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प्रसार भारती ने करवट बदली, फिर निशाने पर आई पीटीआई

नई दिल्ली. प्रसार भारती ने स्वतंत्र पत्रकारिता को टेढ़ी नजर से देखने वाली केन्द्र की सत्तारूढ़ पार्टी को खुश करने की राह में आगे बढ़ते हुए समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के सब्सक्रिप्शन रद्द कर दिया है।

प्रसार भारती ने पीटीआई को 15 अक्टूबर को पत्र लिखकर बताया कि बोर्ड ने अंग्रेजी और अन्य मल्टीमीडिया सेवाओं के लिए डिजिटल सब्सक्रिप्शन हेतु घरेलू समाचार एजेंसियों से नए प्रस्ताव मंगवाने का फैसला किया है।

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प्रसार भारती समाचार सेवा एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म के प्रमुख समीर कुमार के हस्ताक्षरयुक्त पत्र में कहा गया, प्रसार भारती द्वारा अधिसूचित किए जाने के बाद पीटीआई भी इसमें हिस्सा ले सकता है। प्रसार भारती समाचार सब्सक्रिप्शन के लिए पीटीआई को सालाना 6.85 करोड़ रुपये का भुगतान कर रहा है। इस साल जून में प्रसार भारती के वरिष्ठ अधिकारी ने लद्दाख मामले को लेकर पीटीआई की कवरेज की निंदा कर उसे देशद्रोही करार दिया था।

नए प्रस्ताव मांगे

पत्र में कहा गया था कि पीटीआई को समय-समय पर कई बार उनकी संपादकीय खामियों के बारे में बताया गया, जिस वजह से गलत खबरों का प्रसार हुआ और इससे जनहित को हानि पहुंची। पीटीआई देशभर में संवाददाताओं और फोटोग्राफरों का एक बड़ा नेटवर्क है और इसकी सेवाओं को देश में सभी प्रमुख समाचार संगठनों के लिए अनिवार्य समझा जाता है।

‘मोदी सरकार के मित्रों की भरी हुई हैं जेब और भारत का गरीब भूखा’

प्रसार भारती दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो का संचालन करता है और ये दोनों प्रसारक लंबे समय से पीटीआई की वायर सेवाओं के सब्सक्राइबर रहे हैं। प्रसार भारती के बोर्ड ने एक अन्य एजेंसी यूएनआई की सदस्यता को भी समाप्त करने का फैसला किया है। हालांकि घरेलू एजेंसियों से नए प्रस्ताव मंगाने के उनके फैसले को पीटीआई को निशाना बनाने के तौर पर देखा जा रहा है।

सिर्फ 75 फीसदी भुगतान कर रही है सरकार

पीटीआई पर सरकार की तरफ से पहला आधिकारिक दबाव 2016 में उस समय डाला गया, जब प्रसार भारती ने एकतरफा घोषणा कर कहा कि वह पीटीआई को इसकी 9.15 करोड़ रुपये की वार्षिक सदस्यता फीस का सिर्फ 75 फीसदी ही भुगतान करेगा। जब मोदी सरकार पीटीआई के संपादक के रूप में अपने उम्मीदवार को पेश करने के प्रयासों में असफल रही थी। तब पीटीआई के बोर्ड ने दिवंगत मंत्री अरुण जेटली की ओर से सुझाए गए तीनों को दरकिनार कर एसोसिएटेड प्रेस (एपी) के वरिष्ठ पत्रकार विनय जोशी को एजेंसी के निवर्तमान संपादक एमके राजदान की जगह नया संपादक चुना था।

चीन में भारतीय राजदूत के साक्षात्कार से नाराज हुई थी सरकार

इस साल जून महीने में उस समय मामला अधिक बिगड़ा, जब सरकार पीटीआई के भारत में चीन के राजदूत और चीन में भारत के राजदूत के साक्षात्कारों से नाराज हो गई। प्रसार भारती के एक अधिकारी ने उस समय संवाददाताओं से कहा था, ‘पीटीआई की देशविरोधी रिपोर्टिंग अब संबंधों को जारी रखने के लिए संभव नहीं है।

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सरकार को लगता है कि लद्दाख मामले पर राजदूत का साक्षात्कार नहीं लिया जाना चाहिए था। भारतीय राजदूत विक्रम मिस्री के साथ पीटीआई साक्षात्कार से साउथ ब्लॉक की काफी किरकिरी हुई थी क्योंकि मिस्री ने चीन की घुसपैठ पर टिप्पणी की थी और उनके इसी बयान को पीटीआई ने ट्वीट किया था। असल में विक्रम मिस्री का यह बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन दावों से विपरीत था, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की सीमा में किसी ने प्रवेश नहीं किया।