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महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमितों की संख्या 50000 के पार

मुंबई । महाराष्ट्र में वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) ने रविवार को सबसे अधिक कहर बरपाया और रिकॉर्ड तीन हजार से अधिक नये मामलों से कुल संक्रमितों की संख्या 50 हजार को पार कर गई जबकि 58 मरीजों की और मृत्यु से कोरोना वायरस 1635 लोगों की जान ले चुका है।

राज्य के स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से आज जारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले 24 घंटों में संक्रमण के रिकॉर्ड 3041 मामले आए और कुल संक्रमितों की संख्या 50 हजार 231 पर पहुंच गई।इस दौरान 58 मरीजों की मृत्यु संक्रमण से 1635 की यह वायरस जान ले चुका है।महाराष्ट्र में इस अवधि में 1196 लोग स्वस्थ भी हुए और 14600 मरीज ठीक हो चुके हैं। राज्य में 33 हजार 988 संक्रमण मामले सक्रिय हैं।

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देश में कोरोना के मामले तीसरे दिन भी छह हजार से अधिक

नयी दिल्ली । देश में लगातार तीसरे दिन भी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस संक्रमण के छह हजार से अधिक मामले सामने आने से कुल संक्रमितों की संख्या 1,31,868 पर पहुंच गयी है हालांकि राहत की बात यह है कि देश में 54 हजार से अधिक लोगों ने इस संक्रमण से निजात भी पायी।

केन्द्रीय स्वास्थ्य एवंकी ओर से रविवार सुबह जारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 24 घंटों में कोरोना संक्रमण के अब तक के सर्वाधिक 6767 नये मामले सामने आये जिससे कुल संक्रमितों की संख्या 1,31,868 पर पहुंच गयी। देश में कुल सक्रिय मामले 73560 हैं। इससे एक दिन पहले 6654 नये मामले सामने आये थे।

देश में कोविड-19 संक्रमण से पिछले 24 घंटों में 147 लोगों की मौत होने से मृतकों की संख्या 3,867 हो गयी। शनिवार की तुलना में रविवार को मृतकों की संख्या 10 बढ़ गयी है। शनिवार के आंकड़ों के मुताबिक एक दिन में कोविड-19 से 137 लोगों की मौत हुई थी। संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच पिछले 24 घंटों में इस महामारी से 2657 लोग मुक्त हुए हैं जिससे स्वस्थ हुए लोगों की कुल संख्या 54,441 हो गयी है।देश में कोरोना से सबसे अधिक महाराष्ट्र प्रभावित हुआ है और कुल संक्रमण के मामलों में एक तिहाई से अधिक हिस्सा यहीं का है। महाराष्ट्र में पिछले 24 घंटों में 2608 नये मामले सामने आये हैं , जिसके बाद यहां कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 47190 हो गयी है तथा कुल 1577 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 13404 लोग इसके संक्रमण से ठीक भी हुए हैं।

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मधुमेह रोगियों को पैर और तलवे की झनझनाहट से राहत दिलाता है बेर

Plum relieves diabetics from tingling of feet: बेर के पेड़ शुष्क और अर्द्धशुष्क इलाकों में पाए जाते हैं। बेर का फल हरे रंग का होता है और पकने पर लाल हो जाता है। बेर पकने का समय दिसंबर से मार्च तक होता है। यह मुख्यतः शुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। इसे तमिल में नरी एलान्धई और हिंदी में झरबेरी कहा जाता है। बेर की दोनों प्रजातियां दक्षिण एशियाई देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल-के साथ ही अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भी पाई जाती हैं। भारत में यह हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में मिलते हैं। बेर का पेड़ मंदिरों में लगाए जाने वाले महत्वपूर्ण पेड़ों में से एक है। बेर का फल भगवान शिव को अर्पण किया जाता है और महाशिवरात्रि के समय इसे बेल के समान ही महत्त्व दिया जाता है।

 

बेर में अनेक औषधीय तत्व

Plum relieves diabetics from tingling of feet: यह फल विटामिन और खनिजों से लबरेज है। इसमें विटामिन के, कैल्शियम, मैग्नीशियम प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। बेर में कुछ जैविक अम्ल भी पाए जाते हैं, जैसे-सक्सीनिक और टार्टरिक अम्ल। बेर में अनेक प्रकार के औषधीय तत्व पाए जाते हैं, जिसकी पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधान भी करते हैं। एक शोध इसके कैंसर-रोधी गुणों की पुष्टि करता है। बेर के गूदे का सेवन मधुमेह की वजह से होने वाले तंत्रिका क्षरण से बचाव करता है। इस बीमारी में पैर और तलवे की धमनियों में तेज दर्द होता है। बेर के इस गुण की पुष्टि इंडियन जर्नल ऑफ बेसिक मेडिकल साइंसेस में प्रकाशित शोध में की गई है।

 

चेचक और खसरे के उपचार में लाभकारी

Plum relieves diabetics from tingling of feet: बेर के पेड़ की छाल और पत्ते का इस्तेमाल चेचक और खसरे के उपचार में लाभकारी है। एक अध्ययन के अनुसार, बांग्लादेश के पारंपरिक वैद्य बेर के पत्तों और छाल को उबालकर उस पानी को पीड़ित व्यक्तियों पर छिड़कते हैं। तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले के पारंपरिक वैद्य भी बेर के पत्तों और छाल को उबालकर और उस पानी को नहाने के पानी में मिलाकर स्नान करने की सलाह देते हैं। इससे बदन दर्द में आराम मिलता है।

दस्त और हैजा के उपचार में सक्षम

Plum relieves diabetics from tingling of feet: एक शोध के अनुसार, इस फल को सुखाकर और पीसकर भी खाया जाता है। बेर के पेड़ की कोंपलों को छांव में सुखाकर इसका पाउडर बनाया जाता है। इस पाउडर को पानी में घोलकर बने मिश्रण का उपयोग विटामिन सी कमी से होने वाले रोग स्कर्वी के उपचार के लिए किया जाता है। एक अध्ययन बताता है कि बेर के पेड़ की छाल का पाउडर घाव के उपचार में कारगर है। बेर के पेड़ की जड़ से बना घोल दस्त और हैजा के उपचार में सक्षम है।

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मोदी सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा ​ये नया फंदा, इस बार बचना मुश्किल

सुप्रीम कोर्ट से एक के बाद एक आ रहे फैसलों से और ताकतवर हुई मोदी सरकार के लिए ये नया फंदा टेढ़ी खीर साबित होगा क्योंकि इस बार विपक्षी दलों की तैयारी उसे पूरी तरह घेर लेने की है। अर्थव्यवस्था में मंदी, महाराष्ट्र के घटनाक्रम और जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को खत्म करने तथा किसानों के मुद्दे पर विपक्षी दलों के कड़े तेवरों को देखते हुए आगामी शीतकालीन सत्र के हंगामेदार होने की संभावना है और इसे सुचारू ढंग से चलाना सरकार के लिए टेढी खीर होगा।

शीतकालीन सत्र सोमवार से शुरू होगा और 13 दिसम्बर तक चलेगा। मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद यह संसद का दूसरा सत्र होगा। जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त किये जाने और इसका दो केन्द्र शासित प्रदेशों में विभाजन किये जाने के बाद भी संसद का सत्र पहली बार बुलाया गया है। सरकार ने इससे संबंधित विधेयक सत्र के अंतिम दिनों में पारित कराये थे और विपक्ष विरोध के बावजूद इस मुद्दे पर सरकार को घेरने में विफल रहा था। इस बार वह इस मुद्दे को सत्र के दौरान जोर-शोर से उठाने की पूरी कोशिश करेगा।
राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने सत्र के दौरान सुचारू कामकाज के लिए सभी विपक्षी दलों के साथ सत्र शुरू होने से एक दिन पहले रविवार को अपने निवास पर बैठक बुलायी है। बैठक में वह सभी दलों के नेताओं से पिछले सत्र की तरह विधायी कामकाज में सहयोग की अपील के साथ साथ उनके सुझाव भी मांगेगे।
लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के साथ सत्ता में वापसी के बाद पिछले संसद सत्र में रिकार्डतोड़ विधायी कामकाज से उत्साहित मोदी सरकार एक बार फिर लंबित विधेयकों तथा नये विधेयकों के भारी भरकम एजेन्डे के साथ संसद सत्र की रणनीति बनाने में जुटी है। उधर सरकार कराधान कानून (संशोधन)अध्यादेश 2019 और देश में ई सिगरेट तथा ई हुक्का पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित अध्यादेश की जगह विधेयक लेकर आयेगी। इसके अलावा पिछले सत्र में लंबित रहे विधेयकों को भी पारित कराने के लिए सरकार कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के फैसले पर भी संसद की मुहर लगेगी।

अयोध्या में विवादित जमीन पर राममंदिर निर्माण के लिए एक न्यास का गठन करने के उच्चतम न्यायालय के आदेश के मद्देनजर सरकार इसी सत्र में एक विधेयक भी ला सकती है। विधेयक में सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि के अधिग्रहण का भी प्रावधान किये जाने की संभावना है।
राफेल लड़ाकू विमान सौदा मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा पुनर्विचार याचिका को खारिज किये जाने से भी सरकार को राहत मिली है और अब विपक्ष इस मामले को संसद में उठाने से पहले सोचेेगा। न्यायालय ने उसके पहले के फैसले के खिलाफ सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। न्यायालय ने अपने फैसले में सौदे की स्वतंत्र जांच कराने की मांग ठुकरा दी थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पिछले लोकसभा चुनाव में इस मामले को पूरे जोर शाेर से उठाया था।

कांग्रेस ने संसद सत्र शुरू होने से लगभग दो सप्ताह पहले ही 5 नवम्बर को विपक्षी दलों की बैठक बुलाकर सरकार को घेरने की व्यूहरचना पर काम शुरू कर दिया था। बैठक में मौजूद 13 विपक्षी दलों ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत और किसानों के मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठा रही है और इसे देखते हुए विपक्ष सरकार को संसद से सड़क तक कठघरे में खड़ा करेगा।
महाराष्ट्र के घटनाक्रम की छाया भी संसद सत्र पर दिखायी देगी। तीन दशकों से भाजपा की मजबूत सहयोगी रही शिव सेना ने महाराष्ट्र में सरकार के गठन के दौरान पनपी तल्खी के बाद उससे नाता तोड़ लिया है। भाजपा को इस बार संसद में विभिन्न मुद्दों पर शिव सेना की नाराजगी से भी दो- चार होना पड़ेगा। उधर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने भी पार्टी महासचिवों के साथ बैठक की है। सूत्रों के अनुसार बैठक में आगामी संसद सत्र के दौरान पार्टी की रणनीति पर भी चर्चा की गयी।

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राष्ट्रपति शासन की धमकी से बिफरी शिवसेना, बोली—क्या राष्ट्रपति आपकी जेब में है

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के इस बयान पर महाराष्ट्र में सात नवंबर तक नयी सरकार का गठन नहीं होता है तो वहां राष्ट्रपति शासन लग सकता है, पर जोरदार प्रतिक्रिया करते हुए शिवसेना ने शनिवार को कहा कि क्या राष्ट्रपति आपकी जेब में है और राष्ट्रपति शासन की धमकी महाराष्ट्र की जनता के जनादेश का अपमान है।

शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में एक संपादकीय में ‘क्या राष्ट्रपति आपकी जेब में है? महाराष्ट्र का अपमान’ में कहा कि भाजपा के मंत्री सुधीर मुनगंतीवार का यह धमकी भरा बयान “असंवैधानिक और लोकतंत्र के खिलाफ है।”
शिवसेना ने कहा ‘‘यह मुगल काल में जारी किए जाने वाले फरमानों जैसा है और कानून तथा संविधान किसी के भी गुलाम नहीं है। महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक स्थिति के लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं और राज्य की जनता भी यह जानती है। हमें पता है कि कानून और संविधान क्या होता है।”

संपादकीय में कहा ‘‘श्री मुनगंतीवार के इस तरह के बयान इस बात के सबूत है कि भाजपा और उनके मन में कितनी कड़वाहट पनप रही है। क्या राष्ट्रपति भाजपा के नियंत्रण में है अथवा राष्ट्रपति की मुहर भाजपा कार्यालय में है कि उसका इस्तेमाल राज्य में सरकार नहीं बनने की दिशा में किया जाएगा और महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।”

गौरतलब है कि कल पूर्व मंत्री और भाजपा नेता मुनगंतीवार ने एक टेलीविजन चैनल में कहा था कि अगर महाराष्ट्र में सात नवंबर तक सरकार नहीं बनती है तो वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है और और सरकार नहीं बनने देने की दिशा में शिवसेना की वह मांग है जिसमें वह ढाई वर्षों के लिए अपना मुख्यमंंत्री बनाना चाहती है।
शिवसेना ने संपादकीय में कहा “सवाल यह है कि आखिर महाराष्ट्र में सरकार क्यों नहीं बन रही है और इसका जवाब कौन देगा? भाजपा नेता की इस घोषणा के लिए महाराष्ट्र की जनता को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए और क्या धमकी मुगल काल के धमकी भरे फरमानों जैसी नहीं है।”

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अगर ये कम्पनी ऐसा नहीं करती तो महाराष्ट्र में तीन चौथाई बहुमत से जीत जाती भाजपा!

दो राज्यों में हुए चुनाव के बाद देश में फिर इस बात की चर्चा जोरों पर है कि अगर पारले कम्पनी ने कर्मचारियों की छंटनी नहीं की होती तो महाराष्ट्र में अकेली भाजपा को बहुमत मिलना ​तय था। हरियाणा में भी नौ​करियां जाने के असर से ही भाजपा 41 सीट पर सिमट गई। हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में महाराष्ट्र में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महज 11 महीने पहले बनी दुष्यंत चौटाला की अगुवाई वाली जननायक जनता पार्टी ने उम्दा प्रदर्शन किया। लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को जैसा प्रचंड बहुमत मिला था, उन्हें वैसी ही अपेक्षाएं इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी थीं।
लेकिन इन चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों के प्रदर्शन ने भाजपा को सीधी चुनौती पेश की है। हालांकि ऐसा कहना अभी सही नहीं होगा क्योंकि कई राज्यों में अभी क्षेत्रीय पार्टियां नहीं हैं। दिसंबर 2018 में तीन राज्यों में जो चुनाव हुए थे उस समय बीजेपी के ख़िलाफ़ कांग्रेस को समर्थन मिला था। जहां जहां बीजेपी की ज़मीन कमज़ोर है, वहां क्षेत्रीय पार्टियां ही उसका फायदा उठाकर चुनौती पेश करती हैं। ऐसे में यह कह सकते हैं कि जहां कांग्रेस कमज़ोर पड़ गई है या न के बराबर है, वहां बीजेपी को टक्कर देने के लिए क्षेत्रीय पार्टियां ही उभर कर सामने आती हैं क्योंकि राजनीति में बहुत दिनों तक वैक्यूम नहीं रहता है। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम में क्षेत्रीय दलों के बेहतर प्रदर्शन करने के बाद भी नहीं लगता कि आगामी दिनों में क्षेत्रीय दल मोदी के प्रभुत्व को रोकने में सफल हो सकते हैं।

दरअसल क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व राज्यों के चुनाव तक ही सीमित रहा है। मोदी राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं। ऐसे में हो सकता है कि राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों से आपको समझौता करना पड़े लेकिन केन्द्र की राजनीति में उनका (क्षेत्रीय पार्टियों का) प्रभाव गौण ही रहेगा।
दिल्ली और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं, इसके बाद अगले साल बिहार में चुनाव होंगे। ​नज़रें ​बिहार की ओर लगी है। वहां किस तरह के समीकरण उभर कर सामने आते हैं क्योंकि नीतीश कुमार की जेडीयू भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पार्टी है। बीजेपी को चुनौती देने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को कहीं ना कहीं कांग्रेस के साथ आना होगा और यह संभव नहीं लगता। तीसरे मोर्चे के राह में भी कई रोडे हैंं। समस्या यह है कि जो क्षेत्रीय दल अपने अपने क्षेत्र में महत्व और प्रभाव रखते हैं, जहां उनका जनाधार होता है, उनके पास नेतृत्व भी होता है, ऐसे में जब वह बीजेपी से गठबंधन करती हैं तो फिर तीसरे मोर्चे का वि​कल्प बहुत कम बच जाता हैं फिर कुछ दल साथ में आकर तीसरा मोर्चा बना लेते हैं लेकिन उससे वो बात नहीं बन पाती हैं समस्या यह है कि साथ आने और एक दो चुनाव साथ लड़ने के बाद वो फिर अलग अलग हो जाते हैं और बीजेपी या कांग्रेस के साथ समझौता कर लेते हैंं।

अगर झारखंड में झामुमो या झाविमो जैसी क्षे​त्रीय पार्टियां मिल कर बीजेपी को चुनाव हरा देती हैं तो तीसरे मोर्चा का विकल्प ज़्यादा मजबूत हो जाएगा। लेकिन तीसरे मोर्चे में सपा और बसपा का रहना बहुत ज़रूरी है। लेकिन इस साल लोकसभा चुनाव में इन दोनों दलों ने गठबंधन किया और बाद में तोड़ लिया। ऐसे में अगली बार उनका साथ आना नामुमकिन लगता है। जब बसपा तीसरे मोर्चे से बाहर रहेगी तब सपा की संभावना कमज़ोर हो जाती है और बीजेपी को इसका लाभ मिलता है।
लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी को महाराष्ट्र और हरियाणा में अच्छी सफलता हासिल हुई थी। लिहाजा इन विधानसभा चुनावों में ऐसा लगा रहा था कि मोदी का जादू एक बार फिर चलेगा और बीजेपी दोनों राज्यों में प्रचंड जीत हासिल करेगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगहों पर आर्थिक सुस्ती का असर हुआ है। महाराष्ट्र में पारले कंपनी से हज़ारों लोगों को निकाल दिया गया है। कई छोटे-छोटे उद्योग बंद हुए हैं। सिंगल यूज़ प्लास्टि​क पर प्रतिबंध लगने से असंगठित रिटेलर और इसके उत्पादन में लगे लोगों को लग रहा है कि खाने के लाले पड़ जाएंगे। महाराष्ट्र और गुजरात में इस तरह के काम ज़्यादा होते हैं।
हरियाणा और महाराष्ट्र में जब चुनाव हो रहा था तो ऐसा कहा जा रहा था कि ये दिलचस्प चुनाव नहीं हैं क्योंकि भाजपा एकतरफा जीत जाएगी। हालांकि जब परिणाम सामने आया तब चुनावी जानकार भी चौंक गए।

 

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घोड़े जैसी ताकत पाना चाहते हैं तो एक माह तक मुझे खा लीजिए क्योंकि मैं कड़कनाथ हूं

यौवन शक्ति को घोड़े के बराबर करना चाहते हैं तो मुझे एक माह तक खा लीजिए। अगर आपने सही तरीके से खा लिया तो आप न सिर्फ घोड़े को दौड़ में हरा सकते हैं बल्कि उसके जैसा बलिष्ठ शरीर भी पा सकते हैं।

असल में कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, रक्तचाप और टीबी जैसी बीमारियों की रोकथाम में मददगार ‘कड़कनाथ’ एक समय अस्तित्व का संकट झेल रहा था लेकिन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और अन्य संस्थानों की मदद से अब यह देश के कोने कोने में ‘बांग’ दे रहा है। रोग प्रतिरोधक क्षमता से भरपूर कड़कनाथ प्रजाति का मुर्गा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में पाया जाता है। यौवन शक्ति बढ़ाने में कारगर होने के कारण लोगों में इसकी भारी मांग से पिछले वर्षों के दौरान इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया जिससे यह प्रजाति विलुप्त होने के कागार पर पहुंच गयी थी। समय रहते भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के हस्तक्षेप से अब यह न केवल तीन राज्यों बल्कि पूरे देश में किसानों की आय बढ़ाने में बहुत मददगार साबित हो रहा है।
उप महानिदेशक (कृषि विस्तार) ए.के. सिंह ने बताया कि सिर से नख तक बिल्कुल काले रंग का देशी कड़कनाथ में जलवायु परिवर्तन के इस दौर में भी अत्यधिक गर्मी और सर्दी सहने की क्षमता है और यह विपरीत परिस्थिति में भी जीवित रहता है। इसका न केवल खून काला होता है बल्कि इसका मांस भी काला है जो बेहद नर्म और स्वादिष्ट होता है। इसके मांस में प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक होती है और हृदय रोग के लिए घातक माने जाने वाले काेलेस्ट्रोल की मात्रा इसमें बहुत कम होती है। इसमें नाम मात्र की वसा है।

डॉ. सिंह ने बताया कि प्रोटीन कोशिका का एक महत्वपूर्ण घटक है जो शरीर के ऊतकों के निर्माण और मरम्मत में मददगार है। एंजाइम, हार्मोन और शरीर के अन्य रसायनों के निर्माण में प्रोटीन का उपयोग होता है। प्रोटीन हड्डियों, मांसपेशियों, त्वचा और रक्त के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे शरीर में हानिकारक चर्बी और काेलेस्ट्रोल की मात्रा कम होती है। उन्होंने बताया कि कड़कनाथ के मांस में पाया जाने वाला स्टीयरिक एसिड खराब काेलेस्ट्रोल को कम करने में मददगार है। इसमें पाया जाने वाला ओलिक एसिड रक्तचाप और काेलेस्ट्रोल कम करने के साथ ही टाइप टू मधुमेह और कैंसर प्रतिरोधक है। इसमें गामा लिनोलेनिक एसिड, अरचिडोनिक एसिड और डोकोसैक्सिनोइक एसिड भी पाया जाता है जो शरीर को कई प्रकार के फायदे पहुंचाता है। डॉ. सिंह ने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, कृषि विज्ञान केन्द्र तथा राज्यों के सहयोग से कड़कनाथ हेचरी की स्थापना की गयी है जहां सालाना 139000 चूजे तैयार हो रहे हैं।
इन चूजों को 20 राज्यों के 117 जिलों में पाला जाता है। इन राज्यों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर आदि शामिल हैं। कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दांतेवाड़ा में सालाना एक लाख चूजे तैयार किये जा रहे हैं। इस राज्य के कांकेड़, बलरामपुर और राजनंदगांव में भी हेचरी की स्थापना की गयी है। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, झाबुआ, धार और ग्वालियर में भी इस प्रकार के केन्द्र हैं।

कड़कनाथ का चूजा छह माह में वयस्क हो जाता है और मुर्गी अंडा देने लगती है। यह मुर्गी साल भर में तीन से चार चरणों में अंडे देती है और यह साल भर में 75 से 90 अंडे दे देती है। इसका एक अंडा स्थानीय स्तर पर 10 रुपये से 50 रुपये में मिलता है जबकि इसका मांस 600 से 1200 रुपये प्रति किलोग्राम बिकता है। किसानों को आम अंडों का मूल्य दो से तीन रुपये और सामान्य मुर्गे का मांस का मूल्य 150 रुपये किलोग्राम मुश्किल से मिलता है।
कड़कनाथ का मूल नाम कालामासी है जिसका अर्थ काले मांस वाला मुर्गा है। इसकी तीन किस्मों में जेट ब्लैक, पेनसिल्ड और गोल्डन कड़कनाथ शामिल हैं। कृषि विस्तार उप महानिदेशक ने बताया कि कड़कनाथ के प्रति लोगों में भारी जागरुकता आयी है जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों से इसके चूजे की भारी मांग आ रही है। कई स्थानों पर कड़कनाथ के पालन से गरीबों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है और वे व्यावसायिक तौर पर वैज्ञानिक ढंग से इसका पालन कर रहे हैं।

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देश के ये पन्द्रह राज्य कर रहे हैं शहीदों का अपमान, संसद की इस फाइल में छुपी हुई है यह सच्चाई

आतंकी वारदातों के साथ ही सीमा पर दुश्मन के हमलों में जान गंवाने वाले सैनिकों की अंतिम यात्रा में नेताओं से लेकर आम आदमी तक गला फाड़ फाड़ कर नारे लगाता है कि जब तक सूरज चांद रहेगा तब ​तक शहीद का नाम रहेगा। सरकारी नेता मसलन प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री तक आगे बढ़कर उन्हें नकद, जमीन, पेट्रोल पम्प समेत अन्य कई सुविधाओं के वादे कर खूब भाषण झाड़ते हैं लेकिन ये हकीकत नहीं है। अंतिम संस्कार होने के साथ ही सब भुला दिया जाता है और सैनिकों के परिवार को पेंशन से लेकर घोषणाओं की नकदी तथा सुविधाएं प्राप्त करने के लिए एडियां रगड़नी पड़ती हैं। 

 

चौंकिए मत यह ऐसी कड़वी सच्चाई है जिससे बहुत कम लोग वाकिफ हैं क्योंकि घोषणाओं को कागज से धरातल तक लाने की जिम्मेदारी सम्भालने वाले राज्यों के सैनिक कल्याण बोर्ड वर्षों से गहरी नींद में सोए हुए हैं। शहीदों के परिवार उनके दफ्तरों के चक्कर लगाते रहते हैं लेकिन उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। रेंगेगी भी कैसे, वे फैसले करने के लिए बैठक ही नहीं करते। 

 

इस वास्तविकता की पोल संसद की रक्षा मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने खोली है। संसदीय समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि 15 राज्यों के सैनिक कल्याण बोर्डों की लम्बे समय से बैठक ही नहीं हुई है। बैठक नहीं होने से इन राज्यों में शहीदों को मिलने वाली सुविधाओं और नकदी पर फैसला ही नहीं हो पाता है। 

 

पन्द्रह राज्यों में सबसे पहला नाम उत्तरप्रदेश का है जिसकी भारतीय सेना में हिस्सेदारी पन्द्रह फीसदी है। इसके अलावा आठ प्रतिशत भागीदारी वाले राजस्थान, महाराष्ट्र और पंजाब के साथ ही ग्यारह अन्य राज्य ऐसे हैं जिनके सैनिक कल्याण बोर्डों ने पिछले कई सालों से बैठक नहीं की है। इस वजह से शहीदों के हजारों मामले अटके पड़े हैं। कई मामलों में तो शहीदों के परिवारों की पेंशन तक अटकी हुई है। संसदीय समिति की यह रिपोर्ट बताती है कि इन पन्द्रह राज्यों को कई बार याद दिलाया गया कि शहीदों के मामलों पर फैसला करें लेकिन वे इस पर ध्यान तक नहीं दे रहे हैं।

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व्हाटसएप के समारोह में सामने आई असलियत, मैसेज पढ़ते समय बुद्धि नहीं लगाई तो बन जाएंगे वज्र मूर्ख

सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर व्हाटसएप के मैसेज को समझने के लिए जो व्यक्ति अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करता, उसे वज्र मूर्ख बनने से कोई नहीं रोक सकता और घीरे-धीरे वह व्यक्ति बुद्धिहीन होता चला जाता है। यह राय जयपुर पुलिस ने व्हाट्एसऐप और डिजिटल एम्पॉवरमेंट फाउंडेशन की ओर से जयपुर में आयोजित सामुदायिक लीडर्स के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम में कही। अगस्त में व्हाट्सऐप और डिजिटल एम्पॉवरमेंट फाउंडेशन ने 10 राज्यों में शैक्षिक कार्यशालाओं की श्रृंखला का शुभारंभ किया। इन कार्यशालाओं में यूज़र्स को इस बारे में शिक्षित किया गया कि मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग किस प्रकार किया जाए। उन्हें भारत में भ्रामक जानकारी की महामारी को रोकने के उपाय बताए गए, जो इस साल की शुरुआत में हिंसा का कारण बनी थी। 

 

व्हाट्सऐप और डीईएफ इस साल मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और राजस्थान में प्रशिक्षणों का आयोजन कर रहे हैं, जिसके बाद तेलंगाना में प्रशिक्षण आयोजित किया जाएगा। इन प्रशिक्षणों का केंद्रण राज्यों में चुनाव और भ्रामक जानकारी के फलस्वरूप इस साल हुई प्रेरित-हिंसा की घटनाओं को रोकने पर है। टीमें मार्च, 2019 तक प्रमुख राज्यों, जैसे पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, महाराष्ट्र, त्रिपुरा और झारखंड में भी पहुंचेंगी। पब्लिक पॉलिसी मैनेजर, व्हाट्सऐप, बेन सपल ने कहा, ”व्हाट्सऐप को राजस्थान में लाखों लोगों को दुनिया में कहीं भी अपने प्रियजनों से स्वतंत्रतापूर्वक कनेक्ट होने में मदद करने पर गर्व है। ये प्रषिक्षण लोगों को इस चुनावी मौसम में सुरक्षित रहने और नुकसानदायक अफवाहों को फैलने से रोकने में मदद करने की हमारी कार्ययोजना के प्रमुख हिस्से हैं। 

 

जयपुर में आयोजित चैथी एजुकेशन वर्कशॉप की अध्यक्षता, रवि गुरिया, डिप्टी प्रोग्राम डायरेक्टर, मीडिया एवं कम्युनिकेशन ने की। तीन हिस्सों में बंटे, तीन घंटे के प्रशिक्षण सत्र ने व्हाट्सऐप यूज़र्स को सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन को संबोधित कर खुद को ‘परिवर्तन के दूत के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित किया और उन्हें झूठी खबरें पहचानने में समर्थ बनाया। इसके अलावा इसने उन्हें अफवाहों और विचारों में अंतर करने में समर्थ बनाया। उनसे झूठी खबरों की घटनाओं का समाधान करने के उपाय साझा किए तथा व्हाट्सऐप पर सुरक्षित रहने के सुझाव दिए। इस करिकुलम में यह भी बताया गया कि ग्राहक संदेह होने पर किस प्रकार फास्ट चेकिंग संस्थानों जैसे एल्टन्यूज़ एवं बूमलाईव से संपर्क कर जानकारी की पुष्टि कर सकते हैं। 120 से अधिक आगंतुकों को संबोधित करते हुए यह प्रशिक्षण स्थानीय शासकीय प्रशासन, कानून प्रवर्तन अधिकारियों, कॉलेज के विद्यार्थियों, एनजीओ एवं अन्य सामुदायिक लीडर्स द्वारा दिया गया, जो अपने समाज, खासकर गांवों एवं अद्र्धशहरी केंद्र के टेक्नॉलॉजिकल सशक्तीकरण के लिए समर्पित हैं। 

 

विनीत कुमार, डिप्टी कमिश्रर ऑफ पुलिस (डीसीपी) क्राइम, जयपुर ने कहा, ”सोशल मीडिया विचार, संदर्भ और भावनाएं साझा करने का ग्लोबल प्लेटफॉर्म बन गया है। इसकी आसान उपलब्धता और व्यापक पहुंच के कारण यह हर व्यक्ति के दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाला उत्प्रेरक बन गया है। इसने कई तरह से लोगों की जिंदगी में सुधार किया है। हालांकि इसकी अपनी एक कमी भी है। यह झूठे प्रचार एवं अफवाहें फैलाने का माध्यम भी बन गया है। यदि व्यक्ति सोशल मीडिया के कंटेंट के बारे में अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर जाँच नहीं करता, तो वास्तविकता समझने की उसकी क्षमता इससे प्रभावित हो सकती है। इसका प्रभाव उनके व्यक्तिगत/व्यवसायिक जीवन तथा उनके आसपास के लोगों पर पड़ता है। इसलिए सोशल मीडिया के कंटेंट की जाँच कर अपनी बुद्धि के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का यह सही समय है। हालांकि यह काम तभी पूरा हो सकता है, जब स्कूली षिक्षा और घर के वातावरण में इसका समावेश किया जाए। लेकिन नकली खबरों एवं भ्रामक जानकारी पर ऐसी कार्यषालाएं इस विशय की जरूरत पर जानकारी प्रदान कर सकती हैं। इसके अलावा व्हाट्सऐप और डीईएफ अपने सामुदायिक इन्फॉर्मेशन रिसोर्स सेंटर (सीआईआरसी) के तहत कार्यशाला आयोजित करेंगे, जिसमें वो भारत के 5 राज्यों के ग्रामीण इलाकों में जमीनी स्तर के समुदायों पर केंद्रित प्रशिक्षण सत्रों का संचालन करेंगे।

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हिकारत से नहीं प्यार से देखिए थाली के बैंगन को

अगर आप बीमार होने से बचने की चाहत रखते हों तो फिर आज से ही उसे अपने भोजन का अहम हिस्सा बना लीजिए। क्योंकि उसी थाली के बैंगन की कृषि वैज्ञानिकों ने एेसी किस्म विकसित की है जो न केवल बीमारियों से बचायेगी बल्कि बुढ़ापे को भी रोकेगी। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा ने बैंगन की एक नयी किस्म पूसा हरा बैंगन-एक का विकास किया है जिसमें भारी मात्रा में क्यूप्रेक, फ्रेक और फिनोर जैसे पोषक तत्व हैं जो इसे एंटीआॅक्सीडेंट बनाते हैं। इसके चलते यह बीमारियों से बचाने और बुढ़ापा रोकने में मददगार है। एंटीआॅक्सीडेंट वह तत्व है जो हमारे शरीर को विषैले पदार्थों से बचाता है और यह ऊर्जा प्रदान करने के साथ ही कई प्रकार की बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करता है। पाचनक्रिया के दौरान शरीर भोजन से अपने लिए पोषक तत्व ले लेता है और उन तत्वों को अलग कर देता है जो नुकसानदेह होते हैं। एंटीआॅक्सीडेंट कैंसर, हृदय रोग, रक्तचाप, अल्जाइमर और दृष्टिहीनता से बचाता है। 

 

 

विषैले पदार्थों के शरीर में इकट्ठा होने से कोशिकाओं के मरने का अनुपात बढ़ जाता है और बुढ़ापा तेजी से प्रभावी होने लगता है लेकिन एंटीआॅक्सीडेंट शरीर में होने से विषैले पदार्थ निकलते रहते हैं और अधिक संख्या में नयी कोशिकाओं का निर्माण होता है जो बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। बैंगन की नयी किस्म शरीर में एंटीआॅक्सीडेंट तत्व को बढ़ाने में सहायक हैं।

संस्थान के सब्जी अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिक तुषार कांति बेहरा ने बताया कि नयी किस्म में पूर्व की किस्मों की तुलना में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है जिसके कारण इसमें कीटनाशकों का कम छिड़काव किया जाता है। इसकी पैदावार काफी अधिक है। इसकी प्रति हेक्टेयर 45 टन तक पैदावर ली जा सकती है। इसके एक फल का औसत वजन 220 ग्राम है।

हरे रंग के अंडाकार गोल बैंगन की यह पहली प्रजाति है जिसकी खेती खरीफ मौसम में उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में की जा सकती है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसे गमले में लगाया जा सकता है। गोल हरे रंग के इसके फल पर हल्के बैंगनी रंग के धब्बे होते हैं और बाह्य दलपूंज कांटे रहित होते हैं ।

डा़ॅ बेहरा ने बताया कि बैंगन की नयी किस्म रोपायी के 55 से 60 दिनों में फलने लगता है। खरीफ मौसम के दौरान बैंगन की इस किस्म की खेती से किसान प्रति हेक्टेयर एक से डेढ़ लाख रुपये तक कमा सकते हैं। इसमें बीमारियां कम लगती हैं जिसके कारण इसमें कीटनाशकों का कम इस्तेमाल किया जाता है।

कुछ लोगों को बैंगन से भले ही एलर्जी हो लेकिन बंगाली संस्कृति से प्रभावित खानपान का यह अभिन्न हिस्सा है। खाने में बैंगन भाजा नहीं हो तो वह अधूरा सा लगता है। इसलिए मेहमानों के आने पर बैंगन भाजा जरूर बनाया जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बैंगन के भर्ते का विशेष प्रचलन है। पंजाबी लोग भी बैंगन का भुना हुआ भर्ता विशेष रुप से तैयार करते हैं। बैंगन के गुदेदार होने और इसमें खास तरह के मसालों के उपयोग से इसका स्वाद बेहद लजीज हो जाता है।

बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक,मध्य प्रदेश तथा आन्ध्र प्रदेश में बैंगन की व्यावसायिक पैमाने पर खेती की जाती है और किसान सालों भर इसकी फसल लेते हैं। खाड़ी तथा कुछ अन्य देशों को बैंगन का निर्यात भी किया जाता है। देश में तीन लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में बैंगन की खेती की जाती है और इसका सालाना करीब 50 लाख टन उत्पादन होता है।