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लाखों की अफीम खा जाते हैं राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के अफीमची तोते

भारत के अफीमची तोते सरकार के बड़ी मुसीबत बन गए हैं। उन्हें अफीम खाने की ऐसी लत लग गई है कि वे डोडे में लगाए गए चीरे से रिसने वाले अफीम के दूध को चूंस जाते हैं। कई तोते तो इतने बड़े अफीमची हो चुके हैं कि वे पूरे डोडे को ही तोड़कर ले जाते हैं और आराम से पेड़ों की डालियों पर बैठकर खाते हैं।

तोतों को ऐसे पड़ी अफीम की लत 

मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में अफीम की खेती करने वाले किसानों की शिकायत है कि अफीम के आदी तोते, बारी बारी से उनकी फसल को नुक़सान पहुंचाते हैं। उन्हें भगाने के बहुत प्रयास किए जाते हैं। तोते पोस्त की फसल के अलावा अंदर अफीम तक पहुंचने के लिए पोस्त के बीज की फली को भी उधेड़ डालते हैं। पोस्त की एक फली से 30-35 ग्राम अफीम निकलती है। जिसे कटाई के सीज़न में तोतों के बड़े बड़े समूह तबाह कर देते हैं। उनमें के कुछ तो फली को ही लेकर उड़ जाते हैं। इन तोतों को अफीम की लत पड़ गई है। ये दिन में 30-40 बार खेतों पर वापस आते हैं। फलियों को पकाने के लिए लगाए गए चीरे से जब मॉरफीन रिसने लगता है तो तोते उस मॉरफीन को चूस लेते हैं।

घट रहा है अफीम का वजन

इधर हर साल अप्रैल में नार्कोटिक्स विभाग किसानों से अफीम ख़रीदता है, लेकिन इस बार लॉकडाउन के कारण एक महीने से अधिक समय से अफीम किसानों के घरों में पड़ी है। किसानों को चिंता है कि अफीम को लम्बे समय तक घरों या गोदामों में रखने से उसकी क्वालिटी ख़राब हो सकती है। जिससे उसका नेट वज़न घट सकता है।

…..तो रद्द हो जाएगा लाइसेंस

लाइसेंसिंग पॉलिसी के अनुसार अफीम उत्पाद का नेट वज़न अगर लाइसेंस देते समय सरकार द्वारा तय किए गए प्रति हेक्टेयर मानक से कम हो तो किसान का अफीम की खेती का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। पॉलिसी में कहा गया है कि केवल वही किसान लाइसेंस के पात्र होंगे जो प्रति हेक्टेयर कम से कम 53 किलोग्राम अफीम उत्पाद मध्यप्रदेश और राजस्थान में और कम से कम 45 किलोग्राम उत्तर प्रदेश में बेंचेंगे। पोस्त उगाने वाले किसानों को लाइसेंस देने के लिए सरकार ने उपज की यही न्यूनतम सीमा तय की है।

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बिस्तर में पराजित पुरुषों के लिए संजीवनी कैसे बनी वियाग्रा, जानिए पूरी कहानी

लगभग बीस साल पहले तक बिस्तर के संग्राम में पराजित होने वाले पुरुषों के लिए संजीवनी बन चुकी वियाग्रा नामक दवा की खोज की कहानी बड़ी दिलचस्प है। इस दवा को हृदय रोगियों का रक्त प्रवाह सुचारू रखने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसके साइड इफेक्ट इतने विचित्र थे कि दवा बनाने वाली कम्पनी फाइजर ने शोधकर्ताओं को इसका शोध बंद कर देने के आदेश दे दिए थे।

जाग उठती थी सम्बध बनाने की भूख

यह दवा हृदय रोगियों के रक्त प्रवाह को सुचारू तो रख रही थी लेकिन इसे खाने के थोड़ी देर बाद ही पुरुषों में सम्बंध बनाने की भूख जाग उठती थी। इससे घबराए शोधकर्ताओं ने फाइजर के कहने पर शोध तो बंद कर दिया लेकिन इसके साइड इफेक्ट उनका ध्यान भी खींच रहे थे। बस फिर क्या था, कुछ और क्लिनिकल ट्रॉयल के बाद इसे पुरुषों की नपुंसकता दूर करने वाली दवा के रूप में बाजार में जारी कर दिया गया। अब इस दवा की बिक्री पुरुषों में उत्तेजना के साथ रक्त प्रवाह को सुचारू रखने के लिए भी किया जाता है।

रक्तचाप सुचारू रखने में भी करती है मदद

इस नतीजे के बाद कि यह हृदय संबंधी समस्या को दूर करने में दूसरी दवाओं जितना ही है, शोधकर्ताओं ने इस पर काम रोकने का फ़ैसला ले लिया था। लेकिन जब उन्हें वियाग्रा के इस इफेक्ट के बारे में पता चला तब उन्होंने शोध को जारी रखने का फ़ैसला लिया। अब वियाग्रा का इस्तेमाल सिर्फ़ पुरुषों में नपुंसकता को दूर करने के लिए नहीं होता बल्कि कम मात्रा में इसका इस्तेमाल हृदय संबंधी रक्तचाप की समस्या में भी होता है। ब्रांड नाम रिवाटीओ के नाम से यह दवा बाज़ार में उपलब्ध है।

ड्रग रिपोजिशनिंग का ये होता है फायदा

खोजी गई दवा का इस्तेमाल किसी दूसरी बीमारी में किए जाने की इस प्रक्रिया को ड्रग रिपोजिशनिंग कहते हैं। विशेषज्ञ इस प्रक्रिया के मुख्य फ़ायदों में सबसे बड़ा फ़ायदा समय की बचत बताते हैं। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लीवरपुल के क्लिनिकल एंड मॉल्युकूलर फॉर्माकोलॉजी के प्रोफेसर मुनीर पीर मोहम्मद का कहना है कि किसी ड्रग को शून्य से तैयार करने में सबसे पहले उसे लैबोरेट्री में तैयार कर के उसके असर को कोशिकाओं पर परखते हैं और उसके बाद उसका प्रक्लिनिकल अध्ययन करते हैं। ड्रग रिपोजिशनिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बनाई गई दवाइयां इंसानों पर टेस्ट की जा चुकी होती हैं। इसलिए इसकी सुरक्षित होने को लेकर डेटाबेस मौजूद होता है कि कैसे यह काम करता है। सिर्फ एक ही बात जाननी होती है कि यह किसी बीमारी विशेष पर काम कर रहा या नहीं।

वियाग्रा जैसा ही उदाहरण है एस्प्रिन

वियाग्रा के अलावा ड्रग रिपोजिशनिंग का एक और बेहतरीन उदाहरण एस्प्रिन है। एक सदी से इसका इस्तेमाल दर्द की दवा के रूप में होता आया है लेकिन अब कम मात्रा में इसका इस्तेमाल कुछ मरीजों में दिल के दौरे के जोखिम को कम करने में भी किया जाता हैै और अब नए अध्ययन में पता चला है कि कुछ खास किस्म के कैंसर की रोकथाम में यह प्रभावी हो सकता है।

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पुतलीबाई का नाम सुनकर पायजामा गीला कर देते थे चंबल के डाकू

चंबल के बीहड़ों में राज करने वाले जिन डाकुओं का नाम सुनकर आम आदमी को कंपकंपी छूट जाती थी, उन्हीं डाकुओं में से अनेक डाकू पुतलीबाई का नाम सुनकर पायजामा गीला कर देते थे। बी हड़ों में पुतलीबाई के अलावा भी अनेक महिला डकैत हुई हैं लेकिन उनमें से एक भी पुतलीबाई जैसा नाम नहीं कमा सकी।

चंबल के इतिहास में पुतलीबाई का नाम पहली महिला डकैत के रूप में दर्ज है। बीहडों में पुतलीबाई का नाम एक बहादुर और आदर्शवादी महिला डकैत के रूप में सम्मानपूर्वक लिया जाता है। गरीब मुस्लिम परिवार में जन्मी गौहरबानो को परिवार का पेट पालने के लिए नृत्यांगना बनना पड़ा और इसी दौरान डाकुओं के उत्पीड़न से तंग आकर पुतली बाई ने हथियार उठा लिए। बीहड़ों में उसकी बहादुरी के साथ ही गरीबों विशेषकर महिलाओं की दुष्टों से रक्षा के लिए उसका नाम आज भी आदर के साथ लिया जाता है।

हाथों मे बदूंक थामना वैसे तो हिम्मत और साहस की बात कही जाती है, लेकिन जब कोई महिला बंदूक थामकर बीहडों में कूदती है तो उसकी चर्चा बहुत ज्यादा होती है। चंबल के बीहडों में सैकडों की तादात में महिला डाकुओं ने अपने आंतक का परचम लहराया है। बाद में कुछ महिला डकैत पुलिस की गोली खाकर मौत के मुंह मे समा गईं तो कुछ गिरफ्तार कर ली गई या फिर कुछ महिला डकैतों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें से ऐसी ही कुछ महिला डकैत आज भी समाज में अपने आप को स्थापित करने में लगी हुई हैं।

एक समय था जब चंबल में सीमा के नाम की तूती बोला करती थी। सीमा बीहड में आने से पहले अपने माता-पिता के साथ मासूमियत के साथ जिंदगी बसर कर रही थी। दस्यु सरगना लालाराम सीमा परिहार को उठा कर बीहड में लाया था। बाद में लालाराम ने गिरोह के एक सदस्य निर्भय गुर्जर से सीमा की शादी करवा दी, लेकिन दोनों जल्दी ही अलग हो गए। 18 मई, 2000 को पुलिस मुठभेड में लालाराम के मारे जाने के बाद 30 नवंबर, 2000 को सीमा परिहार ने आत्मसमर्पण कर दिया था। फिलहाल, सीमा परिहार औरैया में रहते हुए राजनीति में सक्रिय है। फूलनदेवी के चुनाव क्षेत्र मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ चुकी सीमा परिहार टेलीविजन शो बिग बॉस में हिस्सा ले चुकी है। सीमा परिहार के बाद डकैत चंदन की पत्नी रेनू यादव, डकैत सलीम गुर्जर की प्रेयसी सुरेखा उर्फ सुलेखा और जगन गुर्जर की पत्नी कोमेश गुर्जर, डकैत सलीम की प्रेमिका सुरेखा भी बहुत थोड़े समय तक चर्चा में रही है।

अस्सी के दशक में सीमा परिहार के बाद लवली पांडे, अनीता दीक्षित, नीलम गुप्ता, सरला जाटव, सुरेखा, बसंती पांडे, आरती, सलमा, सपना सोनी, रेनू यादव, शीला इंदौरी, सीमा यादव, सुनीता पांडे, गंगाश्री आदि ने भी बीहड में दस्तक दी परंतु इनमें से कोई भी सीमा परिहार जैसा नाम और शोहरत नहीं हासिल कर सकीं। सरला जाटव, नीलम गुप्ता और रेनू यादव के अतिरिक्त अन्य महिला डकैत पुलिस की गोलियों का शिकार हो गईं। हालांकि एक समय लवली पांडेय सीमा परिहार के मुकाबले ज्यादा खतरनाक साबित हुई थी।

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कैर-सांगरी को चट करने आंधियों के कंधे पर सवार होकर आई टिड्डी

कोरोना से परेशान राजस्थान अब टिड्डियों के निशाने पर है। धूल भरी आंधियों के कंधों पर सवार होकर पाकिस्तान से आए टिड्डी दल रेगिस्तानी कल्पवृक्ष खेजड़ी पर टूट पड़े हैं। कृषि क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि जल्द ही टिड्डियों का सफाया नहीं किया गया तो वे जोधपुर से लेकर बाड़मेर तक सांगरी को पूरी तरह चट कर सकती हैं। इसके अलावा वे खरीफ की अन्य फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचाएंगी!

पाकिस्तान की सीमा से सटे सीमावर्ती जैसलमेर, बाड़मेर एवं गंगानगर की सीमा के कई इलाकों में पिछले दो दिनों से टिड्डियों का जबरदस्त हमला हुआ हैं। पाकिस्तान के सिंध एवं पंजाब प्रान्त में टिड्डियों की भरमार को देखते हुए रबी की फसल के लिये यह टिड्डियां किसानों के लिये खतरे की घंटी बन सकती हैं इसको देखते हुए टिड्डी नियंत्रण विभाग द्वारा अभी से तैयारियां शुरू कर दी गई हैं तथा एरियल कंट्रोल के लिये इस बार विशेष रूप से एयरक्राफ्ट, ड्रोन व अन्य दूसरे संसाधन मंगवाने की कार्रवाई शुरू कर दी है।

पाकिस्तान की सीमा से बड़ी संख्या में टिड्डियों ने उनके खेतों में धावा बोला हैं हालांकि वहां पर फसलें कट चुकी हैं लेकिन खेतों में पड़े हुवे पशुओं के लिये घास व अन्य वनस्पतियों को टिड्डियां नष्ट कर रही हैं। टिड्डी नियंत्रण विभाग के उपनिदेशक डॉ के एल गुर्जर ने बताया कि पाकिस्तान अपने क्षेत्र में टिडिड्यों पर नियंत्रण करने में पूरी तरह नाकाम रहा हैं इसके कारण बड़ी संख्या में टिड्डियों के होपर्स एडल्ट होकर भारतीय क्षेत्र में आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि जैसलमेर के सम क्षेत्र में भुवाना, धनाना, लंगतला एवं बछियाछोर लाठी चांधन आदि क्षेत्रों में तथा रामगढ़ में मीरवाला, आसुतार, लोंगेवाला, घोटारू आदि क्षेत्रों में बड़ी संख्या में टिड्डी दल पहुंचे हैं हालांकि यह छोटे छोटे पेचेज में हैं।

टिड्डी नियंत्रण विभाग की टीमें मौके पर पहुंच गई हैं तथा इन्हें नष्ट करने की कार्रवाई शुरू कर दी है। उन्होंने बताया कि इसी तरह गंगानगर के हिन्दूमल कोट कोठा आदि कई सीमावर्ती इलाकों में टिड्डियां पिछले कई दिनों से पाकिस्तान की सीमा से आ रही हैं जिन्हें लगातार नष्ट करने की कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान इन टिड्डियों को कंट्रोल कर नहीं पाया, कुछ समय पूर्व ईरान में टिड्डियों की जो ब्रीडिंग चल रही थी और उस दौरान बरसात भी हो रही थी। ऐसे में टिड्डियों के समूह ईरान से सटे हुवे पाकिस्तानी ब्लूचिस्तान व अन्य इलाकों में आ गए और अब पंजाब व सिंध इलाकों में जबरदस्त रूप से इन टिड्डियों ने डेरा डाल रखा है।

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17 साल पहले मौत का तांडव करने वाले सार्स का सगा भाई है कोरोना

संसार के शक्तिशाली देशों को घुटने पर ला चुका कोरोना वायरस 17 साल पुराने सार्स का सगा भाई है। इस बार उसके ज्यादा मारक होने का यही कारण है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोरोना फैमिली का यह वायरस पिछले दो बार के मुकाबले ज्यादा ताकतवर होकर आया है और उसने म्युटेशन के जरिए स्वयं को ज्यादा घातक बना लिया है। 2003 में आए सार्स कोविड-1 और 2013-14 में आए मर्स वायरस से मौजूदा वायरस की समानता क्रमश: 70 और 50 प्रतिशत तक है। पहले के दोनो वायरस घातक तो थे लेकिन वे व्यापक तबाही नहीं फैला पाए थे। क्योंकि कोविड-1 पूरी तरह ग्लोबल होने से पहले ही दम तोड़ गया था और 2013-14 का मर्स सऊदी अरब तक सीमित रह गया था।
कोरोना वायरस का मौजूदा स्वरूप बेहद घातक है। उसने 45 वर्ष से अधिक उम्र के इंसानों को उसी तरह मौत के घाट उतारा है जिस तरह लगभग एक सदी पहले प्लेग ने उनका भक्षण किया था। अनुमान है कि पिछले चार माह में कोरोना संक्रमण के चलते पूरी दुनिया में भगवान को प्यारे हुए लगभग ढाई लाख इंसानों में से 80 प्रतिशत 45 से 80 साल के हैं।

बूढ़ों के लिए मौत का दूसरा नाम है कोरोना

इन दिनों कोविड-19 के रोगियों की जान बचाने में जुटे दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कार्डियक थोरासिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अजीत जैन के मुताबिक पूरी दुनिया में अभी तक कोरोना संक्रमितों की मृत्यु का जो आंकड़ा सामने आ रहा है, उसमें 25 साल से कम उम्र के संकमितों की संख्या एक प्रतिशत है। 25 से 44 साल तक के मृतकों का आंकड़ा अभी तक छह प्रतिशत पर टिका हुआ है लेकिन 45 से 60 साल तक संक्रमितों की मृत्यु दर 15 प्रतिशत तक जा पहुंची है। सबसे ज्यादा मौत 65 वर्ष से अधिक उम्र के रोगियों की हो रही है। इस उम्र के संक्रमितों में से आधे ठीक होने की अपेक्षा काल के गाल में समा जाते हैं।
डा. अजीत के मुताबिक तीनो वायरस एक ही जींस के हैं इसलिए विशिष्ट दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाने के बावजूद परम्परागत दवाएं इलाज में काम ली जा रही हैं। इन दवाओं के बल पर ही कोरोना से मुक्त होने वालों की संख्या बढ़ रही है लेकिन इससे यह महामारी नियंत्रण में नहीं आ रही है।
उन्होंने बताया कि सीवियर एक्यूट रेस्पेरेटिरी सिंड्रोम अर्थात सार्स वायरस सात तरह का है। इनमें 2003 में आया सार्स कोविड-1, 2013-14 में आए मर्स वायरस और 2019 में आए कोविड-19 से दुनिया का परिचय हो चुका है। इसके अलावा कोरोना फैमिली के चार अन्य वायरस के नाम क्रमश: ह्यूमन कोरोना वायरस ओएच 43, ह्यूमन कोरोना वायरस एनएल 63, ह्यूमन कोरोना वायरस 229ई, ह्यूमन कोरोना वायरस एचयूके1 हैं। डा. अजीत जैन के अनुसार 2016 में डब्ल्यूएचओ ने भविष्यवाणी की थी कि कोरोना फैमिली के ये वायरस दुनिया में कभी भी महामारी फैला सकते हैं। भविष्यवाणी के बाद रिसर्च प्रोग्राम और दवा बनाने के प्रयास शुरू हो गए थे। इसीलिए उम्मीद है कि कोरोना का इलाज जल्द ही खोज लिया जाएगा।

प्रोटीन बढ़ाते है मौत का खतरा

डा. जैन के अनुसार दुनिया को सबसे ज्यादा घबराहट कोरोना संक्रमितों की मौत की बढ़ती दर से है। 2003 में चाइना के यूनान से शुरू हुए सार्स कोविड-1 के दौर में मौत की दर 9 प्रतिशत थी। दस साल बाद 2013-14 में आई मर्स महामारी में मौत की दर 35 प्रतिशत थी, लेकिन उसका फैलाव नहीं होने से दुनिया को ज्यादा चिंता नहीं हुई थी। इस बार यह पूरी दुनिया में फैल गया है और इसकी औसत मृत्यु दर भी 15 प्रतिशत है। कोविड-19 वायरस में चार तरह के प्रोटीन स्पाइक प्रोटीन, एनवल्व, मेमरिन और न्यूक्लोसाइट हैं और ये हाइरिस्क ग्रुप (डायबिटीज, हाइपर टेंशन,हृदय रोग) के मरीजों के मरने का खतरा बढ़ा देते है।

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पांच ग्राम खमीरा रोजाना खाएं, कोरोना के डर से मुक्ति पाएं

यूनानी चिकित्सा पद्धति में प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत करने के लिए खमीरा पर बहुत जोर दिया गया है। इसमें सबसे बेहतर खमीरा अमरबरीद और रेशम को बताया गया है। इसके अलावा भी बहुत तरह के खमीरा है। जब भी प्रतिरोधक शक्ति में कमी महसूस हो, हकीम की सलाह लेकर यूनानी दवा की दुकान से खमीरा खरीद कर प्रतिदिन पांच ग्राम खाया जा सकता है।

फ्लू और मानव का साथ चोली-दामन जैसा

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के यूनानी विभागाध्यक्ष डा. सैयद अहमद के मुताबिक खमीरा शरीर को रोगों से लड़ने की ताकत देता है। यूनानी में वैसे तो अनेक प्रकार के खमीरा का वर्णन है लेकिन अमरबरीद और रेशम को आम आदमी भी आसानी से खरीद सकता है। उनका दावा है कि भरपूर नींद और समय से भोजन करके भी कोरोना संक्रमण का सफलता के साथ मुकाबला किया जा सकता है। डा. सैयद अहमद ने बताया कि फ्लू और मानव का साथ चोली-दामन जैसा है। बदलते मौसम के साथ फ्लू के वायरस मानव शरीर को संक्रमित करते हैं और शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली कुछ बाहरी उपायों के साथ उससे निजात पा लेती है। इसलिए पारम्परिक चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद, यूनानी, सिद्धा शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को मजबूत बनाने सिद्धांत पर काम करती हैं।

कोशिकाओं की होती है मरम्मत

डा. अहमद के अनुसार मानव शरीर एक ऐसी मशीन है जिसमें जागते रहने पर लगातार टूट—फूट होती है अर्थात उसकी कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता हैं। जैसे ही शरीर नींद के आगोश में जाता है, शरीर कोशिकाओं की मरम्मत शुरू कर देता है। इसके लिए भरपूर गहरी नींद अति आवश्यक है। नींद के दौरान सिर्फ कोशिकाओं की मरम्मत ही नहीं होती बल्कि प्रतिरोधक प्रणाली भी अपनी शक्ति बढ़ाती है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अक्सर आपने देखा होगा कि भरपूर गहरी नींद वही व्यक्ति ले पाता है जिसकी दिनचर्या नियमित है अर्थात वह सभी काम तय समय पर करता है। सीजनल फल—सब्जियों का सेवन करता है। डा. सैयद अहमद का कहना है कि कोरोना काल में इम्युन सिस्टम की मजबूती के लिए ड्राइफ्रूट खाएं। भीगे हुए बादाम और अखरोट की गिरी खाने के साथ ही काली मिर्च लोंग अदरक तुलसी गिलोय की चाय बनाकर पीने से भी कोरोना वायरस के प्रकोप से स्वयं को सुरक्षित किया जा सकता है।

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सिर्फ मेंढ़क व घोंघे ही खाता है गिद्ध प्रजाति का यह प्रवासी पक्षी

आमतौर पर संरक्षित वन क्षेत्रों में पाया जाने वाला प्रवासी पक्षी लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क अब कृषि क्षेत्रों में भी आबाद हो रहा है। प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक डॉ. गोपी सुन्दर ने इन पक्षियों पर शोध के बाद बताया कि अब तक यह माना जाता था कि संरक्षित घने क्षेत्रों में ही गिद्ध प्रजाति का लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क संरक्षित रहता है और फलता-फूलता है।

मानवीय गतिविधियां खास तौर से कृषि इन पक्षियों एवं वन्यजीवों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होता है परन्तु शोध के बाद यह पाया गया कि वन क्षेत्र के बाहर अब कृषि क्षेत्रों में भी ये पक्षी व वन्यजीव आबाद हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तक माना जाता था कि अति संकटापन लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क की आबादी घने जंगलों में ही संरक्षित हैं। पहले यह कहा जाता था कि तालाबों में खेती करने से पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है परन्तु नेपाल के लुंबिनी क्षेत्र (बुद्ध की जन्मस्थली) एवं कपिलवस्तु के कृषि क्षेत्रों में यह प्रजाति बहुत फल-फूल रही है। डॉ. गोपीसुंदर के नेतृत्व में नेशनल ज्योग्राफिक की एक शोध परियोजना के तहत पक्षी विज्ञानियों के दल ने यह निरीक्षण किया कि यह स्टॉर्क बड़ी कॉलोनी नहीं बनाता है अपितु यह छोटी-छोटी 10 से 20 घोंसलों की कॉलोनियां ही बनाता है।

पक्षी की जरूरत घोंसला बनाने के लिए पेड़ और चूजों के लिए भोजन की मांग स्थानीय कृषकों द्वारा संरक्षित पीपल, बरगद व सेमल के पेड़ से हो जाती है और किसानों की मिश्रित चावल एवं गेहूं की खेती से भोजन हेतु मेंढ़क व घोंघे मिल जाते हैं। डा गोपीसुंदर के निर्देशन में काठमाण्डू के पास खोपा कॉलेज के दो छात्र रोशिला और बिजय, कॉलेज सलाहकार कमल गोसाई, क्षेत्रीय सहयोग कैलाश जेसवाल और प्रकृति संरक्षण फाउण्डेशन के दो वैज्ञानिक स्वाति कितूर ने 101 घोसलों का 250 घंटों तक निरीक्षण किया और पाया कि उनमें 162 चूजों ने जन्म लिया जो एक सुखद आश्चर्य की बात है।

इससे एक नई जानकारी प्रकाश में आई कि कृषि क्षेत्र के तालाब भी पक्षियों के आर्द्र भूमि की मांग को पूरा करते है। कृषि को वन्यजीवों के अस्तित्व में खतरा न मानकर इससे इनकी आबादी में वृद्धि हुई। इस शोध से ज्ञात हुआ कि नये वैज्ञानिकों के लिए शोध का क्षेत्र घने संरक्षित वन ही नहीं अपितु कृषि क्षेत्रों में भी यह शोध किया जा सकता है। शोध का विवरण अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका यूएसए द्वारा प्रकाशित वाटर बर्ड और ब्रिटेन द्वारा प्रकाशित वाइल्ड फॉलव में प्रकाशित हुआ है। डॉ. गोपीसुंदर ने बताया कि नेपाल सरकार इस योजना के तहत सेमल के बढ़ावे व संरक्षण के लिए कृषकों को अनुदान देती है। इससे कृषक सेमल का वृक्षारोपण करते है और इसे संरक्षित रखते हैं। इस कांटेदार रूई के पेड़ पर लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क घोंसला बनाना पसंद करते हैं।

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कोरोना वायरस के सबसे आसान शिकार हैं मधुमेह के रोगी, ये चूर्ण बचाएगा उनकी जान

अगर आप डायबिटिक अर्थात मधुमेह के रोगी हैं तो कोरोना काल में सबसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत आपको ही है क्योंकि डायबिटिज आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करती है और कोरोना वायरस को ऐसे ही मानव शरीरों की तलाश रहती है जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो। ऐसे इंसानों के शरीर कोरोना के प्रवेश को रोक पाने में नाकाम होते हैं और वह आसानी से उनके फेफड़ों तक जा पहुंचता है।
आयुर्वेद विशेषज्ञ मंदीप जायसवाल के अनुसार कोरोना से निपटने के लिए लागू किया गया लॉकडाउन मधुमेह रोगियों को दोहरी परेशानी लेकर आया है। एक तरफ वे मॉर्निंग वाक नहीं कर पा रहे हैं तो दिनचर्या बिगड़ जाने से उनका खानपान नियंत्रित नहीं रह गया है।
डॉ. मंदीप ने बताया कि मधुमेह से पीडि़त रोगियों को इस समय ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। इस रोग से ग्रसित लोगों को हल्का व आधा पेट भोजन करना चाहिए। सुबह का नाश्ता भरपूर करना चाहिए। रात का खाना आठ बजे से पहले तथा आधा पेट करना चाहिए तथा रात के खाने के दो घंटे बाद ही सोना चाहिए।
डा. जायसवाल ने कहा कि मधुमेह रोगियों को दवाओं का नियमित सेवन करना चाहिए। आज के समय में बाहर टहलने की मनाही है इसलिए घर पर ही टहलें। कब्ज न हो, इसका विशेष ध्यान रखना है। इसके लिए खाना खाने के एक घंटे बाद गुनगुने पानी का सेवन करें। यदि दवा की जरूरत है तो भोजन करने से पहले हिंगवाष्टक चूर्ण तथा भोजन करने के एक घंटे बाद त्रिफला चूर्ण क्वाथ का सेवन अवश्य करें।
उन्होंने बताया कि भोजन से एक घंटे पहले हरिद्रा, आमलकी, दालचीनी, गिलोय, मेथी, चिरायता को बराबर मात्रा में मिलाकर इसका चूर्ण बनाकर लगातार सेवन करने से मधुमेह नियंत्रित रहती है। यदि शुगर बढ़ी है तो भोजन करने के एक घंटे बाद निशाकथाकादि कशाय फलाकत्रादि कशाय का सेवन इसमें फायदा मिलता है।
डॉ. जायसवाल के अनुसार डायबिटीज में विशेष रूप से दूध तथा दूध के अन्य विकार (पनीर इत्यादि) तथा दही आदि भी कम मात्रा में और जहां तक संभव हो दोपहर से पहले लेने चाहिए। फिर भी डायबिटीज नियंत्रित नहीं हो रहा है तो डाक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

उन्होंने बताया कि हम एलोपैथिक दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो निगरानी जरूरी होती है क्योंकि शरीर में प्रतिक्रियाएं बढ़ जाती हैं। ऐसे में हमें एलोपैथिक दवाओं की डोज कम करने की आवश्यकता होती है।

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कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े कर देगा ‘अतुल्य’

Incredible will break thousand pieces of Corona virus:

भारत के रक्षा वैज्ञानिकों ने एक ऐसा माइक्रोवेव बनाया है जो कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े करके उसे नष्ट करने में सक्षम है। ये माइक्रोवेव पुणे स्थित उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी संस्थान ने विकसित किया है। यह एक मिनट से भी कम समय में कोरोना विषाणु के टुकड़े टुकड़े कर उसे नष्ट कर देगा। संस्थान द्वारा विकसित माइक्रोवेव को अतुल्य नाम दिया गया है और यह 560 से 600 सेल्सियस के तापमान पर कोरोना विषाणु को टुकड़े टुकडे कर उसे नष्ट करने में सक्षम है। माइक्रोवेव किफायती है और इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है या एक जगह पर फिक्स भी किया जा सकता है। माइक्रोवेव इसे चलाने वाले व्यक्ति के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। विभिन्न वस्तुओं के आकार के अनुसार यह उस पर लगे कोरोना विषाणु को 30 सेकेंड से एक मिनट में नष्ट करने में सक्षम है। इस माइक्रोवेव का वजन तीन किलो है और यह केवल गैर धातु वाली वस्तुओं को ही संक्रमण मुक्त करने में सक्षम है।

 

ये तीन सुपर हीरो देंगे मात

इस बीच कोरोना वायरस को मात देने के लिए तीन सुपर हीरो भी आगे आए हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी सुपर पावर के साथ चलने की बात की है। इतना ही नहीं कोविड-19 के सुपर हीरो से नाम से एक पोस्टर भी जारी किया है, जिसमें साबुन, मास्क और अल्कोहल वाले हैण्ड सैनिटाइजर को वायरस से मुकाबला करने वाले सुपर हीरो के रूप में दिखाया गया है।
पोस्टर के माध्यम से सन्देश दिया जा रहा है कि कोरोना के संक्रमण से सुरक्षित रहना है तो साबुन और पानी से बार-बार अच्छी तरह से हाथ धोएं। बाहर से जब भी घर के अंदर आयें तो हाथों को अच्छी तरह से धोना कतई न भूलें। नाक, मुंह व आँख को न छुएं।

इसी तरह कोविड-19 के दूसरे सुपर हीरो मास्क को भी बहुत अहम बताते हुए इसका उपयोग खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए करने को कहा गया है। कोरोना का वायरस खांसने व छींकने से निकलने वाली बूंदों के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है, इसलिए खांसते या छींकते समय नाक व मुंह को ढककर रखें। वहीं, अल्कोहल आधारित सैनिटाइजर भी कोरोना की जंग में अहम भूमिका निभा रहे हैं। कोरोना को फैलने से रोकने के साथ ही कीटाणुओं को खत्म करने और खुद को सुरक्षित रखने में इनका इस्तेमाल बहुत ही प्रभावी है।

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बन गई कोरोना की दवा, नैनोमेडिसिन है नाम

Nano medicine is the name of Corona medicine:

भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दवा खोज निकाली है जो शरीर घुस चुके कोविड 19 वायरस की विस्तार की क्षमता को समाप्त कर देगी। वैज्ञानिकों ने दवा का पशुओं पर परीक्षण पूर्ण करके मानवों पर परीक्षण की तैयारी शुरू कर दी है।

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बदलने में सक्षम

ये वैज्ञानिक कोलकाता स्थित एस.एन. बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साईंसेज, (एसएनबीएनसीबीएस) के है और उन्होंने ऐसी सुरक्षित एवं किफायती नैनोमेडिसिन विकसित की है जो शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बदलने में सक्षम है। नैनोमेडिसिन स्थिति के अनुसार हमारे शरीर में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पेसीज (आरओएस) को घटा या बढ़ा सकती है और रोग का उपचार कर सकती है।
स्तनधारियो में आरओएस की नियंत्रित वृद्धि के लिए इस अनुसंधान की क्षमता कोविड-19 सहित वायरस संक्रमणों को नियंत्रित करने में नैनोमेडिसिन के अनुप्रयोग के लिए नई संभावना की उम्मीदें बढ़ाती है।

पशु परीक्षण पूर्ण

कई रोगों के रिडक्शन एंड ऑक्सीडेशन प्रोसेसेज (रेडॉक्स) के लिए पशु परीक्षण पूर्ण हो चुका है और अब संस्थान मानवों पर नैदानिक परीक्षण करने के लिए प्रायोजकों की खोज कर रहा है। यह मेडिसिन नींबू जैसे नींबू वर्गीय अर्क के साथ मैगनीज सॉल्ट से निकाले गए नैनोपार्टिकल्स को जोड़ती है। नैनोटेक्नोलॉजी की तरकीबों का उपयोग करते हुए मैगनीज और साइट्रेट का महत्वपूर्ण मिश्रण नैनोमेडिसिन का उत्पादन करता है।

ऑक्सीजन जोड़ती हटाती हैं

कृत्रिम रूप से निर्मित्त नैनोमेडिसिन हमारे शरीर के उत्तकों में रिडक्शन एंड ऑक्सीडेशन प्रोसेसेज (रेडॉक्स) के संतुलन को बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण पाया गया। कोशिकाओं में रेडॉक्स प्रतिक्रियाएं ऑक्सीजन जोड़ती या हटाती हैं और कोशिकाओं में ऊर्जा पैदा करने जैसी कई प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य हैं। रेडॉक्स प्रतिक्रियाएं रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पेसीज (आरओएस) नामक कोशिकाओं के लिए हानिकारक उत्पादनों का भी निर्माण कर सकती हैं चूहों पर किए गए एक परीक्षण में, नैनोमेडिसिन सुरक्षित एवं त्वरित पाए गए और ढाई घंटों के भीतर बिलरुबिन के स्तर को नीचे ले आए।

तोड़ देती है वायरस की संरचना

स्तनपायियों में रिएक्टिव आक्सीजन स्पेसीज (आरओएस) की नियंत्रित वृद्धि की यह क्षमता कोविड-19 सहित वायरस संक्रमणों को नियंत्रित करने में नैनोमेडिसिन के अनुप्रयोग की नई संभावनाओं का रास्ता प्रशस्त करता है। अभी हाल में, हाइड्रोजन पेरोक्साइड, जो आरओएस के वर्ग का है, की स्थानीय दवा की अनुशंसा कोविड-19 से बचने के एक तरीके के रूप में की गई है। एक नेबुलाइजर के जरिये श्वसन मार्ग में हाइड्रोजन पेरोक्साइड के उपयोग द्वारा अत्यधिक आरओएस अर्जित किया गया, जिसकी सलाह वायरस संरचना को तोडऩे के द्वारा कोविड-19 को निष्क्रिय करने के लिए दी जाती है। ये निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित किए गए हैं।