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बूढ़ा था फिर भी उसका नाम सुनकर थरथराते थे नेता, आ जाती थी नानी की याद, जानिए उस वृद्ध की पूरी कहानी

आप मुझे सनकी, गंजा, बूढ़ा, बददिमाग, खब्ती कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन मैं नेताओं को चुनावों में बेइमानी नहीं करने दूंगा और ना ही उन्हें काला धन खर्च करने की इजाजत दूंगा। ये शब्द हैं उन टी एन शेषन के जिन्होंने बिहार में मतपेटियां लूटने वालों स​बक सिखाने के साथ ही पैसा बांटकर वोट खरीदने वाले नेताओं को नानी याद दिला दी थी। 

 

भारतीय चुनाव व्यवस्था में आमूल—चूल परिवर्तन करने वाले टी एन शेषन को जब मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया तो उन्होंने पहला काम किया, चुनाव को कई चरणों में कराने का। इससे पहले भारत में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक ही चरण में होते थे। इस वजह से प्रत्येक मतदान केन्द्र की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा बल नहीं मिल पाते और बाहुबली नेता मतपेटियां लूट लेते थे। शेषन ने पहली बार 1991 में कई चरणों में चुनाव कराने की परिपार्टी शुरू की थी। आज का चुनाव आयोग भी उनकी खींची लकीर को बदल नहीं पाया है। 

 

इसके अलावा उन्होंने फर्जी मतदान रोकने के लिए पहचान पत्र प्रणाली भी शेषन की देन है। शेषन ने मतदाता पहचान पत्र बनाने की प्रक्रिया शुरू करने के साथ ही चुनावों में वोट डालने से पहले मतदाताओं के लिए पहचानपत्र लाना अनिर्वाय कर दिया था। शेषन ने आदेश दिया था कि जब तक पहचान पत्र नहीं बन जाए तब तक मतदाता अपना कोई भी पहचान चिन्ह दिखाकर ही वोट डाल पाएगा। 

 

नेताओं के लाख विरोध के बाद भी शेषन ने चुनाव में खर्च की सीमा बांधने का काम भी किया था। नेता इस व्यवस्था से सबसे ज्यादा बौखलाए थे, लेकिन धुन के पक्के शेषन ने उनकी एक नहीं सुनी और खर्च की सीमा तय कर दी। उस सीमा में अब बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन नेता इसे बंद नहीं करा पाए। मतदान के दौरान बूथ पर हर किसी के घुस जाने को भी शेषन ने कड़ाई से रोक दिया था ताकि मतदान के वक्त किसी तरह की गड़बड़ी नहीं हो।

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