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विश्व में कोराना संक्रमितों की संख्या 45.42 लाख, तीन लाख से अधिक मौत

बीजिंग/जिनेवा/नयी दिल्ली। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) का प्रकोप दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है और विश्व भर में इसके संक्रमितों की संख्या 45.43 लाख से अधिक हो गयी है जबकि 3.07 लाख से ज्यादा लोग काल का ग्रास बन चुके हैं।

अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के विज्ञान एवं इंजीनियरिंग केन्द्र (सीएसएसई) की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक कुल संक्रमितों की संख्या 45,42,752 हो गयी जबकि कुल 3,07,696 लोगों की इस बीमारी से मौत हो चुकी है।

भारत में भी कोरोना वायरस का संक्रमण बहुत तेजी से फैल रहा है और यह संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित देशों की सूची में 11वें स्थान के साथ ही वैश्विक महामारी के केंद्र चीन से आगे हो गया है।

केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से शनिवार सुबह जारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कोरोना से संक्रमितों और मृतकों की संख्या में क्रमश: 3970 और 103 की बढ़ोतरी हुई है।देश में इसके संक्रमण से अब तक 85,940 लोग प्रभावित हुए हैं तथा 2752 लोगों की मौत हुई है जबकि 30,153 लोग पूरी तरह ठीक भी हो चुके हैं।

सीएसएसई के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में कोरोना वायरस से दुनिया में सर्वाधिक लोग संक्रमित हुए हैं तथा यहां संक्रमण के मामलों की संख्या 14 लाख से अधिक हो चुकी है।

विश्व की महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका में 14,42,924 संक्रमित है और 87,493 की मौत हो चुकी है।रूस में भी कोविड-19 का प्रकोप लगातार तेजी से बढ़ रहा है और यह कोविड-19 के संक्रमण से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों की सूची में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है।

देश में संक्रमितों की संख्या ढाई लाख के आंकड़े को पार कर चुकी है। यहां अब तक 2,62,843 लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं और 2418 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।यूरोप में गंभीर रूप से प्रभावित देश इटली में इस महामारी के कारण अब तक 31610 लोगों की मौत हुई है और 2,23,885 लोग इससे संक्रमित हुए हैं।

स्पेन में काेरोना से 230183 लोग संक्रमित है जबकि 27459 लोगों की मौत हो चुकी है।इस वैश्विक महामारी के केंद्र चीन में अब तक 82,941 लोग संक्रमित हुए हैं और 4633 लोगों की मृत्यु हुई है।

इस वायरस को लेकर तैयार की गयी एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन में हुई मौत के 80 प्रतिशत मामले 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के थे।रोपीय देश फ्रांस और जर्मनी में भी स्थिति काफी खराब है।

फ्रांस में अब तक 1,78,994 लोग संक्रमित हुए हैं और 27529 लाेगों की मौत हो चुकी है। जर्मनी में कोरोना वायरस से 173722 लोग संक्रमित हुए हैं और 7881 लोगों की मौत हुई है।इसके अलावा ब्रिटेन में भी हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं।

यहां अब तक इस महामारी से 236711 लोग प्रभावित हुए हैं और अब तक 33998 लोगों की इसके कारण मौत हो चुकी है। तुर्की में कोरोना से अब तक 146457 लोग संक्रमित हुए हैं तथा इससे 4055 लोगों की मौत हो चुकी है।

कोरोना वायरस से गंभीर रूप से प्रभावित खाड़ी देश ईरान में 116635 लोग संक्रमित हुए हैं जबकि 6902 लोगों की इसके कारण मौत हुई है।ब्राजील में 14817, बेल्जियम में 8959, नीदरलैंड में 5643, कनाडा में 5562, मेक्सिको में 4767, स्वीडन में 3646, स्विट्जरलैंड में 1874, आयरलैंड में 1518 और पुर्तगाल में 1190 लोगों की मौत हो गयी है।

इसके अलावा पड़ोसी देश पाकिस्तान में पिछले 24 घंटों में कोरोना संक्रमण के तीन हजार से अधिक तथा 64 लोगों की मौत का नया मामला सामने आया हैं। यहां कुल संक्रमितों की संख्या 38799 हो गयी है जबकि 834 लोगाें की मौत हो चुकी है।

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अगर पुलिस ने नहीं रचा होता ये षड़यंत्र तो अमेरिका के कान काट लेता भारत

अगर 1994 में ये षड़यंत्र नहीं रचा जाता तो अंतरिक्ष विज्ञान में भारत अमेरिका के कान काट रहा होता. लेकिन भारत की भ्रष्ट पुलिस ने मात्र चंद रुपयों के लिए भारत के इस सपने को धूल—धूसरित कर दिया और एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक को गद्दार साबित करने में पूरी ताकत लगा दी. हां ये मजेदार तथ्य है कि ऐसा भारत में ही हो सकता है कि किसी को गोपनीय तकनीक हनी ट्रेप में फंसकर बेचने के आरोप में गिरफ्तार करके लगातार पीटा जाए और बाद में सुप्रीम कोर्ट पूरी चार्जशीट को फर्जी करार दे. इतना ही नहीं स्वयं भारत सरकार उन्हें पद्म भूषण सम्मान भी दे और भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के लिए बदनाम केरल सरकार उन्हें गैरकानूनी गिरफ्तारी के लिए करोड़ों का मुआवजा भी चुकाए.
बिल्कुल ऐसा ही इसरो के एक वैज्ञानिक के साथ 26 साल पहले हुआ जब वे क्रायोजनिक इंजन बनाकर भारत को अं​तरिक्ष विज्ञान में अमेरिका से आगे ले जाना चाहते थे.

30 नवंबर 1994 को जब 53 वर्षीय नांबी नारायणन को गिरफ्तार किया गया उस वक़्त इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान) के क्राइजेनिक रॉकेट इंजन कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे थे। कुछ ही घंटों के भीतर अख़बार उन्हें ‘गद्दार’ कह रहे थे. एक ऐसा गद्दार जिसने मालदीव की दो महिलाओं के हनी ट्रैप के फंसकर रूस से भारत को मिलने वाली टेक्नॉलजी पाकिस्तान को बेच दी थी. इसरो में काम करते हुए नारायणन ने तेज़ी से प्रगति की. उन्हें अमरीका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में रॉकेट से जुड़ी तकनीक का अध्ययन करने के लिए स्कॉलरशिप भी मिली. वहां से पढ़ाई के एक साल बाद वो भारत लौटे और वापस आकर फिर से इसरो में काम करने लगे.
नारायणन ने इसरो में काम करना शुरू किया तब यह अपने शुरुआती दौर में था. सच कहें तो किसी तरह का रॉकेट सिस्टम विकसित करने की हमारी कोई योजना थी ही नहीं. अपने एयरक्राफ़्ट उड़ाने के लिए हम अमरीका और फ़्रांस के रॉकेट इस्तेमाल करने की योजना बना रहे थे. हालांकि ये प्लान बाद में बदल गया और नारायणन भारत के स्वदेशी रॉकेट बनाने के प्रोजेक्ट में अहम भूमिका निभाने लगे.

साल 1994 तक उन्होंने एक वैज्ञानिक के तौर पर बड़ी मेहनत से काम किया. तब तक, जब तक नवंबर 1994 में उनकी ज़िंदगी पूरी तरह उलट-पलट नहीं गई. नारायणन की गिरफ़्तारी से एक महीने पहले केरल पुलिस ने मालदीव की एक महिला मरियम राशीदा को अपने वीज़ा में निर्धारित वक़्त से ज़्यादा समय तक भारत में रहने के आरोप में गिरफ़्तार किया था. राशीदा की गिरफ़्तारी के कुछ महीनों बाद पुलिस ने मालदीव की एक बैंक कर्मचारी फ़ौज़िया हसन को गिरफ़्तार किया. इसके बाद एक बड़ा स्कैंडल सामने आया.
स्थानीय अख़बारों ने अपनी ख़बरों में लिखा मालदीव की ये महिलाएं भारतीय रॉकेट से जुड़ी ‘गुप्त जानकारियां’ चुराकर पाकिस्तान को बेच रही हैं और इसमें इसरो के वैज्ञानिकों की मिलीभगत भी है. फिर ये दावे भी किए जाने लगे कि नांबी नारायणन भी मालदीव की औरतों के हनी ट्रैप के शिकार हुए वैज्ञानिकों में से एक हैं. औपचारिक रूप से गिरफ़्तार किए जाने के बाद नारायणन को अदालत में पेश किया गया.
जांचकर्ता उन्हें पीटते थे और पीटने के बाद एक बिस्तर से बांध दिया करते थे. वो उन्हें 30 घंटे तक खड़े रहकर सवालों के जवाब देने पर मजबूर किया करते थे. उन्हें लाइ-डिटेक्टर टेस्ट लेने पर मजबूर किया जाता था, जबकि इसे भारतीय अदालतों में सबूत के तौर पर मान्यता नहीं है.

नारायणन ने पुलिस को बताया था कि रॉकेट की ख़ुफ़िया जानकारी ‘काग़ज के ज़रिए ट्रांसफ़र नहीं की जा सकती’ और उन्हें साफ़ तौर पर फंसाया जा रहा है. उस समय भारत शक्तिशाली रॉकेट इंजन बनाने के लिए क्राइजेनिक टेक्नॉलजी को हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहा था और इसलिए जांचकर्ताओं ने नारायणन की बातों पर भरोसा नहीं किया. इस मामले में नारायणन को 50 दिन गिरफ़्तारी में गुजारने पड़े थे. वो एक महीने जेल में भी रहे. जब भी उन्हें अदालत में सुनवाई के लिए ले जाया जाता, भीड़ चिल्ला-चिल्लाकरक उन्हें ‘गद्दार’ और ‘जासूस’ बुलाती.
हालांकि नारायणन की गिरफ़्तारी के एक महीने बाद भारत की केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) ने केरल से यह मामला ले लिया.
नारायणन ने सीबीआई के जासूसों से बताया कि वो जिन भी जानकारियों से काम करते थे उनमें से कोई जानकारी ‘क्लासिफ़ाइड’ नहीं थी. एक जासूस ने नारायणन से इस बारे में माफ़ी भी मांगी थी. उसने कहा था, “मुझे मालूम नहीं कि इतना कुछ कैसे हो गया, हमें इसका बहुत दुख है. आख़िरकार 19 जनवरी 1995 को नांबी नारायणन को ज़मानत मिली . नारायणन के अलावा पांच अन्य लोगों पर भी जासूसी और पाकिस्तान को रॉकेट तकनीक बेचने का आरोप लगा था. इसरो में काम करने वाले डी ससिकुमार, दो अन्य भारतीय पुरुष (रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के एक कार्यकर्ता और एक कॉन्ट्रैक्टर) और मालदीव की दो महिलाओं को भी इस सिलसिले में गिरफ़्तार किया था. सीबीआई के मामला बंद किए जाने के बावजूद, राज्य सरकार ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की और सुप्रीम कोर्ट गई. लेकिन साल 1998 में इसे पूरी तरह ख़ारिज कर दिया गया.
इन सबके बाद नारायणन ने उन्हें ग़लत तरीके से फंसाने के लिए केरल सरकार पर मुक़दमा कर दिया. मुआवज़े के तौर पर उन्हें 50 लाख रुपए दिए गए. अभी पिछले महीने केरल सरकार ने कहा कि वो ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी और उत्पीड़न के मुआवज़े के तौर पर उन्हें एक करोड़ 30 लाख रुपए और देगी. साल 2019 में नांबी नारायणन को भारत सरकार के प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केरल पुलिस की भूमिका की जांच के आदेश दिए. नारायणन और पांच अन्य लोगों के ख़िलाफ़ इस तरह की साज़िश क्यों रची गई, यह आज भी रहस्य बना हुआ है. शायद यह षड्यंत्र किसी प्रतिद्वंद्वी अंतरिक्ष शक्ति ने रचा होगा ताकि भारत की रॉकेट टेक्नॉलजी को विकसित होने से रोका जा सके. बाद में यही तकनीक अंतरिक्ष में भारत की सफलता के लिए वरदान साबित हुई. क्या इसके पीछे वो देश थे जो भारत के कम ख़र्च में सैटेलाइट लॉन्च करने से घबराए हुए थे? या फिर ये सिर्फ़ भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार का नतीजा था?

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इस स्कूल के संचालकों ने अमेरिका के कई मिलियन डालर उड़ाए

गुजरात में अहमदाबाद शहर के पालडी क्षेत्र में एक स्कूल में चल रहे अवैध कॉल सेंटर का भंडाफोड़ करते हुए बुधवार को छह लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने बताया कि खुफिया सूचना के आधार पर साइबर अपराध शाखा ने अंकुर स्कूल पर सुबह छापा मारा। इस दौरान स्कूल के एक कमरे में चल रहे कॉल सेंटर से अमेरिकी नागरिकों को फोन करके वित्तीय लेन-देन के नाम पर ठगी करने वाले छह लोगों को पकड़ लिया गया। वहां से लेपटॉप, मोबाइल फोन तथा कम्प्यूटर सहित अन्य सामान जब्त कर लिया गया। पुलिस ने मामला दर्ज करके विस्तृत जांच शुरू कर दी है।

उधर झारखंड के गिरिडीह जिले में अहिल्यापुर थाना क्षेत्र के चिकसोरिया गांव से पुलिस ने चार साइबर अपराधियों को गिरफ्तार कर लिया है।
पुलिस सूत्रों ने बताया कि चिकसोरिया गांव में साइबर अपराधियों के देखे जाने की मिली सूचना के आधार पर कार्रवाई करने के लिए गठित पुलिस टीम ने छापेमारी की। पुलिस को देखते ही जंगल के नजदीक मोबाइल फोन पर बात कर रहे कुछ युवक भागने लगे। पुलिस ने खदेड़ कर चार युवकों को गिरफ्तार कर लिया।

सूत्रों ने बताया कि पूछताछ में गिरफ्तार चारों की पहचान विश्वनाथ कुमार मंडल, राजेंद्र मंडल, कैलाश मंडल और संतोष कुमार मंडल के रूप में हुई है। गिरफ्तार युवकों के पास से कई मोबाइल फोन, सिम कार्ड, एटीएम कार्ड, दो मोटरसाइकिल और 25 हजार रुपये नकद बरामद किए गए हैं। पूछताछ में युवकों ने स्वीकार किया कि वे फोन कर लोगों को खुद की पहचान बैंक अधिकारी बताते हैं और उनसे ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) पूछकर उनके बैंक खाते से रुपये उड़ा लेते हैं।

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15 करोड़ रुपए नहीं दिए तो दुनिया के इस ताकतवर राष्ट्रपति को जेल भेज देगी अदालत

पूरी दुनिया को झुकाने के दम्भ में हर किसी को कुछ भी कह देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर दान की राशि का घोटाला करने के आरोप में एक अमेरिकी अदालत ने 15 करोड़ का जुर्माना लगाया है। अमेरिका के हिसाब से ये राशि बीस लाख डालर है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर न्यूयॉर्क की एक अदालत ने करीब 15 करोड़ रुपये का भारी भरकम जुर्माना लगाया है। अदालत ने इसके साथ ही उनके ट्रंप फाउंडेशन को बंद करने के आदेश भी दे दिए हैं।

ट्रंप को उनके चैरिटेबल फाउंडेशन के गलत इस्तेमाल के लिए 20 लाख डॉलर (करीब 15 करोड़ रुपये) का जुर्माना लगाया गया है। कोर्ट में ट्रंप पर यह आरोप सही साबित हुए हैं कि उन्होंने अपने चैरिटेबल फाउंडेशन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक और बिजनस से जुड़े हितों को साधने के लिए किया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, न्यायाधीश सैलियन स्क्रापुला ने इस मामले पर अपना निर्णय सुनाते हुए यह भी आदेश दिया कि ट्रंप फाउंडेशन को बंद कर दिया जाए और इस फाउंडेशन के बाकी बचे हुए फंड (करीब 17 लाख डॉलर) को अन्य गैर लाभकारी संगठनों में बांट दिया जाए। मामले की सुनवाई के दौरान ट्रंप ने आरोप स्वीकार कर लिया था।
गौरतलब है कि ट्रंप पर यह मुकदमा पिछले साल दायर हुआ था। ट्रंप पर आरोप है कि उन्होंने अपने चैरिटी फाउंडेशन का पैसा 2016 संसदीय चुनाव प्रचार में खर्च किया था।
अटॉर्नी जनरल जेम्स ने यह मुकदमा दायर करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप पर 2.8 मिलियन (28 लाख) डॉलर क्षतिपूर्ति लगाने की मांग की थी। न्यायाधीश स्क्रापुला ने इस राशि को कम करते हुए 20 लाख डॉलर कर दिया। फाउंडेशन के वकील ने पहले कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप पर यह मुकदमा राजनीति से प्रेरित है।

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अमेरिकन अंडों को मिला विश्व का सबसे बड़ा ग्राहक, एक दिन में चट कर जाता है लाखों अंडे

चीन के ​निवासी अब चाव से अमेरिकन अंडों का स्वाद ले सकेंगे क्योंकि दोनों देशों के बीच हुए समझौते के बाद अमेरिका ने चीन को अंडे और अन्य पोल्ट्री उत्पाद निर्यात पर लगाया गया प्रतिबंध खत्म कर दिया है। पिछले काफी समय से चीन वालों को अमेरिकन अंडे और मुर्गे खाने को नहीं मिल रहे थे। चीन में एक दिन में कई अरब अंडों की बिक्री होती है।

चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने शनिवार को एक बयान जारी कर कहा कि अमेरिका और चीन ने पोल्ट्री उत्पादों के आयात की शर्तों पर आम सहमति बना ली है। मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, मत्स्य और पोल्ट्री उत्पादों के आयात को लेकर अमेरिका और चीन आम सहमति पर पहुंच गए हैं। दोनों देश अमेरिका द्वारा चीन को पोल्ट्री उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने पर भी सहमत हुए है।
इससे पहले शुक्रवार को अमेरिकी व्यापार के कार्यालय प्रतिनिधि ने कहा कि दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण के कुछ वर्गों को अंतिम रूप देने के करीब है। इन समझौतों की रूपरेखा दरअसल चीन के वाइस प्रीमियर लियू हे और अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्टीवन मेनुचिन तथा ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव रॉबर्ट लाइटहाइजर के बीच बातचीत के दौरान तय की गयी है। दोनों देश एक दूसरे के हितों पर विचार-विमर्श करने के लिए भी सहमत हुए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अक्टूबर की शुरुआत में वाशिंगटन में लियू के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद घोषणा करते हुए कहा था कि वह व्यापार वार्ता के पहले चरण की बातचीत के लिए सहमत है।

उन्होंने कहा था कि अमेरिका में बौद्धिक संपदा और वित्तीय सेवाओं से संबंधित सुधार करने के तहत चीन 40-50 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद खरीदने पर सहमत भी हुआ है। उधर अमेरिका ने क्यूबा पर अतिरिक्त दबाव बनाने के लिए उसके सभी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों से अमेरिकी एयरलाइंस के विमानों की उड़ानों पर दिसंबर से प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी वक्तव्य के मुताबिक क्यूबा की राजधानी हवाना स्थित जोस मार्टी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को इस प्रतिबंध से दूर रखा जाएगा। वक्तव्य के अनुसार 45 दिनों के भीतर अमेरिका और क्यूबा के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के बीच विमानों के परिचालन को रोक दिया जाएगा। इसका उद्देश्य विमानों के परिचालन से क्यूबा को होने वाले फायदे को राेकना है। अमेरिकी मीडिया के अनुसार विभिन्न अमेरिकी शहरों से क्यूबा के सांता क्लारा, सेंटियागो और होलगुइन समेत नौ स्थानों स्थानों की ओर जाने वाली सभी निर्धारित उड़ानों को निलंबित कर दिया जाएगा। क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिगुइज ने टि्वटर पर अमेरिका के इस कदम की निंदा की है।

उन्होंने कहा कि इससे अमेरिकी लोगों की स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा होगा और दाेनों देशों के लोगों के बीच संपर्क स्थापित करने में बाधा आएगी। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार का समर्थन करने के कारण क्यूबा पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने यह कदम उठाए हैं। गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान अमेरिका और क्यूबा के रिश्ते खराब हुए हैं, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने के लिए काफी प्रयास किए थे।

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अमेरिका ने फिर मरोड़ा भारत का हाथ, नाराज भारत ने कहा, हद में रहे अमेरिका

पिछले छह माह से भारत—पाकिस्तान के फटे में कश्मीर के बहाने टांग फंसाने की ताक में बैठे अमेरिका ने एक बार फिर भारत की बांह मरोड़ने की कोशिश की है। उसने न सिर्फ कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद के हालात पर उंगली उठाते हुए फिर दोहराया है कि राष्ट्रपति ट्रम्प कश्मीर मामले भारत—पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता को तैयार है। हालांकि भारत ने तत्काल इस पर नाराजगी जाहिर कर दी लेकिन अमेरिका पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा।

विदेश विभाग के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि कश्मीर पर अमरीकी कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने खेदजनक टिप्पणियां की हैं। समिति के लोगों को भारत के फ़ैसले की आलोचना करने की बजाय सीमा पार से कश्मीर में होने वाली प्रायोजित घुसपैठ की निंदा करनी चाहिए थी।
यह दुखद है कि कुछ सदस्यों ने कश्मीर के लोगों की बेहतरी और कश्मीर में शांति बनाए रखने के मकसद से उठाए गए कदम पर सवाल खड़े किए हैं। अमरीकी प्रशासन के अधिकारियों ने कहा था कि उनका एक पैनल 5 अगस्त के बाद कश्मीर जाना चाहता था लेकिन भारत ने इनकार कर दिया। जम्मू-कश्मीर मामले में पाकिस्तान लगातार अमेरिका से मध्यस्थता करने की बात कह रहा है जबकि भारत इसे अपना आंतरिक मामला मानता है।

Narendra Modi

अमेरिका ने भारत से कहा था कि वह कश्मीर में राजनीतिक और आर्थिक स्थिति सामान्य करने का ‘खाका’ पेश करने और जल्द से जल्द राजनीतिक बंदियों को रिहा करे। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के ‘फॉगी बॉटम मुख्यालय’ में अमेरिकी प्रतिनिधि ने पत्रकारों से कहा कि अमेरिका घाटी की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। करीब 80 लाख स्थानीय लोगों का जीवन जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने और राजनीतिज्ञों को बिना कारण हिरासत में लेने और संचार प्रतिबंधों के कारण प्रभावित है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में सुरक्षा प्रतिबंधों के चलते पत्रकारों को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रवक्ता ने कहा कि लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे गिरोह निश्चित तौर पर परेशानी का कारण हैं। उन्होंने कहा, इस सिलसिले में हम पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के सितंबर में आए उस बेबाक बयान का स्वागत करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीर में हिंसा करने के लिए पाकिस्तान से गुजरने वाला हर शख्स पाकिस्तानियों और कश्मीरियों, दोनों का दुश्मन होगा’ इस बीच, विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक बार फिर कहा कि अगर दोनों देश चाहें तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मामले पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं। वह (ट्रम्प) निश्चित तौर पर मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार हैं, अगर दोनों देश इस पर सहमत हों तो।

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कई दिनों तक पसीना पीकर बुझाई प्यास फिर भी लात मारकर वापस भारत भेजा

धन कमाने की चाह में अमेरिका जाने निकले 300 से ज्यादा भारतवासियों को जान बचाने के लिए अपने कपड़ों में भरे पसीने को निचोड़कर प्यास बुझानी पड़ी। कई दिनों तक भूखे रहकर पसीना पी—पीकर अमेरिका के मेक्सिको पहुंचे इन भारतीयों को अब वापस भेज दिया गया है। मेक्सिको से 300 से ज़्यादा भारतीयों को वापस डिपोर्ट किए जाने की भारत में मेक्सिको के राजदूत ने पुष्टि की है। ये लोग अवैध रूप से मेक्सिको में घुसे थे और अमरीका जाने की कोशिश कर रहे थे।
इन भारतीयों की पूरी रामकथा दिल्ली से छपने वाले एक अंग्रेजी अखबार ने सिलसिलेवार प्रकाशित की है। आपबीती में बताया गया है कि इन लोगों को इक्वाडोर तक विमान से और उसके बाद सड़क और हवाई मार्ग के इस्तेमाल से कोलंबिया, ब्राज़ील, पेरू, पनामा, कोस्टारिका, निकारगुआ, होंडुरस और ग्वाटेमाला से होते हुए मेक्सिको लाया गया। वीज़ा एजेंट्स उनसे 15-20 लाख रुपये प्रति व्यक्ति मांग रहे थे।

 

लेकिन फिर उन्होंने यूट्यूब पर वीडियो देखे और उन लोगों के बारे में सुना जो ऐसे ही तरीक़ों से सफलतापूर्वक अमरीका पहुंच गए थे। हालांकि उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें जंगलों में बिना खाए-पिए सफ़र करना होगा। उन्होंने कई हफ़्ते सस्ते होटलों में ठहरते हुए गुज़ारे। इस दौरान उन्हें बीमारियां, प्यास और जंगल के पैदल सफ़र जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इनमें से एक शख़्स बताया कि पनामा के जंगलों से गुज़रते हुए उन्हें अपनी कमीज़ का पसीना भी निचोड़कर पीना पड़ा। ये नौजवान पंजाब और हरियाणा से हैं, बेरोज़गार हैं और ज़्यादातर का संबंध किसान परिवार से हैं। भारत में मेक्सिको के राजदूत फेडरिको सालास का कहना है कि ये सभी ज़रूरी दस्तावेज़ों के बिना अवैध रूप से मेक्सिको पहुंचे थे। इसलिए उन्हें वापस भेजा गया और ऐसा भारतीय दूतावास और अधिकारियों की जानकारी में किया गया। उन्होंने कहा, “इस वक़्त पूरी दुनिया में अप्रत्याशित संख्या में प्रवासी हैं। इस मामले में इन लोगों को पहले लैटिन अमरीका, फिर मेक्सिको और फिर अमरीका ले जाने की कोशिश थी। मेक्सिको सरकार इस तरह की कई घटनाओं से रूबरू होती रही है जिसमें प्रवासी ख़ुद मानव तस्करी के पीड़ित होते हैं। उन्होंने बताया कि मेक्सिको के ज़रिये अमरीका में पहुंचने की अवैध कोशिशें अकसर होती रही हैं क्योंकि अमरीका में अवैध प्रवेश के दूसरे तरीक़े बहुत कम हैं।

 

 

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अमेरिका ने दिखाया अपना असली रंग, पाकिस्तान से एफ 16 छीनने के स्थान पर भारत से छीन लीं ये चीज

चुनावी लड़ाई की तैयारी कर रही भारत की मोदी सरकार को अमेरिका ने तगड़ा झटका देते हुए उससे व्यापार के लिए अत्यंत पसंदीदा राष्ट्र का दर्जा छीन लिया है। अमेरिका के इस कदम से भारत का करीब 560 करोड़ डालर का व्यापार खतरे में पड़ गया है। 

 

समाचार एजेंसी रायटर के अनुसार अमेरिका ने अपने बाजारों तक उसकी पहुंच प्रदान करने में विफल रहने के बाद भारत के कर मुक्त देश के दर्जे को समाप्त कर दिया है। अमेरिका ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कांग्रेस (संसद) को एक पत्र लिखकर यह जानकारी दी है। ट्रम्प ने सोमवार को कांग्रेस को बताया, “मैं प्राथमिकताओं के सामान्यीकरण प्रणाली (जीएसपी) कार्यक्रम के विकासशील देश के तौर पर भारत को प्राप्त उपाधि को समाप्त करने की सूचना प्रदान कर रहा हूं। 

 

मैं यह कदम इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि अमेरिका तथा भारत सरकार के बीच मजबूत सम्बंध के बावजूद मैंने यह पाया है कि भारत ने अमेरिका को यह आश्वासन नहीं दिया है कि वह अपने बाजारों में उसकी न्याय संगत और उचित पहुंच प्रदान करेगा।” इसके साथ ही ट्रम्प ने एक अलग पत्र में कांग्रेस को बताया है कि उन्होंने आर्थिक विकास के आधार पर तुर्की के कर मुक्त देश के दर्जे को भी समाप्त कर दिया है।
ट्रम्प ने यह कदम हाल ही भारत की ओर से अमेरिकी आयात पर शुल्क बढ़ाने के जवाब में उठाया है। ट्रम्प ने कहा है कि भारत सरकार के साथ काफी चर्चा के बाद वे ये क़दम उठा रहे हैं क्योंकि भारत ने अब तक अमेरिका को इस बात का आश्वासन नहीं दिया है कि वो अपने बाज़ारों तक अमेरिकी समान और उचित तरीके से पहुंचने देगा। 

 

उल्लेखनीय है कि सन् 1970 में अमेरिका ने खास आयात नीति अपनाते हुए भारत और ​तुर्की को विकासशील देश के रूप में अत्यंत पसंदीदा राष्ट्र का दर्जा दिया था। इस दर्जे के समाप्त होने के बाद भारत का करीब 560 करोड़ डालर का सामान आयात शुल्क चुकाने के बाद ही अमेरिकी बाजारों तक पहुंच पाएगा।कांग्रेस जब इस आदेश को पारित कर देगी तब साठ दिन बाद यह नियम अमल में आ जाएगा। व्यापारिक प्रतिनिधि दफ्तर के बयान के अनुसार अप्रैल 2018 में इस बात पर पुनर्विचार करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी कि भारत को पसंदीदा राष्ट्र के दर्जे को बनाए रखना चाहिए अथवा नहीं।

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इस देस की ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ खतरे में

वाशिंगटन । ( स्पूतनिक) अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि जो लोग मध्य अमेरिकी प्रवासियों के अमेरिका-मैक्सिको सीमा पर आने का बचाव कर रहे हैं, वह अमेरिका के ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ को खतरे में डाल रहे हैं।

Donald Trump

ट्रम्प ने बुधवार को ट्वीट कर कहा, “ जो लोग सुरक्षा और हमारे नागरिकों की सुरक्षा के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, वैसे लोगों की न्यायिक सक्रियता हमारे देश को बड़े खतरे में डाल रहे हैं।यह अच्छा नहीं है!”उल्लेखनीय है कि सैन फ्रांसिस्को के एक जिला न्यायाधीश ने ट्रम्प द्वारा हस्ताक्षरित उस एक घोषणा पर मंगलवार को रोक लगा दी थी

 जिसके तहत गैर कानूनी तरीके से अमेरिका में घुसने वाले लोगों को शरण देने पर रोक लगा दी गई थी। अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन समेत वकीलों के कई समूहों ने ट्रम्प के इस आदेश को चुनौती दी थी।

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बातचीत खत्म करने के लिए अमेरिका जिम्मेदार:मोहम्मद जावेद ज़रीफ

लंदन। ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद ज़रीफ ने एक ट्वीट कर कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते से अलग होकर अमेरिका ने ही बातचीत खत्म की है जिसके लिए उसे स्वयं को दोषी ठहराना चाहिए।

 

Mohammad Javed Zarif
Mohammad Javed Zarif

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ज़रीफ ने ट्वीट किया। अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते से अलग होकर दोनों देशों के बीच बातचीत खत्म करने के लिए अमेरिका केवल खुद को ही दोषी ठहरा सकता है।”इससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बिना किसी शर्त ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से मिलने की इच्छा व्यक्त की थी। ट्रम्प ने कहा कि ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका के अलग होने के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए वह बिना किसी शर्त के ईरान के नेता से मिलने के लिए तैयार हैं।

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अमेरिकी राष्ट्रपति ने इटली के प्रधानमंत्री के साथ व्हाइट हाउस में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान कहा,“यदि वे मिलना चाहते हैं तो मैं निश्चित रूप से ईरान के नेता से मिलूंगा। मुझे नहीं पता कि वे अभी तैयार हैं। मैंने ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को अलग किया। वह एक बेतुका समझौता था। मुझे विश्वास है कि वे शायद मिलना चाहते हैं और मैं किसी भी समय मिलने के लिए तैयार हूं।

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(इस खबर को मोबाइल पे न्यूज संपादकीय टीम ने संपादित नहीं किया है। यह एजेंसी फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)

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