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कैग ने फिर कठघरे में खड़ी की मोदी सरकार, उपकर खर्च मामले में गड़बड़ का आरोप

नई दिल्ली. केंद्रीय महालेखा एवं परीक्षक नियंत्रक (कैग) ने फिर एक बार मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। उसने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि सरकार ने वित्त वर्ष 2018-19 में 35 अलग-अलग तरीके के उपकरों (सेस), लेवी और शुल्क से कुल 2,74,592 करोड़ रुपये वसूले लेकिन इस राशि का जिस तयशुदा काम के लिए उपयोग होना चाहिए था,वह नहीं किया।

खास मकसद वाले फंड में नहीं गई राशि

रिपोर्ट के अनुसार कुल वसूले गए 2,74,592 करोड़ उपकर में 35 फीसदी यानी 95,028 करोड़ रुपए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के हर्जाने का है। 22 फीसदी यानी 59,580 करोड़ रुपए हाई स्पीड डीजल तेल और मोटर स्प्रिट में अतिरिक्त उत्पाद शुल्क शामिल है। वहीं, 51,273 करोड़ रुपए यानी 19 फीसदी सड़क एवं संरचना उपकर है। साथ ही 41,177 करोड़ यानी 15 फीसदी स्वास्थ्य एवं शिक्षा का उपकर भी शामिल है। सरकार ने इसमें से 1,64,322 करोड़ रुपये ही खास मकसद के उपयोग वाले रिजर्व फंड में डाले और शेष राशि भारत की संचित निधि में ही रह गए।

जीएसटी में मर्ज फिर भी होती रही वसूली

दरअसल कर के ऊपर लगने वाले कर अर्थात उपकर वसूल कर लोगों की भलाई, कल्याण या उन्नति से जुड़ी योजनाओं को बेहतर और मजबूत बनाने में खर्च किया जाता है। इसलिए उपकर राशि को योजना से जुड़े खास मकसद वाले रिजर्व फंड में संसद की अनुमति से डाला जाता है। ताकि संबंधित मंत्रालय, विभाग रिजर्व फंड का इस्तेमाल आसानी से कर सके। कैग करीब दो दशक से यह बात दोहराता रहा है कि इन उपकरों का इस्तेमाल तय काम में ही किया जाए। हैरानी की बात ये है कि जिन 17 उपकरों 1 जुलाई, 2017 को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) में शामिल कर दिया गया, उनमें से कई उपकरों को सरकार आगे के वर्ष (2018-19) में भी वसूलती रही। इनमें किसान कल्याण कोष, स्वच्छ ऊर्जा, स्वच्छता अभियान जैसे कुल 9 उपकर शामिल हैं। इनको भी संचित निधि में ही रखा गया और रिजर्व फंड में नहीं डाला गया।

पहले तय रिजर्व फंड में जानी चाहिए राशि

संचित निधि से रिजर्व खाते में उपकर के पैसे को ट्रांसफर न करने पर कैग ने कहा है कि इससे न सिर्फ राजस्व घाटा बढ़ा बल्कि वित्त मंत्रालय खास मकसद वाले जरूरी रिजर्व फंड को संचालित करने में विफल हो गया। वैसे तो उपकर को समाप्त किए जाने के बाद जीएसटी से अलग वसूली नहीं की जानी चाहिए थी। दूसरा यह कि इन उपकरों को सही ठिकाने पर पहुंचाया जाना चाहिए। कैग की रिपोर्ट यह बताती है कि योजना के तहत वसूले गए उपकर और लेवी को सबसे पहले तय रिजर्व फंड में डालना चाहिए ताकि उसका इस्तेमाल संसद द्वारा विशिष्ट मकसद के लिए किया जाए। बावजूद इसके करीब 2.75 लाख करोड़ में से 1,64,322 करोड़ रुपये ही रिजर्व फंड में डाले गए।

संचित निधि है सरकार की पूंजी वाली तिजोरी

1 जुलाई, 2017 को जीएसटी में शामिल किए जाने वाले कई उपकरों में कुल 9 ऐसे उपकर थे, जिन्हें 2018-19 में भी वसूला गया और जिनका इस्तेमाल नहीं किया गया। यानी इन्हें संचित निधि में रहने दिया गया। भारत की संचित निधि (सीएफआई) सरकार के समस्त आय-व्यय की पूंजी वाली तिजोरी है। और इस तिजोरी से पैसे बिना संसद की अनुमति के नहीं निकाले जा सकते। यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 114 की उप धारा 3 में वर्णित है। इसके बावजूद प्रावधान के विपरीत और संसद की इजाजत के बिना 2018-19 में सेंट्रल बोर्ड आफ डायरेक्ट टैक्सेस ने 20,566.33 करोड़ रुपए की निकासी की।