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टेराकोटा के घोड़े और बैल ने यूरोप में झंडे गाड़े, ऊंट और बकरी भी पीछे नहीं

सदियों पुरानी पारंपरिक कला टेराकोटा को जीआई टैग के साथ ही बौद्धिक संपदा अधिकारों के एक घटक का दर्जा मिल गया है। टेराकोटा ऐसी कला है जिसमें कुम्हार हाथ से विभिन्न जानवरों की मूर्ति जैसे कि घोड़े, हाथी, ऊंट, बकरी, बैल आदि बनाते हैं।

टेराकोटा शिल्प को जीआई टैग

टेराकोटा शिल्प को पिछले गुरुवार को जीआई टैग दिया गया था। इसके लिये गोरखपुर के औरंगाबाद गुलेरिया के लक्ष्मी टेराकोटा मूर्तिकला केंद्र ने आवेदन किया था। खासकर सजे-धजे टेराकोटा घोड़े न सिर्फ इन इलाकों की पहचान हैं, बल्कि दुनिया में भी इन्होंने अपनी कला के झंडे गाड़े हैं। कुम्हार चाक पर अलग-अलग हिस्सों को आकार देने के बाद में उन्हें जोड़ कर एक आकृति तैयार करता है। शिल्प कौशल के कुछ प्रमुख उत्पादों में हौदा हाथी, महावतदार घोड़ा, हिरण, ऊँट, पाँच मुँह वाले गणेश, एकल-हाथी की मेज, झाड़ लटकती हुई घंटियाँ आदि हैं। पूरा काम हाथों से किया जाता है। कारीगर प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं। रंग लम्बे समय तक तेज रहता है।

पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकार

स्थानीय कारीगरों द्वारा डिजाइन किए गए टेराकोटा काम की 1,000 से अधिक किस्में हैं। गोरखपुर में शिल्पकार मुख्य रूप से गोरखपुर के चरगवां ब्लॉक के भटहट और पडऱी बाजार, बेलवा रायपुर, जंगल एकला नंबर-1, जंगल एकला नंबर -2, औरंगाबाद, भरवलिया, लंगड़ी गुलेरिया, बुढाडीह, अमवा, एकला आदि गाँवों में बसे हुए हैं। गौरतलब है कि जीआई टैग को औद्योगिक संपत्ति के संरक्षण के लिए पेरिस कन्वेंशन के तहत बौद्धिक संपदा अधिकारों के एक घटक के रूप में शामिल किया गया है।

दार्जिलिंग टी जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई का विनिमय विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं पर समझौते का तहत किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं का भौगोलिक सूचक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 के तहत किया जाता है, जो सितंबर 2003 में लागू हुआ था। वर्ष 2004 में दार्जिलिंग टी जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद है। जीआई का उपयोग कृषि उत्पादों, हस्तशिल्प, औद्योगिक उत्पादों आदि के लिए किया जाता है।

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उतर प्रदेश में बरसात के कारण जानलेवा बीमारियों का बढ़ रहा है प्रकोप

बरसात शुरू होते ही गोरखपुर समेत समूचे उत्तर प्रदेश में जानलेवा बीमारी दिमागी बुखार का प्रकोप बढने लगा है वहीं पूर्वांचल के नामीगिरामी अस्पतालों में शुमार बाबा राघवदास मेडिकल कालेज (बीआरडी) प्रशासन ने दिमागी बुखार के मरीजों की तादाद सार्वजनिक करने से साफ इंकार कर दिया है।

Brain Fever
Brain Fever

इसके पहले बीआरडी प्रशासन नियमित तौर पर दिमागी बुखार से पीडित दाखिल होने वाले मरीजों, मृत्युतथा अन्य स्थानों से आये मरीजों की संख्या का पूरा विवरण स्वास्थ्य विभाग एवं मीडिया को देता था लेकिन पिछले चारदिनों से सूचनाओं का आदान प्रदान बंद कर दिया है जिसके कारण सरकार को भी जानलेवा बीमारी से ग्रसित मरीजों की सही तादाद पता करने में मुश्किल आ रही है।

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पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा आस पास के जिलों, बिहार प्रान्त तथा पडोसी देश नेपाल से काफी संख्या में आने वाले मरीजों के लिए दिमागी बुखार से पीडित लोगों का इलाज गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कालेज में होता है और यहीं से बनायें गये आंकडे का शासन दवा तथा इलाज के लिए बजट उपलब्ध कराता है।

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दिमागी बुखार की सूचनाओं का प्रेषण न होने के कारण असमंजस जैसी स्थिति पैदा हो गयी है। सम्बंध में गोरखपुर में मुख्य चिकित्साधिकारी आर एन तिवारी ने रविवार ‘यूनीवार्ता’ से बातचीत में बताया कि गोरखपुर जिले में पिछले एक जनवरी से 11 जुलाई तक 57 दिमागी बुखार के मरीज भर्ती हुए है और 17 की मृत्यु हुयी है।उन्होंने बताया कि पिछले चार दिनों से दिमागी बुखार के आंकडे उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं इसलिए अभी तक बता पाना सम्भव नहीं है लेकिन आने वाले समय में सूचना उपलब्ध होते ही बताया जायेगा।

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गोरखपुर में 36 इंच के दूल्हा को आखिरकार मिल गयी हमसफर

एक लम्बे समय के इन्तजार के बाद अखिरकार 36 इंच के दुूल्हे को उसकी जीवन की हमसफर मिल गयी।उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में गत सोमवार को हुई अनोखी शादी पूरे शहर में चर्चा का विषय रही।शादी के बाद 36 इंच का दूल्हा एवं 34 इंच की दुल्हन एक-दूसरे के हमसफर बने।शादी में आने वाले लोगों में दूल्‍हा-दुल्‍हन के साथ सेल्‍फी खिंचवाने का जुनून भी खूब दिखाई दिया।इस अनोखी शादी में कई ऐसे लोग भी पहुंचे थे, जिनको न तो वर पक्ष से न्‍योता मिला था और न ही वधू पक्ष से लेकिन, सभी के चेहरे पर खुशी साफ झलकती दिखाई दी।

36-inch groom

गोरखपुर जिले में खजनी क्षेत्र के विशुनपुरा गांव निवासी 42 वर्षीय डाॅ0 सुनील पाठक जो 36 इंच के हैं और संस्कृत से पीएचडी किये हुए हैं।वह छह भाइयों में तीसरे नंबर के हैं।सभी की शादियां हो चुकी हैं।शिक्षा प्राप्त करने के दौरान भी सहपाठियों द्वारा उन्हें कद छोटा होने पर उपहास का विषय बनाया जाता था।सुनील ने अपने छोटे कद की वजह से धीरे-धीरे शादी की उम्मीद छोड़ दी थी।फिर अचानक एक दिन उसके लिए रानीबाग के प्रज्ञा कालोनी निवासी सारिका मिश्रा(32) का रिश्ता आया जो लगभग उसी के जैसी थी।

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सुनील ने झट से शादी के लिए हां कर दीउसने स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की है।बेटी सारिका की उम्र बढ़ने के साथ ही उसके विवाह की चिंता भी घरवालों को सताने लगी थी।डॉ सुनील पाठक का रिश्ता सारिका के लिए वरदान सरीखा रहा।दोनों को एक साथ देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कि दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।बढ़ती उम्र के चलते डॉ0 सुनील ने शादी की उम्‍मीद खो दी थी, लेकिन आखिरकार उसे अपने सपनों की रानी मिल ही गयी।दोनों की शादी गत सोमवार को धूमधाम से हुई।दोनों एक-दूसरे के हो गए।इस मौके पर जुटे परिवारीजन और परिचितों ने वर-वधू को आशीर्वाद देकर उनके सुखद वैवाहिक जीवन की मंगल कामना की।

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वहीं शादी में ऐसे लोग भी जुटे जिन्हें बुलाया नहीं गया था, लेकिन विवाहित जोड़े के साथसेल्फी लेने वालों की भीड़ जुट गयी थी।दूल्हन बनी सारिका इस शादी से काफी खुश है।वहीं शादी से खुश उसके भाई प्रवीण कुमार मिश्र का कहना था कि उन्होंने बहन सारिका के शादी की उम्मीद ही छोड़ चुके थे।

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