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बच्चों में इंफ्लेमेट्री सिंड्रोम हो सकता है कोरोना का लक्षण

एजिनेवा/नयी दिल्ली।विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूचओ) ने बच्चों में इंफ्लेमेट्री सिंड्रोम यानी सूजन के साथ लाल चकत्ते निकलने के प्रति डॉक्टरों को सावधान रहने की सलाह देते हुये कहा है कि ये कोरोना के लक्षण हो सकते हैं।

डब्ल्यूएचओ की शुक्रवार को जारी एक वैज्ञानिक टिप्पणी में डॉक्टरों और अस्पतालों को सलाह दी गयी है कि यदि बच्चों की जीभ, हाथों या पैरों पर चकत्ते निकलते हैं या सूजन आता है अथवा शॉक के लक्षण दिखते हैं और इसका कोई जीवाणु से जुड़ा कारण नहीं पाया जाता तो यह कोरोना के लक्षण हो सकते हैं।

यदि बच्चे की कोरोना जाँच में संक्रमण की पुष्टि होती है या उसके संपर्क में आया कोई व्यक्ति कोविड-19 से संक्रमित है तो इसकी रिपोर्ट डब्ल्यूएचओ को भेजी जाये।कोविड-19 पर डब्ल्यूएचओ की मुख्य तकनीकी विशेषज्ञ डॉ मरिया वैन कोरखोव ने बताया कि अमेरिका और इटली से कुछ ऐसी रिपोर्टें मिली हैं कि कुछ बच्चों को इंफ्लेमेट्री सिन्ड्रोम के साथ आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा है। इनमें से कई बच्चों की जाँच में कोविड-19 के संक्रमण की भी पुष्टि हुई है।

अभी यह तय नहीं है कि इंफ्लेमेट्री सिंड्रोम कोरोना से सीधे जुड़ा हुआ है या नहीं। इसलिए हम और डाटा एकत्र कर रहे हैं।डब्ल्यूएचओ के स्वास्थ्य आपदा कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डॉ. माइकल जे. रेयान ने कहा कि हो सकता है कि यह बच्चों में दिखने वाला मल्टीसिस्टम इंफ्लेमेट्री सिंड्रोम सीधे वायरस के कारण न होकर वायरस के खिलाफ शरीर के रोग प्रतिरोधक तंत्र की अत्यधिक सक्रियता का परिणाम हो।

वैज्ञानिक टिप्पणी में कहा गया है कि इस सिंड्रोम के लक्षणों और इससे होने वाले जोखिम तथा जनहानि को समझना जरूरी है। साथ ही ऐसी परिस्थितियों में उपचार भी विकसित करने की आवश्यकता है। अभी यह भी स्प्ष्ट नहीं है कि यूरोप और अमेरिका के अलावा दूसरे महादेशों में यह सिंड्रोम नहीं है या यह मौजूद है लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं गया है।

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डब्ल्यूएचओ की भविष्यवाणी: कोरोना वैक्सीन नहीं बना पाएंगे वैज्ञानिक!

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि वैज्ञानिक जिस तरह एचआईवी और डेंगू की वैक्सीन नहीं बना पाए हैं, वैसे ही हो सकता है कि वे कोरोना की वैक्सीन बनाने में भी नाकाम हो जाएं।

आशंका ने बढ़ाई लोगों की चिंता

विश्व स्वास्थ्य संगठन में कोविड-19 के विशेष दूत डॉ.डेविड नैबोरो ने कहा, यहां कुछ वायरस हैं जिनकी कोई वैक्सीन नहीं है। हम यह मान कर नहीं चल सकते कि वैक्सीन आ जाएगी और अगर यह आती भी है तो क्या सभी तरह की सुरक्षा और क्षमता के मानकों पर खरा उतरती है। उल्लेखनीय है कि डब्ल्यूएचओ चीफ भी कोरोना वायरस को लेकर भयावह भविष्यवाणी करते रहे हैं और अब एक्सपर्ट की इस आशंका ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

तीन करोड़ की हो चुकी है एचआइवी से मौत

सीएएन की रिपोर्ट के मुताबिक नैबोरो ने कहा, ‘सबसे बुरी स्थिति यह हो सकती है कि कभी कोई वैक्सीन ही न हो। उन्होंने कहा कि लोगों की उम्मीदें बढ़ रही हैं और फिर खत्म हो रही हैं, क्योंकि आखिरी मुश्किलों से पहले ही कई समाधान फेल हो जा रहे हैं। चार दशकों से अब एचआईवी से 3.2 करोड़ लोगों की मौत हो चुकी है लेकिन दुनिया उसका वैक्सीन नहीं ढूंढ पाई है। वहीं, डेंगू की बात की जाए तो यह हर साल चार लाख लोगों को प्रभावित करता है। वहीं, कुछ देशों में 9-45 साल के लोगों के लिए डेंगू का वैक्सीन मौजूद है।

इन दो दवाओं से कम हुआ कोरोना का असर

एक अध्ययन के मुताबिक हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन के साथ एजिथ्रोमाइसिन का कॉम्बिनेशन कोरोना के असर को कम कर सकता है। कई देशों में दोनों दवाओं के इस्तेमाल के अच्छे नतीजे मिले हैं। भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक कोरोना वायरस का इलाज अभी तक नहीं मिल पाया है। देश में एक होम्योपैथिक दवा की भी फोटो और दवा का नाम खूब वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा है कि यह दवा कोरोना वायरस के इलाज में कारगर है। इस दवा का नाम आर्सेनिक एलबम 30 है। सोशल मीडिया में चल रहे मैसेज में कहा गया है कि कोरोना वायरस एक तरह का वायरल इंफेक्शन है, जिसको होम्योपैथिक दवा आर्सेनिक एलबम 30 से नियंत्रित किया जा सकता है।

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हर साल पांच लाख भारतवासियों को मौत के घाट उतार देती है तपेदिक, इतने ही निगल जाता है डायरिया

दुनिया भर में कोरोना वायरस (कोविड-19) की तुलना में तपेदिक (टीबी) और डायरिया जैसी रोकथाम की जा सकने वाली और उपचार योग्य बीमारियों से अधिक मौतें होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) के अनुसार अकेले इस्केमिक हृदय रोग से दुनिया भर में औसतन 26,000 लोगों की मौत होती है।

भारत में दिल और सांस की बीमारियों से लाखों लोगों की मौत

आंकड़ों के अनुसार भारत में दिल और सांस की बीमारियों से होने वाली मौतों के अलावा हर दिन लगभग 2,000 लोग डायरिया से और 1,200 से अधिक लोग तपेदिक से मरते हैं। भारत में बीमारियों के अलावा यातायात दुर्घटनाओं में भी रोजाना 500 लोग मारे जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार स्ट्रोक के कारण हर दिन दुनिया भर में करीब 16,000 लोगों की मौत होती है। आंकड़ों से यह भी पता चला है कि अस्थमा और नवजातों में जन्म संबंधी विकारों के साथ हृदय, श्वसन, डायरिया और गुर्दे की बीमारियों से दुनिया भर में हर साल लाखों लोगों की मौत होती है।

कोरोना से इसलिए ज्यादा डरी हुई है दुनिया

एक अनुभवी चिकित्सक के अनुसार स्वाइन फ्लू एक दशक पहले दहशत का कारण था, लेकिन अब शायद ही इसका कभी उल्लेख होता है। इसके बावजूद भारत में स्वाइन फ्लू से हर साल एक हजार से अधिक लोगों की मौत होती है। इसके बावजूद दुनिया कोरोना से इसलिए ज्यादा डरी हुई है क्योंकि यह प्रचार हो गया है कि कोरोना वायरस का अभी तक कोई इलाज नहीं है। हवा से फैलने वाली तपेदिक जैसी बीमारी भी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती है जबकि इसका इलाज है। तपेदिक से भारत में प्रतिवर्ष करीब 4.5 लाख लोगों की मौत होती है। चिकित्सक ने कहा कि इनमें से किसी भी कारण से लोगों या सरकार को कोरोना की नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस वायरस की संक्रामकता का पता इसी से चलता है कि इसने लगभग पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है। अगर इसके खिलाफ हर मोर्चे पर नहीं लड़ा गया तो यह एक वैश्विक तबाही बन सकता है।

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देश में खुलेंगे 732 नए मेडिकल कॉलेज, दर्जनों विश्वविद्यालय!

Education Budget 2020:

बजट में शिक्षा के क्षेत्र के लिए 99,300 करोड़ रुपये और कौशल विकास के लिए 3,000 करोड़ रुपये आवंटित का प्रस्ताव है। नई शिक्षा नीति, नैशनल पुलिस यूनिवर्सिटी, डिग्री लेवल ऑनलाइन स्कीम, नेशनल फॉरेंसिक यूनिवर्सिटी और मेडिकल कॉलेजों के निर्माण का प्रस्ताव किया गया है।

बजट में स्किल इंडिया प्रोग्राम के लिए 3,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। 150 उच्च शिक्षण संस्थान मार्च 2021 से शुरू हो जाएंगे। जल्द नई शिक्षा नीति की घोषणा की जाएगी। देश में एक राष्ट्रीय पुलिस विश्वविद्यालय या नेशनल पुलिस यूनिवर्सिटी का प्रस्ताव है। यहां पुलिसिंग से संबंधित सीखने और काम करने से संबंधित अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। पुलिसिंग साइंस, फॉरेंसिक साइंस, साइबर फॉरेंसिक, क्रिमिनॉलजी, क्रिमिनल जस्टिस, रिस्क मैनेजमेंट और अन्य संबंधित क्षेत्रों की स्टडी कराई जाएगा। एक नेेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी और राष्ट्रीय न्यायिक विज्ञान विश्वविद्यालय बनाने का भी प्रस्ताव है।

डॉक्टरों की भारी कमी से निपटने के लिए हर जिला अस्पताल के साथ मेडिकल कॉलेज बनेगा।  भारत में हर 10,189 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 1,000 मरीजों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। देश में करीब 6,00,000 डॉक्टरों की कमी है। नर्स और मरीज का अनुपात 1:483 है। देश करीब 20 लाख नर्सों की कमी का सामना कर रहा है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए डिग्री लेवल ऑनलाइन स्कीम शुरू की जाएगी। दुनिया के छात्रों को भारत में पढ़ने के लिए सुविधाएं दी जाएंगी और भारत के छात्रों को एशिया,अफ्रीका के देशों में भेजा जाएगा

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भारत को मिला ‘सुपरबग हॉटस्पॉट’ का खिताब, दुनिया के सिर्फ चार देशों के सिर पर है यह ताज

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अध्ययन में नकली दवाओं का बढ़ा हुआ आंकड़ा सामने आया है। लेकिन ऐसे अध्ययनों को भारतीय अधिकारियों ने खारिज कर दिया है। जरा नकली दवा के दुष्परिणामों के बारे में सोचिए। नकली दवाओं पर असली दवा का लेबल चिपका होता है लेकिन उसमें कारगर अवयवों की मात्रा बहुत कम होती है।

जब ऐसी दवा एंटीबायोटिक हो तो फिर जीवाणुओं के उत्परिवर्तन के संदर्भ में परिणाम काफी गंभीर होते हैं। भारत के ‘सुपरबग हॉटस्पॉट’ होने के पीछे यह भी एक कारण है। डॉक्टर एंटी-बायोटिक दवाएं बार-बार लिखते हैं और अक्सर वे दोयम दर्जे की होती हैं।
एक विशेषज्ञ समिति औषधि मूल्य नियामक से यह अनुशंसा करने वाली है कि उसे बिना ब्रांड वाली जेनेरिक औषधियों को दायरे में लेते हुए एंटीबायोटिक औषधियों की कीमतों पर लगी सीमा को तार्किक बनाना चाहिए। फिलहाल ब्रांडेड एंटीबायोटिक औषधियां मसलन ऑगमेंटिन आदि पर स्टॉकिस्ट के लिए मार्जिन की सीमा 8 फीसदी और खुदरा कारोबारियों के लिए 16 फीसदी है। जबकि इस औषधि का थोक मूल्य नियामक तय करता है। यदि राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण राजी हो जाता है तो जेनेरिक एंटीबायोटिक के लिए भी समान नियमन जारी किए जाएंगे। अटकलें हैं कि सबसे अधिक प्रभाव अस्पतालों के मार्जिन पर पड़ेगा।

कीमतों पर किसी भी तरह की सीमा आरोपित करने का असर आपूर्ति पर पड़ता है। एंटीबायोटिक जैसी दवाओं की आपूर्ति प्रभावित होना कई तरह से नुकसानदेह है। पहली बात, मूल्य नियंत्रण के अधीन खरीदी गई औषधि की कमी आम हो सकती है। यदि कीमतों में ज्यादा कटौती हुई तो दवाओं की राशनिंग हो सकती है। संसाधनों का स्थानांतरण अधिक मुनाफे वाली दवाओं के उत्पादन में हो सकता है जिनकी कीमत पर सीमा न लगी हो। कई कंपनियां चुनिंदा दवाओं को बनाना बंद कर सकती हैं। अन्य कंपनियां चिकित्सकों या अस्पतालों से मिलकर वे दवाएं लिखवाना शुरू कर सकती हैं जो तय कीमत की सीमा से परे हों। ब्रांडेड और गैर ब्रांडेड जेनेरिक औषधियों के साथ ऐसा हो भी रहा है। आपूर्ति संबंधी प्रतिक्रिया का असर गुणवत्ता पर पड़ सकता है। औषधि निर्माता कटौती करेंगे और पर्याप्त नियामकीय निगरानी के वे खराब गुणवत्ता वाली औषधियां बना सकते हैं। चिकित्सकों के गलत पर्चे पहले ही समस्या बने हुए थे और मूल्य सीमा ने हालत और खराब कर दी है। इंडियन बिजनेस स्कूल के शोधकर्ताओं ने टाइप 2 डाइबिटीज के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा मेटफॉर्मिन पर मूल्य सीमा लागू करने के आपूर्ति एवं मांग पर पडऩे वाले असर का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि इसका असर स्पष्ट है। इस दवा की कीमत की सीमा तय किए जाने के बाद विभिन्न कंपनियां आपस में मिलीभगत कर मेटफॉर्मिन के बाजार पर कब्जा बरकरार रखने लगीं।

कुल मिलाकर शोध और अध्ययन से यही साबित हुआ है कि देश में औषधि मूल्य नियंत्रण का असर नकारात्मक ही रहा है। दवाएं कुछ मरीजों की पहुंच से दूर हो जाएंगी। दवाओं तक बेहतर पहुंच वाले अमीर उपभोक्ता दवाएं आसानी से खरीद सकते हैं। इससे गलत पर्चों की आशंका बढ़ती है। कुछ मरीज इनका दुरुपयोग कर सकते हैं। एंटीबायोटिक औषधियों के साथ ऐसे पर्चे खतरनाक हो सकते हैं क्योंकि बिना जरूरत के दवा लिखी जा सकती है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध के मामले में हमारी हालत दुनिया में सबसे बुरी है। खराब दवाओं के कारण हमारे यहां जन स्वास्थ्य संकट में है। अब देश सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की ओर बढ़ रहा है तो हमें दवाओं के मूल्य पर मनमाने नियंत्रण से बचना चाहिए।

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संरा एजेंसियों ने लागु किया नया कार्यकर्म,बच्चो के खिलाफ हिंसा रोकना

नोम पेन्ह। विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्लयूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल आपात राहत कोष परिषद(यूूूनीसेफ) ने विश्व में बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसात्मक घटनओं पर रोेक लगाने के लिए सात सूत्रीय कार्यक्रम( सेवन स्ट्रेटिजीज फाॅर एंडिंग वायलेंंस अगेंस्ट चिल्डन) इंस्पायर की शुरूआत पर सहमति जताई है।

एशिया और प्रशांत क्षेत्र के 21 देेशों के प्रतिनिधि इन दिनों यहां एक कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे हैं जिसका मकसद बच्चोंं के खिलाफ होने वाली हिंसात्मक घटनाओं पर रोक लगाने की दिशा में कदम उठाना है। यह कार्यक्रम 31 अक्टूबर से एक नवंबर तक है। एक अनुमान के मुताबिक विश्व में कम से कम एक अरब बच्चे हर साल किसी न किसी रूप में हिंसा का सामना कर रहे हैं अौर एशिया में पिछलेे वर्ष 50 फीसदी बच्चों को हिंसात्मक घटनाओं का सामना करना पड़ा था। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने वर्ष 2030 तक बच्चों के खिलाफ हिंसा को रोकने की प्रतिबद्धता जताई है और यह सतत विकास के उद्देश्यों को हासिल करने की दिशा में एक प्राथमिकता तय की गई है। इसे हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की दस एजेंसियाें ने मिलकर काम करने पर सहमति जताई है।

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शराब के सेवन से साल में 30 लाख लोगों की मौत

कोलकाता। विश्वभर में करीब 23 करोड़ 70 लाख पुरुष और चार करोड़ 60 लाख महिलाएं शराब के कारण होने वाली बीमरियों की चपेट में आती हैं और इसकी वजह से हर साल 30 लाख लोगों की मौत होती है। धनी देशों में शराब का सेवन अधिक हो रहा है।दुनिया में हर 20 में से एक मौत शराब की वजह से होती है।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ ) ने कल 2018 की स्वास्थ्य रिपार्ट जारी की जिसमें कहा गया है कि शराब की वजह से पुरुषों की सर्वाधिक मौत होती है। वर्ष 2016 में इसकी वजह से 30 लाख लोगों की जान गयी है। संगठन ने देशों से शराब के उपयोग पर नियंत्रण लगाने के उपयों के बारे में जानकारी मांगी है।

डब्ल्यू एच ओ के महानिदेशक डाॅ.टेड्रोस अधानोम गेबेरियस कहा,“ स्वस्थ समाज के विकास के लिए इस गंभीर खतरे के खिलाफ बड़े कदम उठाने का समय आ गया है।”रिपोर्ट के मुताबिक प्रतिवर्ष शराब के सेवन से होने वाली कुल मौतों में 28 प्रतिशत शराब के उपयोग से संबंधित घटनाओं ,जैसे नशे में वाहन चलाना एवं घर में मारपीट ,स्वयं को नुकसान पहुंचाने आदि से हाेती हैं, 21 प्रतिशत पाचन शक्ति में खराबी आने के कारण ,19 प्रतिशत दिल से संबंधी बीमारियों की वजह से और शेष मौतें कैंसर, खतरनाक संक्रमण, मानसिक बीमारियों एवं अन्य स्वास्थ्य कारणों से हाेती हैं।

डॉ़ गेबेरियस ने कहा कि शराब के अत्यधिक उपयोग से ने केवल इसका सेवन करने वाला व्यक्ति बल्कि उसका परिवार भी भारी समस्याओं का सामना करता है।उन्होंने कहा,“ शराब के सेवन से बड़ी संख्या में लोग और उनके परिवार के सदस्य परेशानियों का सामना करते हैं। शराब के अत्यधिक सेवन से बड़ी संख्या में लोग कैंसर और पक्षाघात की चपेट में आ रहे हैं। इसके अलावा इसके कारण मानसिक हालत बिगड़ने पर समाज में हिंसक घटनाओं में भी बढ़ोतरी हो रही है।

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दूषित पानी के कारण रोजाना 14 लोगों की हैजे के कारण मौत : डब्ल्यूएचओ

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक यूरोप में लाखों लोग दूषित पानी पीते हैं। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार अपर्याप्त स्वच्छता और दूषित पानी के कारण रोजाना 14 लोगों की हैजे के कारण मौत हो जाती है।

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डब्ल्यूएचओ ने यहां एक वक्तव्य जारी कर बताया कि यूरोप के विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के घरों में पीने का स्वच्छ एवं सुरक्षित पानी उपलब्ध नहीं है।  यूरोप में पांच करोड़ 70 लाख लोगों के घरों में पाइप के जरिये उपलब्ध होने वाले पानी की सुविधा नहीं है। इसके अलावा दो करोड़ 10 लाख लोगों को अभी तक मूलभूत पेयजल की सुविधा भी नहीं है। इसके कारण लोग असुरक्षित कुओं के अलावा झरनों से पानी लेते हैं। इसके अलावा लोग भू-जल का उपभोग भी करते हैं, अथवा इन्हें पानी लेने के लिये काफी दूर भी जाना पड़ता है। यूरोप में पेयजल की मूलभूत सुविधा से वंचित तीन चौथाई लोग ग्रामीण इलाकों में रहते हैं।

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उल्लेखनीय है कि डब्ल्यूएचओ ने पेयजल की गुणवत्ता को लेकर स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देश जारी किये हुये हैं। डब्ल्यूएचओ जर्मनी केे बॉन शहर में स्थित यूरोपियन सेंटर फॉर इनवारेनमेंट एण्ड हेल्थ(ईसीईएच) के जरिये यूरोपीय देशों में इन दिशा-निर्देशों को पालन कराने का कार्य करती है।

(इस खबर को मोबाइल पे न्यूज संपादकीय टीम ने संपादित नहीं किया है। यह एजेंसी से सीधे प्रकाशित की गई है।)
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