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पानी पर चलकर आया शिष्य तो गुरु कैसा होगा! अचरज में पड़े इस संत ने छोड़ा अपना रुद्राक्ष और शंख

उत्तर प्रदेश की सूखाग्रस्त बुंदेलखंड की धरती पर जालौन जिला मुख्यालय से महज 55 किलोमीटर की दूरी पर हरे भरे जंगलों और ग्रामीण अंचल के बीच एक ऐसा मनोहारी दर्शनीय स्थल मौजूद है जो एकबार बुंदेलखंड में होने का एहसास ही भुला देता है और वह स्थान है पांच नदियों के संगम से बना “पचनद स्थल”। यह स्थान न केवल प्राकृतिक रूप से बेहद दर्शनीय है बल्कि इस जगह का अपना आध्यात्मिक महत्व भी है और इसी कारण स्थानीय लोगों के बीच पचनद स्थल को लेकर बड़ी श्रद्धा और विश्वास भी है। प्राकृतिक रूप से संपन्न और पर्यटन की असीम संभावनाओं वाला यह क्षेत्र शासन की उपेक्षा के चलते उस तरह विकसित नहीं हो पाया है जितना होने की इसमें क्षमता है। इसी कारण देसी और विदेशी पर्यटकों के बीच इस स्थल को लेकर कोई जानकारी नहीं है। इस क्षेत्र की असीम संभावनाएं हैं पर्यटन के अलावा जलसंकट समाधान और आध्यात्मिक महत्व भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

कंजौसा के पास यमुना, पहुज, सिंध, क्वांरी और चंबल पांच नदियों का संगम होने की वजह से यह स्थान पचनद के नाम से जाना जाता है। इस वजह से पंचनद का अध्यात्मिक महत्व भी है। संगम के पहले बाबा साहब का प्रचीन मंदिर है। कथानक है कि इस स्थल पर सबसे पहले मुकुंद दास रहते थे। एक बार तुलसी दास यमुना के मार्ग से गुजर रहे थे। प्यास लगने पर उन्होंने पानी के लिए पुकार लगाई। महंत मुकुंद दास उस समय सो रहे थे। उनके शिष्य ने उन्हें जगाकर बताया कि कोई संत यमुना के बीच में है और पानी मांग रहा है। मुकुंद दास ने शिष्य को ही अपनी खड़ाऊ देकर तुलसीदास को पानी पिलाने के लिए भेज दिया। मुकुंद दास की खड़ाऊं पहनकर यमुना में प्रवेश करने पर उनका शिष्य ऐसे चला गया जैसे पानी में नहीं जमीन पर चल रहा है। इस दिव्यता को देख तुलसीदास भी अचरज में पड़ गए और वे अपना रद्राक्ष और शंख यहां दान कर गए। इस कथानक पर आज भी यहां के लोग यकीन करते हैं।

बाबा साहेब के मंदिर में भले आज तमाम देवी देवताओं के मंदिर बनवाकर वहां मूर्तियां स्थापित कर दी गईं हैं लेकिन मुख्य पूजन खड़ाऊ का ही होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान के लिए तड़के से ही हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ संगम पर जमा हो जाती है और मंदिर के पास विशाल मेला लगता है। यमुना पारी बकरी, सिंघाड़ा और जलेबी के लिए यह मेला खासा प्रसिद्ध है। मेले में भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के इंतजाम सबसे तगड़ी चुनौती होता है। पुलिस पंद्रह दिन पहले से ही इस दौरान सुरक्षा इंतजामों को चाक चौबंद कर दी जाती है। पांच नदियों के संगम का एक मात्र स्थान होने के बावजूद भले ही पचनद को पूरे देश में ख्याति नहीं है लेकिन स्थानीय इलाकों में इसकी महत्ता सदियों के बाद भी खत्म नहीं हुई है। आधुनिकता के हावी होने के बावजूद कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले मेले में अतीत की झलक देखने को मिलती है। इस मेले में न सिर्फ जनपद जालौन के बल्कि पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के जिला भिंड और इधर औरैया तथा इटावा जनपद से हजारों की संख्या में लोग शिरकत करने आते हैं। यहीं से यमुना कालपी की ओर पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाती है। यहां का अदभुत नजारा लोगों को अपनी ओर खींच लेता है।

चंबल के बीहड़ों में स्थित इस स्थान का विशेष धार्मिक महत्व है। बताते हैं कि यहां पर सतयुग में ब्रह्मा के आदेश से नारद मुनि ने महर्षि बाल्मीकि को रामायण की रचना के लिए प्रेरित किया था और बाल्मीकि ने संपूर्ण रामायण की रचना की थी। किवंदती यह भी है कि भगवान विष्णु कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर ब्रह्म मुहूर्त में पचनद कुंड में स्नान कर भोले बाबा की आराधना करते हैं। इसी कुंड में ज्ञान की देवी मां सरस्वती भी कार्तिक पूर्णिमा को ब्रह्मामुहूर्त में दर्शन देती हैं और उस काल में स्नान ध्यान करने वालों की इच्छापूर्ति करती हैं इसलिए इसी दिन कार्तिक पूर्णिमा पर बड़ी संख्या में लोग यहां स्नान के लिए आते हैं और अपनी मनौती मांगते हैं। भगवान भोलेनाथ का कालेश्वर मंदिर भी आसपास के जिलों में प्रसिद्ध है। यहां पर दूर दराज से लोग दर्शन करने आते हैं।

धार्मिक महत्व के हिसाब से स्थान का विकास किया जाए तो निश्चित रूप से पांच नदियों का यह संगमस्थल प्रयाग के संगम से काफी लोकप्रिय हो सकता है क्योंकि प्रयाग में तो मात्र तीन नदियों का संगम है यहां पर पांच नदियों का संगम है। यदि शासन की ओर से इस क्षेत्र में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए तथा ठहरने के लिए उचित प्रबंध किए जाए तो निश्चित रूप से यहां पर पर्यटकों का आने जाने का सिलसिला शुरू हो सकता है और यह बुंदेलखंड के जाने माने पर्यटनस्थल का रूप ले सकता है।

यहां पांच नदियों का संगम होने से इस पानी का इस्तेमाल कर अगर सिंचाई के साधनों को विकसित किया जाए तो अवश्य ही इस क्षेत्र में हरित क्रांति लाई जा सकती है। ऐसा होने से अपने सूखे और बदहाली पर आंसू बहाता यह इलाका हरा भरा और खेती के लिए बेहद उपजाऊ साबित हो सकता है। इस तरह यहां न केवल किसानों की स्थिति में आमलूचूल परिवर्तन लाया जा सकता है बल्कि रोजगार के अभाव में बड़े बड़े शहरों की ओर रूख करने वाले युवाओं को घर में ही न केवल रोजगार उपलब्ध हो सकता है। पलायन की बड़ी समस्या से भी निपटा जा सकता है।

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