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ऐसा था चाउचेस्कू, बुखार के साथ खांसी की दवा खरीदते ही फांसी पर चढ़ा देता था

तानाशाहों का वर्तमान बेहद क्रूर और भविष्य मौत होता है। आज हम एक ऐसे ही तानाशाह की कहानी लेकर आए हैं जिसने अपने देश में दवाओं तक पर राशन लगा दिया। अर्थात अगर किसी को बुखार के साथ खांसी है तो उसे सिर्फ बुखार अथवा खांसी में ​से किसी एक की दवा खरीदने की इजाजत थी। खाने के लिए भी राशन तय किया हुआ था। उससे अधिक एक ब्रेड भी किसी को खरीदने की इजाजत नहीं थी।
बिल्कुल 30 साल पहले पूर्वी यूरोप के देश रोमानिया की जनता ने 25 साल तक उनका रक्त पीने वाले निकोलस चाउचेस्की को अत्याचारों की सजा मौत के रूप में देकर 25 साल तक उनके कंधों पर रखे नर्क के जुए को उतार फैंका था। बहुत से लोग अब शायद यकीन न करें लेकिन 60 के दशक में रोमानिया में निकोलस चाचेस्कू ने लगातार 25 सालों तक न सिर्फ़ अपने देश के मीडिया की आवाज़ नहीं निकलने दी बल्कि खाने, पानी, तेल और यहाँ तक कि दवाओं तक पर राशन लगा दिया। नतीजा ये हुआ कि हज़ारों लोग बीमारी और भुखमरी के शिकार हो गए और उस पर तुर्रा ये कि उनकी ख़ुफ़िया पुलिस ‘सेक्योरिटेट’ ने लगातार इस बात की निगरानी रखी कि आम लोग अपनी निजी ज़िंदगी में क्या कर रहे हैं। रोमानिया के तानाशाह निकोलस चाउसेस्की का कद मात्र 5 फ़ीट 4 इंच था, इसलिए पूरे रोमानिया के फ़ोटोग्राफ़रों को हिदायत थी कि वो उनकी इस तरह तस्वीरें खीचें कि वो सबको बड़े क़द के दिखाई दे। उनकी पत्नी एलीना ने कई विषयों में फ़ेल होने के बाद 14 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी थी लेकिन रोमानिया की फ़र्स्ट लेडी बनने के बाद उन्होंने ऐलान करवा दिया था कि उनके पास रसायन शास्त्र में ‘पीएचडी’ की डिग्री है। ये डिग्री जाली थी।

 

चाउसेस्कू रोमानिया को एक विश्व शक्ति बनाना चाहते थे. इसके लिए ज़रूरी था बड़ी जनसंख्या का होना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने ‘एबॉर्शन’ यानी गर्भपात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसी वजह से पूरे रोमानिया में तलाक़ लेना भी मुश्किल बना दिया गया था। चूंकि चाउसेस्कू छोटे क़द के थे लेकिन वे हर चीज़ बड़ी पसंद करते थे। चाउसेस्कू के प्रति चापलूसी इस हद तक बढ़ गई कि रोमानिया का प्रमुख अख़बार ‘सिनतिया’ उनको रोमानिया का जूलियस सीज़र, नेपोलियन, पीटर महान और लिंकन कह कर पुकारने लगा। चाउसेस्कू के शासन का पूरा दौर रोमानिया की जनता के लिए अभाव का दौर था। हर जगह चीज़ों को लेने के लिए लंबी कतारें लगी रहती थीं; कसाई की दुकानों पर मुर्गी के पैरों के अलावा कुछ भी उपलब्ध नहीं रहता था। दुकानों में फल नहीं के बराबर थे। कभी कभी कुछ सेब और आड़ू दिख जाते थे। सामान्य ‘वाइन’ आम लोगों की पहुंच से बाहर थी और कुछ चुनिंदा रेस्टोरेंट में ही मिल सकती थी।  सबसे बड़ी समस्या ऊर्जा की थी हर तीन में से एक बल्ब ही जला करता था और सार्वजनिक वाहनों के रविवार को चलने पर मनाही थी। खाने पर राशन था बिजली की खपत में भारी कटौती से लोग कड़कड़ाती ठंड में अँधेरे में बिना किसी हीटिंग के काँपते हुए रहने के लिए मजबूर थे

टेलिविजन पर सिर्फ़ एक चैनल से प्रसारण होता था। आधे कार्यक्रमों में सिर्फ़ चाउसेस्कू की गतिविधियाँ और उपलब्धियाँ दिखाई जाती थीं।
किताबों की दुकानों और म्यूज़िक स्टोर्स के लिए उनके भाषणों का संग्रह रखना ज़रूरी था। 17 दिसंबर, 1979 को रोमानिया के सैनिकों ने तिमिस्वारा के प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। इसके बाद ही पूरे देश में प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया।  21 दिसंबर, 1989 को निकोलाई चाचेस्कू ने अंतिम भाषण बुखारेस्ट के मध्य में पार्टी मुख्यालय की बालकनी से एक जनसभा में दिया। भाषण के दौरान ही भीड़ ने उनका आवास घेर लिया। वे पत्नी के साथ एक हेलीकाप्टर से भागे लेकिन वह उन्हें एक खेत में उतारकर चला गया।
उसी दिन चाउचेस्की और उनकी पत्नी को गिरफ़्तार कर लिया गया। क्रिसमस के दिन दोनों पर एक सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया और उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई। दोनों के हाथ बाँध कर एक दीवार के सामने खड़ा किया गया। पहले दोनों को अलग अलग गोली मारी जानी थी, लेकिन एलीना ने कहा कि वो साथ साथ मरना पसंद करेंगे। सैनिकों ने निशाना लिया और 25 सालों तक रोमानिया पर राज करने वाला निरंकुश तानाशाह निकोलाई चाउचेस्कू धराशाई हो गया। मार्क्सवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स ने एक बार बिल्कुल सही कहा था, लोग अपना इतिहास खुद बनाते हैं लेकिन इतिहास कभी उनकी पसंद से नहीं बनता।

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