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राजस्थान में मुख्यमंत्री को झूठी रिपोर्ट भेजने पर मिलती है पदोन्नति!

दवा कारोबारी से मिलीभगत के आरोपी हैं ड्रग कंट्रोलर !

जयपुर. क्या कोई यकीन करेगा कि नकली दवा कारोबारी के खिलाफ कार्रवाई की झूठी जानकारी मुख्यमंत्री को भेजने वाले अधिकारी को सजा नहीं पदोन्नति मिलती है? चौंकिए मत, राजस्थान में ऐसा ही होता है। यहां एक ऐसे ड्रग कंट्रोलर है जिन्हें राज्य के तीन मुख्यमंत्री पिछले 11 साल में दंडित नहीं कर पाए। मजे की बात ये कि मौजूदा चिकित्सा मंत्री ने उन्हें राज्य में नकली दवाओं का कारोबार रोकने और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का जिम्मा भी सौंप रखा है।

कहानी की शुरूआत 2009 में होती है जब बीकानेर के एक पेंशनर धर्मेश कुमार ने मुख्यमंत्री को एक शिकायत भेजी कि बीकानेर के सादुलगंज स्थित मैसर्स स्वास्तिक मेडिकोज एजेंसी पेंशनरों को डाक्टरों की लिखी दवा देने की अपेक्षा नकली दवा देती है जिससे पेंशनरों के जीवन पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय ने शिकायत प्रमुख चिकित्सा एंव स्वास्थ्य सचिव को भिजवा दी, जहां से फाइलों का सफर तय करते हुए वह तत्कालीन ड्रग कंट्रोलर पी एन सारस्वत तक पहुंची और बीकानेर के तत्कालीन सहायक औषधि नियंत्रक दिवाकर पटेल को कार्रवाई के आदेश भेज दिए गए।

ऐसे हुआ भंडाफोड़

सारस्वत के कई स्मरण पत्रों के बाद दिवाकर पटेल ने सूचना भेजी कि फर्म को कारण बताओ नोटिस देने के साथ ही उसका ड्रग लाइसेंस तीन दिन के लिए निलम्बित किया जा चुका है। सारस्वत ने पटेल की झूठी सूचना ज्यों की त्यों मुख्यमंत्री कार्यालय को भिजवा दी और इसी के साथ मामला फाइलों के जंगल में गुम हो गया, लेकिन इस बीच दिवाकर का तबादला जयपुर जिले में हो गया और उनके स्थान पर आए हीरालाल बंसल ने चार्ज सम्भालने के बाद ड्रग कंट्रोलर को 18 जून 2010 को रिपोर्ट भेजी कि दिवाकर ने 24 जुलाई 2009 को नकली दवा बेचने वाले स्वस्तिक मेडिकोज एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की झूठी रिपोर्ट भेजी थी। उन्होंने ना तो स्वस्तिक का लाइसेंस निलम्बित किया और ना ही उन्हें नोटिस दिया।

लाल-पीला हुआ मुख्यमंत्री कार्यालय

बंसल की रिपोर्ट से ड्रग कंट्रोलर आफिस में खलबली मच गई। चूंकि मुख्यमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट तत्कालीन ड्रग कंट्रोलर पी एन सारस्वत ने भेजी थी, इसलिए उन्होंने अपनी खाल बचाने के लिए बंसल की रिपोर्ट मुख्यमंत्री को भेज दी। इससे लाल-पीले हुए मुख्यमंत्री कार्यालय ने पूरे मामले की जांच सम्भागीय आयुक्त बीकानेर और जिला कलक्टर बीकानेर से अलग-अलग कराई और दोनों का निष्कर्ष आया कि दिवाकर ने ड्रग कंट्रोलर के जरिए मुख्यमंत्री को न सिर्फ धोखा दिया बल्कि पेंशनरों के जीवन से खिलवाड़ की खुली छूट स्वस्तिक मेडिकोज एजेंसी को दे रखी थी।

सीसीए रूल्स में कार्रवाई के आदेश

जांच रिपोर्ट मिलते ही मुख्यमंत्री कार्यालय ने नकली दवा कारो​बारियों से मिलीभगत के आरोपी दिवाकर पटेल के खिलाफ सीसीए रूल्स (THE RAJASTHAN CIVIL SERVICES (CLASSIFICATION, CONTROL AND APPEAL) RULES, 1958) के तहत 23 अगस्त 2010 को कार्रवाई के आदेश दिए, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस बीच करनाणी मोहल्ला नई लेन गंगाशहर बीकानेर के जोगेन्द्र शर्मा ने मुख्य सचिव को ​शिकायत भेजी कि प्रमुख स्वास्थ्य सचिव कार्यालय के एक उपसचिव कार्रवाई को 16 से 17 सीसीए में बदलकर आरोपी को बचा रहे हैं।

चिकित्सा मंत्री ने दिए थे 17 सीसीए में कार्रवाई के आदेश !

इस स्टेज पर अचानक चिकित्सा मंत्री की एंट्री होती है। तत्कालीन प्रमुख स्वास्थ्य सचिव 23 सितम्बर 2011 को पत्रावली पर लिखते हैं कि दिवाकर के खिलाफ 17 सीसीए की कार्रवाई चिकित्सा मंत्री के निर्देश के आधार पर प्रस्तावित है। सूत्रों के अनुसार पर्दे के पीछे चिकित्सा मंत्री के संकेतों को समझते हुए प्रमुख शासन सचिव कार्यालय ने मामले को फिर से फाइलों के जंगल में फेंक दिया और मुख्यमंत्री कार्यालय स्मरण पत्र लिखते ही रह गया। इस बीच दिवाकर सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए राज्य के ड्रग कंट्रोलर बन गए। तब से अब तक राज्य में वसुंधरा राजे एक बार और अशोक गहलोत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन नकली दवा कारोबारियों के हिमायतियों के खिलाफ कार्रवाई ढाक के तीन पात है।