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दिल्ली पी जाती है 38 टन गांजा, मुंबई के गंजेडियों को चाहिए 32 टन

विधिवेत्ताओं ने कहा-भारत के तीन करोड़ गंजेडियों को आजाद करो!

नई दिल्ली. भारत के कुछ विधिवेत्ता चाहते हैं कि भारत में गांजे के उपयोग को वैध बना दिया जाए और उन क्रिमिनल कानूनों का लोप कर दिया जाए जिनके चलते गांजा पीना गैरकानूनी है। विधिवेत्ताओं ने इसके लिए बाकायदा तर्क दिए हैं और दावा किया है कि जिस अमेरिका ने पूरी दुनिया के देशों को गांजे के इस्तेमाल को कानूनी अपराध घोषित किया था, वही अमेरिका अब गांजे के डिक्रिमिनलाइजेशन करने की कोशिश कर रहा है और अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनावों में वह एक मुद्दे के रूप में शामिल है।

गांजे के इस्तेमाल पर भारत में नहीं थी पाबंदी

भारत में ऐतिहासिक रूप से गांजे के इस्तेमाल पर पाबंदी नहीं थी, लेकिन अमेरिका के वॉर ऑन ड्रग्स के चलते अंतरराष्ट्रीय दबाव में उसके इस्तेमाल और उत्पादन को गैरकानूनी बना दिया गया। भारत में 5000 ईसा पूर्व भी गांजे के इस्तेमाल के रिकॉर्ड मिलते हैं। आयुर्वेद में, निर्माण में और फाइबर के तौर पर उपयोग के चलते गांजा भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पौधों में से एक है। साइकोएक्टिव गुणों के लिए गांजे का व्यापक रूप से प्रचलन रहा है। सामाजिक न्याय मंत्रालय के नेशनल सर्वे ऑन एक्सटेंट एंड पैटर्न्स ऑफ सबस्टांस यूज इन इंडिया में अनुमान लगाया गया है कि भारत में तीन करोड़ लोग गांजे का सेवन करते हैं। साइकोएक्टिव पदार्थों में शराब के बाद गांजा दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला पदार्थ है।

अमेरिका ने किया था मजबूर

अमेरिका वह सबसे बड़ी ताकत था जिसने दुनियाभर के देशों को नशीले पदार्थों को प्रतिबंधित करने को मजबूर किया। उसने संयुक्त राष्ट्र के जरिए दुनियाभर में नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध लगाने का काम किया। नारकोटिक ड्रग्स पर 1961 के संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के प्रभाव में भारत में एनडीपीएस (नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक सबस्टांसेज) एक्ट लागू किया गया। चूंकि भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात के लिए बाध्य था कि गांजा सहित नारकोटिक ड्रग्स की तस्करी, उत्पादन, इस्तेमाल को नियंत्रित किया जाए। इसके चलते भारत में गांजा उगाने पर कई नियम लगाए गए और उसके इस्तेमाल को क्रिमिनलाइज किया गया।

4.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है गांजा कारोबार

ऐतिहासिक रूप से गांजे के फाइबर के तौर पर इस्तेमाल होने के बावजूद हेम्प उत्पादों के विश्व बाजार में भारत का हिस्सा 0.001% है। यह पूरा कारोबार 4.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है।
1985 के एनडीपीएस एक्ट ने ऐसा वातावरण तैयार किया जिसके कारण विश्व के हेम्प बाजार में भारत लगभग नदारद हो गया। 2027 में विश्व में कैनाबिस मार्केट 15.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है। इसलिए भारत में गांजे पर लगे प्रतिबंध की एक बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है।

दिल्ली पी जाती है 38 टन गांजा, मुंबई का हिस्सा 32 टन

2018 की एक स्टडी से पता चलता है कि नई दिल्ली में लोग 38.26 टन गांजे का उपभोग करते हैं और मुंबई में 32.38 टन का। अगर गांजे पर टैक्स लगाया जाए तो दिल्ली से 725 करोड़ रुपये और मुंबई से 641 करोड़ रुपये जमा होंगे। अगर गांजे के इस्तेमाल को डिक्रिमिनलाइज किया जाएगा तो न्यायिक प्रणाली को भी राहत मिलेगी। भारत की अदालतों में 2.4 करोड़ से ज्यादा क्रिमिनल मामले लंबित हैं और पुलिस बलों में 5,28,165 पद खाली हैं।

गांजे में बेंजोडायजेपाइन नाम के सेडेटिव की मिलावट

प्रतिबंध के चलते लोग ब्लैक मार्केट से माल खरीदते हैं इसलिए मिलावट की पूरी गुंजाइश होती है। भारत में गांजे में बेंजोडायजेपाइन नाम के सेडेटिव की मिलावट की जाती है जिससे किसी शख्स को सेडेटिव्स की लत लग सकती है। भारत में गांजे के रेगुलेशन पर विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी ने एक स्टडी की है। इसमें गांजे पर प्रतिबंध को ऐतिहासिक और रेगुलेटरी संदर्भ में देखा गया है। सेंटर का कहना है कि भारत में गांजे पर लगी पाबंदी पर फिर से विचार किया जाना चाहिए।

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