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भारत के हरे रेगिस्तानों में दम तोड़ रहे हैं बरगद, पीपल

नई दिल्ली. भारत के जंगलों के बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुकी विलायती बबूल प्रजाति हरे रेगिस्तान तैयार कर रही है। इन रेगिस्तानों में देसी प्रजाति के वृक्ष दम तोड़ रहे हैं और विलायती कीकर फलफूल रहा है। यहां तक कि जंगलों में बरगद और पीपल जैसे भारी—भरकम वृक्ष भी इसके आगे लाचार हो गए हैं। विलायती कीकर (विदेशी बबूल) मैक्सिको से आयातित पादप प्रजाति है। वहां इसे मेसकीट नाम से जाना जाता है। विज्ञानी इसे प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा के नाम से जानते हैं। अंग्रेज 20वीं शताब्दी के आरंभिक दौर में इसे दिल्ली ले आए थे।

1970 के दशक में संयुक्त राष्ट्र ने इसे करिश्माई पेड़ कहा था। यह नाइट्रोजन का स्तर स्थिर बनाए रखकर मिट्टी की गुणवत्ता को सुधार सकता था और पक्षी इसमें अपने बसेरे बना सकते थे। दो दशकों के भीतर ही भारत समेत दुनिया के कई सूखाग्रस्त क्षेत्रों में छा गया।

विलायती बबूल के बीज से डायबिटीज की दवा

राजस्थान और कच्छ जैसे सूखे क्षेत्रों में ग्रामीणों की जलावन लकड़ी का 75 प्रतिशत हिस्सा विलायती कीकर से आता है। तमिलनाडु और केन्या के कुछ भागों में कुछ उद्यमी कीकर की लकड़ी का चारकोल बेचते हैं। दक्षिण अफ्रीका में एक निजी कंपनी बबूल के बीजों को दवा के रूप में बेचती है। यह दवा रक्तशर्करा (ब्लड शुगर) के स्तर को स्थिर रखने के काम आने वाली बताई जाती है।

यह प्रजाति जलस्तर को घटाकर और देसी प्रजातियों को नष्ट करके नए हरे रेगिस्तान तैयार कर रही हैं। अभी तक जिसे करिश्माई पेड़ कहा जा रहा था, वही अब शैतानी वृक्ष में बदल चुका था।