शरीर की शुगर को खा जाती है चमत्कारी चिरौंजी, खांसी में भी असरकारक

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चिरौंजी मतलब चमत्कार। खाने में स्वादिष्ट आकार में छोटा सा चिरौंजी नामक सूखा मेवा आयुर्वेद की कई दवाओं का आधार होने के साथ ही स्वयं भी छोटे—मोटे वैद्य से कम नहीं है। इसके सेवन से मधुमेह के उन रोगियों का दवाओं से पीछा छूट सकता है जिन्हें खा—खाकर वे थक गए हैं। बिल्कुल ये हम नहीं वर्ष 2010 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित एक शोध कह रहा है कि चिरौंजी का इस्तेमाल खांसी के उपचार के लिए और शक्तिवर्धक के तौर पर किया जाता है। चिरौंजी के तेल का उपयोग चर्मरोग के इलाज में भी कारगर है। वर्ष 2013 में ट्रॉपिकल जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल रिसर्च में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया कि चिरौंजी का नियमित सेवन मधुमेह के रोगियों के रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है। एनल्स ऑफ बायोलॉजिकल रिसर्च नामक जर्नल में वर्ष 2011 में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, चिरौंजी के फल और छाल से बना लेप सर्पदंश के उपचार में कारगर है। फार्माकॉलॉजी ऑनलाइन जर्नल में वर्ष 2010 में प्रकाशित शोध ने भी चिरौंजी की जड़ से बनी दवा से अतिसार के उपचार की पुष्टि की थी। चिरौंजी खांसी, अतिसार और मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद है। चिरौंजी का इस्तेमाल मेवे की तरह होता है और स्थानीय बाजारों में ऊंची कीमत पर इसे बेचा जाता है।

चिरौंजी के पेड़ मुख्यतः ऊष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के शुष्क इलाकों में पाए जाते हैं। लेकिन उन्हें समुद्र तल से 1,200 मीटर की ऊंचाई तक वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता हैं। सदाबहार श्रेणी के चिरौंजी के पेड़ जंगलों में 18 मीटर तक ऊंचे हो सकते हैं। भारत में इसके पेड़ बागानों में भी उगाए जाते हैं।

गाय के दूध में पीसकर पीते हैं आदिवासी

चिरौंजी का वानस्पतिक नाम बुकानानिया लांजन है और अंग्रेजी में ‘आमंडेट’ के नाम से जाना जाता है। चिरौंजी भारत में झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के वाराणसी व मिर्जापुर जिलों में पाया जाता है।
चिरौंजी का फल पियार 4-5 महीने में पकता है और इसे अप्रैल-मई के महीने में तोड़ा जाता है। तोड़ने के बाद हरे रंग का फल काला पड़ जाता है। चिरौंजी निकालने के लिए इस फल को रात भर पानी में डालकर रखा जाता है और इसके बाद जूट के बोरे से रगड़-रगड़कर बीज अलग कर लिया जाता है। इसके बाद इसे पानी से अच्छी तरह से धोकर धूप में सुखाया जाता है।
झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी चिरौंजी का इस्तेमाल घाव के उपचार के लिए करते हैं। चिरौंजी इन आदिवासियों के जीवनयापन का एक बड़ा साधन भी है। उत्तर प्रदेश सोनभद्र के आदिवासी समुदाय के लोग चिरौंजी के पेड़ से गोंद और लाख इकट्ठा करके बाजार में बेचकर आय कमाते हैं। आंध्र प्रदेश के कुछ आदिवासी चिरौंजी के गोंद को गाय के दूध में मिलाकर पीते हैं। उनका मानना है कि इससे गठिया का दर्द दूर होता है। पिछले कुछ दशकों से चिरौंजी की मांग शहरी बाजारों में बढ़ने की वजह से इसका बड़ी मात्रा में संग्रह और पेड़ों की गलत तरीके से छंटाई की वजह से जंगलों में चिरौंजी के पेड़ तेजी से कम हुए हैं।

त्रिदोषहर भी मानता है आयुर्वेद

चरक संहिता, भाव प्रकाश, चक्रदत्त और चिरंजीव वनौषधि के अनुसार चिरौंजी का नियमित सेवन शरीर में कफ, वात और पित्त को नियंत्रित रखता है और खून को भी साफ रखता है। आयुर्वेद में चिरौंजी के तेल से दवाई बनाई जाती है। हृदय रोग और खांसी के उपचार में काम आता है। साथ ही मस्तिष्क के लिए टॉनिक का भी काम करता है।
चिरौंजी के पेड़ की छाल का इस्तेमाल चमड़े की सफाई के लिए किया जाता है। चिरौंजी का पेड़ बड़ी मात्रा में गोंद का उत्पादन करता है। इस गोंद का इस्तेमाल सस्ती औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है। खराब गुणवत्ता के कारण इसकी लकड़ी का इस्तेमाल जलावन के तौर पर या चारकोल बनाने में किया जाता है।

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