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161 साल पहले नवाबी शासन से मुक्त होते ही सुलग उठा था अयोध्या विवाद, 134 वर्ष पहले खारिज हुआ था पहला दावा

आस्था और विश्वास के खम्भों पर टिके भारत के आराध्य भगवान राम के अयोध्या स्थित जन्मस्थान को लेकर मुकदमेबाजी की शुरुआत 30 नवंबर 1858 को की गई पहली लिखित शिकायत से हुई। इसमें बाबरी मस्जिद के एक कर्मचारी मौलवी मोहम्मद असगऱ ने जन्मस्थान पर बैरागियों की ओर से एक चबूतरा निर्माण पर आपत्ति जताई थी।

अयोध्या के रामकोट मुहल्ले में एक टीले पर लगभग पाँच सौ साल पहले वर्ष 1528 से 1530 में बनी मस्जिद पर लगे शिलालेख और सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक़ यह मस्जिद हमलावर मुग़ल बादशाह बाबर के आदेश पर उसके गवर्नर मीर बाक़ी ने बनवाई। अनेक ब्रिटिश इतिहासकारों ने लिखा है कि 1855 में नवाबी शासन के दौरान मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद पर जमा होकर कुछ सौ मीटर दूर अयोध्या के सबसे प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर पर क़ब्ज़े के लिए धावा बोला। उनका दावा था कि यह मंदिर एक मस्जिद तोड़कर बनायी गई थी।
इस ख़ूनी संघर्ष में हिंदू वैरागियों ने हमलावरों को हनुमान गढ़ी से खदेड़ दिया। 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद नवाबी शासन समाप्त होने पर ब्रिटिश क़ानून, शासन और न्याय व्यवस्था लागू हुई। इसी दरम्यान बाबरी मस्जिद के एक कर्मचारी मौलवी मोहम्मद असगऱ ने 30 नवंबर 1858 को लिखित शिकायत की कि हिंदू वैरागियों ने मस्जिद से सटाकर एक चबूतरा बना लिया है और मस्जिद की दीवारों पर राम-राम लिख दिया है।

शांति व्यवस्था क़ायम करने के लिए प्रशासन ने चबूतरे और मस्जिद के बीच दीवार बना दी लेकिन मुख्य दरवाज़ा एक ही रहा। इसके बाद भी मुसलमानों की तरफ़ से लगातार लिखित शिकायतें होती रहीं कि हिंदू वहाँ नमाज़ में बाधा डाल रहे हैं। अप्रैल 1883 में निर्मोही अखाड़ा ने डिप्टी कमिश्नर फ़ैज़ाबाद को अर्ज़ी देकर मंदिर बनाने की अनुमति माँगी, मगर आपत्ति पर अर्ज़ी नामंज़ूर हो गई। इसी बीच मई 1883 में मुंशी राम लाल और राममुरारी राय बहादुर का लाहौर निवासी कारिंदा गुरमुख सिंह पंजाबी वहाँ पत्थर वग़ैरह सामग्री लेकर आ गया और प्रशासन से मंदिर बनाने की अनुमति माँगी, मगर डिप्टी कमिश्नर ने वहाँ से पत्थर हटवा दिए। निर्मोही अखाड़े के महंत रघबर दास ने चबूतरे को राम जन्म स्थान बताते हुए भारत सरकार और मोहम्मद असगऱ के ख़िलाफ़ सिविल कोर्ट में पहला मुक़दमा 29 जनवरी 1885 को दायर किया। मुक़दमे में 17 डग 21 फ़ीट लम्बे-चौड़े चबूतरे को जन्मस्थान बताया गया और वहीं पर मंदिर बनाने की अनुमति माँगी गई, ताकि पुजारी और भगवान दोनों धूप, सर्दी और बारिश से निजात पाएँ।

जज पंडित हरिकिशन ने मौक़ा मुआयना किया और पाया कि चबूतरे पर भगवान राम के चरण बने हैं और मूर्ति थी, जिनकी पूजा होती थी. इसके पहले हिंदू और मुस्लिम दोनों यहाँ पूजा और नमाज़ पढ़ते थे, यह दीवार झगड़ा रोकने के लिए खड़ी की गई। जज ने मस्जिद की दीवार के बाहर चबूतरे और ज़मीन पर हिंदू पक्ष का क़ब्ज़ा भी सही पाया। इतना सब रिकॉर्ड करने के बाद जज पंडित हारि किशन ने यह भी लिखा कि चबूतरा और मस्जिद बिलकुल अग़ल-बग़ल हैं, दोनों के रास्ते एक हैं और मंदिर बनेगा तो शंख, घंटे वग़ैरह बजेंगे, जिससे दोनों समुदायों के बीच झगड़े होंगे, लोग मारे जाएँगे इसीलिए प्रशासन ने मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी।
जज ने यह कहते हुए निर्मोही अखाड़ा के महंत को चबूतरे पर मंदिर बनाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया कि ऐसा करना भविष्य में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दंगों की बुनियाद डालना होगा। इस तरह मस्जिद के बाहरी परिसर में मंदिर बनाने का पहला मुक़दमा निर्मोही अखाड़ा साल भर में हार गया।
डिस्ट्रिक्ट जज चैमियर की कोर्ट में अपील दाख़िल हुई। उन्होंने तीन महीने के अंदर फ़ैसला सुना दिया। फ़ैसले में डिस्ट्रिक्ट जज ने कहा, हिंदू जिस जगह को पवित्र मानते हैं वहां मस्जिद बनाना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन चूँकि यह घटना 356 साल पहले की है इसलिए अब इस शिकायत का समाधान करने के लिए बहुत देर हो गई है। जज के मुताबिक़, “इसी चबूतरे को राम चंद्र का जन्मस्थान कहा जाता है। जज ने यह भी कहा कि मौजूदा हालत में बदलाव से कोई लाभ होने के बजाय नुक़सान ही होगा। चैमियर ने सब जज हरि किशन के जजमेंट का यह अंश अनावश्यक कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि चबूतरे पर पुराने समय से हिंदुओं का क़ब्ज़ा है और उसके स्वामित्व पर कोई सवाल नहीं उठ सकता।
निर्मोही अखाड़ा ने इसके बाद अवध के जुडिशियल कमिश्नर डब्लू यंग की अदालत में दूसरी अपील की। जुडिशियल कमिश्नर यंग ने 1 नवंबर 1886 को अपने जजमेंट में लिखा कि “अत्याचारी बाबर ने साढ़े तीन सौ साल पहले जान-बूझकर ऐसे पवित्र स्थान पर मस्जिद बनाई जिसे हिंदू रामचंद्र का जन्मस्थान मानते हैं। इस समय हिंदुओं को वहाँ जाने का सीमित अधिकार मिला है और वे सीता-रसोई और रामचंद्र की जन्मभूमि पर मंदिर बनाकर अपना दायरा बढ़ाना चाहते हैं”। जजमेंट में यह भी कह दिया गया कि रिकार्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे हिंदू पक्ष का किसी तरह का स्वामित्व दिखे। इन तीनों अदालतों ने अपने फ़ैसले में विवादित स्थल के बारे में हिंदुओं की आस्था, मान्यता और जनश्रुति का उल्लेख तो किया लेकिन अपने फ़ैसले का आधार रिकार्ड पर उपलब्ध सबूतों को बनाया और शांति व्यवस्था की तत्कालीन ज़रूरत पर ज़्यादा ध्यान दिया।

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