसिंस से जुड़ा है।

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17 साल पहले मौत का तांडव करने वाले सार्स का सगा भाई है कोरोना

संसार के शक्तिशाली देशों को घुटने पर ला चुका कोरोना वायरस 17 साल पुराने सार्स का सगा भाई है। इस बार उसके ज्यादा मारक होने का यही कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोरोना फैमिली का यह वायरस पिछले दो बार के मुकाबले ज्यादा ताकतवर होकर आया है और उसने म्युटेशन के जरिए स्वयं को ज्यादा घातक बना लिया है। 2003 में आए सार्स कोविड-1 और 2013-14 में आए मर्स वायरस से मौजूदा वायरस की समानता क्रमश: 70 और 50 प्रतिशत तक है। पहले के दोनो वायरस घातक तो थे लेकिन वे व्यापक तबाही नहीं फैला पाए थे। क्योंकि कोविड-1 पूरी तरह ग्लोबल होने से पहले ही दम तोड़ गया था और 2013-14 का मर्स सऊदी अरब तक सीमित रह गया था।
कोरोना वायरस का मौजूदा स्वरूप बेहद घातक है। उसने 45 वर्ष से अधिक उम्र के इंसानों को उसी तरह मौत के घाट उतारा है जिस तरह लगभग एक सदी पहले प्लेग ने उनका भक्षण किया था। अनुमान है कि पिछले चार माह में कोरोना संक्रमण के चलते पूरी दुनिया में भगवान को प्यारे हुए लगभग ढाई लाख इंसानों में से 80 प्रतिशत 45 से 80 साल के हैं।

बूढ़ों के लिए मौत का दूसरा नाम है कोरोना

इन दिनों कोविड-19 के रोगियों की जान बचाने में जुटे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कार्डियक थोरासिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजीत जैन के मुताबिक पूरी दुनिया में अभी तक कोरोना संक्रमितों की मृत्यु का जो आंकड़ा सामने आ रहा है, उसमें 25 साल से कम उम्र के संकमितों की संख्या एक प्रतिशत है। 25 से 44 साल तक के मृतकों का आंकड़ा अभी तक छह प्रतिशत पर टिका हुआ है लेकिन 45 से 60 साल तक संक्रमितों की मृत्यु दर 15 प्रतिशत तक जा पहुंची है। सबसे ज्यादा मौत 65 वर्ष से अधिक उम्र के रोगियों की हो रही है। इस उम्र के संक्रमितों में से आधे ठीक होने की अपेक्षा काल के गाल में समा जाते हैं।
डा. अजीत के मुताबिक तीनो वायरस एक ही जींस के हैं इसलिए विशिष्ट दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाने के बावजूद परम्परागत दवाएं इलाज में काम ली जा रही हैं। इन दवाओं के बल पर ही कोरोना से मुक्त होने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन इससे यह महामारी नियंत्रण में नहीं आ रही है।
उन्होंने बताया कि सीवियर एक्यूट रेस्पेरेटिरी सिंड्रोम अर्थात सार्स वायरस सात तरह का है। इनमें 2003 में आया सार्स कोविड-1, 2013-14 में आए मर्स वायरस और 2019 में आए कोविड-19 से दुनिया का परिचय हो चुका है। इसके अलावा कोरोना फैमिली के चार अन्य वायरस के नाम क्रमश: ह्यूमन कोरोना वायरस ओएच 43, ह्यूमन कोरोना वायरस एनएल 63, ह्यूमन कोरोना वायरस 229ई, ह्यूमन कोरोना वायरस एचयूके1 हैं। डा. अजीत जैन के अनुसार 2016 में डब्ल्यूएचओ ने भविष्यवाणी की थी कि कोरोना फैमिली के ये वायरस दुनिया में कभी भी महामारी फैला सकते हैं। भविष्यवाणी के बाद रिसर्च प्रोग्राम और दवा बनाने के प्रयास शुरू हो गए थे। इसीलिए उम्मीद है कि कोरोना का इलाज जल्द ही खोज लिया जाएगा।

प्रोटीन बढ़ाते है मौत का खतरा

डा. जैन के अनुसार दुनिया को सबसे ज्यादा घबराहट कोरोना संक्रमितों की मौत की बढ़ती दर से है। 2003 में चाइना के यूनान से शुरू हुए सार्स कोविड-1 के दौर में मौत की दर 9 प्रतिशत थी। दस साल बाद 2013-14 में आई मर्स महामारी में मौत की दर 35 प्रतिशत थी, लेकिन उसका फैलाव नहीं होने से दुनिया को ज्यादा चिंता नहीं हुई थी। इस बार यह पूरी दुनिया में फैल गया है और इसकी औसत मृत्यु दर भी 15 प्रतिशत है। कोविड-19 वायरस में चार तरह के प्रोटीन स्पाइक प्रोटीन, एनवल्व, मेमरिन और न्यूक्लोसाइट हैं और ये हाइरिस्क ग्रुप (डायबिटीज, हाइपर टेंशन,हृदय रोग) के मरीजों के मरने का खतरा बढ़ा देते है।

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हार गया कोरोना, तेज होते संक्रमण के बीच मरीजों के ठीक होने की रफ्तार बढ़ी

कोरोना के कहर के बीच राहत की खबर आई है। देश में अभी जिस तेजी से कोरोना संक्रमण फैल रहा है, उतनी तेजी से संक्रमण के शिकार मरीज ठीक होकर घर भी जा रहे हैं। पिछले 24 घंटों में कोरोना से संक्रमित 682 लोगों के स्वस्थ होने के साथ ऐसे लोगों की संख्या 10633 पर पहुंच गयी है तथा इनकी रिकवरी दर बढ़कर 26 प्रतिशत से अधिक हो गयी है।

रेड और ओरेंज जोन पुन: परिभाषित

इसी को देखते हुए रेड और ओरेंज जोन को पुन: परिभाषित किया गया है। इन क्षेत्रों में विषाणु संक्रमण को रोकने के लिए उपयुक्त कंटेनमेंट स्ट्रैटिजी अपनाई जानी जरूरी है। कंटेनमेंट जोन के बाहर के क्षेत्र को घेरकर उपयुक्त रणनीति बनाई जानी है लेकिन अगर इसके बाहर के क्षेत्र यानी बफर जोन में कोई भी केस नहीं आ रहा है और इसके बाहर के क्षेत्र में कुछ गतिविधियों में छूट दी जा सकती है। किसी भी राज्य अथवा जिले चाहे वे रेड जोन हो या ओरेंज जोन हो, उन सभी में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों को बढऩे से रोकने के लिए कड़े कदम उठाये जाने जरूरी है क्योंकि इस वायरस का प्रसार रोकने के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है। हालांकि इसी बीच देश में कईं मरीजों पर प्लाज्मा थैरेपी को आजमाया गया और उसके नतीजे भी सकारात्मक रहे है लेकिन महाराष्ट्र में एक कोरोना मरीज की मौत होने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके बारे में स्पष्ट कर दिया है कि प्लाज्मा थेरेपी को विश्व में कहीं भी मान्य उपचार के तौर पर पुष्टि नहीं हुई है और यह सिर्फ ट्रायल के तौर पर ही की जा रही है तथा दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना यह घातक साबित हो सकती है।

ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की मंजूरी जरूरी

विश्व के अनेक देशों में कोरोना महामारी से निपटने पर शोध और अनेक कार्य हो रहे हैं लेकिन अभी तक किसी भी कारगर वैक्सीन अथवा दवा का पता नहीं चल सका है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश में कई स्थानों पर प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल कोरोना मरीजों के इलाज के लिए हो रहा है लेकिन इसका उपयोग भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के दिशा- निर्देशों के तहत ही होना चाहिए और इसके लिए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से मंजूरी लेनी जरूरी है। इसी के बाद ही यह प्रकिया शुरू की जानी है।

देश में कुल 75 हजार वेंटीलेटर की मांग

देश में इस समय कुल 75 हजार वेंटीलेटर की मांग है और उपलब्ध वेंटीलेटर की संख्या 19398 है जिसे देखते हुए केन्द्र सरकार ने घरेलू निर्माता कंपनियों को 59884 वेंटीलेटर के ऑर्डर दिए हैं। देश में आक्सीजन तथा आक्सीजन सिलेंडरों की आपूर्ति सामान्य है। देश की कुल आक्सीजन निर्माण क्षमता 6400 एमटी है जिसमें से एक हजार एमटी का इस्तेमाल ही मेडिकल आक्सीजन बनाने में होता है। देश में इस समय पांच बड़े और 600 छोटे आक्सीजन निर्माता कंपनियां हैं और खुद ही आक्सीजन निर्माण करने वाले अस्पतालों की संख्या 409 है और क्रायोजेनिक टैंकरों की संख्या 1050 है। देश में 30 मार्च को पीपीई की निर्माण क्षमता मात्र 3312 थी जो 30 अप्रैल तक 186472 हो गई है।

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कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े कर देगा ‘अतुल्य’

Incredible will break thousand pieces of Corona virus:

भारत के रक्षा वैज्ञानिकों ने एक ऐसा माइक्रोवेव बनाया है जो कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े करके उसे नष्ट करने में सक्षम है। ये माइक्रोवेव पुणे स्थित उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी संस्थान ने विकसित किया है। यह एक मिनट से भी कम समय में कोरोना विषाणु के टुकड़े टुकड़े कर उसे नष्ट कर देगा। संस्थान द्वारा विकसित माइक्रोवेव को अतुल्य नाम दिया गया है और यह 560 से 600 सेल्सियस के तापमान पर कोरोना विषाणु को टुकड़े टुकडे कर उसे नष्ट करने में सक्षम है। माइक्रोवेव किफायती है और इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है या एक जगह पर फिक्स भी किया जा सकता है। माइक्रोवेव इसे चलाने वाले व्यक्ति के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। विभिन्न वस्तुओं के आकार के अनुसार यह उस पर लगे कोरोना विषाणु को 30 सेकेंड से एक मिनट में नष्ट करने में सक्षम है। इस माइक्रोवेव का वजन तीन किलो है और यह केवल गैर धातु वाली वस्तुओं को ही संक्रमण मुक्त करने में सक्षम है।

 

ये तीन सुपर हीरो देंगे मात

इस बीच कोरोना वायरस को मात देने के लिए तीन सुपर हीरो भी आगे आए हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी सुपर पावर के साथ चलने की बात की है। इतना ही नहीं कोविड-19 के सुपर हीरो से नाम से एक पोस्टर भी जारी किया है, जिसमें साबुन, मास्क और अल्कोहल वाले हैण्ड सैनिटाइजर को वायरस से मुकाबला करने वाले सुपर हीरो के रूप में दिखाया गया है।
पोस्टर के माध्यम से सन्देश दिया जा रहा है कि कोरोना के संक्रमण से सुरक्षित रहना है तो साबुन और पानी से बार-बार अच्छी तरह से हाथ धोएं। बाहर से जब भी घर के अंदर आयें तो हाथों को अच्छी तरह से धोना कतई न भूलें। नाक, मुंह व आँख को न छुएं।

इसी तरह कोविड-19 के दूसरे सुपर हीरो मास्क को भी बहुत अहम बताते हुए इसका उपयोग खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए करने को कहा गया है। कोरोना का वायरस खांसने व छींकने से निकलने वाली बूंदों के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है, इसलिए खांसते या छींकते समय नाक व मुंह को ढककर रखें। वहीं, अल्कोहल आधारित सैनिटाइजर भी कोरोना की जंग में अहम भूमिका निभा रहे हैं। कोरोना को फैलने से रोकने के साथ ही कीटाणुओं को खत्म करने और खुद को सुरक्षित रखने में इनका इस्तेमाल बहुत ही प्रभावी है।

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बन गई कोरोना की दवा, नैनोमेडिसिन है नाम

Nano medicine is the name of Corona medicine:

भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दवा खोज निकाली है जो शरीर घुस चुके कोविड 19 वायरस की विस्तार की क्षमता को समाप्त कर देगी। वैज्ञानिकों ने दवा का पशुओं पर परीक्षण पूर्ण करके मानवों पर परीक्षण की तैयारी शुरू कर दी है।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बदलने में सक्षम

ये वैज्ञानिक कोलकाता स्थित एस.एन. बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साईंसेज, (एसएनबीएनसीबीएस) के है और उन्होंने ऐसी सुरक्षित एवं किफायती नैनोमेडिसिन विकसित की है जो शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बदलने में सक्षम है। नैनोमेडिसिन स्थिति के अनुसार हमारे शरीर में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पेसीज (आरओएस) को घटा या बढ़ा सकती है और रोग का उपचार कर सकती है।
स्तनधारियो में आरओएस की नियंत्रित वृद्धि के लिए इस अनुसंधान की क्षमता कोविड-19 सहित वायरस संक्रमणों को नियंत्रित करने में नैनोमेडिसिन के अनुप्रयोग के लिए नई संभावना की उम्मीदें बढ़ाती है।

पशु परीक्षण पूर्ण

कई रोगों के रिडक्शन एंड ऑक्सीडेशन प्रोसेसेज (रेडॉक्स) के लिए पशु परीक्षण पूर्ण हो चुका है और अब संस्थान मानवों पर नैदानिक परीक्षण करने के लिए प्रायोजकों की खोज कर रहा है। यह मेडिसिन नींबू जैसे नींबू वर्गीय अर्क के साथ मैगनीज सॉल्ट से निकाले गए नैनोपार्टिकल्स को जोड़ती है। नैनोटेक्नोलॉजी की तरकीबों का उपयोग करते हुए मैगनीज और साइट्रेट का महत्वपूर्ण मिश्रण नैनोमेडिसिन का उत्पादन करता है।

ऑक्सीजन जोड़ती हटाती हैं

कृत्रिम रूप से निर्मित्त नैनोमेडिसिन हमारे शरीर के उत्तकों में रिडक्शन एंड ऑक्सीडेशन प्रोसेसेज (रेडॉक्स) के संतुलन को बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण पाया गया। कोशिकाओं में रेडॉक्स प्रतिक्रियाएं ऑक्सीजन जोड़ती या हटाती हैं और कोशिकाओं में ऊर्जा पैदा करने जैसी कई प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य हैं। रेडॉक्स प्रतिक्रियाएं रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पेसीज (आरओएस) नामक कोशिकाओं के लिए हानिकारक उत्पादनों का भी निर्माण कर सकती हैं चूहों पर किए गए एक परीक्षण में, नैनोमेडिसिन सुरक्षित एवं त्वरित पाए गए और ढाई घंटों के भीतर बिलरुबिन के स्तर को नीचे ले आए।

तोड़ देती है वायरस की संरचना

स्तनपायियों में रिएक्टिव आक्सीजन स्पेसीज (आरओएस) की नियंत्रित वृद्धि की यह क्षमता कोविड-19 सहित वायरस संक्रमणों को नियंत्रित करने में नैनोमेडिसिन के अनुप्रयोग की नई संभावनाओं का रास्ता प्रशस्त करता है। अभी हाल में, हाइड्रोजन पेरोक्साइड, जो आरओएस के वर्ग का है, की स्थानीय दवा की अनुशंसा कोविड-19 से बचने के एक तरीके के रूप में की गई है। एक नेबुलाइजर के जरिये श्वसन मार्ग में हाइड्रोजन पेरोक्साइड के उपयोग द्वारा अत्यधिक आरओएस अर्जित किया गया, जिसकी सलाह वायरस संरचना को तोडऩे के द्वारा कोविड-19 को निष्क्रिय करने के लिए दी जाती है। ये निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित किए गए हैं।

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कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाएंगे एंटी वायरल कपड़े से बने वस्त्र

फैशन बाजार ने कोरोना संक्रमण के चलते देश भर में लागू लॉकडाउन का फायदा उठाने का रास्ता खोज लिया है। वह फैशन के दीवाने लोगों के लिए एंटी वायरल कपड़ा लेकर आया है। बाजार का दावा है कि इस कपड़े से बने वस्त्र पहनने वालों से कोरोना वायरस कई मीटर दूर रहेगा।

सूक्ष्मजीवों को पनपने से रोकते हैं एंटीवायरल और एंटी-बैक्टीरियल कपड़े 

ये कपड़ा ग्राडो नामक कम्पनी ने बनाया है। डोनियर समूह की कंपनियों द्वारा विकसित और ग्राडो की निर्माण इकाइयों द्वारा बेहतरीन तरीके से तैयार किए गए परिधानों में सूट से लेकर जैकेट और पतलून तक किसी भी तरह के परिधान पहनने और उपयोग करने के लिए सुरक्षित प्रमाणित किए गए हैं। विशेष रूप से डिजाइन किए गए एंटीवायरल और एंटी-बैक्टीरियल कपड़े सूक्ष्मजीवों को पनपने से रोकते हैं। जिससे वे सुरक्षित और स्वच्छ बनते हैं। कपड़े अपने गुणों को 50 बार धुलने तक भी बरकरार रखते हैं और हर रोज पहनने के लिए उपयुक्त हैं।
ग्राडो के एक अधिकारी ने कहा कि दुनिया की मौजूदा स्थिति को देखते हुए बाजार में इस लॉकडाउन के लिए ज्यादा हाइजीन प्रोडक्ट की पेशकश करने की स्थिति में होना चाहते थे और फिलहाल एंटी वायरल कपड़ों से बेहतर और क्या हो सकता है, जिसे हर कोई पहन सकता है। हम इस मुश्किल समय में राष्ट्र के लिए अपना योगदान देने के बारे में गर्व महसूस कर रहे हैं।

सुरक्षा की गारंटी नहीं

यहां यह उल्लेखनीय है कि कोरोना संकट के बीच जहां हम सब परेशान हैं, वहीं क्या हमने एक बार भी सोचा है कि जब हम घरों से बाहर निकलने के लिए आजाद होंगे तो क्या अपने फैंसी कपड़ों में सुकून के साथ बाहर निकलने का साहस कर पाएंगे? एंटीवायरल कपड़ों को पहनने से इसमें मदद मिल सकती है, जो भले ही सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है, लेकिन कम से कम मानसिक शांति देता है। नियो टेक्नोलॉजी की मदद से जो बेहतरीन क्वालिटी का उपयोगी प्रोडक्ट बनाता है, जो बैक्टीरिया और वायरस से सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जिंदगी शायद सहज व आसान हो जाए। ग्राडो नियो टेक्नोलॉजी उपयोग करते हुए वायरस और रोगाणुओं से सुरक्षा के लिए कपड़े बनाने वाली पहली कपड़ा कंपनी है।