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1962 में जीतने के बाद भी मैकमोहन रेखा के पीछे क्यों चली गई थी चीनी सेना?

टूट सकती थी सप्लाई लाइन

1962 में जब चीन की सेना ने अरुणाचल प्रदेश के आधे से भी ज़्यादा हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था तो एकतरफा युद्ध विराम के बाद उसकी सेना मैकमोहन रेखा के पीछे क्यों लौट गई? जबकि चीन आए दिन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत बताकर उस पर अपना दावा करता रहता था।

इस पर सामरिक विशेषज्ञों का अलग—अलग मत है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी सेना ने अरुणाचल को रौंदने के बाद जब असम की ओर कदम बढ़ाए तो तेजपुर पहुंचते—पहुंचते चीनी कमांडरों को अहसास हो गया कि मैदानी इलाके में उतरते ही उनकी सप्लाई लाइन टूट सकती है क्योंकि वह चीनी इलाके से ज्यादा दूर आ गए हैं। इसके अलावा मैदानी इलाके में भारतीय सेना की रक्षा पंक्तियां तोड़ने के लिए भारी मात्रा में सैनिकों की जरूरत होगी जिन्हें इतनी दूर ढोने के साधन मिलना मुश्किल था। इन्हीं विशेषज्ञों की राय है कि अरुणाचल पर कब्जा बनाए रखना भी उतना ही दुरुह है जितना मैदानी इलाके में भारतीय सेना से युद्ध करना। इसलिए चीन 1962 में एकतरफा युद्ध विराम कर मैकमोहन रेखा के पीछे लौट गया था।

भारत की राजधानी स्थि​त ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सामरिक मामलों पर शोध विभाग के मुताबिक चीन चाहता है कि वो कूटनीतिक स्तर पर अरुणाचल प्रदेश पर दावा कर मामले को तूल देता रहे मगर वो इसका नियंत्रण अपने पास नहीं रखना चाहता है क्योंकि अरुणाचल के लोग कभी भी चीन के साथ खड़े नज़र नहीं आए।
वर्ष 1986 में भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग के सुम्दोरोंग चू के पास चीनी सेना की बनाई स्थायी इमारतें देखीं। जवाब में भारतीय सेना ने हाथुंग ला पर अपनी तैनाती को मज़बूत कर दिया।
मामला तब शांत हुआ जब भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री नारायण दत्त तिवारी बीजिंग पहुंचे।
अरुणाचल प्रदेश अलग राज्य के रूप में वर्ष 1987 में अस्तित्व में आया। वर्ष 1972 तक इसे नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी के नाम से जाना जाता था। 20 जनवरी 1972 को इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया और इसका नाम अरुणाचल प्रदेश कर दिया गया।
अरुणाचल में पूर्व में स्थित अनजाव से लेकर राज्य के पश्चिम में स्थित तवांग तक ‘लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल’ की लम्बाई 1126 किलोमीटर है।

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