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केबीसी के अगले एपिसोड में पूछा जा सकता है ये सवाल, किस पार्टी को मिला है भारतीय जासूसी पार्टी का खिताब

केबीसी में ​अमिताभ बच्चन आजकल राजनीति से जुड़े सवाल अधिक पूछ हैं और अक्सर ऐसे सवालों का जवाब देने में प्रतिभागी नाकाम रहते हैं। ऐसे ही सवालों की लिस्ट में एक नया सवाल जुड़ने वाला है जिसे केबीसी के अगले एपिसोड में कभी भी पूछा जा सकता है क्योंकि ये सवाल ऐसा ही है जिसका जवाब बहुत कम लोग याद रखेंगे। सवाल ये हो सकता है कि भारत में हाल ही किस पार्टी को भारतीय जासूसी पार्टी का खिताब मिला है।

क्योंकि एक दिन पहले ही कांग्रेस ने केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकार पर आरोप लगाया कि उसे इस साल अप्रैल-मई में बीते लाेकसभा चुनावों के समय इजरायली साॅफ्टवेयर पिगैसस के माध्यम से नेताओं, पत्रकारोंं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी कराये जाने की पूरी जानकारी थी और वह इस मामले में रहस्यमयी एवं षड़यंत्रकारी चुप्पी साधे हुए है।
कांग्रेस के संचार विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने संवाददाता सम्मेलन में अपने आरोपों के समर्थन में कुछ दस्तावेज पेश करते हुए कहा, “अबकी बार जासूस सरकार।” उन्होंने कहा कि फेसबुक एवं व्हाट्सएप के मालिक ने 17 मई को अपनी रिपोर्ट में केन्द्र सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को इस बारे में जानकारी दे दी थी। उन्होंने कहा कि जासूसी के लिए इजरायल निर्मित जिस पिगैसस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया, उसे निर्माता कंपनी केवल एवं केवल सरकार एवं उसकी सुरक्षा एजेंसियों को ही बेचती है।

सुरजेवाला ने रिपोर्ट के आधार पर यह दावा भी किया कि पिगैसस की जासूसी निगाह से नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) और विदेश संचार निगम लिमिटेड भी प्रभावित रहे हैं। इसका मतलब यह है कि कोई भी जासूसी के दायरे से अछूता नहीं था। उन्होंने कहा कि सरकार यह सब जानने के बावजूद एक रहस्यमयी एवं षड़यंत्रकारी चुप्पी साधे रही। अमेरिका में मामला 30 अक्टूबर को सामने आने के बाद संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ट्वीटर पर अगले दिन कहा कि उन्होंने कंपनी से जानकारी मांगी है ।

उन्होंने कहा कि आज तक सरकार ने इस बारे में कुछ भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया है और पत्रकारों एवं संपादकों पर दबाव डाल कर सूत्रों के हवाले के झूठी बातें छपवा रही है। उन्होंने सरकार से पूछा कि वह बताये कि क्या चुनाव के लिए उसने राजनेताओं एवं पत्रकारों की जासूसी करवायी। क्या यह टेलीग्राफ अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम का उल्लंघन नहीं है। केन्द्र सरकार ने किसके कहने पर पिगैसस की खरीद एवं उसके गैरकानूनी इस्तेमाल की इजाजत दी। क्या यह काम प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार या गृहमंत्री ने किया था। केन्द्र सरकार ने इस पर रहस्यमयी चुप्पी क्यों साधे रखी। क्या सरकार इसके जिम्मेदार मंत्रियों या अधिकारियों पर कोई कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से इस मामले में भाजपा की संलिप्तता उजागर हुई है उसके बाद पार्टी के नाम का अर्थ अब भारतीय जासूस पार्टी हो गया है।

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जिसने कभी समुद्र नहीं देखा, वह कम्पनी बनाएगी नौसेनिक पनडुब्बी, नौसेना में खलबली

रक्षा मंत्रालय के खरीद के तथाकथित रणनीतिक साझेदार मॉडल में पिछले सप्ताह कई गंभीर खामियां सामने आईं जब पांच भारतीय कंपनियों ने प्रोजेक्ट 75-आई में एसपी बनने के लिए प्रस्ताव सौंपे। इस परियोजना के तहत 45,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से छह परंपरागत पनडुब्बियां बनाई जानी है।

 

 

एचएसएल और अडाणी डिफेंस की विशेष कंपनी (एसपीवी) ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई जबकि एसपीवी को इसमें बोली के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था। इस तरह एचएसएल ने दो प्रस्ताव सौंपे, जो एकदूसरे के साथ होड़ में थे। एलएंडटी, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, अडाणी डिफेंस, महिंद्रा डिफेंस, रिलायंस डिफेंस और कल्याणी ग्रुप ने दिलचस्पी दिखाई है। रक्षा मंत्रालय एसपी और ओईएम प्रस्तावों की जांच करने के बाद इनकी छंटाई करेगा। इसके बाद छांटे गए एसपी मंजूर किए गए ओईएम के साथ मिलकर औपचारिक प्रस्ताव सौंपेंगे। रक्षा मंत्रालय एसपी-ओईएम की उस जोड़ी को ठेका देगा जो सबसे कम लागत में पनडुब्बी बनाएगी, स्वदेशी का ज्यादा का ज्यादा इस्तेमाल करेगी और अधिकांश प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करेगी।

 

उस ओईएम को प्रोत्साहन दिया जाएगा जो न्यूनतम अनिवार्य स्तर पर अधिक से अधिक स्वदेशी साजोसामान का इस्तेमाल करेगी। पहली पनडुब्बी में यह स्तर 45 फीसदी होगा जबकि छठी पनडुब्बी में बढ़कर 60 फीसदी हो जाएगा। रक्षा क्षेत्र की नौ सार्वजनिक कंपनियों (डीपीएसयू) और ऑर्डनेंस फैक्टरी बोर्ड (ओएफबी) की 41 कंपनियों के साथ मुकाबले के लिए तैयार करने का था। 2001 तक रक्षा उत्पादन में इन्हीं का दबदबा था। 2005-06 में केलकर समिति ने इसमें निजी कंपनियों को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। लेकिन ओएफसी और डीपीएसयू के श्रम संगठनों ने इसका विरोध किया। उन्हें आशंका थी कि उनका रोजगार छिन जाएगा। जिस तरह प्रोजेक्ट 75-आई परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है, उस पर कई तरह की आपत्तियां जताई जा रही हैं। खासकर अडाणी डिफेंस के इसमें शामिल होने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कंपनी के पास न तो कोई शिपयार्ड है और न ही उसे जहाज बनाने का कोई अनुभव है। कंपनी की भागीदारी का आधार यह है कि उसकी मूल कंपनी अडाणी ग्रुप के पास बिजली संयंत्र है। पनडुब्बी बनाने के लिए शुष्क गोदी और आउटफिटिंग बर्थ सहित कई शर्तें हैं जिन्हें पूरा करने के लिए अडाणी डिफेंस एचएसएल के साथ एसपीवी पर निर्भर हैं। लेकिन नियमों के मुताबिक प्रस्ताव सौंपने की तिथि पर बोली लगाने वाली कंपनी का अस्तित्व होना चाहिए।

 

अडाणी-एचएसएल को इसमें मुश्किल हो सकती है। एचएसएल अकेले बोली नहीं लगा सकती है, क्योंकि वह न तो प्रस्ताव की वित्तीय शर्तों को पूरा करती है और न ही उसने पिछले पांच साल में 300 करोड़ रुपये का कोई प्लेटफॉर्म सौंपा है। राफेल विवाद और रिलायंस नेवल की वित्तीय समस्याओं के बावजूद रिलायंस ग्रुप भी इस परियोजना को हासिल करने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। लेकिन रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर की खराब नकदी स्थिति और डी क्रेडिट रेटिंग से उसकी संभावना प्रभावित हो सकती है। समय पर आपूर्ति न कर पाना भी इन कंपनियों के लिए एक बड़ी समस्या है।

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इसलिए बौखला गया भारत का ये बड़ा जाट नेता, दे रहा है कमल को मसल देने की धमकी

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) के संयोजक एवं नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पूर्व मंत्री यूनुस खान पर खींवसर विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की मदद करने का आरोप लगाया है। बेनीवाल ने ट्वीट कर इस बारे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एवं कार्यवाहक अध्यक्ष जे पी नड्डा एवं भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया से शिकायत कर इन दोनों नेताओं के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव और अब खींवसर उपचुनाव में भी श्रीमती वसुंधरा राजे और श्री खान रालोपा का भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी की चुनाव में खुले आम मदद की, इन पर कार्यवाही की जानी चाहिये।

पिछले लोकसभा चुनाव के समय रालोपा एवं भाजपा के बीच गठबंधन हुआ था और श्री बेनीवाल नागौर से सांसद चुने गये थे। इसके बाद हाल में खींवसर विधानसभा सीट पर हुए चुनाव में भी गठबंधन जारी रहा। गत 24 अक्टूबर को उपचुनाव परिणाम में हनुमान बेनीवाल के छोटे भाई एवं रालोपा प्रत्याशी नारायण बेनीवाल संभावना से बहुत कम अंतर करीब साढ़े हजार से चुनाव जीता। जबकि लोकसभा चुनाव में क्षेत्र में रालोपा एवं कांग्रेस के प्रत्याशियों में करीब 55 हजार का अंतर रहा था।

वर्ष 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई खींवसर में शुरू से ही हनुमान बेनीवाल का राजनीतिक दबदबा रहा है और वह पहले चुनाव में ही भाजपा के टिकट पर खींवसर से विधायक चुने गये। इसके बाद 2013 में निर्दलीय एवं गत वर्ष पिछले विधानसभा चुनाव में खुद की पार्टी रालोपा उम्मीदवार के रुप में विधायक निर्वाचित होकर लगातार तीसरी बार विधानसभा पहुंचे।

इसके बाद वह सांसद निर्वाचित हुए और सीट खाली होने पर हुए उपचुनाव में अपने छोटे भाई को चुनाव मैदान में उतारा और वह भी विधायक चुने गये। हालांकि उनके भाई नारायण बेनीवाल के चुनाव जीत जाने से उनका दबदबा कायम रहा लेकिन संभावना से कम मत मिले। इसके बाद हनुमान बेनीवाल ने श्रीमती राजे एवं खान पर कांग्रेस प्रत्याशी की चुनाव में मदद करने का आरोप लगाया।

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अगर ये कम्पनी ऐसा नहीं करती तो महाराष्ट्र में तीन चौथाई बहुमत से जीत जाती भाजपा!

दो राज्यों में हुए चुनाव के बाद देश में फिर इस बात की चर्चा जोरों पर है कि अगर पारले कम्पनी ने कर्मचारियों की छंटनी नहीं की होती तो महाराष्ट्र में अकेली भाजपा को बहुमत मिलना ​तय था। हरियाणा में भी नौ​करियां जाने के असर से ही भाजपा 41 सीट पर सिमट गई। हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महज 11 महीने पहले बनी दुष्यंत चौटाला की अगुवाई वाली जननायक जनता पार्टी ने उम्दा प्रदर्शन किया। लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को जैसा प्रचंड बहुमत मिला था, उन्हें वैसी ही अपेक्षाएं इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी थीं।
लेकिन इन चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों के प्रदर्शन ने भाजपा को सीधी चुनौती पेश की है। हालांकि ऐसा कहना अभी सही नहीं होगा क्योंकि कई राज्यों में अभी क्षेत्रीय पार्टियां नहीं हैं। दिसंबर 2018 में तीन राज्यों में जो चुनाव हुए थे उस समय बीजेपी के ख़िलाफ़ कांग्रेस को समर्थन मिला था। जहां जहां बीजेपी की ज़मीन कमज़ोर है, वहां क्षेत्रीय पार्टियां ही उसका फायदा उठाकर चुनौती पेश करती हैं। ऐसे में यह कह सकते हैं कि जहां कांग्रेस कमज़ोर पड़ गई है या न के बराबर है, वहां बीजेपी को टक्कर देने के लिए क्षेत्रीय पार्टियां ही उभर कर सामने आती हैं क्योंकि राजनीति में बहुत दिनों तक वैक्यूम नहीं रहता है। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम में क्षेत्रीय दलों के बेहतर प्रदर्शन करने के बाद भी नहीं लगता कि आगामी दिनों में क्षेत्रीय दल मोदी के प्रभुत्व को रोकने में सफल हो सकते हैं।

दरअसल क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व राज्यों के चुनाव तक ही सीमित रहा है। मोदी राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं। ऐसे में हो सकता है कि राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से आपको समझौता करना पड़े लेकिन केन्द्र की राजनीति में उनका (क्षेत्रीय पार्टियों का) प्रभाव गौण ही रहेगा।
दिल्ली और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसके बाद अगले साल बिहार में चुनाव होंगे। ​नज़रें ​बिहार की ओर लगी है। वहां किस तरह के समीकरण उभर कर सामने आते हैं क्योंकि नीतीश कुमार की जेडीयू भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पार्टी है। बीजेपी को चुनौती देने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को कहीं ना कहीं कांग्रेस के साथ आना होगा और यह संभव नहीं लगता। तीसरे मोर्चे के राह में भी कई रोडे हैंं। समस्या यह है कि जो क्षेत्रीय दल अपने अपने क्षेत्र में महत्व और प्रभाव रखते हैं, जहां उनका जनाधार होता है, उनके पास नेतृत्व भी होता है, ऐसे में जब वह बीजेपी से गठबंधन करती हैं तो फिर तीसरे मोर्चे का वि​कल्प बहुत कम बच जाता हैं फिर कुछ दल साथ में आकर तीसरा मोर्चा बना लेते हैं लेकिन उससे वो बात नहीं बन पाती हैं समस्या यह है कि साथ आने और एक दो चुनाव साथ लड़ने के बाद वो फिर अलग अलग हो जाते हैं और बीजेपी या कांग्रेस के साथ समझौता कर लेते हैंं।

अगर झारखंड में झामुमो या झाविमो जैसी क्षे​त्रीय पार्टियां मिल कर बीजेपी को चुनाव हरा देती हैं तो तीसरे मोर्चा का विकल्प ज़्यादा मजबूत हो जाएगा। लेकिन तीसरे मोर्चे में सपा और बसपा का रहना बहुत ज़रूरी है। लेकिन इस साल लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने गठबंधन किया और बाद में तोड़ लिया। ऐसे में अगली बार उनका साथ आना नामुमकिन लगता है। जब बसपा तीसरे मोर्चे से बाहर रहेगी तब सपा की संभावना कमज़ोर हो जाती है और बीजेपी को इसका लाभ मिलता है।
लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को महाराष्ट्र और हरियाणा में अच्छी सफलता हासिल हुई थी। लिहाजा इन विधानसभा चुनावों में ऐसा लगा रहा था कि मोदी का जादू एक बार फिर चलेगा और बीजेपी दोनों राज्यों में प्रचंड जीत हासिल करेगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर आर्थिक सुस्ती का असर हुआ है। महाराष्ट्र में पारले कंपनी से हज़ारों लोगों को निकाल दिया गया है। कई छोटे-छोटे उद्योग बंद हुए हैं। सिंगल यूज़ प्लास्टि​क पर प्रतिबंध लगने से असंगठित रिटेलर और इसके उत्पादन में लगे लोगों को लग रहा है कि खाने के लाले पड़ जाएंगे। महाराष्ट्र और गुजरात में इस तरह के काम ज़्यादा होते हैं।
हरियाणा और महाराष्ट्र में जब चुनाव हो रहा था तो ऐसा कहा जा रहा था कि ये दिलचस्प चुनाव नहीं हैं क्योंकि भाजपा एकतरफा जीत जाएगी। हालांकि जब परिणाम सामने आया तब चुनावी जानकार भी चौंक गए।

 

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पुख्ता सबूत मिल गए थे फिर भी सीबीआई ने इसलिए नहीं माना आरोपी!

जिस ट्रक ने उत्तरप्रदेश के उन्नाव की बलात्कार पीड़िता का एक्सीडेंट करके उसे मौत के घाट उतारने का प्रयास किया था, उसके तार बलात्कार के आरोपी भाजपा से नि​ष्कासित विधायक कुलदीप सैंगर से जुड़े होने के पुख्ता सबूत मिलने के बावजूद सीबीआई ने उसे इस मामले का आरोपी बनाने से इनकार कर दिया है। सीबीआई ने जो चार्जशीट पेश की है, उसमें कुलदीप सैंगर का नाम नहीं है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि 28 जुलाई को रायबरेली के थाना गुरुबख्शगंज के अंतर्गत कार ट्रक भिड़ंत को सीबीआई ने सड़क हादसा बताया है। उन्नाव रेप पीड़िता के साथ हुए सड़क हादसे में सीबीआई ने चार्जशीट फाइल कर दी है।

इस हादसे में रेप पीड़िता और उसके वकील को गंभीर चोट आई थी, जबकि इस दुर्घटना में पीड़िता के एक परिजन की मौत हो गई थी। सेंगर और ड्राइवर आशीष कुमार पाल को सीबीआई ने आरोपी बनाया है। मामले में कुलदीप सिंह सेंगर और उसके सहयोगियों के खिलाफ सीबीआई के आरोपपत्र में हत्या का कोई आरोप शामिल नहीं किया गया है।

ड्राइवर आशीष कुमार पाल को आईपीसी की धारा 304-ए, 338 और 279 के तहत आरोपी बनाया गया है। चार्जशीट लखनऊ में दाखिल हुई। कुलदीप सिंह सेंगर और अन्य आरोपियों पर 120 बी के तहत आरोप लगाए गए हैं। गौरतलब है कि जेल में बंद अपने चाचा से मिलने जा रही दुष्कर्म पीड़िता की कार को एक ट्रक ने टक्कर मार दी थी। यह घटना 28 जुलाई की है।

इस हादसे में पीड़िता के दो रिश्तेदारों की मौत हो गई थी, जबकि पीड़िता और उसके वकील गंभीर रूप से घायल हो गए थे। पीड़िता के परिजनों ने इसे हादसे के पीछे कुलदीप सिंह सेंगर का हाथ लगाते हुए हत्या और हत्या के प्रयास का आरोप लगाया था। विदित हो कि पीड़िता को उपचार के लिए गंभीर हालत में एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पीड़िता को 25 सितंबर को अस्पताल से छुट्टी मिली थी।

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भाजपा विधायक ने समर्थकों संग मिलकर किया ऐसा काम जिसे जान के आपको भी आ जाएगी शर्म

इंदौर। मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के गंजी कंपाउंड क्षेत्र में आज एक अति खतरनाक मकान को तोड़ने पहुंचे नगर निगम कर्मचारियों को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक आकाश विजयवर्गीय और उनके समर्थकों ने पीट दिया।

इस संबंध में वायरल हुए वीडियो में पार्टी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश विजयवर्गीय क्रिकेट के बल्ले से निगम कर्मचारी को पीटते हुए नजर आ रहे हैं। इस घटनाक्रम के बाद इंदौर-3 विधानसभा क्षेत्र से विधायक आकाश विजयवर्गीय ने कहा ‘मैं बहुत ग़ुस्सा में था। मैंने क्या कर दिया, मुझे नहीं पाता।’ घटना के समय मौके पर मौजूद पुलिसबल ने विधायक और उनके समर्थकों के बीच से मारपीट के शिकार बने दो निगम कर्मचारियों को बीच बचाव कर सुरक्षित बाहर निकाला।

विधायक विजयवर्गीय क्रिकेट खेलने के बल्ले से निगम अधिकारियों को पीट रहे थे। घटना के बाद निगम के अफसरों ने स्थानीय पुलिस को शिकायत कर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उधर घटना से आक्रोशित निगम कर्मियों ने काम बंद का एलान कर दिया है। सोशल मीडिया पर घटनाक्रम से जुड़े वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने कहा कि जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी।

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भाजपा को लाखों वोट से हराकर शादी के लिए राजी हुई ये बंगाली सुंदरी, 17 को पिया संग लेगी सात फेरे

तृणमूल कांग्रेस सांसद एवं लोकप्रिय बंगाली अभिनेत्री नुसरत जहां शीघ्र ही बिजनेसमैन निखिल जैन के साथ परिणयसूत्र में आबद्ध होने जा रही हैं। सुश्री नुसरत ने लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की बशीरहाट सीट से भारतीय जनता पार्टी के सयांतन बसु को साढ़े तीन लाख से अधिक वोटों से पराजित किया था।

वर्ष 2010 में ब्यूटी कॉन्टेस्ट जीतने के बाद मॉडलिंग से अपने करियर की शुरुआत करने वाली नुसरत के विवाह की रस्में 17 जून से तुर्की के इस्तांबुल में होंगी। मेहंदी एवं संगीत की रस्म 18 जून तथा 19 से 21 जून के बीच रीति-रिवाज के अनुरूप उनका विवाह होगा। नुसरत और निखिल की मुलाकात पिछले साल दुर्गा पूजा के दौरान हुई थी। इसके बाद मुलाकात का दौर चला और कुछ समय पश्चात दोनों ने शादी का फैसला कर लिया।

शादी में कई सितारों के शामिल होने की संभावना है। नुसरत की दोस्‍त और अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती भी इस शादी में शामिल होंगी। मिमि भी तृणमूल कांग्रेस सांसद हैं और उन्होंने हाल में हुए लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से भाजपा के अनुपम हाजरा को पराजित किया है। तृणमूल कांग्रेस सांसद एवं लोकप्रिय बंगाली अभिनेत्री नुसरत जहां शीघ्र ही बिजनेसमैन निखिल जैन के साथ परिणयसूत्र में आबद्ध होने जा रही हैं। सुश्री नुसरत ने लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की बशीरहाट सीट से भारतीय जनता पार्टी के सयांतन बसु को साढ़े तीन लाख से अधिक वोटों से पराजित किया था।

वर्ष 2010 में ब्यूटी कॉन्टेस्ट जीतने के बाद मॉडलिंग से अपने करियर की शुरुआत करने वाली नुसरत के विवाह की रस्में 17 जून से तुर्की के इस्तांबुल में होंगी। मेहंदी एवं संगीत की रस्म 18 जून तथा 19 से 21 जून के बीच रीति-रिवाज के अनुरूप उनका विवाह होगा।
नुसरत और निखिल की मुलाकात पिछले साल दुर्गा पूजा के दौरान हुई थी। इसके बाद मुलाकात का दौर चला और कुछ समय पश्चात दोनों ने शादी का फैसला कर लिया। शादी में कई सितारों के शामिल होने की संभावना है। नुसरत की दोस्‍त और अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती भी इस शादी में शामिल होंगी। मिमि भी तृणमूल कांग्रेस सांसद हैं और उन्होंने हाल में हुए लोकसभा चुनाव में जादवपुर सीट से भाजपा के अनुपम हाजरा को पराजित किया है।

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अब चीन से उधार लिए गए मुहावरे को हथियार बनाकर मोदी से जूझेगा भारत का ये नेता

हाल ही ऐतिहासिक बहुमत के साथ फिर सत्ता में लौटे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुकाबले चारों खाने चित हुए विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी अब चीन से उधार लिए गए शब्दों के जरिए भाजपा से दो—दो हाथ करेगी। कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुने जाने के लिए हुई बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इंच इंच लडने का जो नया मुहावरा दिया, वह असल में चीन की दुश्मनों से लड़ने की रणनीति का हिस्सा है।

चीन में ये मुहावरा माओत्से तुंग के जमाने में तब आया जब साठ के दशक में उसका रूस के साथ भीषण युद्ध छिड़ गया था। इस युद्ध में जब चीनी सेनाएं कमजोर पड़ने लगी तो माओ ने अपनी सेनाओं को सम्बोधित करते हुए कहा था कि उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि हम इंच इंच आगे बढ़ेंगे और दुश्मन को धराशायी कर देंगे। इतिहास गवाह है कि इससे चीनी सेनाओं का मनोबल इतना बढ़ गया था कि आखिर में रूस को चीन से बराबरी के स्तर पर आकर समझौता करना पड़ा था।

अपने चुनावी भाषणों में चीन की आर्थिक प्रगति का लगातार हवाला देते रहे राहुल गांधी करारी पराजय के बाद अब चीन के इस मुहावरे का इस्तेमाल अपने पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। इस मुहावरे की ऐतिहासिक सच्चाई के अनुसार चीन आज भी अपने दुश्मनों से निपटने के लिए इंच इंच आगे बढ़ता है। वह दुश्मनों को इंच इंच पीछे धकेलता रहता है और कुछ ही समय में उसकी सीमाओं के बड़े भूभाग पर कब्जा करके उसे वार्ता की टेबल पर आने के लिए बाध्य कर देता है।

वैसे कांग्रेस अध्यक्ष ने कुछ गलत कहा भी नहीं क्योंकि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कांग्रेस को पूरी तरह समेट दिया है और उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट गया है। इंच इंच लड़कर ही अब कांग्रेस भाजपा से पार पा सकती है।

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इन प्रमुख मंत्रालयों पर लार टपका रहे हैं ये बड़े नेता, हजारों करोड़ का है बजट

बिहार से लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को मिली अभूतपूर्व सफलता के बाद जनता दल ((यू)) का केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होना तय है और उसकी नजर कुछ प्रमुख मंत्रालयों पर है। भाजपा, जद ((यू)) और लोजपा ने मिलकर राज्य की 40 लोकसभा सीटों में से 39 पर कब्जा कर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। इस चुनाव में भाजपा को 17, जद (यू) को 16 तथा लोजपा को छह सीटें मिली हैं। पिछली बार जद (यू) मोदी सरकार का हिस्सा नहीं थी।

महागठबंधन बनाकर राज्य में अपना आधार मजबूत करने के राष्ट्रीय जनता दल के प्रयासों को इस चुनाव में गहरा झटका लगा है जिससे उबरने में उसे लम्बा वक्त लगेगा। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले में जेल में रहने के कारण भी संगठन को वह ताकत नहीं मिल सकी जिसकी उसे तलाश थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य का तेजी से विकास चाहते हैं और वह राज्य को अधिक केन्द्रीय सहायता देने के लिए विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग भी करते रहे हैं। पार्टी के प्रधान महासचिव के. सी. त्यागी समय-समय पर बिहार को विशेष राज्य का दर्ज देने की मांग उठाते रहे हैं। कुमार बिहार से झारखंड के अलग होने से हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए पैकेज तथा नेपाल से आने वाली नदियों से उत्तर बिहार में होने वाली तबाही की भरपायी तथा इस समस्या का स्थायी समाधान भी चाहते हैं।

जद (यू) सूत्रों के अनुसार पार्टी केन्द्र में कुछ प्रमुख मंत्रालय चाहती है। पार्टी की नजर रेलवे, कृषि, ग्रामीण विकास और स्वास्थ्य जैसे बड़े मंत्रालयों पर है। सूत्रों का मानना है कि इन मंत्रालयों में बेहतर कामकाज के जरिये पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कार्यक्षमता का प्रदर्शन करने के साथ-साथ जनाधार को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। पार्टी नेताओं की नजर दिल्ली पर भी है जहां बड़ी संख्या में बिहार और झारखंड के लोग रहते हैं। उनका मानना है कि इनकी मजबूत उपस्थिति का फायदा पार्टी उठा सकती है।

लोजपा और भाजपा के स्थानीय नेता भी चाहते हैं कि राज्य के विकास में केंद्र की भूमिका और बढ़े। लोजपा प्रमुख राम विलास पासवान भी बिहार के तेजी से विकास के पक्ष में हैं और इसके लिए अधिक केन्द्रीय सहायता देने पर जोर देते रहे है। भाजपा के राज्य स्तरीय नेताओं की राय इन दोनों पार्टियों से मिलती है और स्थानीय स्तर पर वे विकास के मुद्दे पर एकमत हैं लेकिन केन्द्रीय सहायता का निर्णय मोदी सरकार को करना है। लोजपा के के छह सांसद निर्वाचित हुए हैं और पासवान पहले ही कह चुके हैं कि उनके पुत्र चिराग पासवान के मंत्री बनने पर उन्हें खुशी होगी। पासवान मोदी सरकार में खाद्य, आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री थे लेकिन इस बार उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा।

भाजपा की ओर से मोदी सरकार में राधामोहन सिंह कृषि और रविशंकर प्रसाद विधि एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री थे, ये दोनों जीत कर लोकसभा पहुंचे हैं। भाजपा के गिरिराज सिंह, आर. के. सिंह, अश्विनी कुमार चौबे, राम कृपाल यादव भी केंद्र में मंत्री थे। इस चुनाव में ये सभी नेता विजयी हुए हैं। पिछली मोदी सरकार में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा भी मंत्री थे लेकिन चुनाव से पहले वह राजग से अलग हो गये थे।

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इन राज्यों में छप्पर फाड़कर मिले वोट, गिनने वालों के भी थक गए थे हाथ

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने दावे के अनुरूप हिन्दी पट्टी के 14 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में से 10 में उसने अकेले दम पर और दो राज्यों में अपने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करने में कामयाबी हासिल कर ली है। भाजपा चुनाव से पहले कह रही थी कि इस बार उसका लक्ष्य 50 प्रतिशत वोट का है और हिंदी पट्टी के यह कारनामा कर दिखाया। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा को 49.56 प्रतिशत मत मिले हैं और उसने 62 सीटें जीती हैं। पिछले चुनाव में राज्य में उसे 42.63 प्रतिशत मत मिले थे और 71 सीटें उसकी झोली में गयी थीं।

अन्य राज्यों में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली, चंडीगढ़, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में उसने अकेले ही 50 प्रतिशत से ज्यादा मतों पर कब्जा किया है। महाराष्ट्र और बिहार में उसने सहयोगी दलों के साथ मिलकर 50 प्रतिशत से अधिक सीटों पर कब्जा किया है। गुजरात में पार्टी को 62.21 प्रतिशत मत मिले और सभी 26 की 26 सीट उसकी झोली में गयी। पिछली बार 60.11 प्रतिशत मतों के साथ उसने सभी सीटें जीती थीं। राजस्थान में 58.47 प्रतिशत मतों के साथ पार्टी में 25 में से 24 सीटों पर अपना परचम लहराया है। पिछली बार वहाँ 55.61 प्रतिशत मत हासिल कर उसने सभी 25 सीटों पर कब्जा किया था।

मध्य प्रदेश में भाजपा को 58 प्रतिशत मत मिले और उसने 29 में से 28 सीटें जीतीं। पिछली बार 54.76 प्रतिशत मतों के साथ उसे 27 सीट मिली थी। हरियाणा में पार्टी ने अपने प्रदर्शन में जबरदस्त सुधार किया है। पिछली बार 34.84 प्रतिशत मत के साथ सात सीट जीतने वाली पार्टी ने 58 प्रतिशत वोट के साथ सभी सात सीटों पर अपना परचम लहराया। झारखंड में भाजपा को 50.96 प्रतिशत मत मिले और उसने 11 सीटें जीतीं। पिछली बार उसने राज्य में 40.71 प्रतिशत मत हासिल किया था और उसे 12 सीटें मिली थीं।

पार्टी ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी 50 प्रतिशत का आँकड़ा पार कर लिया। पिछली बार उसे 46.63 प्रतिशत मत मिले थे और इस बार यह आँकड़ा 56.56 प्रतिशत पर पहुँच गया। यहाँ वह सभी सात सीटों पर अपना कब्जा बनाये रखने में कामयाब रही। चंडीगढ़ की एक मात्र सीट पर भी उसका मत प्रतिशत 42.49 से बढ़कर 50.64 पर पहुँच गया। उत्तराखंड में पार्टी ने सभी पाँच सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है और मत प्रतिशत 55.93 से बढ़ाकर 61.01 प्रतिशत करने में कामयाब रही। हिमाचल प्रदेश में भी वह अपनी सभी चार सीटें बचाने में कामयाब रही। यहाँ उसका मत प्रतिशत 53.85 से बढ़कर 69.11 पर पहुँच गया। महाराष्ट्र में भाजपा का शिवसेना से गठबंधन है। वहाँ भाजपा को 27.59 प्रतिशत और शिवसेना को 23.29 प्रतिशत वोट मिले हैं। इस प्रकार यहाँ भी दोनों मिलकर 50 प्रतिशत का आँकड़ा पार करने में सफल रही। पिछली बार राज्य में भाजपा को 27.56 प्रतिशत और शिवसेना को 20.82 प्रतिशत मत मिले थे।

बिहार में भाजपा को 23.58 प्रतिशत और उसकी सहयोगी दलों जनता दल (यू) को 21.81 प्रतिशत तथा लोक जनशक्ति पार्टी को 7.86 प्रतिशत मत मिला है। पिछली बार भाजपा को 29.86 प्रतिशत और लोजपा को 6.50 प्रतिशत मत मिले थे जबकि जदयू उस समय भाजपा के खिलाफ खड़ी थी। सिर्फ पंजाब और जम्मू-कश्मीर में वह 50 प्रतिशत के लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी। पंजाब में भाजपा शिरोमणी अकाली दल (एसएडी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। वहाँ भाजपा को 9.63 प्रतिशत मत और दो सीट तथा एसएडी को 27.45 प्रतिशत मत और दो सीट मिली। जम्मू-कश्मीर में भाजपा भले ही 50 प्रतिशत का आँकड़ा नहीं छू पायी हो, लेकिन इसके काफी करीब पहुँचने में कामयाब रही। वहाँ भाजपा को 46.39 प्रतिशत मत मिले जबकि पिछली बार 32.65 प्रतिशत मत मिले थे। यहाँ पार्टी ने पिछली बार की तरह ही तीन सीट जीती है।