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चीनियों को देखते ही चीर देते हैं भारत के ये जवान

इस फोर्स के जवानों से बेहद डरते हैं चीनी

नई दिल्ली. चीन से सटी एलएसी पर तैनाती के साथ ही जिस स्पेशल फ्रंटियर फोर्स का नाम एकाएक सुर्खियों में छाया हुआ है, वह दरअसल चीनियों के लिए साक्षात काल मानी जाती है। चीनी इस फोर्स के जवानों से बेहद डरते हैं क्योंकि युद्ध के मैदान में चीनी नजर आने के बाद इस फोर्स के जवान उन्हें जिंदा नहीं छोड़ते।

चिंता में पड़ा चीन

असल में इस फोर्स में तिब्बत की लड़ाकू जातियों के वे युवा भर्ती होते हैं जिन्हें चीनियों से बेहद नफरत होती है और वे तिब्बत पर कब्जे के दोषी चीनियों को देखते ही मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) में उन तिब्बती शरणार्थियों को शामिल किया जाता है, जो अब भारत को अपना घर कहते हैं। इसका गठन 1962 के चीन युद्ध के फौरन बाद किया गया था, जिसमें भारत को मुंह की खानी पड़ी थी। इस बल ने कई सैन्य अभियानों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1971 के भारत-पाक युद्ध से लेकर, 1999 के कारगिल युद्ध तक।
ऐसा माना जाता है कि एसएफएफ सैनिक उन अतिरिक्त बलों में शामिल हैं, जिन्हें चीन के साथ पांच महीने से चल रहे गतिरोध के बीच सीमा पर भेजा गया था। इससे चीन चिंता में पड़ गया है क्योंकि वह तिब्बत की निर्वासित सरकार और आध्यात्मिक गुरू दलाई लामा के भारत में ठिकाना बनाने को लेकर बहुत होशियार रहता है। दलाई 1959 में चीनी क़ब्ज़े के विरोध में एक नाकाम बग़ावत के बाद बचकर भारत आ गए थे।

1962 में हार के बाद हुआ था गठन

सैन्य एक्सपर्ट्स का कहना है कि एसएफएफ में पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल होते हैं और उन्हें वही ट्रेनिंग मिलती है जो एलीट कमांडोज़ को दी जाती है। शुरू में एस्टेब्लिशमेंट 22 के नाम से स्थापित एसएफएफ का गठन भारतीय सेना के एक अधिकारी मेजर जनरल सुजान सिंह ऊबन ने किया था। ये फोर्स इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व डायरेक्टर बीएन मलिक, और अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए के दिमाग़ की उपज मानी जाती है। चूंकि तिब्बत पर क़ब्ज़े का घाव ताज़ा था, इसलिए भारत से प्रस्ताव आने पर, बहुत से तिब्बती स्वेच्छा से इस बल में शामिल हो गए, और जल्द ही एसएफएफ की संख्या छह हजार तक पहुंच गई।

माना जाता है बेहतरीन पहाड़ी योद्धा 

एसएफएफ यूनिट्स सीधे कैबिनेट सचिवालय के अधिकार क्षेत्र में आती हैं और उसका संचालन सेना करती है। फोर्स का प्रमुख मेजर जनरल रैंक का सेना अधिकारी होता है जो एसएफएफ के महानिदेशक का काम करता है। एसएफएफ का मुख्यालय उत्तराखंड के चकराता में है और इसका प्रतीक स्नो लायन है। सूत्रों के अनुसार एसएफएफ के सैनिक प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मी होते हैं।उनको वही ट्रेनिंग दी जाती है जो कमांडोज़ और स्पेशल फोर्सेज़ को मिलती है।
उन्हें पहाड़ी युद्ध के अलग अलग पहलुओं की व्यापक ट्रेनिंग दी जाती है और ज़्यादातर चीन के खिलाफ तैनात किया जाता है। उनके अधिकतर ऑपरेशंस की डिटेल्स ख़ुफिया रहती हैं। एसएफएफ कर्मी एक विशिष्ट बल होते हैं, जिन्हें अधिक ऊंचाई पर युद्ध लड़ने में प्रशिक्षित और बेहतरीन पहाड़ी योद्धा माना जाता है। भारतीय सेना इस धारणा पर काम करती है कि पहाड़ों और सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय निवासियों से बनी स्काउट रेजिमेंट्स तैनात की जाएं। ऐसा इसलिए है कि स्थानीय निवासी कठोर जलवायु वाले ऊंचे और बीहड़ इलाक़ों में काम करने के लिए ज़्यादा उपयुक्त होते हैं।

1971 में चटगांव की पहाड़ियों में हुई थी तैनाती

वो इलाक़े के ज़मीनी हालात, रीति रिवाज और भाषा से परिचित होते हैं। भारतीय सेना के पास स्थानीय निवासियों की भागीदारी वाला अरुणाचल स्काउट्स, डोगरा स्काउट्स भी हैं। एसएफएफ के अंदर तिब्बती शरणार्थियों का प्रतिशत अच्छा ख़ासा है, जो स्वेच्छा से सेवाएं देना चाहते हैं और उन इलाक़ों में लाभप्रद रोज़गार से लगे हैं, जहां के लिए वो उपयुक्त होते हैं। एसएफएफ 1971 की लड़ाई में चटगांव पहाड़ों के पास तैनात की गईं थीं। उन्हें दुश्मन की पोज़ीशंस पर हमले का काम दिया गया था जिससे भारतीय सेना के ऑपरेशंस में सहायता हो सके।

कारगिल में युद्ध में भी दिखाए थे जौहर

छापामार अभियानों के लिए वे बांग्लादेश में घुस गए। जहां उन्होंने दुश्मन सैनिकों और सैन्य ढांचों पर हमला करने के साथ ही कम्यूनिकेशन लाइन्स काटकर रसद, हथियारों की सप्लाई में बाधा पहुंचाई थी। एसएफएफ बटालियनों ने 1984 के ऑपरेशन ब्लू-स्टार में भी अहम रोल निभाया। 1984 में ही सियाचिन ग्लेशियर पर क़ब्ज़े के साथ-साथ 1999 के कारगिल युद्ध में भी उन्होंने जौहर दिखाए थे। इसके वजूद को सार्वजनिक रूप से 1965 में तब स्वीकार किया गया, जब चीन के परमाणु हथियारों के परीक्षण पर नज़र रखने के लिए एसएफएफ सैनिकों ने सीआईए के साथ मिलकर माउंट नंदा देवी पर एक परमाणु संचालित उपकरण लगाने के अभियान में हिस्सा लिया था।

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