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इस बिजली का स्विच आॅन करते ही घर में बरसने लगता है जहर - Mobile Pe News
Monday , January 20 2020
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इस बिजली का स्विच आॅन करते ही घर में बरसने लगता है जहर

जिस बिजली के बिना आपका एक क्षण भी गुजारा नहीं है, उसे बनाने वाले बिजलीघर ही नहीं आपके घरों तक आने वाली बिजली में इतना जहर है कि वह लाइट का स्विच आॅन करते ही आपके घर को प्रदूषित करना शुरू कर देती है. जी हां भारत के ताप आधारित अर्थात कोयले से चलने वाले बिजलीघर हानिकारक SO2 यानी सल्फ़र डाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन रोकने फेल हैं.
दिल्ली, यूपी, हरियाणा और पंजाब के कुल 11 कोयला बिजलीघरों को 31 दिसंबर 2019 तक सल्फ़र डाई ऑक्साइड को रोकने के लिये प्रदूषण नियंत्रक टेक्नोलॉजी लगानी थी जिसे फ्ल्यू गैस डी-सल्फ़राइजेशन या FGD कहा जाता है. लेकिन हरियाणा स्थित एक पावर प्लांट को छोड़कर बाकी किसी बिजलीघर ने इस आदेश का पालन नहीं किया. इससे भी बड़ी और हैरान करने वाली बात ये कि राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को – यह पता ही नहीं है कि सरकार ने बिजलीघरों को जो FGD तकनीक लगाने को कहा था.

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) ने इसे बेहद गम्भीर स्थिति माना है. असल में दिल्ली से लगे राज्यों हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुल 11 बिजलीघरों समेत देश भर की 450 से अधिक पावर प्लांट इकाइयों को 2015 में सरकार ने यह आदेश दिया था कि वह सल्फर डाइ ऑक्साइड (SO2) के उत्सर्जन को कम करने के लिये इमीशन कंट्रोल टेक्नोलॉजी लगाए. पंजाब, हरियाणा और यूपी के इन 11 बिजलीघरों के लिये दिसंबर 2017 की डेडलाइन रखी गई. इनमें उत्तर प्रदेश में 2 बिजलीघर, हरियाणा में 5 और पंजाब में 4 प्लांट हैं.
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने बाद में यह समय सीमा बढ़ाकर दिसंबर 2019 तक कर दी थी. कोर्ट ने इन 11 बिजलीघरों को छोड़कर देश के ज्यादातर बिजलीघरों के लिये 2022 तक की कट-ऑफ टाइम लाइन मुकर्रर की. लेकिन हरियाणा स्थित महात्मा गांधी थर्मल पावर प्लांट को छोड़कर किसी भी बिजलीघर ने नियमों का पालन नहीं किया और SO2 कंट्रोल डिवाइस नहीं लगाई. केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय को पहले ही समय सीमा बढ़ाने के लिये लिख चुका है. देश की 90% से अधिक कंपनियां अभी सल्फर नियंत्रण टेक्वोलॉजी लगा पाने की स्थिति में नहीं है.
जहां तक पानीपत थर्मल पावर प्लांट का सवाल है SO2 नियंत्रक लगाने के लिये टेंडर निकाल दिया है. हिसार और यमुनानगर के संयंत्रों के लिये दूसरी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे फिट करने में 18 से 20 महीने लगते हैं. सल्फर डाइ ऑक्साइड कोल (SO2) पावर प्लांट के अलावा वाहनों और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन को जलाने से निकलती है. वातावरण में आते ही कुछ ही घंटों के भीतर यह सल्फेट के अलग—अलग प्रकारों में बदल जाती है. इससे PM 2.5 कणों का घनत्व हवा में बढ़ता है और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) तेज़ी से बिगड़ता है. यह गैस आंख, नाक, गले और सांस की नलियों में तकलीफ और संक्रमण के अलावा दमे की बीमारी के लिये ज़िम्मेदार है. खासतौर से बुज़ुर्गों और बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका अधिक हानिकारक असर पड़ता है.
पिछले साल दीपावली के बाद दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 700 माइक्रोग्राम/घन मीटर से 900 माइक्रोग्राम/घनमीटर की रेंज में था. हालात इतने बिगड़े कि दिल्ली सरकार को हेल्थ इमरजेंसी की घोषणा करनी पड़ी. स्कूल बन्द करने, निर्माण कार्य रोकने और ऑड-ईवन कार राशनिंग स्कीम जैसे कदम उठाये गये. इस साल की शुरुआत में भी राजधानी के कई इलाकों में एयर क्वॉलिटी इंडिकेस 650 को पार कर गया है. महत्वपूर्ण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के हिसाब से PM 2.5 कणों की हवा में उपस्थिति 25 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिये.
पिछले कुछ सालों में भारत के पड़ोसी देश चीन ने FGD तकनीक का इस्तेमाल कर हवा में SO2 को काफी हद तक कम किया है. साल 2017 तक चीन के 95% से अधिक उद्योगों और कोयला बिजलीघरों में FGD तकनीक लग चुकी थी. IIT कानपुर की 2015 की रिपोर्ट में कहा गया कि अगर दिल्ली के 300 किलोमीटर के दायरे में मौजूद 13 बिजलीघरों से SO2 उत्सर्जन को 90% कम कर दिया जाये तो इससे हानिकारक PM 2.5 की मात्रा 35 माइक्रोग्राम प्रतिघन मीटर कम हो जायेगी. हालांकि पंजाब के नाभा में निजी कंपनी एल एंड टी (लार्सन एंट टूब्रो) अकेला बिजलीघर है जिसने नियमों की परवाह करते हुए अपने प्लांट को फिलहाल बन्द कर दिया. एल एंड टी ने कहा है कि केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड द्वारा (प्रदूषण नियंत्रक उपकरण लगाने की) समय सीमा न बढ़ाये जाने से उसे अपने बिजलीघर की दोनों यूनिट बन्द करनी पड़ रही हैं.
इन कंपनियों का कहना है SO2 नियंत्रण मानकों के पालन के लिये भारी निवेश और पैसे की ज़रूरत है. ज़्यादातर कंपनियों से बात करने पर पता चलता है कि अभी कम से कम 2-3 साल तक ये कोयला बिजलीघर FGD जैसी तकनीक नहीं लगा पायेंगे. निजी पावर कंपनी वेदांता के पंजाब स्थित बिजलीघर तलवंडी साबो पावर लिमिटेड (TSPL) ने बीबीसी हिन्दी को दिये अपने बयान में कहा कि उनका बिजलीघर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े 80% (5 में से 4) मानकों को पूरा करता है. टीएसपीएल SO2 उत्सर्जन से जुड़े मानकों को पूरा करने के लिये भारी निवेश की ज़रूरत है और उपकरण लगाने के लिये 32-36 महीने चाहिये.

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