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मोदी सरकार ने बनाया खदानों को पूंजीपतियों के हवाले करने का कानून

नई दिल्ली. कोरोना काल में कई कानूनों को बदलकर निजी क्षेत्र के लिए खोल देने में जुटी मोदी सरकार ने खनन क्षेत्र भी पूंजीपतियों के हवाले करने का रास्ता साफ कर दिया है।
खनन मंत्रालय ने ‘खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 या एमएमडीआर एक्ट में अगस्त में बड़े फेरबदल करते हुए खनन में बड़े स्तर पर निजीकरण की प्रक्रिया को शुरू कर दिया है।
सरकार का दावा है कि बदलावों से खनन में बड़ी तदाद में रोज़गार पैदा किया जा सकेगा और देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।
लेकिन खनन क्षेत्र में काम कर रहे लोग रोज़गार के इन सरकारी दावों के साथ-साथ, इस निजीकरण के पर्यावरण, खदान बहुल राज्यों के जंगलों और वहां के आम जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी सवाल उठा रहे हैं।

शोध का खर्च राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट उठाएगा

छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान उड़ीसा और कर्नाटक जैसे राज्य इन बदलावों से प्रभावित होंगे। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इसे संघीय व्यवस्था के ख़िलाफ़ बताया है।
भारत में खनन का वर्तमान और इतिहास कई जटिल संशोधित क़ानूनों की कड़ियों और मज़दूर यूनियनों के विरोध से भरा पड़ा है। बदलाव के लिए खनन मंत्रालय का नोटिस खनन से जुड़ी प्राइवेट कंपनियों को खदानों के साथ-साथ संभावित खदान क्षेत्रों की जाँच-पड़ताल करने की अनुमति मिल जाएगी और इस शोध का खर्च राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट उठाएगा।
अवैध खनन की परिभाषा में किया जा रहा बदलाव भी काफ़ी अहम है। फ़िलहाल किसी भी खदान में खनन के लिए खनन योजना में चिह्नित किए गए कोर खनन क्षेत्र के सिवा अन्य जगहों पर खनन करने की इजाज़त नहीं है। लेकिन बदलाव के बाद माइनिंग कंपनियां खनन के लिए लीज़ पर ली गई पूरी ज़मीन में से जहां भी खनन करना चाहें, वहां अब क़ानूनी रूप से कर सकती हैं।

कैप्टिव और नॉन-कैप्टिव खदानों का अंतर ख़त्म

इसके साथ ही कैप्टिव और नॉन-कैप्टिव खदानों के अंतर को ख़त्म करके सभी खनिजों के ब्लॉकों को व्यावसायिक खनन के लिए निजी कंपनियों के बीच नीलाम जाएगा। स्टाम्प ड्यूटी को कम करने और डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड (डीएमएफ) नीति के मूल उद्देश्य में बदलाव का प्रस्ताव भी इन सुधारों में शामिल है। जानकारी के अनुसार वर्तमान बदलाव सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर 2019 में बनी हालिया राष्ट्रीय खनिज नीति का भी उल्लंघन है। कई बदलाव राष्ट्रीय खनिज नीति और संविधान तक के ख़िलाफ़ हैं। राष्ट्रीय खनिज नीति कहती है कि सभी प्राकृतिक संसाधन साझा राष्ट्रीय विरासत है।

बुरी तरह प्रभावित होगा डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड या डीएमएफ

इन संसाधनों की देखभाल की ज़िम्मेदारी राज्य पर है। खनिजों के संदर्भ में इसमें यह भी साफ़ कहा गया है कि ज़मीन के अंदर मौजूद सभी मिनरल्स की पूरी क़ीमत राज्य सरकारों को मिलनी चाहिए।
खनन में प्रस्तावित इन बदलावों से डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड या डीएमएफ बुरी तरह प्रभावित होगा। खनन क़ानून में 2015 के संशोधन के बाद शामिल किया गया डीएमएफ खनन ज़िलों में बनने वाला एक ऐसा फंड है जिसका इस्तेमाल खनन से प्रभावित होने वाले स्थानीय लोगों के जीवन को बेहतर बनाए जाने के लिए किया जाना तय था।
डीएमएफ में स्थानीय लोगों के लिए उचित शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के साथ साथ उनके आजीविका के साधन उपलब्ध करवाना भी है। लेकिन प्रस्तावित क़ानून में इसे बदल दिया गया है। अब डीएमएफ फंड को सड़कें और इमारतें जैसे दिखाई देने वाले निर्माण कार्य में पैसा निवेश करने को कहा गया है।