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लहू का प्यासा: अमावस्या की रात में चीखों से गूंजती थी बावड़ी, नदी की तरह बहता था खून - Mobile Pe News
Monday , December 9 2019
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लहू का प्यासा: अमावस्या की रात में चीखों से गूंजती थी बावड़ी, नदी की तरह बहता था खून

रात घिर आई थी फिर भी पके हुए फलों की डाली की तरह भरपूर यौवन से लदी—फदी अंगूरी खेत से गांव के बाहर बनी अपनी बस्ती की ओर बढ़ रही ​थी। रात के अंधेरे में जब अधेड़ स्त्रियां भी घर से बाहर निकलने में डरती थी, तब मात्र अठारह साल की अंगूरी बेखोफ होकर सूनी पगडंडियों पर चली जा रही थी, लेकिन आसपास के खेतों में छुपे स्त्री शरीर के भूखे भेडिए उसकी ओर देखने का साहस भी नहीं कर पा रहे थे। कुछ भेडिए उसे कनखियों से देखकर होठों पर जीभ जरूर फिरा रहे थे, लेकिन आगे बढ़ने के लिए उनके पैर साथ नहीं दे रहे थे। 

 

अंगूरी गांव के एक किसान परिवार की सबसे बड़ी बेटी थी और उसे समय से पहले जवान होने के लिए बाध्य कर दिया गया था। गजगामिनी की तरह कदम आगे बढ़ाती हुई अंगूरी को अचानक पांच साल पहले का वह वाकया याद आ गया जिसे वह कभी याद नहीं करना चाहती थी, लेकिन वह दु:स्वप्न उसका पीछा ही नहीं छोड़ता था। एक दिन मां के साथ ऐसे ही अंधेरे में खेत से घर लौट रही अंगूरी जैसे ही उस बावडी के पास पहुंची जिसके बारे में मशहूर था कि वहां भूत रहते हैं कि अचानक एक मजबूत हाथ ने उसका मुंह दबा लिया और फूल की तरह उसे उठाकर बावड़ी के पास ले गया। आगे चल रही उसकी मां को पता ही नहीं चला कि बेटी को एक भूखा भेडिया उठाकर ले गया है।
अस्मत के लुटेरे उस भेड़िए ने बड़ी बेदर्दी के साथ उसे बावड़ी की सीढ़ियों पर पटक दिया और अपने कपड़े खोलने लगा। अंधेरे में डर गई अंगूरी को वह किसी राक्षस के समान दिख रहा था। भयभीत हिरणी की तरह उसने वहां से भागने की कोशिश की, लेकिन डर के मारे पत्थर हो चुके पैरों ने साथ ​नहीं दिया। तब तक कपड़े उतार चुका राक्षस उसके समीप आया और उसके कपड़े तार—तार कर दिए। अंगूरी कातर स्वर में चीत्कार कर उठी। ​छोड़ देने के लिए गिड़गिड़ाने लगी लेकिन राक्षस पर कोई असर नहीं पड़ा। वह निर्वस्त्र अंगूरी के शरीर को भंभोड़ने लगा। वह खूब चिल्लाई लेकिन सुनसान बावड़ी में उसे सुनने वाला कोई नहीं था। जिस तरह निरीह हिरणी को शेर मार डालता है, वैसे ही उसने अंगूरी की आत्मा पर अमिट घाव छोड़ दिया। इस बीच आंसू बहाती अंगूरी ने उसे पहचान लिया। वह गांव के जमींदार का बेटा था। उसी जमींदार का जिसने स्वयं गांव की किसी भी औरत को छोड़ा नहीं था।

 

जमींदार के बेटे के चले जाने के बाद अपने तार—तार कपड़ों से बदन छिपाने की कोशिश करती अंगूरी बावडी से बाहर आई तो कुछ अन्य औरतों के साथ हाथ में मशाल लेकर उसे ढूंढने आई मां दिख गई। मां को देखकर अंगूरी ने दहाड़ मारकर रोना शुरू किया तो हालत देखकर मां और उसकी सहेलियां समझ गई कि उसके साथ क्या हुआ है। जैसे—तैसे घर पहुंचकर मां ने अंगूरी को दूसरे कपड़े दिए और उसे इशारे में समझाया कि इसका जिक्र किसी से नहीं करे क्योंकि वह जानती थी कि अगर अंगूरी ने चूं—चपड़ की तो जमींदार अपनी उस जमीन को छीन लेगा जिस पर खेती करके उसका परिवार पेट पालता था।
उसने मां की बात तो मान ली लेकिन प्रतिशोध की अग्नि उसके हृदय में धधकने लगी। उसने उसी समय तय कर लिया कि अस्मत लूटने वाले को ऐसा सबक सिखाएगी कि फिर कभी वह किसी अन्य के साथ ऐसी हिम्मत नहीं करे। कठोर संकल्प के साथ अंगूरी ने झोपड़ी में खोंस कर रखे गए उस छोटे से धारदार हंसिए को निकाल लिया जिसे मां अक्सर छोटी लकडियों की छाल को छीलती थी। उसने हंसिए को सावधानी पूर्वक पेटीकोट में छिपाकर रख लिया और मां से खेत पर जाने का कहकर घर से निकल गई। मां ने खूब रोका कि कल ही उसके साथ हादसा हुआ है, वह घर में ही रहे। अंगूरी नहीं मानी तो सूरज डूबने से पहले घर आने की हिदायत देकर खेत पर जाने दिया।
धुन की पक्की अंगूरी को यकीन था कि भेड़िया बावड़ी के आसपास ही होगा और उसके जैसी किसी अन्य लड़की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने की ताक में होगा। खेत पर दिन भर काम करने के बाद जब सूरज पूरी तरह डूब गया और अंधेरे की वजह से हाथ को हाथ नहीं सूझने लगा तो हंसिए को थपथपाती अंगूरी उसी रास्ते पर आगे बढ़ने लगी जहां उसने अस्मत गंवाई थी। घात लगाकर बावडी के पास छुुपे भेड़िए ने पदचाप सुनी तो वह पगडंडी के पास आ गया।अंगूरी जैसे ही पास आई तो उसने चिरपरिचित अंदाज में उसके मुंह को भींचकर उठा लिया और बावड़ी की सीढ़ियों पर ला पटका।
​सीढ़ियों पर गिरी अंगूरी की आंखों में एक विशेष चमक उभरी। उसने जमींदार के बेटे से कहा कि जबरदस्ती मत करो। आज मैं स्वयं चलकर आई हूं। स्वर सुनते ही जमींदार का बेटा मलखान सिंह आश्चर्य से भर उठा, लेकिन कुछ करने का निश्चय करके आई अंगूरी अंधेरे में ही उससे चिपक गई। फुसफुसाते हुए बोली कि जल्दबाजी किस बात की है। यह सुनते ही प्रसन्न हो चुके मलखान ने अंगूरी की बात मान ली और अपने कपड़े उतारकर अंगूरी के सामने आकर उसके कपड़े उतारने की कोशिश करने लगा लेकिन तब तक अंगूरी का हंसिया चल चुका था। मलखान के मुंह से मर्मांतक चीख निकली और अंगूरी का अट्टहास बावड़ी में गूंज उठा। बुरी तरह से डरा हुआ मलखान दोनों हाथो से पेट के नीचे के हिस्से को दबाते हुए पगडंडी पर वैसे ही भाग निकला, जैसे उसके हाथों रौंदी गई गांव की कलियां भागती थी।
इधर अंगूरी के घर नहीं आने से उसकी मां बेहद घबरा गई ​थी। वह बेटी को ढूंढने के लिए घर से निकल ही रही थी कि खून से सने हंसिए को हाथ में पकड़े हुए अंगूरी दिख गई। बेटी को देखकर खुश हुई मां ने जब खून सना हंसिया देखा तो सन्न रह गई। वह समझ गई कि बेटी ने वह कर दिया है जिसे करने का साहस वर्षों से गांव की कोई भी लड़की, औरत नहीं कर पाई थी।
वही हुआ जिसका अंदेशा था, पौ फटते ही जमींदार का कारकुन उसके दरवाजे पर था और मां बेटी को जमींदार की हवेली पर ले गया। अंगूरी के अंत:वस्त्र में वह खूनी हंसिया अभी भी छुपा हुआ था। जैसे ही वे हवेली के अंदर घुसे, गुस्से से लाल जमींदार ने उसकी मां को एक लात जमा दी। वह अंगूरी पर हाथ छोड़ता उससे पहले ही उसने कहा कि अगर अब उसने जरा भी हरकत की तो वह पूरे गांव को बता देगी कि उसका बेटा अब औरत के लायक नहीं रह गया है। धमकी सुनते ही जमींदार के हाथ पांव ठंडे पड़ गए। वह सुध—बुध खो बैठा। उसे पता था कि अगर यह बात गांव में फैली तो बेटा जीते—जी मर जाएगा।

 

जमींदार को पस्त देख अंगूरी मां के साथ घर लौट आई। पहले तो मां ने उसे विस्फारित नेत्रों से देखा और फिर उसे सीने से लगा लिया। इसके बाद तो गांव में जैसे कोहराम मच गया। अंगूरी जानबूझकर अमावस्या की रातों को बावड़ी और उसके आसपास के इलाकों में घूमने लगी। गांव के शोहदों ने इस हरकत को उसकी चरित्रहीनता माना। वे यही भूल कर बैठै। अंधेरों में घूमती अंगूरी शोहदों को देखते ही उनसे प्रणय निवेदन करती और वे उसके जाल में फंस जाते। जैसे ही वे निर्वस्त्र होते, अंगूरी का हंसिया अपना कमाल दिखा देता था। एक माह में ही अंगूरी का हंसिया बीस बार चला और हर बार कोई न कोई भेड़िया मेमने में बदल जाता। लगातार हंसिया चलने से अंगूरी की यह हरकत छुपी नहीं रह सकी। ​जिस किसी को हंसिए के कमाल का पता चलता वह उससे दूर रहने में ही भलाई समझता था। तब से पांच साल गुजर गए, अंगूरी सुनसान रातों में ऐसे ही शिकार की तलाश में निकलती, लेकिन कोई भी उसके पास फटकने की हिम्मत नहीं करता।
अचानक अंगूरी की तंद्रा टूटी। उसने देखा कि वह घर के पास आ गई है। घर में घुसकर उसने अंत:वस्त्रों से हंसिया निकाला और उसे पर चढ़ा दिया। इस आशा में कि शायद कल कोई शिकार फंस जाए और तीन साल से प्यासे उसके हंसिए की लहू की प्यास बुझ सके।

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