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सौ साल पहले भारत में इस महामारी से मारे गए थे एक करोड़ 70 लाख लोग

लगभग एक सदी पूर्व कोरोना जैसी महामारी से भारत में एक करोड़ 70 लाख लोगों की मौत हो गई थी. पूरी दुनिया में इस महामारी से पांच करोड़ लोग काल के गाल में समा गए थे. इस बीमारी का नाम था स्पेनिश फ्लू. इसे अक्सर ‘मदर ऑफ़ ऑल पैंडेमिक्स’ यानी सबसे बड़ी महामारी कहा जाता है.

वैज्ञानिकों और इतिहासकारों का मानना है कि उस वक्त दुनिया की आबादी 1.8 अरब थी और आबादी का एक-तिहाई हिस्सा संक्रमण की चपेट में आ गया था. तब पहला विश्व युद्ध खत्म ही हुआ था. लेकिन, इस महामारी से मरने वालों की तादाद पहले विश्व युद्ध में मरने वालों की संख्या को भी पार कर गई थी. आज के दौर के मुक़ाबले किसी बीमारी का सामना करने के लिहाज से दवाइयां और विज्ञान उस वक्त बेहद सीमित था.

दुनिया की पहली एंटीबायोटिक की खोज 1928 में

डॉक्टरों को यह तो पता चल गया था कि स्पेनिश फ़्लू के पीछे माइक्रो-ऑर्गेनिज़्म है. उन्हें यह भी पता था कि यह बीमारी एक शख़्स से दूसरे शख़्स में फैल सकती है. लेकिन, वे तब ये मान रहे थे कि इस महामारी की वजह वायरस न होकर एक बैक्टीरिया है. उस दौरान इलाज भी सीमित था. दुनिया की पहली एंटीबायोटिक की खोज 1928 में जाकर हो पाई थी. पहली फ़्लू वैक्सीन 1940 में लोगों के लिए उपलब्ध हो सकी. उस वक्त सबके लिए इलाज की व्यवस्था मुमकिन नहीं थी. यहां तक कि अमीर देशों में भी पब्लिक सैनिटेशन एक लग्ज़री थी.

कोई युवा व्यक्ति जीवित नहीं बचा

औद्योगिक देशों में ज्यादातर डॉक्टर या तो खुद के लिए काम करते थे या उन्हें चैरिटी या धार्मिक संस्थानों से पैसा मिलता था. ज्यादातर लोगों के पास इलाज कराने की सहूलियत नहीं थी. स्पेनिश फ़्लू ने इस तरह से हमला किया जैसा इससे पहले की किसी भी महामारी में नहीं देखा गया था. इससे पहले 1889-90 में फैली महामारी से 10 लाख से ज्यादा लोग पूरी दुनिया में मारे गए थे, लेकिन इसका दायरा स्पेनिश फ़्लू जैसा नहीं था. दूसरी तरफ, भारत में स्पेनिश फ़्लू से मरने वालों की तादाद आबादी की 5.2 फीसदी यानी करीब 1.7 करोड़ लोग थे. कई देशों में घर चलाने की जिम्मेदारी उठाने वाला, खेती करने वाले, कारोबार करने वाले कोई युवा व्यक्ति जीवित नहीं बचा था. शादी और बच्चे पैदा कर मरे हुए लोगों की भरपाई करने तक के लिए युवा नहीं बचे थे. ऐसे लाखों युवा खत्म हो गए थे.’
योग्य लोगों के अभाव में अकेली बची औरतों की समस्या पैदा हो गई. लाखों महिलाओं के पास कोई पार्टनर नहीं था.
1918 तक भारत को ब्रिटेन की कॉलोनी बने तकरीबन एक सदी बीत चुकी थी. भारत में स्पेनिश फ़्लू उसी साल मई में आया. भारत में इसकी चोट ब्रिटिश नागरिकों से ज्यादा भारतीय आबादी पर पड़ी. आंकड़े बताते हैं कि हिंदुओं में नीची जातियों की मृत्यु दर हर 1,000 लोगों पर 61.6 के स्तर पर पहुंच गई थी. जबकि यूरोपीय लोगों के लिए यह प्रति हजार 9 से भी कम थी.

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कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाएंगे एंटी वायरल कपड़े से बने वस्त्र

फैशन बाजार ने कोरोना संक्रमण के चलते देश भर में लागू लॉकडाउन का फायदा उठाने का रास्ता खोज लिया है। वह फैशन के दीवाने लोगों के लिए एंटी वायरल कपड़ा लेकर आया है। बाजार का दावा है कि इस कपड़े से बने वस्त्र पहनने वालों से कोरोना वायरस कई मीटर दूर रहेगा।

सूक्ष्मजीवों को पनपने से रोकते हैं एंटीवायरल और एंटी-बैक्टीरियल कपड़े 

ये कपड़ा ग्राडो नामक कम्पनी ने बनाया है। डोनियर समूह की कंपनियों द्वारा विकसित और ग्राडो की निर्माण इकाइयों द्वारा बेहतरीन तरीके से तैयार किए गए परिधानों में सूट से लेकर जैकेट और पतलून तक किसी भी तरह के परिधान पहनने और उपयोग करने के लिए सुरक्षित प्रमाणित किए गए हैं। विशेष रूप से डिजाइन किए गए एंटीवायरल और एंटी-बैक्टीरियल कपड़े सूक्ष्मजीवों को पनपने से रोकते हैं। जिससे वे सुरक्षित और स्वच्छ बनते हैं। कपड़े अपने गुणों को 50 बार धुलने तक भी बरकरार रखते हैं और हर रोज पहनने के लिए उपयुक्त हैं।
ग्राडो के एक अधिकारी ने कहा कि दुनिया की मौजूदा स्थिति को देखते हुए बाजार में इस लॉकडाउन के लिए ज्यादा हाइजीन प्रोडक्ट की पेशकश करने की स्थिति में होना चाहते थे और फिलहाल एंटी वायरल कपड़ों से बेहतर और क्या हो सकता है, जिसे हर कोई पहन सकता है। हम इस मुश्किल समय में राष्ट्र के लिए अपना योगदान देने के बारे में गर्व महसूस कर रहे हैं।

सुरक्षा की गारंटी नहीं

यहां यह उल्लेखनीय है कि कोरोना संकट के बीच जहां हम सब परेशान हैं, वहीं क्या हमने एक बार भी सोचा है कि जब हम घरों से बाहर निकलने के लिए आजाद होंगे तो क्या अपने फैंसी कपड़ों में सुकून के साथ बाहर निकलने का साहस कर पाएंगे? एंटीवायरल कपड़ों को पहनने से इसमें मदद मिल सकती है, जो भले ही सुरक्षा की गारंटी नहीं देता है, लेकिन कम से कम मानसिक शांति देता है। नियो टेक्नोलॉजी की मदद से जो बेहतरीन क्वालिटी का उपयोगी प्रोडक्ट बनाता है, जो बैक्टीरिया और वायरस से सुरक्षा कवच प्रदान करता है, जिंदगी शायद सहज व आसान हो जाए। ग्राडो नियो टेक्नोलॉजी उपयोग करते हुए वायरस और रोगाणुओं से सुरक्षा के लिए कपड़े बनाने वाली पहली कपड़ा कंपनी है।

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अब सीबीआई करेगी खीरे की तस्करी की जांच, तस्कर पूरी दुनिया में करते हैं स्मगलिंग

सीबीआई अब खीरे की तस्करी की जांच करेगी, लेकिन वह खेतों में उगने वाला खीरा नहीं बल्कि समुद्र में उत्पन्न होने वाला खीरा है। आश्चर्य मत करिए, सी ककम्बर कहलाने वाला खीरे की शक्ल का यह जीव लक्षद्वीप के तटों पर भारी मात्रा में मिलता है और पूरी दुनिया विशेषकर जापान में इसे चाव से खाया जाता है। तस्कर इसकी लक्षद्वीप से पूरी दुनिया में स्मगलिंग करते हैं।

समुद्री जीव है सी ककम्बर

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने लक्षद्वीप से समु्द्री जीव सी ककम्बर की विभिन्न प्रजातियों की तस्करी के मामले में जांच शुरू कर दी है। सीबीआई ने पर्यावरण मंत्रालय के अधीन कार्य कर रहे वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो का आग्रह स्वीकार करते हुए कल लक्षद्वीप के कावारत्ती के चार निवासियों के खिलाफ औपचारिक प्राथमिकी दर्ज करके जांच शुरू कर दी। कावारत्ती वन विभाग ने विलुप्त प्राय: हो चुके विभिन्न प्रजातियों के 173 मृत और 46 जीवित सी ककम्बर को सुहेली चर्याकारा द्वीप के पास से एक नाव से बरामद किया था। इसके बाद इस मामले में सीबीआई जांच की सिफारिश की गयी थी। प्राथमिकी में जिन चार व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है उनमें सलमानुल फारिस, इरफानुद्दीन, रमीश खान और मोहम्मद अली कोडिपल्ली शामिल हैं। ये सभी कावारत्ती के निवासी हैं। मामले की जांच जारी है।

राष्ट्रीय उद्यान में बाढ़ से वन्य जीवों की रक्षा

इधर केन्द्र सरकार ने असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में बाढ़ से वन्य जीवों की रक्षा के लिए ऊंचे स्थलों की संख्या बढ़ाना तय किया है। जानवरों को बाढ़ के पानी से बचाने के लिए राष्ट्रीय उद्यान के अंदर ऊंचे स्थलों की संख्या बढ़ाई जाएगी। भारी वाहनों की चपेट में आने से होने वाली वन्य जीवों की मृत्यु की घटनाओं को रोकने के लिए ओवरपास और स्पीड गवर्नर लगाने के साथ—साथ वाहन चालकों के लिए संकेतक भी लगाए जाएंगे। कुल 430 वर्ग किलोमीटर में फैले काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से होकर ब्रह्मपुत्र नदी गुजरती है। मानसून के समय हर साल इसमें बाढ़ आती है जिससे यहां रहने वाले जानवरों को दिक्कत होती है।

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लॉकडाउन में पोषण विशेषज्ञों की सलाह: झाड़ू-पौंछा और बर्तन साफ करके कैलोरी बर्न करें मर्द

पोषण विशेषज्ञों ने देशव्यापी लॉकडाउन के चलते घरों में घुसकर बैठे मर्दों को झाड़ू-पौंछा और बर्तन साफ करके कैलोरी बर्न करने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू काम से कैलोरी बर्न करने के साथ ही वजन को भी नियंत्रण में रख सकते हैं।

इस तरह मांजें बर्तन

पोषण विशेषज्ञों के अनुसार घरबंदी में बैठे मर्दों को प्रतिदिन 1800 से 1900 कैलोरी की आवश्यकता है। यदि ऊर्जा की खपत नहीं करेंगे तो वजन बढऩा लाजिमी है। इसलिए कुछ न कुछ काम करते रहना चाहिए ताकि ऊर्जा की खपत हो। हांथ से कपड़े धोने के बाद तह कर रखते हैं तो आप 1 घंटे में 148 कैलोरी बर्न कर सकते हैं। इसी तरह आप हाथों से बर्तन साफ कर 128 कैलोरी बर्न कर सकते हैं। कपड़े प्रेस करते हैं तो 80 कैलोरी बर्न होती है। घर में झाड़ू लगाने में लगभग 156 कैलोरी, पोंछा लगाने में 170 कैलोरी व बिस्तर लगाने में आपकी 70 कैलोरी खर्च होती है। रोजमर्रा के ये काम व्यक्ति को स्वस्थ रखने में योगदान देते हैं। कार धोने में 314, डस्टिंग करने में 166 कैलोरी बर्न होती है।

लॉन में टहल कर करें मेडिटेशन

पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना संकट से हुई बंदी के कारण शारीरिक गतिविधियां बहुत सीमित हैं, लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है। योगा, व्यायाम, अपनी छतों या लान में टहलकर मेडिटेशन कर सकते हैं इससे तनाव के साथ ही वजन नियंत्रण में रहेगा।

भोजन में शामिल करें नींबू पानी व रसीले फल

विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे पहले यह आवश्यक है कि हम अपनी दिनचर्या नियमित करें। ऐसा न हो कि हम घर पर हैं तो न हमारे खाने का समय निश्चित है और न ही सोने व जागने का। हमें सुबह का नाश्ता 8 से साढ़े आठ बजे तक कर लेना चाहिए व रात का खाना सोने से कम से कम 3 घंटे पहले करना चाहिए। 2 मील के बीच कम से से कम 2 से 3 घंटे का अंतर रखना चाहिए। गर्मी का मौसम आ गया है इसलिए पानी का अधिक से अधिक सेवन करें। नींबू पानी व रसीले फलों को भोजन में शामिल करें। शरीर में पानी की कमी न होने दें। भोजन में इम्युनिटी बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों को शामिल करें।

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हर साल पांच लाख भारतवासियों को मौत के घाट उतार देती है तपेदिक, इतने ही निगल जाता है डायरिया

दुनिया भर में कोरोना वायरस (कोविड-19) की तुलना में तपेदिक (टीबी) और डायरिया जैसी रोकथाम की जा सकने वाली और उपचार योग्य बीमारियों से अधिक मौतें होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) के अनुसार अकेले इस्केमिक हृदय रोग से दुनिया भर में औसतन 26,000 लोगों की मौत होती है।

भारत में दिल और सांस की बीमारियों से लाखों लोगों की मौत

आंकड़ों के अनुसार भारत में दिल और सांस की बीमारियों से होने वाली मौतों के अलावा हर दिन लगभग 2,000 लोग डायरिया से और 1,200 से अधिक लोग तपेदिक से मरते हैं। भारत में बीमारियों के अलावा यातायात दुर्घटनाओं में भी रोजाना 500 लोग मारे जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार स्ट्रोक के कारण हर दिन दुनिया भर में करीब 16,000 लोगों की मौत होती है। आंकड़ों से यह भी पता चला है कि अस्थमा और नवजातों में जन्म संबंधी विकारों के साथ हृदय, श्वसन, डायरिया और गुर्दे की बीमारियों से दुनिया भर में हर साल लाखों लोगों की मौत होती है।

कोरोना से इसलिए ज्यादा डरी हुई है दुनिया

एक अनुभवी चिकित्सक के अनुसार स्वाइन फ्लू एक दशक पहले दहशत का कारण था, लेकिन अब शायद ही इसका कभी उल्लेख होता है। इसके बावजूद भारत में स्वाइन फ्लू से हर साल एक हजार से अधिक लोगों की मौत होती है। इसके बावजूद दुनिया कोरोना से इसलिए ज्यादा डरी हुई है क्योंकि यह प्रचार हो गया है कि कोरोना वायरस का अभी तक कोई इलाज नहीं है। हवा से फैलने वाली तपेदिक जैसी बीमारी भी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती है जबकि इसका इलाज है। तपेदिक से भारत में प्रतिवर्ष करीब 4.5 लाख लोगों की मौत होती है। चिकित्सक ने कहा कि इनमें से किसी भी कारण से लोगों या सरकार को कोरोना की नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस वायरस की संक्रामकता का पता इसी से चलता है कि इसने लगभग पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया है। अगर इसके खिलाफ हर मोर्चे पर नहीं लड़ा गया तो यह एक वैश्विक तबाही बन सकता है।

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जब छोटी सी सेना के दम पर कुंवर सिंह ने छुड़ा दिए थे अंग्रेजों के छक्के

वीरता केवल शारीरिक बल नहीं बल्कि चरित्र और आत्मा का बल भी है, जो दया, करुणा, क्षमा और सछ्वाव की जमीन पर शौर्य को जन्म देता है और इसकी मिसाल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह हैं, जिन्होंने ऊंच-नीच, जाति-धर्म और भेदभाव से ऊपर उठकर प्रजा-कल्याण के लिए समर्पित रहने के भाव से उत्पन्न शौर्य से अंग्रेजों को धूल भी चटाई और 23 अप्रैल 1858 को शाहाबाद क्षेत्र को फिरंगियों के चंगुल से आजाद भी कराया। बाबू कुंवर सिंह वर्ष 1857 के देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में एकमात्र नायक थे, जिन्होंने अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए अपने क्षेत्र को आजाद करा लिया।

 

अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दू, मुस्लिम, दलित एवं पिछड़ी जाति के लोगों ने उनका भरपूर साथ दिया। अली करीम, वारिस अली, इब्राहिम खां, द्वारिका माली, रणजीत ग्वाला एवं देवी ओझा उनके विश्वासपात्र थे। उनके पंचों में अल्पसंख्यक एवं पिछड़ी जाति के साथ दलित सदस्य भी थे, जिसकी चर्चा आज भी सामाजिक सौहार्द्र के उदाहरण के तौर पर की जाती है। आरा में शासन स्थापित करने के बाद कुंवर सिंह ने गुलाम यहिया खान को प्रथम जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त किया वहीं तुराब अली एवं खादिम अली को थानों का कोतवाल बनाया। ‘ए यूनिक ट्रायल ऑफ द आरा टाउन (1882) में चर्चा की गयी है कि बाबू साहब के जिन सहयोगियों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था, उनमें अन्य लोगों के अतिरिक्त भेखू जुलाहा, भाला अहीर एवं सोमू दुसाध भी शामिल थे।

दानापुर में सिपाही विद्रोह की चिंगारी

पटना के दानापुर में सिपाही विद्रोह की चिंगारी भड़कने के बाद बाबू कुंवर सिंह ने शाहाबाद क्षेत्र के लोगों को संगठित कर एक सशक्त सेना तैयार की। उन्होंने पहली लड़ाई आरा से पूरब कायमनगर और दूसरी आरा से 10 किलोमीटर पश्चिम बीबीगंज में लड़ी। उसके बाद सासाराम की ओर से रीवा, बांदा, कानपुर, लखनऊ, आजमगढ़ एवं बनारस में कई लड़ाइयां लड़ीं। उनकी सेना गुरिल्ला युद्ध में पारंगत थी। आजमगढ़ में इनकी सेना अंग्रेजों से परास्त होकर पीछे लौट गई। अंग्रेज शाम होते ही खुशी का जश्न मनाने लगे। बाबू साहब की सेना ने ऐन वक्त पर हमला कर हथियार सहित अंग्रेजों को बंदी बना लिया। मध्य प्रांत की सरकार के सचिव लेफ्टिनेंट कर्नल आर. स्ट्रेली ने लिखा है कि ‘विद्रोहियों के नेता के रूप में कुंवर सिंह ने रीवा क्षेत्र में प्रवेश किया। अंग्रेज विरोधी उनकी सहायता कर रहे थे। रीवा स्टेट गजेटियर के अनुसार, उनके साथ 4500 लोगों का काफिला था। रीवा से बांदा, कानपुर, लखनऊ, आजमगढ़ क्षेत्र से विद्रोही सैनिकों की बदौलत अंग्रेजों को मात देते हुए बाबू साहब उत्तर प्रदेश के बलिया जिला के शिवपुर घाट पर पहुंचे। अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने वहां की सभी नावों को हटवा दिया था। बाबू साहब के प्रति अपार जन समर्थन का ही परिणाम था कि अंग्रेजों की लाख हिदायत के बावजूद पानी में डुबो कर रखी गई दर्जनों नावें अचानक गंगा की लहरों पर लहराने लगीं। बाबू साहब अपनी सेना के साथ गंगा पार कर रहे थे, तभी एक गोली उनकी बायीं बांह के अगले हिस्से में लगी। बगैर विलंब किए बाबू साहब ने जख्मी भुजा को अपने ही हाथों काटकर गंगा माता को समर्पित कर दिया। यह उनके साहस की पराकाष्ठा थी। उन्होंने आरा में 23 अप्रैल 1858 को अपने नवनियुक्त कलक्टर याहिया खां द्वारा पहली बार स्वतंत्रता का झंडा फहराया, जो 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजों से शाहाबाद को आजाद कराए जाने का प्रतीक है। उसी विजय दिवस की याद में प्रतिवर्ष 23 अप्रैल विजयोत्सव दिवस मनाया जाता है।

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70 हजार साल पुरानी भाषा में बात करते हैं अंडमान निकोबार के ये तीन आदिवासी

क्या आप जानते हैं कि 70 हजार वर्ष पुरानी ‘जेरो’ भाषा को बोलने वाले दुनिया में कितने लोग जीवित हैं! जवाब है सिर्फ तीन, जी हां दो पुरुष और एक महिला ही इस भाषा में बात करते हैं और वे तीनों भारत के अंडमान निकोबार के जंगलों में रहते हैं।

तीनों पर मंडरा रहा है कोरोना का खतरा 

इन तीनों पर अब कोरोना का खतरा मंडरा रहा है इसलिए संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की भाषा सलाहकार एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान की पृर्व अध्यक्ष डॉ अन्विता अब्बी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अंडमान निकोबार के तीनों आदिवासियों को बचाने की अपील की है। अब्बी के मुताबिक तीनों आदिवासी दुनिया की पहली और 70 हजार साल पुरानी भाषा बोलते है। डॉ अब्बी ने मोदी को लिखे पत्र में कहा है कि अंडमान निकोबार में ‘जेरो’ भाषा बोलने वाले अब केवल तीन आदिवासी ही दुनिया मे बचे है। यह 70 हजार वर्ष पुरानी भाषा है जिसे दुनिया की सर्वप्रथम भाषा माना जाता है। इन तीन आदिवासियों के नाम पेजे, गोलटा (पुरुष) और नू (स्त्री) है।

चार अप्रैल को हो गई थी ली ची नामक आदिवासी महिला की मृत्यु

उन्होंने लिखा है कि चार अप्रैल को ली ची नामक एक आदिवासी महिला की गम्भीर बीमारी से मृत्यु हो गई जो ‘जेरो’ नामक लुप्त प्राय: भाषा बोलने वाले चार ​व्यक्तियों में से एक थी। इस तरह हम अपनी भाषा विरासत को नहीं बचा सके। इसलिए कोरोना महमारी को देखते हुए तीन उपरोक्त व्यक्तियों की सुरक्षा की अपील करती हूँ।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की सलाहकार डॉ अब्बी ने इन आदिवासियों पर विशेष ध्यान देने का आग्रह किया है क्योंकि वे जंगल में अंडमान ट्रंक रोड बनने के चलते पुलिस अधिकारियों के संपर्क में आने से कोरोना के खतरे में पड़ सकते हैं। इन आदिवासियों को बचाने का मतलब विश्व की पुरानी भाषा और सभ्यता को बचाना है, इसलिए सम्बद्ध मंत्रालयों और स्थानीय प्रशासन को निर्देश देकर इन्हे सुरक्षित रखा जाए। डॉ अब्बी इस समय गोवा विश्वविद्यालय में बी बीबोरकर भाषा पीठ की अध्यक्ष है। वह कई विदेशी विश्वविद्यालयों से जुड़ी रही हैं तथा विजिटिंग प्रोफेसर भी रही हैं।

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सुंदरियों के शरीर पर बालों की भरमार तो वे मानी जाएंगी बीमार

वैसे तो महिलाओं के शरीर पर बाल बेहद कम होते हैं लेकिन अगर किसी के शरीर पर बालों की भरमार है तो यह उनके शरीर में किसी बीमारी का संकेत है। एक स्वास्थ्य रिपोर्ट में चिकित्सा विज्ञानियों ने कहा है कि महिलाओं के शरीर पर ज्यादा बाल होने की स्थिति में उन्हें चिकित्सकीय जांच की आवश्यकता हो सकती है।

अमेरिकन इलेक्ट्रोलोजी एसोसिशन(एईए) के अनुसार महिलाओं के शरीर पर अधिक बाल उनके खराब स्वास्थ्य के संकेत हो सकते हैं। संभव है कि महिलाओं में प्रजनन संबंधी कोई समस्या हो। पुरुष हॉर्मोन ‘एंड्रोजन’ की अधिकता को भी महिलाओं के शरीर पर अधिक बाल उगने की वजह माना जाता है पर कई बार इसके कारणों का पता लगाना इतना आसान नहीं होता।

इस शोध में एंड्रोजन हॉर्मोन की अधिकता वाली कई महिलाओं पर अध्ययन किया गया। पता चला कि इनमें से 80 फीसदी से अधिक महिलाएं हर्सुटिज्म(अधिक संख्या में बालों का उगना), मासिक धर्म की गड़बड़ी और मुंहासों की समस्या से परेशान हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि करीब 80 फीसदी मरीजों में समय से इस समस्या का पता नहीं लग पाता, न ही उनका सही तरीके से इलाज हो पाता है। अनचाहे बालों की समस्या से निपटने के लिए इलेक्ट्रोलोजी पध्दति का इस्तेमाल किया जाता है, हालांकि इनसे छुटकारा पाने के लिए उचित चिकित्सकीय इलाज की आवश्यकता होती है।

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खून में बैड कोलेस्ट्रोल अधिक है तो जमकर पीजिए टमाटर का रस!

टमाटर का सेवन हृदय रोगों से बचाव में सहायक है, ये निष्कर्ष फिनलैंड के वैज्ञानिकों ने बीस से पचास साल के लोगों पर लगातार शोध के बाद पाया है। इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों ने उन लोगों को टमाटर खाने या उसका रस पीने की सलाह दी है जिनके रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा अधिक है।

फिनलैंड के औलो विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने 20 से 49 की आयु वर्ग के 21 स्वयंसेवियों को इस अध्ययन में शामिल किया जिनका कोलेस्ट्रोल स्तर सामान्य था। इन लोगों के नाश्ते में टमाटर की मात्रा बढ़ाई गई जिसके बाद तीन सप्ताह के भीतर इनके ‘लो डेनसिटी लाईपो प्रोटीन’ (एलडीएल) स्तर में गिरावट दर्ज हुई।

स्वयंसेवियों के कोलेस्ट्रोल स्तर में छ: फीसदी की गिरावट दर्ज हुई और एलडीएल स्तर में 13 फीसदी की। ‘न्यूट्रीशन’ पत्रिका में छपे इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने लिखा ”जो बदलाव हमने देखे हैं वे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह असर केवल तीन हफ्तों में दिखाई दिया है।”

इधर अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों द्वारा सोने से पहले एक चम्मच शहद का सेवन खांसी को रोकने में सहायक है। भारत में घरेलू नुस्खे के तौर पर शहद से खांसी का उपचार किया जाता है।

अनुसंधानकर्ताओं ने 130 बच्चों पर किए गए एक शोध में भी यह पाया है कि शहद खांसी की रोकथाम में कारगर है। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार शहद एक एंटीआक्सीडेंट हैं जिसमें विषाणुओं से लड़ने की क्षमता है।

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ज्यादा चीनी खाई तो अल्जाइमर के शिंकजे में फंस जाएगा ‘दिमाग’

ज्यादा चीनी खाने से कोई भी इंसान अल्जाइमर अर्थात भूलने की बीमारी का शिकार हो सकता है। एक विज्ञान पत्रिका बायोलॉजिकल केमिस्ट्री में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि बढ़ती उम्र में अल्जाइमर होने की सम्भावनाएं तब और अधिक बढ़ जाती है जब चीनी के सेवन पर अंकुश नहीं लगाया जाए। पत्रिका ने परोक्ष रूप से डायबिटीज रोगियों को चेताने के साथ सामान्य तौर पर स्वस्थ वृद्धों को भी सलाह दी है कि वे रिटायर होने की उम्र आते—आते चीनी का उपभोग घटा दें। इसके अलावा अन्य माध्यमों से भी मीठा खाने की इच्छा पर काबू पाएं।

पत्रिका ने चूहों पर किए गए एक शोध का हवाला देते हुए कहा है कि नए शोध बताते हैं कि चीनी का अधिक सेवन बढ़ती उम्र में मस्तिष्क संबंधी परेशानियों को जन्म दे सकता है।

बर्मिंघम के अलबामा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए शोध के दौरान 15 चूहों में से सात को पानी या अन्य पदार्थों के माध्यम से भारी मात्रा में चीनी दिया गया जबकि आठ को बिना चीनी के रखा गया। चीनी का सेवन करने वाले चूहों में मानसिक बीमारी अल्जाइमर के लक्षण पाए गए, जबकि चीनी का सेवन नहीं करने वाले चूहे सामान्य थे। इस शोध से अधिक चीनी सेवन करने वाले लोगों में अल्जाइमर बीमारी के होने की आशंका बढ़ जाने की पुष्टि होती है।

अल्जाइमर ऐसी बीमारी होती है जिसमें व्यक्ति बात करते—करते शब्दों को भूल जाता है। कई बार बात का संदर्भ भी याद नहीं रहता। ऐसी हालत में व्यक्ति धीरे—धीरे स्मृति भ्रम का शिकार हो जाता है।