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कोरोना जांच के नाम पर घाटे की भरपाई की फिराक में है निजी अस्पताल!

लॉकडाउन में लगभग बंद हो गए निजी अस्पताल फिर से खुलते ही घाटे की भरपाई मरीजों पर कोरोना टेस्ट का भार डालकर करने की तैयारी में हैं। जानकारी के अनुसार निजी अस्पताल अपने यहां इलाज के लिए आने वाले सभी मरीजों को कोरोना जांच के लिए बाध्य करेंगी और प्रति जांच पांच हजार तक वसूलेंगे। हैल्थ सेक्टर के जानकारों का कहना है कि कोरोना के एक टेस्ट की लागत अधिकतम एक हजार रुपए आती है और बड़े पैमाने पर टेस्ट करने पर यह और घट जाती है लेकिन निजी अस्पताल उसकी कीमत अधिकतम वसूलने पर जोर देंगे।

जांच से होगी कमाई

मेडिका ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के चेयरमैन आलोक राय के अनुसार इन जांचों में लागत के अलावा केवल 10 फीसदी मार्जिन मिलेगा। राय ने कहा, ‘वे इसे आमदनी के एक बड़े स्रोत के रूप में नहीं देखते हैं क्योंकि उन्हें समय-समय पर अपने डॉक्टरों और कर्मचारियों की भी जांच करनी होगी। इस तरह मरीज की एक बार जांच होगी और डॉक्टरों की बार-बार करनी होगी। इस तरह जो कमाई होगी, वह आंतरिक जांच में चली जाएगी।

कम आएगी जांच की लागत

दूसरी ओर निजी अस्पतालों की जांच की लागत भी घटेगी क्योंकि नमूने लेने की लागत काफी कम है। उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि अस्पतालों के लिए हर मरीज की पीसीआर जांच की लागत 1000 रुपये से अधिक नहीं होगी। हालांकि अस्पतालों के ज्यादा पैसा वसूलने पर प्रशासन की नजर है। हालांकि कुछ अस्पताल शृंखलाएं धीरे-धीरे सुधार को लेकर सतर्क हैं। अस्पतालों को लोगों और बेडों के बीच दूरी बढाऩी होगी और कर्मचारियों को बारी-बारी से काम पर बुलाना होगा। बड़ी अस्पताल शृंखलाओं के राजस्व में विदेशी मरीजों का हिस्सा करीब 10 से 12 फीसदी है। मगर ऐसे मरीजों के लिए अस्पतालों को कुछ इंतजार करना होगा।

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कोरोना रोगियों को दी जा रही दवा के तीन डोज की कीमत 1.80 लाख

मुम्बई में कोरोना संक्रमण से जूझ रहे रोगियों को बचाने के लिए टोसिलीजुमैब दवा दी जा रही है, उसके तीन डोज की कीमत एक लाख अस्सी हजार रुपए है। इस दवा के परिणाम अच्छे आए हैं लेकिन इसका बड़े पैमाने पर उपयोग करने से पहले इसकी कीमत रास्ते का रोडा बन गई है।

आइटोलिजुमैब का कोरोना के उपचार में इस्तेमाल

जानकारी के अनुसार हाल ही दो दवा कंपनियां रॉश और बायोकॉन भी कोरोना वायरस से मुकाबले के लिए दवाएं पेश करने की होड़ में शामिल हो गई हैं। रॉश की गठिया रोग की सिप्ला द्वारा बेची जाने वाली दवा एक्टेम्रा (टोसिलिजुमैब) को कोविड-19 मरीजों में सूजन दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं बायोकॉन अपनी सोरायसिस की दवा आइटोलिजुमैब में बदलाव लाकर इसका कोरोना वायरस के उपचार में इस्तेमाल कर रही है।

टोसिलीजुमैब का भी उपयोग

दोनों दवाओं का परीक्षण मुंबई के नायर हॉस्पिटल और किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) हॉस्पिटल में गंभीर रूप से बीमार कोरोना मरीजों पर किया जा रहा है। रॉश की टोसिलीजुमैब का इस्तेमाल कर रहे नायर हॉस्पिटल में दो मरीजों के स्वास्थ्य में बड़ा सुधार दिखा है और उन्हें वेंटिलेटर से हटाया जा सकता है। वहीं केईएम में भी मरीज को बायोकॉन की आइटोलिजुमैब दवा दी गई।

मरीजों में बनता है साइटोकिन

मणिपाल हॉस्पिटल्स में इंटरवेंशनल पलमोनोलॉजी ऐंड स्लीप मेडिसिन के एचओडी सत्यनारायण मैसूर के अनुसार मुंबई में, कोरोनावायरस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अब तक टोसिलिजुमैब का इस्तेमाल कोविड-19 मरीजों में ज्यादा साइटोकिन बनने से रोकने के लिए इंटरल्यूकिन-6 के तौर पर किया जा रहा था। अब इसे आइटोलिजुमैब के तौर पर पुन: तैयार कर इसका परीक्षण किया जा रहा है। मणिपाल हॉस्पिटल्स कर्नाटक में गठित कोविड-19 कार्यबल का भी सदस्य है।

एक खुराक की कीमत लगभग 60,000 रुपये

वृहनमुंबई नगरपालिका (बीएमसी) ने 120 से ज्यादा उन मरीजों पर इन दवाओं को आजमाने का निर्णय लिया है जिनकी उसने पहचान की है और उसका मानना है कि इन दवाओं से उन्हें लाभ मिल सकता है। लेकिन समस्या कीमत को लेकर है। इसकी एक खुराक की कीमत लगभग 60,000 रुपये है। इस दवा की तीन खुराक लेने के लिए मरीज को 1.8 लाख रुपये चुकाने की जरूरत होगी। आईटोलिजुमैब को अलजुमैब ब्रांड नाम के तहत भारत में 2013 में बायोकॉन ने तैयार करके पेश किया। इस दवा को गंभीर त्वचा रोग सोरायसिस के इजाज के लिए विकसित किया गया था।