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गरारे और जलनेति से थम सकता है कोरोना वायरस का संक्रमण: डा. शीतू सिंह

जयपुर. कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए जयपुर के सवाईमानसिंह मेडिकल कॉलेज की श्वांस रोग विशेषज्ञ डॉ शीतू सिंह ने दावा किया है कि गुनगुने पानी के गरारे और नेजल वाश (जल नेति) करके कोरोना वायरस के संक्रमण को फेफडों तक पहुंचने से रोका जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय जनरल “लंग इंडिया” के ताजा अंक में प्रकाशित डा. सिंह के रिसर्च पेपर में कहा गया है कि नियमित रूप से गुनगुने पानी के गरारे और नेजल वॉश (जल नेति) गले और नाक में पहुंचे कोरोना वायरस को समाप्त कर देते हैं। जल नेति को मेडिकल साइंस में नेसोफेरेंजियल प्रोसेस कहते हैं।

नाक और गले की धुलाई से कम होता है वायरस का लोड

डॉ शीतू सिंह ने बताया कि Rapid Systematic Analysis में सर्दी, खांसी और बुखार के रूप में प्रकट होने वाले अपर रेसपेरेटरी वायरल संक्रमण की रोकथाम में गरारे और जल नेति का मूल्यांकन किया गया है। शोध से पता चला कि नाक और गले के माध्यम से प्रवेश करने वाले वायरस जनित रोगों की रोकथाम में गरारे और जलनेति से मदद मिलती है। जिस तरह धोने से हाथ संक्रमण रहित होते हैं, उसी तरह गरारे और नेजल वॉश से नाक और गले की धुलाई होती है और उससे वायरल लोड कम होता है। गले और नाक के म्यूकोसा की कोशिकाओं में इसका एंटी वायरल प्रभाव होता है।

कम हो जाती है बीमारी की अवधि

शोध के अनुसार नियमित गरारे और नेजल वॉश COVID 19 की रोकथाम में भी उपयोगी हो सकते है। पूर्व के अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करने के लिए मौजूद हैं कि जलनेति और गरारे करने से बीमारी की अवधि, उसके लक्षण और वायरस की मात्रा कम हो जाती है। शोध के ग्रुप लीडर श्वांस रोग विशेषज्ञ और राजस्थान हॉस्पीटल के अध्यक्ष डॉ वीरेंद्र सिंह ने बताया कि एडिनबरा में हुए एक अध्ययन में अपर रेसपेरेटरी वायरल संक्रमण में वायरस के प्रकार का भी अध्ययन किया गया था। डॉ वीरेंद्र ने कहा कि जापान में इन्फ्लूएंजा नियंत्रण के लिए जारी राष्ट्रीय दिशानिर्देश में फेस मास्क और हाथ धोना भी शामिल है। इसी तर्ज पर गरारे और नेजल वॉश को भारत में प्रोत्साहित किया जा सकता है। डा. वीरेन्द्र सिंह ने बताया कि उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और कान के छिद्र वाले मरीजों को गरारे और जलनेति चिकित्सकीय परामर्श के बाद ही करने चाहिए।

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17 साल पहले मौत का तांडव करने वाले सार्स का सगा भाई है कोरोना

संसार के शक्तिशाली देशों को घुटने पर ला चुका कोरोना वायरस 17 साल पुराने सार्स का सगा भाई है। इस बार उसके ज्यादा मारक होने का यही कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोरोना फैमिली का यह वायरस पिछले दो बार के मुकाबले ज्यादा ताकतवर होकर आया है और उसने म्युटेशन के जरिए स्वयं को ज्यादा घातक बना लिया है। 2003 में आए सार्स कोविड-1 और 2013-14 में आए मर्स वायरस से मौजूदा वायरस की समानता क्रमश: 70 और 50 प्रतिशत तक है। पहले के दोनो वायरस घातक तो थे लेकिन वे व्यापक तबाही नहीं फैला पाए थे। क्योंकि कोविड-1 पूरी तरह ग्लोबल होने से पहले ही दम तोड़ गया था और 2013-14 का मर्स सऊदी अरब तक सीमित रह गया था।
कोरोना वायरस का मौजूदा स्वरूप बेहद घातक है। उसने 45 वर्ष से अधिक उम्र के इंसानों को उसी तरह मौत के घाट उतारा है जिस तरह लगभग एक सदी पहले प्लेग ने उनका भक्षण किया था। अनुमान है कि पिछले चार माह में कोरोना संक्रमण के चलते पूरी दुनिया में भगवान को प्यारे हुए लगभग ढाई लाख इंसानों में से 80 प्रतिशत 45 से 80 साल के हैं।

बूढ़ों के लिए मौत का दूसरा नाम है कोरोना

इन दिनों कोविड-19 के रोगियों की जान बचाने में जुटे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कार्डियक थोरासिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजीत जैन के मुताबिक पूरी दुनिया में अभी तक कोरोना संक्रमितों की मृत्यु का जो आंकड़ा सामने आ रहा है, उसमें 25 साल से कम उम्र के संकमितों की संख्या एक प्रतिशत है। 25 से 44 साल तक के मृतकों का आंकड़ा अभी तक छह प्रतिशत पर टिका हुआ है लेकिन 45 से 60 साल तक संक्रमितों की मृत्यु दर 15 प्रतिशत तक जा पहुंची है। सबसे ज्यादा मौत 65 वर्ष से अधिक उम्र के रोगियों की हो रही है। इस उम्र के संक्रमितों में से आधे ठीक होने की अपेक्षा काल के गाल में समा जाते हैं।
डा. अजीत के मुताबिक तीनो वायरस एक ही जींस के हैं इसलिए विशिष्ट दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाने के बावजूद परम्परागत दवाएं इलाज में काम ली जा रही हैं। इन दवाओं के बल पर ही कोरोना से मुक्त होने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन इससे यह महामारी नियंत्रण में नहीं आ रही है।
उन्होंने बताया कि सीवियर एक्यूट रेस्पेरेटिरी सिंड्रोम अर्थात सार्स वायरस सात तरह का है। इनमें 2003 में आया सार्स कोविड-1, 2013-14 में आए मर्स वायरस और 2019 में आए कोविड-19 से दुनिया का परिचय हो चुका है। इसके अलावा कोरोना फैमिली के चार अन्य वायरस के नाम क्रमश: ह्यूमन कोरोना वायरस ओएच 43, ह्यूमन कोरोना वायरस एनएल 63, ह्यूमन कोरोना वायरस 229ई, ह्यूमन कोरोना वायरस एचयूके1 हैं। डा. अजीत जैन के अनुसार 2016 में डब्ल्यूएचओ ने भविष्यवाणी की थी कि कोरोना फैमिली के ये वायरस दुनिया में कभी भी महामारी फैला सकते हैं। भविष्यवाणी के बाद रिसर्च प्रोग्राम और दवा बनाने के प्रयास शुरू हो गए थे। इसीलिए उम्मीद है कि कोरोना का इलाज जल्द ही खोज लिया जाएगा।

प्रोटीन बढ़ाते है मौत का खतरा

डा. जैन के अनुसार दुनिया को सबसे ज्यादा घबराहट कोरोना संक्रमितों की मौत की बढ़ती दर से है। 2003 में चाइना के यूनान से शुरू हुए सार्स कोविड-1 के दौर में मौत की दर 9 प्रतिशत थी। दस साल बाद 2013-14 में आई मर्स महामारी में मौत की दर 35 प्रतिशत थी, लेकिन उसका फैलाव नहीं होने से दुनिया को ज्यादा चिंता नहीं हुई थी। इस बार यह पूरी दुनिया में फैल गया है और इसकी औसत मृत्यु दर भी 15 प्रतिशत है। कोविड-19 वायरस में चार तरह के प्रोटीन स्पाइक प्रोटीन, एनवल्व, मेमरिन और न्यूक्लोसाइट हैं और ये हाइरिस्क ग्रुप (डायबिटीज, हाइपर टेंशन,हृदय रोग) के मरीजों के मरने का खतरा बढ़ा देते है।

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Intake of fruits and vegetables: दिमाग को देनी है ताकत तो करें इन फल और सब्जियों का सेवन

Intake of fruits and vegetables:  फल और सब्जियां शारीरिक और मानसिक समस्याओं से निजात दिलाती हैं। एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि फलों और सब्जियों का संबंध कम होती याददाश्त और दिल की बीमारियों का खतरा कम करने से होता है।

शोध ऑस्ट्रेलियाई शहर सिडनी की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में किया गया है। Intake of fruits and vegetables: शोध में एक लाख 39 हजार लोगों को शामिल किया गया था। शोध के दौरान कुछ खास फूड ग्रुप्स, मेमोरी लॉस और दिल की बीमारी वाले लोगों के बीच गहरा संबंध पाया गया। अध्ययन में सामने आया कि प्रोटीन से भरपूर चीजें खाने से याददाश्त तेज होती है। शोध के परिणाम को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित किया गया है।

डिमेंशिया नामक बीमारी की ये वजह

Intake of fruits and vegetables:  शोध के आंकड़ों के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया के चार लाख 59 हजार लोग डिमेंशिया नामक बीमारी से पीड़ित हैं। विशेषज्ञों ने अध्ययन में पाया कि फल और सब्जियों का कम सेवन करने वाले लोग डिमेंशिया से पीड़ित है। इनमें दिल से जुड़ी बीमारियां, हाइपरटेंशन और डायबिटीज जैसी घातक बीमारियों के लक्षण पाए गए। डिमेंशिया ऑस्ट्रेलियाई लोगों की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण बन चुकी है।

डाइट में शामिल करें ज्यादा फल और सब्जियां

Intake of fruits and vegetables:  विशेषज्ञों कहना है कि लोगों को अपनी लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करने की जरूरत है ताकि याददाश्त को लेकर कोई दिक्कत न आए। अगर लोगों को घातक बीमारियों से बचना है तो उन्हें जंक फूड छोड़कर हेल्दी फूड का सेवन करना होगा और डाइट में ज्यादा से ज्यादा फल और सब्जियों को शामिल करना होगा।

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शरीर की शुगर को खा जाती है चमत्कारी चिरौंजी, खांसी में भी असरकारक

चिरौंजी मतलब चमत्कार। खाने में स्वादिष्ट आकार में छोटा सा चिरौंजी नामक सूखा मेवा आयुर्वेद की कई दवाओं का आधार होने के साथ ही स्वयं भी छोटे—मोटे वैद्य से कम नहीं है। इसके सेवन से मधुमेह के उन रोगियों का दवाओं से पीछा छूट सकता है जिन्हें खा—खाकर वे थक गए हैं। बिल्कुल ये हम नहीं वर्ष 2010 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित एक शोध कह रहा है कि चिरौंजी का इस्तेमाल खांसी के उपचार के लिए और शक्तिवर्धक के तौर पर किया जाता है। चिरौंजी के तेल का उपयोग चर्मरोग के इलाज में भी कारगर है। वर्ष 2013 में ट्रॉपिकल जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल रिसर्च में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया कि चिरौंजी का नियमित सेवन मधुमेह के रोगियों के रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है। एनल्स ऑफ बायोलॉजिकल रिसर्च नामक जर्नल में वर्ष 2011 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, चिरौंजी के फल और छाल से बना लेप सर्पदंश के उपचार में कारगर है। फार्माकॉलॉजी ऑनलाइन जर्नल में वर्ष 2010 में प्रकाशित शोध ने भी चिरौंजी की जड़ से बनी दवा से अतिसार के उपचार की पुष्टि की थी। चिरौंजी खांसी, अतिसार और मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद है। चिरौंजी का इस्तेमाल मेवे की तरह होता है और स्थानीय बाजारों में ऊंची कीमत पर इसे बेचा जाता है।

चिरौंजी के पेड़ मुख्यतः ऊष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के शुष्क इलाकों में पाए जाते हैं। लेकिन उन्हें समुद्र तल से 1,200 मीटर की ऊंचाई तक वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सदाबहार श्रेणी के चिरौंजी के पेड़ जंगलों में 18 मीटर तक ऊंचे हो सकते हैं। भारत में इसके पेड़ बागानों में भी उगाए जाते हैं।

गाय के दूध में पीसकर पीते हैं आदिवासी

चिरौंजी का वानस्पतिक नाम बुकानानिया लांजन है और अंग्रेजी में ‘आमंडेट’ के नाम से जाना जाता है। चिरौंजी भारत में झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के वाराणसी व मिर्जापुर जिलों में पाया जाता है।
चिरौंजी का फल पियार 4-5 महीने में पकता है और इसे अप्रैल-मई के महीने में तोड़ा जाता है। तोड़ने के बाद हरे रंग का फल काला पड़ जाता है। चिरौंजी निकालने के लिए इस फल को रात भर पानी में डालकर रखा जाता है और इसके बाद जूट के बोरे से रगड़-रगड़कर बीज अलग कर लिया जाता है। इसके बाद इसे पानी से अच्छी तरह से धोकर धूप में सुखाया जाता है।
झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी चिरौंजी का इस्तेमाल घाव के उपचार के लिए करते हैं। चिरौंजी इन आदिवासियों के जीवनयापन का एक बड़ा साधन भी है। उत्तर प्रदेश सोनभद्र के आदिवासी समुदाय के लोग चिरौंजी के पेड़ से गोंद और लाख इकट्ठा करके बाजार में बेचकर आय कमाते हैं। आंध्र प्रदेश के कुछ आदिवासी चिरौंजी के गोंद को गाय के दूध में मिलाकर पीते हैं। उनका मानना है कि इससे गठिया का दर्द दूर होता है। पिछले कुछ दशकों से चिरौंजी की मांग शहरी बाजारों में बढ़ने की वजह से इसका बड़ी मात्रा में संग्रह और पेड़ों की गलत तरीके से छंटाई की वजह से जंगलों में चिरौंजी के पेड़ तेजी से कम हुए हैं।

त्रिदोषहर भी मानता है आयुर्वेद

चरक संहिता, भाव प्रकाश, चक्रदत्त और चिरंजीव वनौषधि के अनुसार चिरौंजी का नियमित सेवन शरीर में कफ, वात और पित्त को नियंत्रित रखता है और खून को भी साफ रखता है। आयुर्वेद में चिरौंजी के तेल से दवाई बनाई जाती है। हृदय रोग और खांसी के उपचार में काम आता है। साथ ही मस्तिष्क के लिए टॉनिक का भी काम करता है।
चिरौंजी के पेड़ की छाल का इस्तेमाल चमड़े की सफाई के लिए किया जाता है। चिरौंजी का पेड़ बड़ी मात्रा में गोंद का उत्पादन करता है। इस गोंद का इस्तेमाल सस्ती औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है। खराब गुणवत्ता के कारण इसकी लकड़ी का इस्तेमाल जलावन के तौर पर या चारकोल बनाने में किया जाता है।

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एक मुट्ठी किशमिश खाइए, डायबिटीज(मधुमेह) से छुटकारा पाइए

आपने अपने घरों में बनने वाली खीर सहित अन्य पकवानों में मिलाया जाने वाला किशमिश नामक मेवा खूब खाया होगा। इसके अलावा भी कई मौके पर बादाम, काजू इत्यादि के साथ भी किशमिश खूब खाई होगी लेकिन ज्यादातर लोग किशमिश खाने के बाद भी इसके फायदों के बारे में नहीं जानते। दरअसल, किशमिश सिर्फ अपने खट्टे-मीठे स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर से जुड़ी कई सामान्य और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए इसका सेवन किया जा सकता है। किशमिश के आश्चर्यजनक फायदों के बारे में जानकर आप हैरान रह जाएंगे और नियमित रूप से इसका सेवन करने लगेंगे।

 

diabetes: डायबिटीज(मधुमेह) का रामबाण इलाज है किशमिश

अब तक डाक्टरों को यही कहते सुना होगा कि मधुमेह के रोगियों के लिए मीठा जहर बराबर है, लेकिन हकीकत में किशमिश उनके लिए अमृत के समान है। अनगिनत शोधों के अनुसार किशमिश पोस्ट-प्रांडियल इंसुलिन प्रतिक्रिया को नियंत्रित कर सकती है, जिस वजह से यह मधुमेह के रोगियों के लिए फायदेमंद है। इसके अलावा किशमिश में ऐसे गुण होते हैं जो लेप्टिन और घ्रेलिन नामक हार्मोंस को भी नियंत्रित कर सकते हैं, जिससे मधुमेह रोगी का अपने खानपान पर नियंत्रण बन जाता है।

पेट में पत्थर को भी पचा देती है किशमिश

पाचन क्रिया को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना कुछ किशमिश का सेवन जरूर करें, क्योंकि किशमिश अन्य जरूरी पोषक तत्वों के साथ-साथ फाइबर से भी समृद्ध होती है। फाइबर भोजन को पचाने में सहायता करता है और कई तरह की पेट संबंधी समस्याों से राहत दिलाता है। किशमिश का दैनिक सेवन शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मददगार है, जिस वजह से पाचन स्वास्थ्य के लिए रोजाना किशमिश का सेवन एक कारगर विकल्प हो सकता है।

कैंसर में बेस्ट है किशमिश

यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि कैंसर कितना घातक रोग है, इसलिए हर साल इसकी चपेट में आकर दुनियाभर के लाखों लोग अपनी जान गंवा देते हैं। मगर यह जानकर हैरानी होगी कि किशमिश कैंसर जैसी घातक बीमारी की आशंका को भी कम कर सकती है। इसमें कैटेचिन नामक एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है जो शरीर को मुक्त कणों से बचाने का काम करता है। ये मुक्त कण ट्यूमर का कारण बन सकते हैं।

किशमिश खाइए एसिडिटी को बॉय—बॉय कहिए

एसिडिटी एक आम समस्या है जो गलत खाद्य पदार्थों के कारण हो जाती है, लेकिन किशमिश का सेवन करके इस समस्या से भी निजात पाया जा सकता है। किशमिश में पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे कई तरह के पोषक तत्व सम्मिलित होते हैं जो एसिडिटी को कम करते हैं। इतना ही नहीं, इसके पोषक तत्व गठिया, गाउट, पथरी और यहां तक कि हृदय रोग जैसी बीमारियों को रोकने में भी मदद करते हैं।

एक मुट्ठी किशमिश देती है दिनभर ऊर्जा

भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण पूरे दिन अपने आप को ऊर्जावान बनाएं रखना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, लेकिन रोजाना एक मुट्ठी किशमिश का सेवन नाश्ते में कर लें तो दिन भर घोड़े की तरह दौड़ सकते हैं। किशमिश विटामिन-बी के समूह से समृद्ध होती है जो व्यक्ति को दिन भर ऊर्जावान रखने में मददगार है। अधिक शारीरिक श्रम करने वाले लोगों के लिए नियमित रूप से किशमिश का सेवन करना जरूरी है।

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घोड़े जैसी ताकत पाना चाहते हैं तो एक माह तक मुझे खा लीजिए क्योंकि मैं कड़कनाथ हूं

यौवन शक्ति को घोड़े के बराबर करना चाहते हैं तो मुझे एक माह तक खा लीजिए। अगर आपने सही तरीके से खा लिया तो आप न सिर्फ घोड़े को दौड़ में हरा सकते हैं बल्कि उसके जैसा बलिष्ठ शरीर भी पा सकते हैं।

असल में कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, रक्तचाप और टीबी जैसी बीमारियों की रोकथाम में मददगार ‘कड़कनाथ’ एक समय अस्तित्व का संकट झेल रहा था लेकिन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और अन्य संस्थानों की मदद से अब यह देश के कोने कोने में ‘बांग’ दे रहा है। रोग प्रतिरोधक क्षमता से भरपूर कड़कनाथ प्रजाति का मुर्गा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में पाया जाता है। यौवन शक्ति बढ़ाने में कारगर होने के कारण लोगों में इसकी भारी मांग से पिछले वर्षों के दौरान इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया जिससे यह प्रजाति विलुप्त होने के कागार पर पहुंच गयी थी। समय रहते भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के हस्तक्षेप से अब यह न केवल तीन राज्यों बल्कि पूरे देश में किसानों की आय बढ़ाने में बहुत मददगार साबित हो रहा है।
उप महानिदेशक (कृषि विस्तार) ए.के. सिंह ने बताया कि सिर से नख तक बिल्कुल काले रंग का देशी कड़कनाथ में जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भी अत्यधिक गर्मी और सर्दी सहने की क्षमता है और यह विपरीत परिस्थिति में भी जीवित रहता है। इसका न केवल खून काला होता है बल्कि इसका मांस भी काला है जो बेहद नर्म और स्वादिष्ट होता है। इसके मांस में प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक होती है और हृदय रोग के लिए घातक माने जाने वाले काेलेस्ट्रोल की मात्रा इसमें बहुत कम होती है। इसमें नाम मात्र की वसा है।

डॉ. सिंह ने बताया कि प्रोटीन कोशिका का एक महत्वपूर्ण घटक है जो शरीर के ऊतकों के निर्माण और मरम्मत में मददगार है। एंजाइम, हार्मोन और शरीर के अन्य रसायनों के निर्माण में प्रोटीन का उपयोग होता है। प्रोटीन हड्डियों, मांसपेशियों, त्वचा और रक्त के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे शरीर में हानिकारक चर्बी और काेलेस्ट्रोल की मात्रा कम होती है। उन्होंने बताया कि कड़कनाथ के मांस में पाया जाने वाला स्टीयरिक एसिड खराब काेलेस्ट्रोल को कम करने में मददगार है। इसमें पाया जाने वाला ओलिक एसिड रक्तचाप और काेलेस्ट्रोल कम करने के साथ ही टाइप टू मधुमेह और कैंसर प्रतिरोधक है। इसमें गामा लिनोलेनिक एसिड, अरचिडोनिक एसिड और डोकोसैक्सिनोइक एसिड भी पाया जाता है जो शरीर को कई प्रकार के फायदे पहुंचाता है। डॉ. सिंह ने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि विज्ञान केन्द्र तथा राज्यों के सहयोग से कड़कनाथ हेचरी की स्थापना की गयी है जहां सालाना 139000 चूजे तैयार हो रहे हैं।
इन चूजों को 20 राज्यों के 117 जिलों में पाला जाता है। इन राज्यों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर आदि शामिल हैं। कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दांतेवाड़ा में सालाना एक लाख चूजे तैयार किये जा रहे हैं। इस राज्य के कांकेड़, बलरामपुर और राजनंदगांव में भी हेचरी की स्थापना की गयी है। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, झाबुआ, धार और ग्वालियर में भी इस प्रकार के केन्द्र हैं।

कड़कनाथ का चूजा छह माह में वयस्क हो जाता है और मुर्गी अंडा देने लगती है। यह मुर्गी साल भर में तीन से चार चरणों में अंडे देती है और यह साल भर में 75 से 90 अंडे दे देती है। इसका एक अंडा स्थानीय स्तर पर 10 रुपये से 50 रुपये में मिलता है जबकि इसका मांस 600 से 1200 रुपये प्रति किलोग्राम बिकता है। किसानों को आम अंडों का मूल्य दो से तीन रुपये और सामान्य मुर्गे का मांस का मूल्य 150 रुपये किलोग्राम मुश्किल से मिलता है।
कड़कनाथ का मूल नाम कालामासी है जिसका अर्थ काले मांस वाला मुर्गा है। इसकी तीन किस्मों में जेट ब्लैक, पेनसिल्ड और गोल्डन कड़कनाथ शामिल हैं। कृषि विस्तार उप महानिदेशक ने बताया कि कड़कनाथ के प्रति लोगों में भारी जागरुकता आयी है जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों से इसके चूजे की भारी मांग आ रही है। कई स्थानों पर कड़कनाथ के पालन से गरीबों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है और वे व्यावसायिक तौर पर वैज्ञानिक ढंग से इसका पालन कर रहे हैं।

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गुर्दे की बीमारी को प्रभावित करती है नींद

नई दिल्ली,  हालिया शोध से संकेत मिलता है कि गुर्दे की बीमारियों के लिए नींद की अवधि बेहद जरूरी है। यह पुरानी किडनी रोग (सीकेडी) वाले व्यक्तियों द्वारा अनुभव की जाने वाली स्वास्थ्य से संबंधित गुणवत्ता (एचआरक्यूओएल) को प्रभावित कर सकता है। होमियोस्टैटिक विनियमन के लिए पर्याप्त मात्रा और गुणवत्ता की नींद आवश्यक है, और अधिक नींद मोटापे, मधुमेह, और उच्च रक्तचाप जैसे चयापचय रोगों से जुड़ी है, जिनमें से सभी सीकेडी के जोखिम कारक हैं। भारत में अंतिम चरण गुर्दे की विफलता विकसित करने वाले सभी मरीजों में से केवल 10% से 15% उचित उपचार प्राप्त करते हैं। लगभग 6000 गुर्दे प्रत्यारोपण से गुजरते हैं, 60,000 हेमोडायलिसिस से गुजरते हैं, और एक और 6000 एक वर्ष में पेरिटोनियल डायलिसिस लेना पसंद करते हैं। गुर्दे प्रतिस्थापन चिकित्सा की इच्छा के लिए लगभग छह लाख लोग मर जाते हैं।  

 

इसके बारे में बात करते हुए, पद्मश्री पुरस्कार विजेता डॉ। केके अग्रवाल, भारत के हार्ट केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष, ने कहा, “सीकेडी की समय के साथ गुर्दे की कमी के क्रमशः हानि की विशेषता है और अंततः गुर्दे की विफलता हो सकती है, जिससे रोगियों को डायलिसिस या गुर्दे से गुजरना पड़ता है। प्रत्यारोपण। संकेत और लक्षण तब तक ध्यान देने योग्य नहीं हैं जब तक कि रोग काफी अच्छी तरह से उन्नत न हो, और स्थिति गंभीर हो गई है। इस समय तक, अधिकांश नुकसान अपरिवर्तनीय है। सीकेडी के एक उन्नत चरण में, तरल पदार्थ, इलेक्ट्रोलाइट्स और कचरे के खतरनाक स्तर शरीर में बन सकते हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, असामान्य किडनी संरचना, और बीमारी के पारिवारिक इतिहास जैसे अंतर्निहित स्थितियों वाले लोग अधिक जोखिम में हैं। इसके अतिरिक्त, धूम्रपान करने वाले और मोटापे से ग्रस्त लोग लंबे समय तक सीकेडी के संभावित उम्मीदवार भी हो सकते हैं। ”  इस स्थिति के कुछ लक्षणों में मतली, उल्टी, भूख की कमी, थकान और कमजोरी, नींद की समस्याएं, मानसिक तीखेपन, मांसपेशी twitches और ऐंठन, edema, लगातार खुजली, सीने में दर्द, सांस की तकलीफ, और उच्च रक्तचाप शामिल हैं। आगे बढ़ते हुए डॉ। अग्रवाल, जो आईजेसीपी के समूह संपादक भी हैं, ने कहा, “गुर्दे की बीमारियों को बरकरार रखने के कुछ महत्वपूर्ण उपाय क्रमशः मोटापा और डिस्प्लिडेमिया जैसी स्थितियों और बीमारियों की निगरानी और इलाज करना है। यदि रक्तचाप और रक्त शर्करा को नियंत्रण में रखा जा सकता है, तो 50% से अधिक सीकेडी को रोका जा सकता है। “

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पारिजात के बीज खाते ही बवासीर हो जाती है छूमंतर

हिन्दू धर्म ग्रंथों में देव वृक्ष की संज्ञा से नवाजे गये दुलर्भ प्रजाति का ‘पारिजात वास्तव में औषधीय गुणों की खान है। आयुर्वेद में इस वृक्ष के तने से लेकर शिखा तक में जटिल और असाध्य रोगों के निदान का वर्णन किया गया है। अपनी नायाब खूबसूरती और विशेष गुणों के कारण यह वृक्ष सदियों से लोगों के आकर्षण और कौतूहल का केन्द्र बना हुआ है। हिन्दू पुराणों में पारिजात को देव वृक्ष की संज्ञा से नवाजा गया है। मान्यता है कि इस वृक्ष को स्पर्श करने मात्र से ही शरीर की थकान छूमंतर हो जाती है।

आयुर्वेद में देव वृक्ष को खास स्थान दिया गया है। पारिजात में औषधीय गुणों का भण्डार है। पारिजात बावासीर के लिए रामबाण औषधि है। पारिजात के एक बीज का सेवन प्रतिदिन किया जाये तो बवासीर रोग ठीक हो जाता है। पारिजात के बीज का पेस्ट बनाकर गुदा पर लगाने से बवासीर के रोगी को बडी राहत मिलती है।

पारिजात के फूल हदय रोग के निदान के लिए भी उत्तम माने जाते हैं। इनके फूलों का अथवा उनके रस का सेवन करने से हृदय रोग से बचा जा सकता है। पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खांसी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधी रोग ठीक हो जाते है।

पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोपल को अगर पांच काली मिर्च के साथ महिलाएं सेवन करें तो स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जहां हेयर टानिक का काम करते है तो इसकी पत्तियों का जूस बुखार को ठीक कर देता है। गुर्दे के रोगों में यह पेड़ लाभकारी होता है। इस पेड़ की छाल में पानी की मात्रा बहुतायत होती है जो मलेरिया ज्वर में उपयोगी होता है। इस वृक्ष का फल लम्बा, भूरा होता है और इसे चाव से खाया जाता है। इसका गूदा पाचक तथा स्वाद में खट्टा होता है।

हिन्दू धर्म ग्रंथो में पारिजात के बारे में कई किवदंतिया प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार परिजात वृक्ष की उत्पत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी। जिसे इन्द्र ने अपनी वाटिका में रोप दिया था। हरिवंश पुराण के अनुसार पारिजात के अदभुद फूलों को पाकर सत्यभामा ने भगवान कृष्ण से जिद की कि पारिजात वृक्ष को स्वर्ग से लाकर उनकी वाटिका में रोपित किया जाए। कृष्ण ने पारिजात वृक्ष लाने के लिए नारद मुनि को स्वर्ग लोक भेजा मगर इन्द्र ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया जिस पर कृष्ण ने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और पारिजात प्राप्त कर लिया। पारिजात छीने जाने से रूष्ट इन्द्र ने इस वृक्ष पर कभी न फल आने का शाप दिया। पारिजात वृक्ष का उल्लेख भगवत गीता में भी मिलता है। पारिजात वृक्ष का उल्लेख पारिजातहरण नरकवधों नामक अध्याय में की गई है। हरिवंश पुराण में ऐसे ही एक वृक्ष का उल्लेख मिलता है,जिसे छूने मात्र से देव नर्तकी उर्वशी की थकान मिट जाती थी।

इस वृक्ष की एक विशेषता यह भी है कि इसमें कलम नहीं लगती ,इसी कारण यह वृक्ष दुर्लभ वृक्ष की श्रेणी में आता है। केन्द्र सरकार ने पारिजात वृक्ष पर डाक टिकट भी जारी किया ताकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी पहचान बन सके। पारिजात वृक्ष कल्प वृक्ष का ही एक प्रकार है। इसका वैज्ञानिक नाम एडेनसोनिया डिजीटाटा है। इसका फूल खूबसूरत सफेद रंग का होता है जो कि सूखने के बाद सुनहरे रंग का हो जाता है। इस फूल में पांच पंखडियां होती हैं। किवदंती के अनुसार इसकी शाखायें सूखती नहीं बल्कि सिकुड़ जाती हैं तथा शुष्क तने में ही समाहित हो जाती हैं। वर्तमान में इस वृक्ष को भारतीय वनस्पति अनुसंधान केन्द्र लखनऊ में चिन्हित किया गया है। पारिजात के गोरस इमली, विलायत इमली, कल्पवृक्ष आदि अन्य नाम हैं। एक साल में सिर्फ एक बार जून माह में सफेद व पीले रंग के फूलो से सुसज्जित होने वाला यह वृक्ष न सिर्फ खुशबू बिखेरता है, बल्कि देखने में भी सुन्दर लगता है।
पूर्व वैज्ञानिक एवं ज्योतिष के जानकार गोपाल राजू की माने तो धन की देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करने में पारिजात वृक्ष का उपयोग किया जाता है। यह पूजा साल के पांच मुहूर्त होली, दीवाली, ग्रहण, रवि पुष्प तथा गुरु पुष्प नक्षत्र में की जाए तो उत्तम है। पारिजात वृक्ष के वे ही फूल उपयोग में लाए जाते है,जो वृक्ष से टूटकर गिर जाते है, यानि वृक्ष से फूल तोडऩे की मनाही है। उन्होंने बताया कि वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार इस वृक्ष की आयु एक से पांच हजार वर्ष तक आंकी गयी है।