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हरियाणा के बाउंसर्स की मौज, नेता रोज पिला रहे हैं देसी घी के साथ कई लीटर दूध - Mobile Pe News
Sunday , February 23 2020
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हरियाणा के बाउंसर्स की मौज, नेता रोज पिला रहे हैं देसी घी के साथ कई लीटर दूध

इन दिनों हरियाणा के बाउंसर्स की पौ बारह है क्योंकि इस राज्य में विधानसभा चुनाव है। चुनाव लड़ने वाले नेता बाउंसर्स को प्रोटीन, देसी घी के साथ कई लीटर दूध पिला रहे हैं क्योंकि नेता उन्हें साथ रखकर मतदाताओं को हरियाणवी अंदाज में लुभा जो लेते हैं।
हरियाणा के खत्म होते अखाड़ा कल्चर को जीवित रखने के लिए चुनाव रोज़गार उपलब्ध कराते हैं। दिल्ली-एनसीआर के अस्पतालों, बारों और फैशन शो के दौरान मिलने वाले हजारों बाउंसरों का घर हरियाणा हमेशा दूध-दही और पहलवानी के लिए जाना जाता जा रहा है। विधानसभा चुनाव के दौरान रेवाड़ी, पलवल, झज्जर, बहादुरगढ़ और फरीदाबाद के ग्रामीण पहलवान और बॉडी बिल्डर नेताओं के चहेते रहते हैं। हरियाणवी बोली पर ज़बरदस्त पकड़ और बढ़िया बॉडी लिए ये बाउंसर वोटर्स का ध्यान आकर्षित करने और अपने प्रतिद्वंद्वियों के बीच पैठ जमाने के काम आते हैं।

बाउंसर्स को चुनावी रैलियों के लिए काम पर रखने का काम देख रहे एक कांग्रेस कार्यकर्ता के अनुसार वे दिहाड़ी के हिसाब से आते हैं। ज्यादातर गांवों की तरफ के लड़के होते हैं। लगभग हर प्रत्याशी 10 से 12 बाउंसर तो रखता है। बाउंसर रखने का क्रेज़ फरीदाबाद और गुड़गांव में ज्यादा है। कांग्रेसी कार्यकर्ता के मुताबिक नेता चुनाव से दो तीन महीने पहले ही बुकिंग कर लेते हैं। जिनको महीने भर के लिए बाउंसर चाहिए वो पहले ही बुकिंग करा चुके हैं। लेकिन जिनको अब 10-15 दिन के लिए चाहिए। वो जिम और अखाड़ों से संपर्क करते हैं। चुनाव की घोषणा से नतीजे आने तक बाउंसर उनके साथ ही रहेंगे। फरीदाबाद में एक जिम चलाने वाले का कहना है कि जो लड़के एजेंसी के ज़रिए जाते हैं। उन्हें 1000 लेकर 1500 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से मिलते हैं। जो जिम के ज़रिए सीधे नेताओं के संपर्क में होतें हैं। वो 1500-3500 प्रति दिन कमा लेते हैं। वो आगे कहते हैं, लेकिन जिम और अखाड़ों में आने वाले सारे बॉडी बिल्डर्स पैसे चार्ज नहीं करते हैं। कुछ लड़के तो महंगी कारों में आते हैं। कुछ की लोकल नेताओं से बढ़िया जान पहचान होती है।
एक साधारण किसान परिवार से आने वाले राहुल बाउंसर का काम करते हैं। वो कहते हैं, ‘मुझे शहर की लाइफ बड़ी अच्छी लगती थी। मां-पापा वैसे तो आने नहीं देते। जब बाउंसर बन गया तो ये नौकरी हो गई। मुझे 5 साल होने वाले हैं। बार की भीड़ और रैलियों की भीड़ काफी अलग होती है। मैंने पहले भी एक दो नेताओं के साथ प्रतिदिन के हिसाब से काम किया है।

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