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कागज की इस स्ट्रिप से एक घंटे में होगी कोरोना की जांच

सीएसआईआर ने कागज की ऐसी स्ट्रिप बनाई है जिससे मात्र एक घंटे में कोरोना की जांच की जा सकेगी। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने कागज की स्ट्रिप के जरिए कोरोना वायरस का टेस्‍ट करने की तकनीक को ‘फेलुदा’ नाम दिया है। बड़े पैमाने पर फटाफट टेस्टिंग (रैपिड मास टेस्टिंग) के लिए इसका इस्‍तेमाल होगा। इसके लिए सीएसआईआर और टाटा संस ने हाथ मिलाया है। उम्‍मीद है कि मई के अंत तक इस तकनीक के जरिये टेस्टिंग का काम शुरू हो जाएगा। यह तकनीक पूरी तरह भारत में बनी है। ‘फेलुदा’ को कोरोना महामारी को काबू में करने के लिए बनाया गया है। इसके जरिये बड़े पैमाने पर टेस्टिंग की जा सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा है कि यह किफायती है। इसे इस्‍तेमाल करना आसान है और इसके लिए महंगी क्‍यू-पीसीआर मशीनों की जरूरत नहीं पड़ती है।

बताया जाता है कि इस तकनीक के जरिये डेढ़ से दो घंटे में कोविड टेस्ट मुमकिन है और कीमत भी 500 रुपये के आसपास आएगी। ‘फेलुदा’ को सीएसआईआर की इंस्‍टीट्यूट ऑफ जेनोमिक्‍स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) ने विकसित किया है। सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी मांडे के मुताबिक आईजीआईबी जैसी सीएसआईआर की प्रयोगशालाएं ‘डीप साइंस’ पर काम कर रही हैं। वे उन्‍नत तकनीकों को विकसित कर रही हैं। उन्‍होंने टाटा ग्रुप जैसे प्रमुख उद्योग घराने के इस मुहिम में शामिल होने पर खुशी जताई। सीएसआईआर-आईजीआईबी और टाटा संस ने इसे लेकर एक एमओयू पर हस्‍ताक्षर किए हैं। यह कोविड-19 की सटीक और बड़े पैमाने पर टेस्टिंग के लिए किट के विकास की लाइंसिंस से जुड़ा है।

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17 साल पहले मौत का तांडव करने वाले सार्स का सगा भाई है कोरोना

संसार के शक्तिशाली देशों को घुटने पर ला चुका कोरोना वायरस 17 साल पुराने सार्स का सगा भाई है। इस बार उसके ज्यादा मारक होने का यही कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोरोना फैमिली का यह वायरस पिछले दो बार के मुकाबले ज्यादा ताकतवर होकर आया है और उसने म्युटेशन के जरिए स्वयं को ज्यादा घातक बना लिया है। 2003 में आए सार्स कोविड-1 और 2013-14 में आए मर्स वायरस से मौजूदा वायरस की समानता क्रमश: 70 और 50 प्रतिशत तक है। पहले के दोनो वायरस घातक तो थे लेकिन वे व्यापक तबाही नहीं फैला पाए थे। क्योंकि कोविड-1 पूरी तरह ग्लोबल होने से पहले ही दम तोड़ गया था और 2013-14 का मर्स सऊदी अरब तक सीमित रह गया था।
कोरोना वायरस का मौजूदा स्वरूप बेहद घातक है। उसने 45 वर्ष से अधिक उम्र के इंसानों को उसी तरह मौत के घाट उतारा है जिस तरह लगभग एक सदी पहले प्लेग ने उनका भक्षण किया था। अनुमान है कि पिछले चार माह में कोरोना संक्रमण के चलते पूरी दुनिया में भगवान को प्यारे हुए लगभग ढाई लाख इंसानों में से 80 प्रतिशत 45 से 80 साल के हैं।

बूढ़ों के लिए मौत का दूसरा नाम है कोरोना

इन दिनों कोविड-19 के रोगियों की जान बचाने में जुटे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कार्डियक थोरासिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजीत जैन के मुताबिक पूरी दुनिया में अभी तक कोरोना संक्रमितों की मृत्यु का जो आंकड़ा सामने आ रहा है, उसमें 25 साल से कम उम्र के संकमितों की संख्या एक प्रतिशत है। 25 से 44 साल तक के मृतकों का आंकड़ा अभी तक छह प्रतिशत पर टिका हुआ है लेकिन 45 से 60 साल तक संक्रमितों की मृत्यु दर 15 प्रतिशत तक जा पहुंची है। सबसे ज्यादा मौत 65 वर्ष से अधिक उम्र के रोगियों की हो रही है। इस उम्र के संक्रमितों में से आधे ठीक होने की अपेक्षा काल के गाल में समा जाते हैं।
डा. अजीत के मुताबिक तीनो वायरस एक ही जींस के हैं इसलिए विशिष्ट दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाने के बावजूद परम्परागत दवाएं इलाज में काम ली जा रही हैं। इन दवाओं के बल पर ही कोरोना से मुक्त होने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन इससे यह महामारी नियंत्रण में नहीं आ रही है।
उन्होंने बताया कि सीवियर एक्यूट रेस्पेरेटिरी सिंड्रोम अर्थात सार्स वायरस सात तरह का है। इनमें 2003 में आया सार्स कोविड-1, 2013-14 में आए मर्स वायरस और 2019 में आए कोविड-19 से दुनिया का परिचय हो चुका है। इसके अलावा कोरोना फैमिली के चार अन्य वायरस के नाम क्रमश: ह्यूमन कोरोना वायरस ओएच 43, ह्यूमन कोरोना वायरस एनएल 63, ह्यूमन कोरोना वायरस 229ई, ह्यूमन कोरोना वायरस एचयूके1 हैं। डा. अजीत जैन के अनुसार 2016 में डब्ल्यूएचओ ने भविष्यवाणी की थी कि कोरोना फैमिली के ये वायरस दुनिया में कभी भी महामारी फैला सकते हैं। भविष्यवाणी के बाद रिसर्च प्रोग्राम और दवा बनाने के प्रयास शुरू हो गए थे। इसीलिए उम्मीद है कि कोरोना का इलाज जल्द ही खोज लिया जाएगा।

प्रोटीन बढ़ाते है मौत का खतरा

डा. जैन के अनुसार दुनिया को सबसे ज्यादा घबराहट कोरोना संक्रमितों की मौत की बढ़ती दर से है। 2003 में चाइना के यूनान से शुरू हुए सार्स कोविड-1 के दौर में मौत की दर 9 प्रतिशत थी। दस साल बाद 2013-14 में आई मर्स महामारी में मौत की दर 35 प्रतिशत थी, लेकिन उसका फैलाव नहीं होने से दुनिया को ज्यादा चिंता नहीं हुई थी। इस बार यह पूरी दुनिया में फैल गया है और इसकी औसत मृत्यु दर भी 15 प्रतिशत है। कोविड-19 वायरस में चार तरह के प्रोटीन स्पाइक प्रोटीन, एनवल्व, मेमरिन और न्यूक्लोसाइट हैं और ये हाइरिस्क ग्रुप (डायबिटीज, हाइपर टेंशन,हृदय रोग) के मरीजों के मरने का खतरा बढ़ा देते है।

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अब केले पर मंडराया कोरोना वायरस का साया, हजारों टन केला……

कोरोना से खेती को भी बड़ा नुकसान हुआ है। इसकी वजह से उत्तरप्रदेश में हजारों टन केले की पैदावार नहीं हो सकी। उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों में टिशू कल्चर केले की खेती की जाती है जिसके बीज महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों से आते हैं। लेकिन कोरोना के चलते इसके बीज नहीं आ पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में बाराबंकी, अयोध्या, सीतापुर, गोंडा, बहराइच, संतकबीरनगर, श्रावस्ती, गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, बलिया, वाराणसी समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों मे टिशू कल्चर केले की खेती बडे पैमाने पर होती है लेकिन कोरोना को लेकर इस खेती पर भी आफत आ गई है। राज्य मे करीब एक लाख हेक्टेयर में टिशू कल्चर के केले की खेती की जाती है लेकिन अभी तक इसके बीज की व्यवस्था नहीं हो पायी है जबकि इस खेती के लिए खेत पूरी तरह तैयार हैं। चूंकि इसके बीज दक्षिण के राज्यों से आते हैं इसलिए बीजों का आना मुश्किल माना जा रहा है।

टिशू कलचर खेती मे अपनी अलग पहचान बना चुके किसान रामशरण कहते हैं कि एक लाख हेक्टेयर मे केले की खेती के लिए करीब तीन करोड़ बीजों की जरूरत होगी। आवागमन बंद होने के कारण इतना बीज आना मुश्किल ही नहीं असंभव है। रामशरण को टिशू कलचर खेती के लिए पद्मश्री भी मिल चुका है। उद्यान विशेषज्ञों के अनुसार पिछले साल टिशू कल्चर केले की राज्य मे बंपर पैदावार हुई थी और किसानों ने मोटा मुनाफा कमाया था।

पिछले साल के मुनाफे को देखकर कुछ नये किसान भी इस क्षेत्र मे आ गए और अपने खेतों को टिशू कल्चर केले की खेती के लिए तैयार किया लेकिन बीज को लेकर अभी भी अनिश्चितता के हालात के कारण किसान अब उदास हैं। रेल के साथ हवाई सेवा भी पूरी तरह से बंद है, इसके बीज हवाई जहाज से भी आते रहे हैं लेकिन यह सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। निचोड़ यह है कि टिशू कल्चर केले की खेती पर इस बार आफत है। किसान इसके लिए किसी को दोष भी नहीं दे सकते कयोंकि देश कोरोना जैसी महामारी से लड रहा है।

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कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े कर देगा ‘अतुल्य’

Incredible will break thousand pieces of Corona virus:

भारत के रक्षा वैज्ञानिकों ने एक ऐसा माइक्रोवेव बनाया है जो कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े करके उसे नष्ट करने में सक्षम है। ये माइक्रोवेव पुणे स्थित उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी संस्थान ने विकसित किया है। यह एक मिनट से भी कम समय में कोरोना विषाणु के टुकड़े टुकड़े कर उसे नष्ट कर देगा। संस्थान द्वारा विकसित माइक्रोवेव को अतुल्य नाम दिया गया है और यह 560 से 600 सेल्सियस के तापमान पर कोरोना विषाणु को टुकड़े टुकडे कर उसे नष्ट करने में सक्षम है। माइक्रोवेव किफायती है और इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है या एक जगह पर फिक्स भी किया जा सकता है। माइक्रोवेव इसे चलाने वाले व्यक्ति के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। विभिन्न वस्तुओं के आकार के अनुसार यह उस पर लगे कोरोना विषाणु को 30 सेकेंड से एक मिनट में नष्ट करने में सक्षम है। इस माइक्रोवेव का वजन तीन किलो है और यह केवल गैर धातु वाली वस्तुओं को ही संक्रमण मुक्त करने में सक्षम है।

 

ये तीन सुपर हीरो देंगे मात

इस बीच कोरोना वायरस को मात देने के लिए तीन सुपर हीरो भी आगे आए हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी सुपर पावर के साथ चलने की बात की है। इतना ही नहीं कोविड-19 के सुपर हीरो से नाम से एक पोस्टर भी जारी किया है, जिसमें साबुन, मास्क और अल्कोहल वाले हैण्ड सैनिटाइजर को वायरस से मुकाबला करने वाले सुपर हीरो के रूप में दिखाया गया है।
पोस्टर के माध्यम से सन्देश दिया जा रहा है कि कोरोना के संक्रमण से सुरक्षित रहना है तो साबुन और पानी से बार-बार अच्छी तरह से हाथ धोएं। बाहर से जब भी घर के अंदर आयें तो हाथों को अच्छी तरह से धोना कतई न भूलें। नाक, मुंह व आँख को न छुएं।

इसी तरह कोविड-19 के दूसरे सुपर हीरो मास्क को भी बहुत अहम बताते हुए इसका उपयोग खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए करने को कहा गया है। कोरोना का वायरस खांसने व छींकने से निकलने वाली बूंदों के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है, इसलिए खांसते या छींकते समय नाक व मुंह को ढककर रखें। वहीं, अल्कोहल आधारित सैनिटाइजर भी कोरोना की जंग में अहम भूमिका निभा रहे हैं। कोरोना को फैलने से रोकने के साथ ही कीटाणुओं को खत्म करने और खुद को सुरक्षित रखने में इनका इस्तेमाल बहुत ही प्रभावी है।

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कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाएंगे एंटी वायरल कपड़े से बने वस्त्र

फैशन बाजार ने कोरोना संक्रमण के चलते देश भर में लागू लॉकडाउन का फायदा उठाने का रास्ता खोज लिया है। वह फैशन के दीवाने लोगों के लिए एंटी वायरल कपड़ा लेकर आया है। बाजार का दावा है कि इस कपड़े से बने वस्त्र पहनने वालों से कोरोना वायरस कई मीटर दूर रहेगा।

सूक्ष्मजीवों को पनपने से रोकते हैं एंटीवायरल और एंटी-बैक्टीरियल कपड़े 

ये कपड़ा ग्राडो नामक कम्पनी ने बनाया है। डोनियर समूह की कंपनियों द्वारा विकसित और ग्राडो की निर्माण इकाइयों द्वारा बेहतरीन तरीके से तैयार किए गए परिधानों में सूट से लेकर जैकेट और पतलून तक किसी भी तरह के परिधान पहनने और उपयोग करने के लिए सुरक्षित प्रमाणित किए गए हैं। विशेष रूप से डिजाइन किए गए एंटीवायरल और एंटी-बैक्टीरियल कपड़े सूक्ष्मजीवों को पनपने से रोकते हैं। जिससे वे सुरक्षित और स्वच्छ बनते हैं। कपड़े अपने गुणों को 50 बार धुलने तक भी बरकरार रखते हैं और हर रोज पहनने के लिए उपयुक्त हैं।
ग्राडो के एक अधिकारी ने कहा कि दुनिया की मौजूदा स्थिति को देखते हुए बाजार में इस लॉकडाउन के लिए ज्यादा हाइजीन प्रोडक्ट की पेशकश करने की स्थिति में होना चाहते थे और फिलहाल एंटी वायरल कपड़ों से बेहतर और क्या हो सकता है, जिसे हर कोई पहन सकता है। हम इस मुश्किल समय में राष्ट्र के लिए अपना योगदान देने के बारे में गर्व महसूस कर रहे हैं।

सुरक्षा की गारंटी नहीं

यहां यह उल्लेखनीय है कि कोरोना संकट के बीच जहां हम सब परेशान हैं, वहीं क्या हमने एक बार भी सोचा है कि जब हम घरों से बाहर निकलने के लिए आजाद होंगे तो क्या अपने फैंसी कपड़ों में सुकून के साथ बाहर निकलने का साहस कर पाएंगे? एंटीवायरल कपड़ों को पहनने से इसमें मदद मिल सकती है, जो भले ही सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है, लेकिन कम से कम मानसिक शांति देता है। नियो टेक्नोलॉजी की मदद से जो बेहतरीन क्वालिटी का उपयोगी प्रोडक्ट बनाता है, जो बैक्टीरिया और वायरस से सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जिंदगी शायद सहज व आसान हो जाए। ग्राडो नियो टेक्नोलॉजी उपयोग करते हुए वायरस और रोगाणुओं से सुरक्षा के लिए कपड़े बनाने वाली पहली कपड़ा कंपनी है।

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कड़ी धूप में जाते ही दम तोड़ देता है यमराज बना कोरोना वायरस, अमेरिका ने किया दावा

कोरोना वायरस के डर से घरों में छुपी हुई दुनिया के लिए राहत की खबर, यमराज की शक्ल में आया ये वायरस सूरज की धूप नहीं सह पाता और कड़ी धूप में जाते ही दम तोड़ देता है। ये दावा अमेरिका के घरेलू सुरक्षा विभाग अति उन्नत बायो कन्टेनमेंट लैब ने किया है। लैब के अनुसार सूरज की रोशनी कोरोना को खत्म कर सकती है, जबकि गर्म तापमान और चिपचिपा मौसम वायरस को काफी नुकसान पहुंचाता है।

कोविड-19 को मार देती हैं सूरज की किरणें

व्हाइट हाउस ने लैब के शोध के हवाले से कहा है कि सूरज की किरणें कोविड-19 को मार देती हैं। जबकि गर्म तापमान और ह्यूमिडिटी वायरस को नुकसान पहुंचाते हैं, और इससे वायरस का जीवन और इसकी शक्ति आधी हो जाती है।
कोरोनावायरस महामारी के चलते अमेरिका सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। वर्तमान में यहां कोविड-19 संक्रमण के कुल आठ लाख 60 हजार से अधिक मामलों की पुष्टि हुई है, जिनमें से 50 हजार से अधिक अमेरिकी नागरिकों की जान चली गई है। तापमान और ह्यूमिडिटी के प्रभाव को लेकर किए गए इस शोध को हफ्तों से ट्रैक्शन मिल रहा है। अमेरिकी सरकार ने कोविड-19 पर तापमान के परीक्षण के प्रारंभिक परिणामों पर पहली बार आधिकारिक मुहर लगाई है।
अमेरिकी घरेलू सुरक्षा विभाग में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी निदेशालय के प्रमुख बिल ब्रायन ने कहा, यह आज तक का हमारा सबसे महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन है। सूर्य की रोशनी के शक्तिशाली प्रभाव से वायरस सतह और हवा दोनों जगह मरता हुआ पाया गया है। हमने तापमान और ह्यूमिडिटी दोनों के साथ इसी तरह के परिणाम देखे हैं। ब्रायन के अनुसार, एक कमरे में 70-75 एफ तापमान पर 20 प्रतिशत ह्यूमिडिटी के साथ वायरस का जीवन लगभग आधा यानी एक घंटे है।
बिल ने कहा कि इसे लेकर बाहर निकलने पर जब यह यूवी किरणों से टकराता है तो इसका जीवन एक मिनट और डेढ़ मिनट में ही आधा रह जाता है।

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गरीबों की किचन में परोस रहे थे शराब, मयखाना चलाने वाले दो विदेशी गिरफ्तार

लॉकडाउन में फंसे गरीबो को भोजन मुहैया कराने के नाम पर चलाए जा रहे किचन में मयखाने चलाए जा रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने ऐसे ही एक मयखाने का भंडाफोड़ करके दो विदेशियों को गिरफ्तार किया है। अफ्रीकी मूल के दोनो विदेशी के कब्जे से अवैध शराब भी बरामद की गयी है।

इस सिलसिले में आरोपियों के खिलाफ मोहन गार्डन थाने में आपराधिक मामला दर्ज कराया गया है। गिरफ्तार दोनो अफ्रीकी युवकों की उम्र 30 और 22 साल है।
डीसीपी के मुताबिक, 22-23 अप्रैल की मध्य रात्रि में करीब ढाई बजे इस संदिग्ध किचन के बारे में सूचना मिली थी। यह किचन मोहन गार्ड के विपिन गार्डन में चल रहा था। किचन की आड़ में चल रहे मयखाने का पर्दाफाश करने के लिए प्रशिक्षु आईपीएस अक्षत कौशल, एसएचओ मोहन गार्डन अरुण कुमार, सहायक उप निरीक्षक संजय धामा, हवलदार लोकेंद्र और एसीपी मोहन गार्डन विजय सिंह की तीन टीमें बनाई गयीं।

योजना बनाकर किचन को घेर लिया

इन्हीं टीमों ने योजना बनाकर किचन को घेर लिया। पुलिस टीमों ने जब छापा मारा तो, मौके से पुलिस को 11 बीयर की बोतलें, 3 क्वार्टर बोतल, बीयर की कई खाली बोतलें मिलीं। मौके पर मौजूद मिले दोनो अफ्रीकी मूल के युवकों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। छानबीन के दौरान दोनो आरोपी विेदेशी युवक भारत में अपने ठहरने का कोई वैध दस्तावेज भी नहीं दिखा पाये।
छानबीन के दौरान पुलिस को पता चला कि, जिस मकान में किचन के अंदर चोरी छिपे ये मयखाना चल रहा था वो, किराये पर था। पता चला कि मकान मालिक ने भी बिना कोई वेरीफिकेशन कराये हुए ही विदेशी युवकों को किराये पर मकान दे दिया था। लिहाजा मकान मालिक के खिलाफ भी पुलिस ने अलग से एक और मामला दर्ज किया है।

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हर साल पांच लाख भारतवासियों को मौत के घाट उतार देती है तपेदिक, इतने ही निगल जाता है डायरिया

दुनिया भर में कोरोना वायरस (कोविड-19) की तुलना में तपेदिक (टीबी) और डायरिया जैसी रोकथाम की जा सकने वाली और उपचार योग्य बीमारियों से अधिक मौतें होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) के अनुसार अकेले इस्केमिक हृदय रोग से दुनिया भर में औसतन 26,000 लोगों की मौत होती है।

भारत में दिल और सांस की बीमारियों से लाखों लोगों की मौत

आंकड़ों के अनुसार भारत में दिल और सांस की बीमारियों से होने वाली मौतों के अलावा हर दिन लगभग 2,000 लोग डायरिया से और 1,200 से अधिक लोग तपेदिक से मरते हैं। भारत में बीमारियों के अलावा यातायात दुर्घटनाओं में भी रोजाना 500 लोग मारे जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार स्ट्रोक के कारण हर दिन दुनिया भर में करीब 16,000 लोगों की मौत होती है। आंकड़ों से यह भी पता चला है कि अस्थमा और नवजातों में जन्म संबंधी विकारों के साथ हृदय, श्वसन, डायरिया और गुर्दे की बीमारियों से दुनिया भर में हर साल लाखों लोगों की मौत होती है।

कोरोना से इसलिए ज्यादा डरी हुई है दुनिया

एक अनुभवी चिकित्सक के अनुसार स्वाइन फ्लू एक दशक पहले दहशत का कारण था, लेकिन अब शायद ही इसका कभी उल्लेख होता है। इसके बावजूद भारत में स्वाइन फ्लू से हर साल एक हजार से अधिक लोगों की मौत होती है। इसके बावजूद दुनिया कोरोना से इसलिए ज्यादा डरी हुई है क्योंकि यह प्रचार हो गया है कि कोरोना वायरस का अभी तक कोई इलाज नहीं है। हवा से फैलने वाली तपेदिक जैसी बीमारी भी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती है जबकि इसका इलाज है। तपेदिक से भारत में प्रतिवर्ष करीब 4.5 लाख लोगों की मौत होती है। चिकित्सक ने कहा कि इनमें से किसी भी कारण से लोगों या सरकार को कोरोना की नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस वायरस की संक्रामकता का पता इसी से चलता है कि इसने लगभग पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है। अगर इसके खिलाफ हर मोर्चे पर नहीं लड़ा गया तो यह एक वैश्विक तबाही बन सकता है।

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कोरोना से बचने के चक्कर में मोल ना लें दूसरी बीमारियां, फल-सब्जियों को केमिकल से नहीं धोएं

Do not chemically wash fruits and vegetables: कोरोना वायरस के खतरे से निपटने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने के लिए देश भर में खट्टे फलों का उपयोग बढ़ गया है। इसके अलावा हरी सब्जियां भी खूब खाई जा रही हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि इस दौरान भी कोरोना वायरस का संक्रमण आपके घर घुसने में कामयाब हो सकता है। बिल्कुल, घरों में बाजार से अथवा हॉकरों से खरीदे जा रहे फल और सब्जियां वायरस को आपके घर लेकर आ सकते हैं, इसलिए इन्हें खरीदने के बाद इस्तेमाल करने से पहले इन टिप्स से इन्हें संक्रमण रहित जरूर करें ताकि इस भयानक बीमारी से आपका बचाव हो सके।

कई लोग वायरस की वजह से पनपे संदेह से राहत पाने के चक्कर में फल और सब्जियों को विभिन्न केमिकल्स जैसे क्लोरीन, डिसइंफेक्टेंट, एल्कोहल आदि से धो देते हैं। इतना ही नहीं, कुछ लोग तो फल और सब्जियों को धोने के लिए साबुन या डिटर्जेंट पाउडर का इस्तेमाल करने लगे हैं। लेकिन ऐसा करना गलत है, क्योंकि ऐसा करने से ये स्वास्थ्यवर्धक चीजें आपके स्वास्थ के लिए घातक हो सकती हैं और गंभीर बीमारी का रूप ले सकती हैं। जब भी बाहर से फल और सब्जियां लाएं तो घर पहुंचकर सबसे पहले किसी बड़े बर्तन में पानी भरकर उनको एक-एक करके धोएं। हो सके तो गलव्स पहनकर धोएं। इसके अलावा, एक टब में आवश्यकतानुसार पानी और एक चम्मच नमक डालकर उसमें फल और सब्जियों को डुबोकर अच्छी तरह साफ कर सकते हैं। साथ ही जब भी फल और सब्जियों का इस्तेमाल करने जा रहे हों, तब भी उनको पानी से अच्छे से साफ कर लें। Do not chemically wash fruits and vegetables:

रीयूजेबल कैरीबैग पर किसी भी तरह के संक्रमण का असर हो सकता है इसलिए जब भी जरूरी सामान की खरीदारी करने जाएं तो घर का कोई भी थैला न लेकर जाएं। इसकी जगह खरीदारी के लिए किसी ऐसे प्लास्टिक बैग का चुनाव करें, जिसे घर आकर फेंक सकें या दुकान से मिलने वाली थैली में ही सामान लें और घर लाकर प्लास्टिक की थैली को फेंक दें। Do not chemically wash fruits and vegetables:

अगर बाहर से दूध, फल और सब्जियां लाएं तो उन्हें पानी से अच्छे से धो लें। बाहर से लाए गए किसी भी तरह के सामान के पैकेट को दांतो से फाड़ने की बजाए कैंची की मदद से खोलें।फ्रिज में हमेशा पके खाद्य पदार्थ को अलग और कच्चे खाद्य पदार्थ को अलग रखें। छिलके वाली चीजों का सेवन ज्यादा करें और सब अच्छे से पकाकर ही खाएं। Do not chemically wash fruits and vegetables:

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चावल और कटहल से बने पाज्जाकांजी के सामने नहीं टिक सका कोरोना वायरस

चावल और कटहल के मिश्रण से तैयार डिश के सहारे 93 साल के बुजुर्ग ने समूचे संसार को भयभीत कर देने वाले कोरोना वायरस को धूल चटा दी है। इस डिश का नाम पाज्जाकांजी है और केरल में इसे बड़े चाव से खाया जाता है। कोरोना वायरस पॉजिटिव पाए गए केरल के पथानामथिट्टा निवासी 93 वर्षीय बुजुर्ग थॉमस अब्राहम ने पाज्जाकांजी खाकर न सिर्फ अपनी बल्कि अपनी 88 साल की पत्नी की जान भी बचा ली है। वे इलाज के दौरान इस डिश को खाते रहे और आखिरकार कोरोना वायरस उनके शरीर को छोड़ने को बाध्य हो गया।

ठीक होकर घर लौटे बुजुर्ग

केरल के पथानामथिट्टा निवासी 93 वर्षीय बुजुर्ग थॉमस अब्राहम के साथ उनकी पत्नी मरियम्मा (88) को उनके बेटे, बहू और पोते से कोरोना का संक्रमण मिला था। तीनों गत माह ही इटली से लौटे थे। वे तीनों भी गंभीर वायरस की चपेट से बाहर आ चुके हैं और अब अपने माता-पिता के सकुशल घर से आने से बहुत खुश हैं। कोरोना वायरस का सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों पर होता है। बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण इससे संक्रमित होने पर उनकी मौत होने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है, लेकिन थॉमस ने इस खतरे को टाल दिया।

संयमित जीवन ने बचाया

थॉमस इब्राहिम के घर लौटने के बाद उनके पोते रिजो मोन्सी ने बताया कि उनके दादा के कोरोना वायरस को पछाड़ने के पीछे उनकी स्वस्थ जीवन शैली का बड़ा हाथ है। वह बड़ा संयमित जीवन जीते हैं। वे किसान है और शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं। वह न तो कोई नशा करते हैं और ना ही उन्हें धूम्रपान का शौक है। वह बिना जिम जाए भी सुडौल शरीर रखते हैं। दादा को केरल का सबसे बेहतरीन डिश पाज्जाकांजी बहुत पसंद है। इसे चावल के घोल और कटहल के मिश्रण से तैयार किया जाता है। उपचार के दौरान उनके दादा ने आइसोलेशन वार्ड में इसी का नियमित रूप से सेवन किया था।

दादी को भी यही खिलाया

उन्होंने दादी को भी यही खाना खिलाया था। इससे शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। उपचार करने वाले चिकित्सक भी उनकी संयमित जीवन शैली से चकित थे। इटली में रेडियोलॉजी क्षेत्र में काम करने वाले रिजो मोन्सी ने बताया कि उनका अगस्त में भारत आने का कार्यक्रम था, लेकिन उनके दादा ने जिद करके उन्हें मार्च में ही भारत बुला लिया। यदि वह नहीं आते तो शायद अब उनकी जिंदगी भी खतरे में होती। उन्होंने कहा कि भारत की चिकित्सा व्यवस्था बेहतरीन है और चिकित्सकों ने बेहतरीन प्रयास किए थे। उन्होंने कहा कि उनके दादा इटली की जगह भारत में ज्यादा सुरक्षित हैं। रिजो ने बताया कि उनके परिवार में कुल 26 सदस्य हैं। उनके इटली से आने के बाद उनके दादा-दादी, माता-पिता, उनकी बहन, बहनोई और उनके ताऊजी कोरोना वायरस से संक्रमित हुए थे, लेकिन उपचार के बाद सभी ठीक हो गए हैं।