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17 साल पहले मौत का तांडव करने वाले सार्स का सगा भाई है कोरोना

संसार के शक्तिशाली देशों को घुटने पर ला चुका कोरोना वायरस 17 साल पुराने सार्स का सगा भाई है। इस बार उसके ज्यादा मारक होने का यही कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोरोना फैमिली का यह वायरस पिछले दो बार के मुकाबले ज्यादा ताकतवर होकर आया है और उसने म्युटेशन के जरिए स्वयं को ज्यादा घातक बना लिया है। 2003 में आए सार्स कोविड-1 और 2013-14 में आए मर्स वायरस से मौजूदा वायरस की समानता क्रमश: 70 और 50 प्रतिशत तक है। पहले के दोनो वायरस घातक तो थे लेकिन वे व्यापक तबाही नहीं फैला पाए थे। क्योंकि कोविड-1 पूरी तरह ग्लोबल होने से पहले ही दम तोड़ गया था और 2013-14 का मर्स सऊदी अरब तक सीमित रह गया था।
कोरोना वायरस का मौजूदा स्वरूप बेहद घातक है। उसने 45 वर्ष से अधिक उम्र के इंसानों को उसी तरह मौत के घाट उतारा है जिस तरह लगभग एक सदी पहले प्लेग ने उनका भक्षण किया था। अनुमान है कि पिछले चार माह में कोरोना संक्रमण के चलते पूरी दुनिया में भगवान को प्यारे हुए लगभग ढाई लाख इंसानों में से 80 प्रतिशत 45 से 80 साल के हैं।

बूढ़ों के लिए मौत का दूसरा नाम है कोरोना

इन दिनों कोविड-19 के रोगियों की जान बचाने में जुटे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कार्डियक थोरासिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजीत जैन के मुताबिक पूरी दुनिया में अभी तक कोरोना संक्रमितों की मृत्यु का जो आंकड़ा सामने आ रहा है, उसमें 25 साल से कम उम्र के संकमितों की संख्या एक प्रतिशत है। 25 से 44 साल तक के मृतकों का आंकड़ा अभी तक छह प्रतिशत पर टिका हुआ है लेकिन 45 से 60 साल तक संक्रमितों की मृत्यु दर 15 प्रतिशत तक जा पहुंची है। सबसे ज्यादा मौत 65 वर्ष से अधिक उम्र के रोगियों की हो रही है। इस उम्र के संक्रमितों में से आधे ठीक होने की अपेक्षा काल के गाल में समा जाते हैं।
डा. अजीत के मुताबिक तीनो वायरस एक ही जींस के हैं इसलिए विशिष्ट दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाने के बावजूद परम्परागत दवाएं इलाज में काम ली जा रही हैं। इन दवाओं के बल पर ही कोरोना से मुक्त होने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन इससे यह महामारी नियंत्रण में नहीं आ रही है।
उन्होंने बताया कि सीवियर एक्यूट रेस्पेरेटिरी सिंड्रोम अर्थात सार्स वायरस सात तरह का है। इनमें 2003 में आया सार्स कोविड-1, 2013-14 में आए मर्स वायरस और 2019 में आए कोविड-19 से दुनिया का परिचय हो चुका है। इसके अलावा कोरोना फैमिली के चार अन्य वायरस के नाम क्रमश: ह्यूमन कोरोना वायरस ओएच 43, ह्यूमन कोरोना वायरस एनएल 63, ह्यूमन कोरोना वायरस 229ई, ह्यूमन कोरोना वायरस एचयूके1 हैं। डा. अजीत जैन के अनुसार 2016 में डब्ल्यूएचओ ने भविष्यवाणी की थी कि कोरोना फैमिली के ये वायरस दुनिया में कभी भी महामारी फैला सकते हैं। भविष्यवाणी के बाद रिसर्च प्रोग्राम और दवा बनाने के प्रयास शुरू हो गए थे। इसीलिए उम्मीद है कि कोरोना का इलाज जल्द ही खोज लिया जाएगा।

प्रोटीन बढ़ाते है मौत का खतरा

डा. जैन के अनुसार दुनिया को सबसे ज्यादा घबराहट कोरोना संक्रमितों की मौत की बढ़ती दर से है। 2003 में चाइना के यूनान से शुरू हुए सार्स कोविड-1 के दौर में मौत की दर 9 प्रतिशत थी। दस साल बाद 2013-14 में आई मर्स महामारी में मौत की दर 35 प्रतिशत थी, लेकिन उसका फैलाव नहीं होने से दुनिया को ज्यादा चिंता नहीं हुई थी। इस बार यह पूरी दुनिया में फैल गया है और इसकी औसत मृत्यु दर भी 15 प्रतिशत है। कोविड-19 वायरस में चार तरह के प्रोटीन स्पाइक प्रोटीन, एनवल्व, मेमरिन और न्यूक्लोसाइट हैं और ये हाइरिस्क ग्रुप (डायबिटीज, हाइपर टेंशन,हृदय रोग) के मरीजों के मरने का खतरा बढ़ा देते है।

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अब केले पर मंडराया कोरोना वायरस का साया, हजारों टन केला……

कोरोना से खेती को भी बड़ा नुकसान हुआ है। इसकी वजह से उत्तरप्रदेश में हजारों टन केले की पैदावार नहीं हो सकी। उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों में टिशू कल्चर केले की खेती की जाती है जिसके बीज महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों से आते हैं। लेकिन कोरोना के चलते इसके बीज नहीं आ पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में बाराबंकी, अयोध्या, सीतापुर, गोंडा, बहराइच, संतकबीरनगर, श्रावस्ती, गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, बलिया, वाराणसी समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों मे टिशू कल्चर केले की खेती बडे पैमाने पर होती है लेकिन कोरोना को लेकर इस खेती पर भी आफत आ गई है। राज्य मे करीब एक लाख हेक्टेयर में टिशू कल्चर के केले की खेती की जाती है लेकिन अभी तक इसके बीज की व्यवस्था नहीं हो पायी है जबकि इस खेती के लिए खेत पूरी तरह तैयार हैं। चूंकि इसके बीज दक्षिण के राज्यों से आते हैं इसलिए बीजों का आना मुश्किल माना जा रहा है।

टिशू कलचर खेती मे अपनी अलग पहचान बना चुके किसान रामशरण कहते हैं कि एक लाख हेक्टेयर मे केले की खेती के लिए करीब तीन करोड़ बीजों की जरूरत होगी। आवागमन बंद होने के कारण इतना बीज आना मुश्किल ही नहीं असंभव है। रामशरण को टिशू कलचर खेती के लिए पद्मश्री भी मिल चुका है। उद्यान विशेषज्ञों के अनुसार पिछले साल टिशू कल्चर केले की राज्य मे बंपर पैदावार हुई थी और किसानों ने मोटा मुनाफा कमाया था।

पिछले साल के मुनाफे को देखकर कुछ नये किसान भी इस क्षेत्र मे आ गए और अपने खेतों को टिशू कल्चर केले की खेती के लिए तैयार किया लेकिन बीज को लेकर अभी भी अनिश्चितता के हालात के कारण किसान अब उदास हैं। रेल के साथ हवाई सेवा भी पूरी तरह से बंद है, इसके बीज हवाई जहाज से भी आते रहे हैं लेकिन यह सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। निचोड़ यह है कि टिशू कल्चर केले की खेती पर इस बार आफत है। किसान इसके लिए किसी को दोष भी नहीं दे सकते कयोंकि देश कोरोना जैसी महामारी से लड रहा है।

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कोरोना के खत्म होने के बाद रिलीज होगी कुली नंबर वन : वरूण धवन

मुंबई। बॉलीवुड अभिनेता वरूण धवन का कहना है कि कोरोना महामारी के खत्म होने के बाद उनकी फिल्म कुली नंबर वन रिलीज होगी।

कोरोना वायरस ने पूरी एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को ठप कर दिया है। बड़ी-बड़ी फिल्मों को पोस्टपोन किया जा रहा है। शूटिंग को रोक दिया गया है। चर्चा हो रही थी कि डेविड धवन के निर्देशन में बन रही वरुण धवन और सारा अली खान की अपकमिंग फिल्म कुली नंबर 1 को पोस्टपोन कर दिया गया है। हालांकि वरुण धवन ने इसी बीच अपनी इस फिल्म से जुड़ी एक खुशखबरी दी है।

वरुण धवन ने अपने फैंस के लिए इंस्टाग्राम पर एक चैट सेशन रखा था, जिसमे उन्होंने अपनी अगली फिल्म ‘कुली नंबर 1’ के रिलीज से जुड़ी कुछ खास बातें की। वरूण ने कहा, “कुली नंबर 1 को अब से एक सप्ताह बाद रिलीज किया जाना था हालांकि अब ऐसा संभव हीं। ऐसे में मैं इस महामारी के खत्म होने के बाद फिल्म के रिलीज की उम्मीद करता हूं।”

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गांव और शहरोंं के गैर हॉटस्पॉट क्षेत्रों में दुकान खोलने की सशर्त छूट, नहीं खुलेंगे बाजार

नयी दिल्ली । केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कोरोना महामारी के कारण देश भर में एक महीने से भी अधिक समय से लागू पूर्णबंदी के दिशा निर्देशों में शुक्रवार रात किये गये संशोधनों के अनुसार गैर हॉटस्पॉट वाले क्षेत्रों में कुछ शर्तों के साथ दुकानोंं को खोलने की छूट दे दी गयी है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह छूट मॉल को छोड़ कर सभी दुकानों पर लागू होगी जबकि शहरों में यह केवल अकेली दुकानाें, आस पास की दुकानों और आवासीय परिसरों में स्थित दुकानों पर ही लागू होगी। बाजार और बाजार परिसरों तथा माल में स्थित दुकानों पर यह छूट लागू नहीं होगी।

आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ई कामर्स कंपनियों को भी केवल अनिवार्य वस्तुओं की आपूर्ति की छूट रहेगी और वे गैर जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति अभी नहीं कर सकेंगी।इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि शराब और अन्य पदार्थों की बिक्री पर पहले से लागू प्रतिबंध अभी भी जारी रहेंगे। यह भी कहा गया है कि शहर हो या ग्रामीण दोनों के ही हॉटस्पॉट क्षेत्रों में यह छूट लागू नहीं होगी।

इससे पहले केन्द्रीय गृह सचिव ने सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों को शुक्रवार देर रात लिखे पत्र में कहा था कि 15 अप्रैल को जारी पूर्णबंदी के दिशा निर्देशों के तहत कुछ श्रेणियों में संशोधन किया जा रहा है। ये संशोधन केवल गैर हॉटस्पॉट क्षेत्रों के लिए किया गया है और हॉटस्पॉट वाले क्षेत्रों में पहले की तरह ही पूर्णबंदी के सभी दिशा निर्देश लागू रहेंगे।

आदेश में व्यावसायिक और निजी प्रतिष्ठान की श्रेणी में छूट देते हुए कहा गया है कि सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियमों के तहत पंजीकृत दुकानों को खोलने की अनुमति होगी। यह आदेश आवासीय परिसरों , पडोस में बनी और अकेली दुकानों पर भी लागू होगा।आदेश के अनुसार नगर निगमों और नगर पालिकाओं की सीमाओं में आने वाले मार्केट परिसरों को छोड़कर अन्य सभी दुकानों को भी यह छूट मिलेगी। साथ ही किसी भी सिंगल और मल्टी ब्रांड माल में दुकानाें को खेलने की अनुमति नहीं होगी।

जिन दुकानों को यह छूट दी गयी है उनमें केवल 50 प्रतिशत कर्मचारी काम करेंगे और सभी के लिए मास्क पहनना तथा सामाजिक दूरी का पालन करना अनिवार्य होगा। आदेश में यह स्पष्ट किया गया है कि ये छूट केवल गैर हॉटस्पॉट क्षेत्रों में ही लागू होगी।

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मुनाफाखोर चीन का पर्दाफाश, दक्षिण कोरियाई कम्पनी आधे दामों पर बेच रही है कोरोना टेस्टिंग किट

कोरोना महामारी को लेकर पूरे विश्व के निशाने पर आए चीन की कम्पनियां टेस्टिंग किट पर भारी मुनाफा वसूल रही हैं। इसका खुलासा दक्षिण कोरियाई कम्पनी एस. डी बायोसेंसर की ओर से हरियाणा सरकार को सप्लाई की गई टेस्टिंग किट से हुआ है। दक्षिण कोरियाई कम्पनी ने किट चीनी कम्पनी के मुकाबले 400 रुपए सस्ती दर पर बेची है। चीनी कम्पनी इसी किट की कीमत 780 रुपए वसूल रही है।

चीन का आर्डर रद्द कर दक्षिण कोरियाई कम्पनी को दिया

इसी के साथ हरियाणा सरकार ने चीन से मंगाई जाने वाली एक लाख रेपिड टेस्ट किट का आर्डर रद्द कर इसे दक्षिण कोरियाई कम्पनी को दे दिया। दक्षिण कोरियाई कम्पनी का कारखाना हरियाणा के मानेसर में ही स्थित है। दक्षिण कोरियाई कम्पनी एस.डी. बायोसेंसर यह किट गुणवत्ता में भी बेहतर है। इसलिये चीन की कम्पनियों को दिया गया आर्डर रद्द किया गया है। इससे सरकार को राजस्व की भी बचत होगी। कोरियाई कम्पनी को एक लाख किट का आर्डर दिया गया है जिसमें से राज्य सरकार को 25 हजार रैपिड टेस्टिंग किट मिल गई हैं। इसकी प्रति किट कीमत 380 रुपए है जो चीन से आयातित किट से लगभग 400 रुपए सस्ती है। यह किट यहां बनने से अब इसके लिये दूसरे देशों पर देश और प्रदेश की निर्भरता कम होगी।

कोरियाई कम्पनी एक माह में देगी एक करोड़ रेपिड टेस्टिंग किट

खास बात यह है कि किट बनाने की स्वीकृति 15 दिन में ही मिल गई, जिसमें रूटीन में पांच माह तक का समय लग जाता है। क्योंकि किट निर्माण के लिये पहले नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे को आवेदन करना होता है तो इसके बाद भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद को जाता है तथा इसके बाद औषध महानियंत्रक से उत्पादन की स्वीकृति लेनी होती थी। कोरियाई कम्पनी एक माह में एक करोड़ रेपिड टेस्टिंग किट तैयार करेगी। हरियाणा में कोरोना मरीजों के दुगुने होने की रफ्तार लगभग 14 दिन है जबकि देश में यह औसत 7.5 दिन है। हरियाणा में रिकवरी रेट 57 है वहीं केंद्र में केवल 16 फीसदी है।

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चावल और कटहल से बने पाज्जाकांजी के सामने नहीं टिक सका कोरोना वायरस

चावल और कटहल के मिश्रण से तैयार डिश के सहारे 93 साल के बुजुर्ग ने समूचे संसार को भयभीत कर देने वाले कोरोना वायरस को धूल चटा दी है। इस डिश का नाम पाज्जाकांजी है और केरल में इसे बड़े चाव से खाया जाता है। कोरोना वायरस पॉजिटिव पाए गए केरल के पथानामथिट्टा निवासी 93 वर्षीय बुजुर्ग थॉमस अब्राहम ने पाज्जाकांजी खाकर न सिर्फ अपनी बल्कि अपनी 88 साल की पत्नी की जान भी बचा ली है। वे इलाज के दौरान इस डिश को खाते रहे और आखिरकार कोरोना वायरस उनके शरीर को छोड़ने को बाध्य हो गया।

ठीक होकर घर लौटे बुजुर्ग

केरल के पथानामथिट्टा निवासी 93 वर्षीय बुजुर्ग थॉमस अब्राहम के साथ उनकी पत्नी मरियम्मा (88) को उनके बेटे, बहू और पोते से कोरोना का संक्रमण मिला था। तीनों गत माह ही इटली से लौटे थे। वे तीनों भी गंभीर वायरस की चपेट से बाहर आ चुके हैं और अब अपने माता-पिता के सकुशल घर से आने से बहुत खुश हैं। कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों पर होता है। बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण इससे संक्रमित होने पर उनकी मौत होने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है, लेकिन थॉमस ने इस खतरे को टाल दिया।

संयमित जीवन ने बचाया

थॉमस इब्राहिम के घर लौटने के बाद उनके पोते रिजो मोन्सी ने बताया कि उनके दादा के कोरोना वायरस को पछाड़ने के पीछे उनकी स्वस्थ जीवन शैली का बड़ा हाथ है। वह बड़ा संयमित जीवन जीते हैं। वे किसान है और शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं। वह न तो कोई नशा करते हैं और ना ही उन्हें धूम्रपान का शौक है। वह बिना जिम जाए भी सुडौल शरीर रखते हैं। दादा को केरल का सबसे बेहतरीन डिश पाज्जाकांजी बहुत पसंद है। इसे चावल के घोल और कटहल के मिश्रण से तैयार किया जाता है। उपचार के दौरान उनके दादा ने आइसोलेशन वार्ड में इसी का नियमित रूप से सेवन किया था।

दादी को भी यही खिलाया

उन्होंने दादी को भी यही खाना खिलाया था। इससे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। उपचार करने वाले चिकित्सक भी उनकी संयमित जीवन शैली से चकित थे। इटली में रेडियोलॉजी क्षेत्र में काम करने वाले रिजो मोन्सी ने बताया कि उनका अगस्त में भारत आने का कार्यक्रम था, लेकिन उनके दादा ने जिद करके उन्हें मार्च में ही भारत बुला लिया। यदि वह नहीं आते तो शायद अब उनकी जिंदगी भी खतरे में होती। उन्होंने कहा कि भारत की चिकित्सा व्यवस्था बेहतरीन है और चिकित्सकों ने बेहतरीन प्रयास किए थे। उन्होंने कहा कि उनके दादा इटली की जगह भारत में ज्यादा सुरक्षित हैं। रिजो ने बताया कि उनके परिवार में कुल 26 सदस्य हैं। उनके इटली से आने के बाद उनके दादा-दादी, माता-पिता, उनकी बहन, बहनोई और उनके ताऊजी कोरोना वायरस से संक्रमित हुए थे, लेकिन उपचार के बाद सभी ठीक हो गए हैं।

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कोरोना से पहले आई इन पांच महा​मारियों ने बदल दिया था दुनिया का इतिहास

कोरोना वायरस प्रकोप पूरी दुनिया में उसी तरह के बदलाव ला रहा है जिस तरह इससे पहले की पांच महामारियों ने विश्व इतिहास को बदलकर रख दिया था। तकरीबन छह सौ साल के ज्ञात इतिहास में पांच महामारियों ने राजनीतिक और सामाजिक बदलावों के साथ ही पूरे विश्व को कुछ देशों की गुलामी में धकेल दिया था। तारीख़ के पन्ने महामारियों के इतिहास बदलने की मिसालों से भरे पड़े हैं। बीमारियों की वजह से सल्तनतें तबाह हो गईं। चौदहवीं सदी के पांचवें और छठें दशक में प्लेग ने यूरोप में मौत का दिल दहलाने वाला तांडव किया था। इसके क़हर से यूरोप की एक तिहाई आबादी काल के गाल में समा गई थी। ब्लैक डेथ यानी ब्यूबोनिक प्लेग से इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत के कारण, खेतों में काम करने के लिए उपलब्ध लोगों की संख्या बहुत कम हो गई।

 

महामारियों ने दिया था मजदूरी प्रथा को जन्म

इस बदलाव ने मज़दूरी पर काम करने की प्रथा को जन्म दिया। जिसके कारण पश्चिमी यूरोप ज़्यादा आधुनिक, व्यापारिक और नक़दी आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ चला। चूंकि ज़मींदारों के लिए मज़दूरों की मज़दूरी देना महंगा पड़ रहा था। इसी मजबूरी ने उन्हें ऐसी तकनीक में निवेश करने के लिए बाध्य किया, जिसमें ख़र्च कम लगे। मज़दूरों की कम ज़रूरत हो और काम पूरा हो जाए। ताकि लागत कम कर के पैसा बचाया जा सके। यहीं से पश्चिमी यूरोपीय देशों ने साम्राज्यवाद की शुरुआत की। यूरोप के लोगों ने लंबी समुद्री यात्राएं शुरू कर दीं। लिहाज़ा कहा जा सकता है कि प्लेग के बाद पश्चिमी यूरोप में नई ऊर्जा आई। यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया कि यूरोप के विस्तार के बाद अमेरिका की क़रीब छह करोड़ (जो उस वक़्त दुनिया की कुल आबादी का दस फ़ीसद हिस्सा थी) की आबादी केवल एक सदी में घट कर महज़ साठ लाख रह गई। अमरीका में यूरोपीय उपनिवेश स्थापित होने के बाद के बाद इन इलाक़ों में होने वाली अधिकतर मौतों के लिए वो बीमारियां ज़िम्मेदार थीं, जो ये उपनिवेशवादी अपने साथ लेकर अमरीका पहुंचे। इनमें सबसे बड़ी बीमारी थी चेचक। अन्य बीमारियों में ख़सरा, हैज़ा, मलेरिया, प्लेग, काली खांसी, और टाइफ़स भी शामिल थीं, जिन्होंने करोड़ों लोगों की जान ले ली। कैरेबियाई देश हैती में एक महामारी के प्रकोप ने उस समय की बड़ी साम्राज्यवादी ताक़त फ्रांस को उत्तरी अमरीका से बाहर करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। और इसी के बाद अमरीका का एक बड़े और ताक़तवर देश के तौर पर विकास हुआ था। और वो महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ चला था।

 

नेपोलियन के सैनिकों को खा गया था पीला बुखार

1801 में कैरेबियाई देश हैती में यूरोप की औपनिवेशिक ताक़तों के ख़िलाफ़ यहां के बहुत से ग़ुलामों ने बग़ावत कर दी। एक के बाद एक कई बग़ावतों के बाद आख़िरकार तुसैंत लोवरतूर का फ़्रांस के साथ समझौता हो गया और वो हैती का शासक बन गया। उधर, फ्रांस में नेपोलियन बोनापार्ट ने ख़ुद को आजीवन देश का शासक घोषित कर दिया था। नेपोलियन ने पूरे हैती द्वीप पर अपना क़ब्ज़ा जमाने की सोची। लिहाज़ा उसने हैती पर कब्ज़ा जमाने के लिए दसियों हज़ार सैनिकों को वहां लड़ने के लिए भेज दिया। फ़्रांस से आए ये लड़ाकू जंग के मैदान में तो बहुत बहादुर साबित हुए। लेकिन पीत ज्वर या येलो फ़ीवर के प्रकोप से ख़ुद नहीं बचा पाए। एक अंदाज़े के मुताबिक़ फ़्रांस के क़रीब पचास हज़ार सैनिक, अधिकारी, डॉक्टर इस बुखार के चपेट में आकर मौत के मुंह में समा गए। हैती पर क़ब्ज़े के लिए गए फ्रांसीसी सैनिकों में से महज़ तीन हज़ार लोग ही फ़्रांस लौट सके।

 

प्लेग से फैली भुखमरी ने बदल दिया चीन का इतिहास

इस हार ने नेपोलियन को ना सिर्फ़ हैती का उपनिवेश छोड़ने पर मजबूर किया। बल्कि, नेपोलियन ने उत्तरी अमरीका में फ्रांस के औपनिवेशिक विस्तार के अपने ख़्वाब को भी तिलांजलि दे दी। 1888 और 1897 के दरमियान राइंडरपेस्ट नाम के वायरस ने अफ़्रीक़ा में लगभग 90 फ़ीसद पालतू जानवरों को ख़त्म कर दिया। इसे जानवरों में होने वाला प्लेग भी कहा जाता है। इतने बड़े पैमाने पर जानवरों की मौत से हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका, पश्चिमी अफ्रीका और दक्षिणी-पश्चिमी अफ्रीका में रहने वाले बहुत से समुदायों पर क़यामत सी आ गई। भुखमरी फैल गई। चूंकि लोग खेती के लिए बैलों का इस्तेमाल करते थे तो जब बैल ही नहीं रहे तो खेती भी ख़त्म होने लगी। अफ़्रीक़ा के ऐसे बदतर हालात ने उन्नीसवीं सदी के आख़िर में यूरोपीय देशों के लिए अफ्रीका के एक बड़े हिस्से पर अपने उपनिवेश स्थापित करने का माहौल तैयार कर दिया। यूरोपीय देशों को अफ्रीका की ज़मीनें हड़पने में राइंडरपेस्ट वायरस के प्रकोप से भी काफ़ी मदद मिली। वर्ष 1641 में उत्तरी चीन में प्लेग जैसी महामारी ने हमला बोला, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई थी। कुछ इलाक़ो में तो प्लेग की वजह से 20 से 40 फ़ीसद तक आबादी ख़त्म हो गई थी। चीन में प्लेग ने उस वक़्त दस्तक दी थी, जब वो सूखे और टिड्डियों के प्रकोप से जूझ रहा था। फ़सलें तबाह हो चुकी थी। लोगों के पास खाने को अनाज नहीं था। हालात इतने बिगड़ गए थे कि जब लोगों के पास खाने को कुछ नहीं होता था तो वो प्लेग, भुखमरी और सूखे से मर चुके लोगों की लाश को ही नोच खाने लगे थे।