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देश के इस अस्पताल में होता है मोबाइल के मरीजों का इलाज, ठीक होने पर करने लगते हैं मोबाइल से नफरत

क्या आप मोबाइल के मरीज हैं तो तमाम चिंताएं छोड़कर उस प्रयागराज चले जाइए, जहां त्रिवेणी संगम में पूरा भारत पाप धोने जाता है, लेकिन आपको त्रिवेणी नहीं जाना है बल्कि उस अस्पताल में जाना है, जहां मोबाइल के मरीजों का इलाज किया जाता है। इस इलाज से मोबाइल के मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं और वे चिडचिड़ेपन, बेचैनी, सिरदर्द, आंखों की रोशनी कमजोर होना, नींद न आना, अवसाद, तनाव, आक्रामक व्यवहार, वित्तीय समस्याओं से मुक्त हो सकते हैं।

मोबाइल मरीजों के लिए खोले गए अस्पताल के डाक्टर राकेश पासवान नेे बताया कि मोबाइल और इंटरनेट लोगों की प्रगति के लिये जहां आवश्यक संसाधनों में शामिल हो गया है। उन्होंने कहा इसके अधिक प्रयोग से लोगों से स्वास्थ्य में प्रतिकूल असर पड़ रहा है। डॉ0 पासवान ने बताया कि मोबाइल के एक सीमा से अधिक प्रयोग से निजात दिलाने के लिए मोतीलाल नेहरु मंडलीय (काल्विन) अस्पताल में प्रदेश का पहला‘‘मोबाइल नशा मुक्ति केन्द्र” शुरू किया गया है। उन्होंने बताया कि मोतीलाल नेहरु मंडलीय (काल्विन) अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डॉ0 वी के सिंह के नेतृत्व में गठित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम की टीम कार्य कर रही है। जिसके नोडल अधिकारी प्रयागराज के एड़िशनल मुख्य चिकित्साधिकारी डा वी के मिश्रा है।

केन्द्र के इन्चार्ज मनोचिकित्सक डाॅ0 राकेश पासवान ने बताया कि बच्चों के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं, युवाओं में बढ़ती लत की समस्या को देखते हुए अस्पताल में मोबाइल नशा मुक्ति केन्द्र की सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को ओपीडी की शुरूआत की गयी है। इसमें मोबाइल और इंटरनेट की लत छुडाने के लिए खास ओपीडी शुरू हुई है। इसमें मरीजो की काउंसिलिग के साथ आवश्यकता पड़ने पर दवायें भी उपलब्ध कराई जायेगी। इसके साथ ही कुछ खास थैरेपी योग भी बताया जाएगा। उन्होने बताया कि मोबाइल के आदी बन चुके लोगों के स्वास्थ्य के साथ ही व्यवहार में भी प्रतिकूल बदलाव देखने को मिल रहा है। स्वस्थ, समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए इस लत को दूर करना महत्वपूर्ण है। सेल फोन के आदी लोग लंबे समय तक काम पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम नहीं होते हैं। बहुत अधिक स्क्रीन समय मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है।

डाॅ0 पासवान ने बताया कि मोबाइल की लत से पीड़ित लोग नोमोफोबिया से पीड़ित होते हैं। यह हमारे स्वास्थ्य, रिश्तों के साथ-साथ काम पर भी असर डालता है। मोबाइल फोन दुनिया भर के किसी भी व्यक्ति के साथ तुरंत जुड़ने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। वे हमें किसी भी आवश्यक जानकारी को खोजने में मदद करते हैं और मनोरंजन का एक बड़ा स्रोत है। उन्होने कहा कि यह आविष्कार हमें सशक्त बनाने के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन यह कुछ ऐसा है जो हमारे ऊपर हावी हो रहा है। उन्होने बताया कि हाइड्रोफोबिया, एक्रॉफोबिया और क्लेस्ट्रोफोबिया के बारे में सुना होगा लेकिन क्या नोमोफोबिया के बारे में सुना है। यह एक नए तरह का डर है जो मनुष्यों में बड़ी संख्या में देखा जाता है। नोमोफोबिया “कोई मोबाइल फोन, फोबिया” नहीं है। यह एक के मोबाइल फोन के बिना होने का डर है। मोबाइल फोन के आदी किशोर सबसे खराब हैं। वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते। मोबाइल की लत उनके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कम करती है और चीजों को समझने की उनकी क्षमता को कम करती है।
डाॅ0 पासवान ने बताया कि अध्ययनों से पता चलता है कि जो लोग दिन में कई घंटों तक अपने मोबाइल फोन पर बात करते हैं, उनमें मस्तिष्क कैंसर विकसित होने की संभावना अधिक होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मोबाइल फोन मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली रेडियो तरंगों का उत्सर्जन करते हैं। हालांकि, कई वैज्ञानिक और चिकित्सा व्यवसायी इस खोज से सहमत नहीं हैं।

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