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दिल्ली के लालकिले में अलग—अलग बनती थी हिंदू चाय और मुसलमान चाय – Mobile Pe News

दिल्ली के लालकिले में अलग—अलग बनती थी हिंदू चाय और मुसलमान चाय

दिल्ली के लालकिले का नाम किसने नहीं सुना, एक जमाने में इसी लालकिले में हिंदू चाय और मुसलमान चाय बनती थी। दोनों चाय के स्वाद भी अलग—अलग होते थे।

इसका पता तब चला जब आज़ाद हिंद फ़ौज के तमाम लोग गिरफ़्तार हुए और उनपर मुकदमा चलने वाला था और सारे लोग लाल क़िले में बंद थे। गांधी उनसे मिलने गए। आज़ाद हिंद फ़ौज के लोगों ने गांधी को बताया कि यहां सुबह हांक लगती है कि हिंदू चाय तैयार है और मुसलमान चाय अभी आने वाली है। उन्होंने सिपाहियों से पूछा कि आप करते क्या हैं तो उनका जवाब था कि ‘ये लोग हमको रोज़ सुबह बांटते हैं, जबकि हमारे अंदर कोई भी मंशा नहीं होती, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन सरकार का हुक़्म है कि हिंदू चाय अलग बने और मुसलमान चाय अलग बने।’ गांधी ने पूछा कि ‘आप क्या करते हैं।

उनका कहना था कि ‘हमने एक बड़ा सा बर्तन रखा है और उसमें हिंदू चाय और मुसलमान चाय मिला देते हैं और फिर बांट के पी लेते हैं।’ महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस के काम करने के ढंग की, हिंसा पर जो उनका भरोसा था उस पर, फ़ौज के गठन और फ़ौज के ज़रिए आज़ादी हासिल करने की कोशिश की कई बार आलोचना की थी। लेकिन लाल क़िले से लौटने के बाद गांधी ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि ‘सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रवादी नेता हैं और उनका सबसे बड़ा योगदान एक पूरा संगठन खड़ा करना और उसमें हिंदू मुसलमान का भेद मिटा देना है और इसके लिए मैं उन्हें सलाम करता हूं।’
इधर ये क़िस्सा 1909 का है जब महात्मा गांधी अपनी चर्चित किताब ‘हिंद स्वराज’ लिख रहे थे, उस समय पोरबंदर, राजकोट, मुंबई और उन जगहों पर एक कहावत प्रचलित थी, जहां गांधी कभी रहे थे। कहावत थी कि मियां और महादेव की नहीं बनती, बन ही नहीं सकती, दोनों में बहुत फ़र्क है। महात्मा गांधी को ये बात बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी कि ये कहावत किस आधार पर बनी है और क्यों कही जाती है इस तरह से।

उस समय भारत के वायसराय वावेल थे और जब गांधी की उनसे कलकत्ता में मुलाक़ात हुई तो उन्होंने कहा कि ‘हम जिस हाल में हैं, हमें छोड़ दीजिए। हमें छोड़ कर चले जाइए हम अपने फ़ैसले, अपनी समस्याएं खुद हल कर लेंगे। क्योंकि आप रहेंगे तो आग में घी डालने का काम करते रहेंगे’ साल 1915 में हरिद्वार में कुंभ लगा था और गांधी कुंभ मेले में जा रहे थे। रास्ते में जब ट्रेन सहारनपुर रुकी तो उन्होंने देखा कि लोग पसीना पसीना हैं, गला सूख रहा है, पानी नहीं है, लेकिन अगर पानी पिलाने वाला आता था और उन्हें पता चल जाए कि वो मुसलमान है तो वो पानी नहीं पीते थे। वो हिंदू पानी का इंतज़ार करते थे, मुसलमान पानी नहीं पी सकते थे, जान भले ही चली जाए।’