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अब पता चल जाएगा कि आखिर राहुल गांधी क्यों जाते हैं विदेश

प्रधानमंत्री समेत कई अन्य नेताओं को सर्वश्रेष्ठ सुरक्षा प्रदान करने के लिये 1988 में गठित एसपीजी अब साये की तरह राहुल गांधी के साथ रहेगी। राहुल उसे छोड़कर अब ​अकेले विदेश नहीं जा सकेंगे। इससे कांग्रेस में घबराहट है और उसके नेता आरोप लगा रहे हैं कि सरकार उनकी निगरानी करने की कोशिश कर रही है। माना जा रहा है कि कांग्रेस और गांधी परिवार के सदस्य विदेश में अपनी गति​विधियों की गोपनीयता उजागर होने के डर से ऐसे आरोप लगा रहे हैं।
वैसे अतिविशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा से एसपीजी को हटाया नहीं जा सकता है। यदि इस तरह की सुरक्षा प्राप्त कोई व्यक्ति एसपीजी के सुरक्षा कवच के बगैर कहीं जाता है, चाहें विदेश यात्रा ही क्यों न हो, तो सहज ही कल्पना की जा सकती है कि वह कितने जोखिमों को जन्म देता है। देश में 1988 में बने और बाद में समय- समय पर इसमें हुये संशोधनों में ही नहीं बल्कि 1996 में उच्चतम न्यायालय के फैसले में भी यही स्पष्ट किया गया है। लेकिन कांग्रेस के नेता राहुल गांधी एसपीजी के सुरक्षा कवच के बगैर ही विदेश यात्रा करते हैं।
केन्द्र सरकार ने एसपीजी सुरक्षा प्राप्त लोगों के लिये दिशा-निर्देश तैयार किये हैं। इनके अंतर्गत एसपीजी सुरक्षा कवच प्राप्त प्रत्येक व्यक्ति के लिये विदेश यात्रा के दौरान भी एसपीजी सुरक्षा कर्मियों को साथ ले जाना होगा। यही नहीं, ऐसे व्यक्तियों को अपनी यात्रा और पिछली कुछ यात्राओं का भी विवरण देना अनिवार्य होगा। एसपीजी सुरक्षा प्राप्त अति विशिष्ट व्यक्ति की इस सुरक्षा कवच के बगैर ही देश-विदेश की यात्रा के दौरान किसी भी तरह की अप्रिय घटना की संभावना खत्म करने के इरादे से ही केन्द्र चाहता है कि इन नियमों का सख्ती से पालन हो. लेकिन ऐसा लगता है कि केन्द्र की पहल को लेकर कांग्रेस खुश नहीं है क्योकि उसे लगता है कि शायद सरकार एसपीजी सुरक्षा कवच के माध्यम से उनके नेताओं की निगरानी करना चाहता है।

केन्द्र की इस पहल के बाद अब कांग्रेस के एसपीजी सुरक्षा प्राप्त नेताओं को अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भी इसकी सुरक्षा में ही रहना होगा। कांग्रेस को लगता है कि केन्द्र सरकार एसपीजी सुरक्षा प्राप्त उसके नेताओं की गतिविधियों पर निगाह रखने का प्रयास कर रही है।
केन्द्र सरकार के निर्णय और कांग्रेस की असहमति भरे रवैये के परिप्रेक्ष्य में पहला सवाल यही उठता है कि आखिर उसे इसमें क्या आपत्ति हो सकती है? यह सवाल भी उठ सकता है कि ऐसी क्या वजह है कि एसपीजी सुरक्षा प्राप्त कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उनके पुत्र और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी विदेश यात्रा के दौरान एसपीजी सुरक्षा अपने साथ नहीं रखना चाहते? क्या ये नेता भारत की तुलना में विदेश में खुद को अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं या वे अपनी विदेश यात्राओं की गतिविधियों को जनता की नजरों से दूर रखना चाहते हैं? 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की उनके आवास में ही हत्या किये जाने के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने पर उनकी पुख्ता सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये संसद ने 1988 में कानून बनाकर विशेष सुरक्षा बल ‘एसपीजी’ का गठन किया था। इस कानून के अंतर्गत एसपीजी की सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति निरंतर इस बल के सुरक्षा दायरे में ही रहता है।
राजीव गांधी दो दिसंबर, 1989 को प्रधानमंत्री पद से हट गये थे। इसके करीब दो साल बाद 21 मई, 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री की तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक चुनाव सभा के दौरान हुये विस्फोट में कर दी गयी थी। इस चुनाव सभा के दौरान राजीव गांधी के निकट पहुंच कर लिट्टे की आत्मघाती महिला ने खुद को बम से उड़ा लिया था। इस घटना के बाद ही यह महसूस किया गया कि पूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिवार के सदस्यों को भी एसपीजी कानून के दायरे में सुरक्षा प्रदान की जाये। इसके बाद 25 सितंबर, 1991 को इस कानून में संशोधन करके प्रावधान किया गया कि प्रत्येक पूर्व प्रधानमंत्री को वर्तमान प्रधान मंत्री के समकक्ष ही अत्यधिक सुरक्षा प्रदान की जायेगी।
पिछले कुछ सालों से यह देखा जा रहा था कि एसीपीजी की सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति अपनी विदेश यात्राओं के दौरान इस सुरक्षा कवच में नहीं होते हैं। ये अतिविशिष्ट व्यक्ति बगैर एसपीजी सुरक्षा कवच के विदेश जाते हैं और इस तरह उनकी सुरक्षा का खतरा बढ़ जाता है।

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