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गोवर्धन का परिक्रमा मार्ग ठसाठस, तिल रखने तक की जगह नहीं

मथुरा. अधिक मास में गोवर्धन में देश भर से आए भक्तों के चलते परिक्रमा मार्ग में तिल रखने तक की जगह नहीं बची है। गोवर्धन की परिक्रमा से लेकर चौरासी कोस की परिक्रमा तक मथुरा की परिक्रमा से बरसाना की गहवर वन की परिक्रमा तक अथवा वृन्दावन की परिक्रमा आदि में जिस प्रकार से अपार जनसमूह परिक्रमा कर रहा है। उससे लगता है कि कन्हैया की नगरी से कोरोनावायरस का प्रकोप समाप्त हो गया है।

बंदर खा नहीं पा रहे हैं फल

रात के समय परिक्रमा इतनी सघन हो जाती है कि परिक्रमा मार्ग में तिल रखने की जगह नही होती है। परिक्रमार्थियों के बढ़ने से बन्दरों की चांदी हो गई है। उन्हें खाने के लिए इतने फल मिल रहे हैं कि उनसे खाया नही जा रहा है तथा बचे खुचे फल या तो गाय खा रही है अथवा सुअर खा रहे हैं।

85 किलोमीटर चलते थे सनातन गोस्वामी

गोवर्धन में तो दण्डौती, ठढ़ेसुरी, लोटन परिक्रमा करने की होड़ सी लगी हुई है। इतिहास साक्षी है कि सनातन गोस्वामी यद्यपि एक दिन में गोवर्धन की एक परिक्रमा ही करते थे लेकिन वे वृन्दावन से मथुरा होते हुए गोवर्धन आते थे और एक परिक्रमा करके फिर वापस चले जाते थे और इस प्रकार उन्हें लगभग 85 किलोमीटर रोज पैदल चलना पड़ता था। जब वे बहुत वृद्ध हो गए तो एक बार परिक्रमा करते करते वे थककर बैठ गए। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ठाकुर जी बालस्वरूप में आए और उनसे कहा कि वे अधिक वृद्ध हो गए हैं इसलिए वे अब गोवर्धन की परिक्रमा न किया करें पर सनातन उस बालक की बात को अनसुना करके परिक्रमा शुरू करने ही वाले थे कि भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट रूप के दर्शन कराए और उनसे इस प्रकार परिक्रमा न करने को कहा तो सनातन की अश्रुधारा बह निकली।

राधादामोदर मंदिर में रखी है कृष्ण के चरणकमल वाली शिला

ठाकुर ने इसके बाद पास से ही एक शिला उठाई और उस पर जैसे ही अपने चरणकमल रखे शिला मोम की तरह पिघल गई। उन्होंने वंशी बजाकर सुरभि गाय को बुलाया और उस शिला पर उसके खुर का निशान बनवा दिया। इसके बाद उन्होंने उस पर अपनी लकुटी और वंशी भी रख दी जिससे उसका चिन्ह भी बन गया। उन्होंने शिला सनातन को दी और कहा कि वे जहां पर रह रहे हैं, वहीं पर इस शिला को रखकर यदि इसकी चार परिक्रमा कर देंगे तो उनकी एक परिक्रमा पूरी हो जाएगी। यह शिला अब राधादामोदर मन्दिर में रखी है तथा सामान्य दिनों में तड़के तीन बजे से इस शिला की परिक्रमा वृन्दावनवासी तथा अधिक वृद्ध तीर्थयात्री करते हैं।

बोरी सिर पर रखकर परिक्रमा

चौरासी कोस की परिक्रमा में अपार जनसमूह उमड़ पड़ा है। इस परिक्रमा में जहां अधिकांश लोग अपने दैनिक उपयोग का सामान एक बोरी में रखकर बोरी को सिर पर रखकर परिक्रमा कर रहे हैं वहीं जो साधन सम्पन्न हैं वे अपने दैनिक उपयोग का सामान किसी वाहन में रखकर ठढ़ेसुरी परिक्रमा कर रहे हैं। कुछ ऐसे भक्त भी है जो चौरासी कोस की दण्डौती परिक्रमा कर रहे हैं। यही हाल वृन्दावन, मथुरा, क्षीरसागर बल्देव, गहवरवन बरसाना आदि की परिक्रमा का है। कुल मिलाकर अधिक मास श्रीकृष्ण का माह होने के कारण ब्रज का वातावरण कृष्णमय हो गया है।