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लाखों की अफीम खा जाते हैं राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के अफीमची तोते

भारत के अफीमची तोते सरकार के बड़ी मुसीबत बन गए हैं। उन्हें अफीम खाने की ऐसी लत लग गई है कि वे डोडे में लगाए गए चीरे से रिसने वाले अफीम के दूध को चूंस जाते हैं। कई तोते तो इतने बड़े अफीमची हो चुके हैं कि वे पूरे डोडे को ही तोड़कर ले जाते हैं और आराम से पेड़ों की डालियों पर बैठकर खाते हैं।

तोतों को ऐसे पड़ी अफीम की लत 

मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में अफीम की खेती करने वाले किसानों की शिकायत है कि अफीम के आदी तोते, बारी बारी से उनकी फसल को नुक़सान पहुंचाते हैं। उन्हें भगाने के बहुत प्रयास किए जाते हैं। तोते पोस्त की फसल के अलावा अंदर अफीम तक पहुंचने के लिए पोस्त के बीज की फली को भी उधेड़ डालते हैं। पोस्त की एक फली से 30-35 ग्राम अफीम निकलती है। जिसे कटाई के सीज़न में तोतों के बड़े बड़े समूह तबाह कर देते हैं। उनमें के कुछ तो फली को ही लेकर उड़ जाते हैं। इन तोतों को अफीम की लत पड़ गई है। ये दिन में 30-40 बार खेतों पर वापस आते हैं। फलियों को पकाने के लिए लगाए गए चीरे से जब मॉरफीन रिसने लगता है तो तोते उस मॉरफीन को चूस लेते हैं।

घट रहा है अफीम का वजन

इधर हर साल अप्रैल में नार्कोटिक्स विभाग किसानों से अफीम ख़रीदता है, लेकिन इस बार लॉकडाउन के कारण एक महीने से अधिक समय से अफीम किसानों के घरों में पड़ी है। किसानों को चिंता है कि अफीम को लम्बे समय तक घरों या गोदामों में रखने से उसकी क्वालिटी ख़राब हो सकती है। जिससे उसका नेट वज़न घट सकता है।

…..तो रद्द हो जाएगा लाइसेंस

लाइसेंसिंग पॉलिसी के अनुसार अफीम उत्पाद का नेट वज़न अगर लाइसेंस देते समय सरकार द्वारा तय किए गए प्रति हेक्टेयर मानक से कम हो तो किसान का अफीम की खेती का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। पॉलिसी में कहा गया है कि केवल वही किसान लाइसेंस के पात्र होंगे जो प्रति हेक्टेयर कम से कम 53 किलोग्राम अफीम उत्पाद मध्यप्रदेश और राजस्थान में और कम से कम 45 किलोग्राम उत्तर प्रदेश में बेंचेंगे। पोस्त उगाने वाले किसानों को लाइसेंस देने के लिए सरकार ने उपज की यही न्यूनतम सीमा तय की है।

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कोरोना जांच के नाम पर घाटे की भरपाई की फिराक में है निजी अस्पताल!

लॉकडाउन में लगभग बंद हो गए निजी अस्पताल फिर से खुलते ही घाटे की भरपाई मरीजों पर कोरोना टेस्ट का भार डालकर करने की तैयारी में हैं। जानकारी के अनुसार निजी अस्पताल अपने यहां इलाज के लिए आने वाले सभी मरीजों को कोरोना जांच के लिए बाध्य करेंगी और प्रति जांच पांच हजार तक वसूलेंगे। हैल्थ सेक्टर के जानकारों का कहना है कि कोरोना के एक टेस्ट की लागत अधिकतम एक हजार रुपए आती है और बड़े पैमाने पर टेस्ट करने पर यह और घट जाती है लेकिन निजी अस्पताल उसकी कीमत अधिकतम वसूलने पर जोर देंगे।

जांच से होगी कमाई

मेडिका ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के चेयरमैन आलोक राय के अनुसार इन जांचों में लागत के अलावा केवल 10 फीसदी मार्जिन मिलेगा। राय ने कहा, ‘वे इसे आमदनी के एक बड़े स्रोत के रूप में नहीं देखते हैं क्योंकि उन्हें समय-समय पर अपने डॉक्टरों और कर्मचारियों की भी जांच करनी होगी। इस तरह मरीज की एक बार जांच होगी और डॉक्टरों की बार-बार करनी होगी। इस तरह जो कमाई होगी, वह आंतरिक जांच में चली जाएगी।

कम आएगी जांच की लागत

दूसरी ओर निजी अस्पतालों की जांच की लागत भी घटेगी क्योंकि नमूने लेने की लागत काफी कम है। उद्योग से जुड़े लोगों का दावा है कि अस्पतालों के लिए हर मरीज की पीसीआर जांच की लागत 1000 रुपये से अधिक नहीं होगी। हालांकि अस्पतालों के ज्यादा पैसा वसूलने पर प्रशासन की नजर है। हालांकि कुछ अस्पताल शृंखलाएं धीरे-धीरे सुधार को लेकर सतर्क हैं। अस्पतालों को लोगों और बेडों के बीच दूरी बढाऩी होगी और कर्मचारियों को बारी-बारी से काम पर बुलाना होगा। बड़ी अस्पताल शृंखलाओं के राजस्व में विदेशी मरीजों का हिस्सा करीब 10 से 12 फीसदी है। मगर ऐसे मरीजों के लिए अस्पतालों को कुछ इंतजार करना होगा।

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इजरायल और इटली का दावा, हमारे वैज्ञानिकों ने बना लिया है कोरोना वैक्सीन

विश्‍वव्‍यापी कोरोना महामारी के बीच इजरायल के रक्षा मंत्री नफ्ताली बेनेट ने दावा किया है कि उनके देश के मुख्य जैविक अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के लिए एक एंटीबॉडी विकसित करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। उन्‍होंने कहा कि अब इसके पेटेंट और बड़े पैमाने पर संभावित उत्‍पादन के बारे में काम चल रहा है। इधर इटली ने भी दावा किया है कि उसने दुनिया का पहला कोरोना वायरस वैक्सीन विकसित कर लिया है जो मनुष्यों पर काम करता है। रोम के एक अस्पताल में किए गए परीक्षणों के अनुसार, कोरोना वायरस वैक्सीन में चूहों में उत्पन्न एंटीबॉडी होते हैं जो मानव कोशिकाओं पर काम करते हैं।

चूहों के शरीर में विकसित हुआ एंटीबॉडी

एक रिपोर्ट के मुताबिक, इटली कोविड-19 की वैक्सीन बनाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है जो इंसानों पर भी असरदार है। यह रिपोर्ट रोम के ‘इंफेक्शियस डिसीज स्पैलनज़ानी हॉस्पिटल’ में हुए एक परीक्षण पर आधारित है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कोरोना वायरस वैक्सीन ने चूहों के शरीर में एंटीबॉडीज जेनरेट की है जिसका असर इंसान की कोशिकाओं पर भी होता है।

इटली में वैक्सीन का परीक्षण

दवा बनाने वाली एक फर्म ‘ताकीज़’ के सीईओ लिगी ऑरिसिशियो ने इटली की एक न्यूज एजेंसी के हवाले से कहा, यह इटली में वैक्सीन का परीक्षण करने वाले उम्मीदवारों का सबसे एडवांस स्टेज है। वैक्सीन का परीक्षण करने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों का इस्तेमाल किया था। सिंगल वैक्सीनेशन के बाद उन्होंने चूहों के शरीर में एंटीबॉडीज़ को विकसित होते देखा जो मानव कोशिकाओं को प्रभावित करने वाले कोरोनो वायरस को ब्लॉक कर सकता है।
दुनियाभर में 100 से ज्यादा वैक्सीन का ट्रायल प्री-क्लीनिकल ट्रायल पर हैं और उनमें से कुछ का इंसानों पर प्रयोग शुरू किया गया है। इस महामारी के फैलने का सबसे बड़ा कारण यह है कि अब तक इसकी दवा ईजाद नहीं हो सकी है।

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ब्रिटिश फौजी बटालियन से जूझती दिखेगी शाहरुख की बेताल सीरिज की आत्मा

बॉलीवुड के किंग खान शाहरूख खान की जॉम्बी हॉरर सीरीज बेताल 24 मई को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। शाहरुख खान ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए भी कंटेंट बना रहे हैं। उनकी नई जॉम्बी हॉरर सीरीज ‘बेताल’ रिलीज के लिए तैयार है। इस सीरिज का फर्स्ट लुक रिलीज हो गया है।

शाहरुख के बैनर रेड चिलीज एंटरटेनमेंट तले बनी यह सीरीज 24 मई से नेटफ्लिक्स पर रिलीज होगी। बेताल को बनाने की घोषणा पिछले साल जुलाई में हुई थी। तब से फैंस को इसका इंतजार था। रेडी चिलीस एंटरटेनमेंट ने अपने ऑफिशियल टवीटर अकाउंट से इसकी जानकारी दी। पोस्टर जारी करते हुए लिखा, ”ये रहा अपकमिंग थ्रिलर-हॉरर वेब सीरीज बेताल का फर्स्ट लुक। कास्ट है विनित कुमार और आहाना कुमरा।

निर्देशित किया है पेट्रिक ग्राहम और निखिल महाजन ने। फिल्म की कहानी में ब्रिटिशकाल दिखाया गया है। यह भारत के एक गांव की कहानी है। दो सदी पुरानी एक बुरी आत्मा का सामना ब्रिटिश इंडियन आर्मी ऑफिसर और उसकी बटालियन से होता है। इसके बाद कहानी में कई रोचक और रोमांचक मोड़ आते हैं। कहा जा रहा है कि यह सीरिज बेहद थ्रिलिंग है और कुछ डरावने पलों से भी दर्शकों का सामना होगा।

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हार गया कोरोना, तेज होते संक्रमण के बीच मरीजों के ठीक होने की रफ्तार बढ़ी

कोरोना के कहर के बीच राहत की खबर आई है। देश में अभी जिस तेजी से कोरोना संक्रमण फैल रहा है, उतनी तेजी से संक्रमण के शिकार मरीज ठीक होकर घर भी जा रहे हैं। पिछले 24 घंटों में कोरोना से संक्रमित 682 लोगों के स्वस्थ होने के साथ ऐसे लोगों की संख्या 10633 पर पहुंच गयी है तथा इनकी रिकवरी दर बढ़कर 26 प्रतिशत से अधिक हो गयी है।

रेड और ओरेंज जोन पुन: परिभाषित

इसी को देखते हुए रेड और ओरेंज जोन को पुन: परिभाषित किया गया है। इन क्षेत्रों में विषाणु संक्रमण को रोकने के लिए उपयुक्त कंटेनमेंट स्ट्रैटिजी अपनाई जानी जरूरी है। कंटेनमेंट जोन के बाहर के क्षेत्र को घेरकर उपयुक्त रणनीति बनाई जानी है लेकिन अगर इसके बाहर के क्षेत्र यानी बफर जोन में कोई भी केस नहीं आ रहा है और इसके बाहर के क्षेत्र में कुछ गतिविधियों में छूट दी जा सकती है। किसी भी राज्य अथवा जिले चाहे वे रेड जोन हो या ओरेंज जोन हो, उन सभी में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों को बढऩे से रोकने के लिए कड़े कदम उठाये जाने जरूरी है क्योंकि इस वायरस का प्रसार रोकने के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है। हालांकि इसी बीच देश में कईं मरीजों पर प्लाज्मा थैरेपी को आजमाया गया और उसके नतीजे भी सकारात्मक रहे है लेकिन महाराष्ट्र में एक कोरोना मरीज की मौत होने के बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके बारे में स्पष्ट कर दिया है कि प्लाज्मा थेरेपी को विश्व में कहीं भी मान्य उपचार के तौर पर पुष्टि नहीं हुई है और यह सिर्फ ट्रायल के तौर पर ही की जा रही है तथा दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना यह घातक साबित हो सकती है।

ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की मंजूरी जरूरी

विश्व के अनेक देशों में कोरोना महामारी से निपटने पर शोध और अनेक कार्य हो रहे हैं लेकिन अभी तक किसी भी कारगर वैक्सीन अथवा दवा का पता नहीं चल सका है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश में कई स्थानों पर प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल कोरोना मरीजों के इलाज के लिए हो रहा है लेकिन इसका उपयोग भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के दिशा- निर्देशों के तहत ही होना चाहिए और इसके लिए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से मंजूरी लेनी जरूरी है। इसी के बाद ही यह प्रकिया शुरू की जानी है।

देश में कुल 75 हजार वेंटीलेटर की मांग

देश में इस समय कुल 75 हजार वेंटीलेटर की मांग है और उपलब्ध वेंटीलेटर की संख्या 19398 है जिसे देखते हुए केन्द्र सरकार ने घरेलू निर्माता कंपनियों को 59884 वेंटीलेटर के ऑर्डर दिए हैं। देश में आक्सीजन तथा आक्सीजन सिलेंडरों की आपूर्ति सामान्य है। देश की कुल आक्सीजन निर्माण क्षमता 6400 एमटी है जिसमें से एक हजार एमटी का इस्तेमाल ही मेडिकल आक्सीजन बनाने में होता है। देश में इस समय पांच बड़े और 600 छोटे आक्सीजन निर्माता कंपनियां हैं और खुद ही आक्सीजन निर्माण करने वाले अस्पतालों की संख्या 409 है और क्रायोजेनिक टैंकरों की संख्या 1050 है। देश में 30 मार्च को पीपीई की निर्माण क्षमता मात्र 3312 थी जो 30 अप्रैल तक 186472 हो गई है।

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सिर्फ मेंढ़क व घोंघे ही खाता है गिद्ध प्रजाति का यह प्रवासी पक्षी

आमतौर पर संरक्षित वन क्षेत्रों में पाया जाने वाला प्रवासी पक्षी लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क अब कृषि क्षेत्रों में भी आबाद हो रहा है। प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक डॉ. गोपी सुन्दर ने इन पक्षियों पर शोध के बाद बताया कि अब तक यह माना जाता था कि संरक्षित घने क्षेत्रों में ही गिद्ध प्रजाति का लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क संरक्षित रहता है और फलता-फूलता है।

मानवीय गतिविधियां खास तौर से कृषि इन पक्षियों एवं वन्यजीवों के अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होता है परन्तु शोध के बाद यह पाया गया कि वन क्षेत्र के बाहर अब कृषि क्षेत्रों में भी ये पक्षी व वन्यजीव आबाद हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब तक माना जाता था कि अति संकटापन लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क की आबादी घने जंगलों में ही संरक्षित हैं। पहले यह कहा जाता था कि तालाबों में खेती करने से पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है परन्तु नेपाल के लुंबिनी क्षेत्र (बुद्ध की जन्मस्थली) एवं कपिलवस्तु के कृषि क्षेत्रों में यह प्रजाति बहुत फल-फूल रही है। डॉ. गोपीसुंदर के नेतृत्व में नेशनल ज्योग्राफिक की एक शोध परियोजना के तहत पक्षी विज्ञानियों के दल ने यह निरीक्षण किया कि यह स्टॉर्क बड़ी कॉलोनी नहीं बनाता है अपितु यह छोटी-छोटी 10 से 20 घोंसलों की कॉलोनियां ही बनाता है।

पक्षी की जरूरत घोंसला बनाने के लिए पेड़ और चूजों के लिए भोजन की मांग स्थानीय कृषकों द्वारा संरक्षित पीपल, बरगद व सेमल के पेड़ से हो जाती है और किसानों की मिश्रित चावल एवं गेहूं की खेती से भोजन हेतु मेंढ़क व घोंघे मिल जाते हैं। डा गोपीसुंदर के निर्देशन में काठमाण्डू के पास खोपा कॉलेज के दो छात्र रोशिला और बिजय, कॉलेज सलाहकार कमल गोसाई, क्षेत्रीय सहयोग कैलाश जेसवाल और प्रकृति संरक्षण फाउण्डेशन के दो वैज्ञानिक स्वाति कितूर ने 101 घोसलों का 250 घंटों तक निरीक्षण किया और पाया कि उनमें 162 चूजों ने जन्म लिया जो एक सुखद आश्चर्य की बात है।

इससे एक नई जानकारी प्रकाश में आई कि कृषि क्षेत्र के तालाब भी पक्षियों के आर्द्र भूमि की मांग को पूरा करते है। कृषि को वन्यजीवों के अस्तित्व में खतरा न मानकर इससे इनकी आबादी में वृद्धि हुई। इस शोध से ज्ञात हुआ कि नये वैज्ञानिकों के लिए शोध का क्षेत्र घने संरक्षित वन ही नहीं अपितु कृषि क्षेत्रों में भी यह शोध किया जा सकता है। शोध का विवरण अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका यूएसए द्वारा प्रकाशित वाटर बर्ड और ब्रिटेन द्वारा प्रकाशित वाइल्ड फॉलव में प्रकाशित हुआ है। डॉ. गोपीसुंदर ने बताया कि नेपाल सरकार इस योजना के तहत सेमल के बढ़ावे व संरक्षण के लिए कृषकों को अनुदान देती है। इससे कृषक सेमल का वृक्षारोपण करते है और इसे संरक्षित रखते हैं। इस कांटेदार रूई के पेड़ पर लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क घोंसला बनाना पसंद करते हैं।

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अब केले पर मंडराया कोरोना वायरस का साया, हजारों टन केला……

कोरोना से खेती को भी बड़ा नुकसान हुआ है। इसकी वजह से उत्तरप्रदेश में हजारों टन केले की पैदावार नहीं हो सकी। उत्तरप्रदेश के कुछ जिलों में टिशू कल्चर केले की खेती की जाती है जिसके बीज महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों से आते हैं। लेकिन कोरोना के चलते इसके बीज नहीं आ पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में बाराबंकी, अयोध्या, सीतापुर, गोंडा, बहराइच, संतकबीरनगर, श्रावस्ती, गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, बलिया, वाराणसी समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों मे टिशू कल्चर केले की खेती बडे पैमाने पर होती है लेकिन कोरोना को लेकर इस खेती पर भी आफत आ गई है। राज्य मे करीब एक लाख हेक्टेयर में टिशू कल्चर के केले की खेती की जाती है लेकिन अभी तक इसके बीज की व्यवस्था नहीं हो पायी है जबकि इस खेती के लिए खेत पूरी तरह तैयार हैं। चूंकि इसके बीज दक्षिण के राज्यों से आते हैं इसलिए बीजों का आना मुश्किल माना जा रहा है।

टिशू कलचर खेती मे अपनी अलग पहचान बना चुके किसान रामशरण कहते हैं कि एक लाख हेक्टेयर मे केले की खेती के लिए करीब तीन करोड़ बीजों की जरूरत होगी। आवागमन बंद होने के कारण इतना बीज आना मुश्किल ही नहीं असंभव है। रामशरण को टिशू कलचर खेती के लिए पद्मश्री भी मिल चुका है। उद्यान विशेषज्ञों के अनुसार पिछले साल टिशू कल्चर केले की राज्य मे बंपर पैदावार हुई थी और किसानों ने मोटा मुनाफा कमाया था।

पिछले साल के मुनाफे को देखकर कुछ नये किसान भी इस क्षेत्र मे आ गए और अपने खेतों को टिशू कल्चर केले की खेती के लिए तैयार किया लेकिन बीज को लेकर अभी भी अनिश्चितता के हालात के कारण किसान अब उदास हैं। रेल के साथ हवाई सेवा भी पूरी तरह से बंद है, इसके बीज हवाई जहाज से भी आते रहे हैं लेकिन यह सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। निचोड़ यह है कि टिशू कल्चर केले की खेती पर इस बार आफत है। किसान इसके लिए किसी को दोष भी नहीं दे सकते कयोंकि देश कोरोना जैसी महामारी से लड रहा है।

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कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े कर देगा ‘अतुल्य’

Incredible will break thousand pieces of Corona virus:

भारत के रक्षा वैज्ञानिकों ने एक ऐसा माइक्रोवेव बनाया है जो कोरोना वायरस के एक हजार से अधिक टुकड़े करके उसे नष्ट करने में सक्षम है। ये माइक्रोवेव पुणे स्थित उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी संस्थान ने विकसित किया है। यह एक मिनट से भी कम समय में कोरोना विषाणु के टुकड़े टुकड़े कर उसे नष्ट कर देगा। संस्थान द्वारा विकसित माइक्रोवेव को अतुल्य नाम दिया गया है और यह 560 से 600 सेल्सियस के तापमान पर कोरोना विषाणु को टुकड़े टुकडे कर उसे नष्ट करने में सक्षम है। माइक्रोवेव किफायती है और इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है या एक जगह पर फिक्स भी किया जा सकता है। माइक्रोवेव इसे चलाने वाले व्यक्ति के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। विभिन्न वस्तुओं के आकार के अनुसार यह उस पर लगे कोरोना विषाणु को 30 सेकेंड से एक मिनट में नष्ट करने में सक्षम है। इस माइक्रोवेव का वजन तीन किलो है और यह केवल गैर धातु वाली वस्तुओं को ही संक्रमण मुक्त करने में सक्षम है।

 

ये तीन सुपर हीरो देंगे मात

इस बीच कोरोना वायरस को मात देने के लिए तीन सुपर हीरो भी आगे आए हैं।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने भी सुपर पावर के साथ चलने की बात की है। इतना ही नहीं कोविड-19 के सुपर हीरो से नाम से एक पोस्टर भी जारी किया है, जिसमें साबुन, मास्क और अल्कोहल वाले हैण्ड सैनिटाइजर को वायरस से मुकाबला करने वाले सुपर हीरो के रूप में दिखाया गया है।
पोस्टर के माध्यम से सन्देश दिया जा रहा है कि कोरोना के संक्रमण से सुरक्षित रहना है तो साबुन और पानी से बार-बार अच्छी तरह से हाथ धोएं। बाहर से जब भी घर के अंदर आयें तो हाथों को अच्छी तरह से धोना कतई न भूलें। नाक, मुंह व आँख को न छुएं।

इसी तरह कोविड-19 के दूसरे सुपर हीरो मास्क को भी बहुत अहम बताते हुए इसका उपयोग खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए करने को कहा गया है। कोरोना का वायरस खांसने व छींकने से निकलने वाली बूंदों के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है, इसलिए खांसते या छींकते समय नाक व मुंह को ढककर रखें। वहीं, अल्कोहल आधारित सैनिटाइजर भी कोरोना की जंग में अहम भूमिका निभा रहे हैं। कोरोना को फैलने से रोकने के साथ ही कीटाणुओं को खत्म करने और खुद को सुरक्षित रखने में इनका इस्तेमाल बहुत ही प्रभावी है।

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लाजवाब पतंगबाज भी थे फिल्म अभिनेता इरफान खान

इरफान खान ​जितने मंजे हुए अभिनेता थे, उतने ही लाजवाब पतंगबाज भी थे। उन्हें पतंगबाजी का बहुत शौक था और वह जयपुर में लोगों के साथ पतंग उड़ाते थे। पतंगबाजी के अवसर पर जब भी जयपुर में होते, वह लोगों को अपने घर की छत पर बुला लेते और खूब पतंग उड़ाते थे। जयपुर के थिएटर से बॉलीवुड और हॉलीवुड में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले इरफान की मां सईदा बेगम का रमजान के पहले दिन ही इंतकाल हुआ है।

लॉकडाउन के चलते इरफान अपनी मां के इंतकाल के बावजूद मुंबई से जयपुर नहीं आ सके लेकिन मां अंतिम सांस तक अपने लाडले की सलामती की दुआएं मांगती रही। इरफान के भाई सलमान ने बताया कि 95 साल की मां की अंतिम इच्छा थी कि इरफान भाई जल्द से जल्द स्वस्थ होकर घर लौटें। इरफान ने शनिवार को मुंबई से वीडियो कॉल के जरिए ही अपनी मां के अंतिम दर्शन किए थे। इरफान मूल रूप से टोंक के रहने वाले थे। उनके पिता कारोबार के लिए जयपुर में रहने लग गए।

टोंक में गुजरा इरफान का बचपन

अभिनेता इरफान खान का राजस्थान के टोंक से गहरा नाता रहा है और उनके निधन के बाद यहां उनके रिश्तेदारों में गम का माहौल है। इरफान खान के मामा हाकिम बुकरात ने बताया कि इरफान का बचपन टोंक में गुजरा है, उनकी माँ एवं वालिद टोंक के रहने वाले थे जो बाद में जयपुर में रहने लगे। इरफान अक्सर टोंक आया करते थे। इरफान नवाब खानदान से ताल्लुक रखते थे। टोंक के अंजुमन खानदान- ए -अमीरिया ने भी उनके निधन पर दुख जताया है। उन्होंने बताया कि इरफान की मां के निधन की खबर के बाद ही इरफान की तबियत बिगड़ी थी। इसके बाद मुंबई के कोकिला बेन हॉस्पिटल में उन्हें भर्ती कराया गया। इरफान के निधन की खबर लगते उनके रिश्तेदारों एवं प्रशंसकों में दुख की लहर दौड़ गई और गम का माहौल है।

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भगवान के चरणों की अपेक्षा खेतों में नष्ट हो रहे हैं सुगंध के साथ सौंदर्य के प्रतीक फूल

कोविड 19 ने भगवान के चरणों में अर्पित किए जाने वाले फूलों की ऐसी दुर्गति की है कि वे अब खेतों में ही अंतिम सांस लेने को मजबूर है। सुगंध के साथ सौंदर्य के प्रतीक फूलों के कारोबार को देश में जारी लाकडाउन ने भारी नुकसान पहुंचाया है और बागों में फूलों के साथ साथ किसानों के चेहरे भी मुरझा गये हैं।

गंगा-यमुना के कछारी क्षेत्र में बसा नैनी फूलो की खेती के लिए उपजाऊ माना जाता है। यहां गुलाब, गेंदा, गुलाब, सूरजमुखी, चमेली के फूलों की खेती की जाती है। लॉकडाउन के कारण मंडियों में फूलों की आवक बंद होने से प्रतिदिन लाखों रूपये मूल्य के फूल का कारोबार चौपट हो गया है। फूलों की खेती कर किसान अच्छी कमाई करते हैं लेकिन शादी विवाह के दौर में लॉकडाउन होने से फूलों का कारोबार बंद हो गया जिससे बड़ी समस्या उत्पन्न हो गयी। फूलों की खेती से परोक्ष और अपरोक्ष तौर पर कम से कम 1500 से 2000 लोग जुड़े हुए है।

गुलाब की खेती को तवज्जो

एक उद्यान अधिकारी के अनुसार चाका, सबहा, सोनई का पुरवा और धनपुर समेत कई गांवों में फूलों की खेती से किसान लाभ कमाते हैं। चाका गांव के किसान तो गेहूं, धान आदि की फसल छोड़कर गुलाब की खेती को तवज्जों दे रहे हैं। नैनी में यमुनापार के अरैल, गंजिया, देवरख, खरकौनी, मवइया, कटका और पालपुर समेत करीब 40-45 से अधिक गांवो में फूल की खेती होती है। सामान्य दिनों में तडके पुराने यमुना पुल के पास और गऊघाट में फूल मंडी सज जाती थी। फूलों की सप्लाई शहर के अलावा कौशांबी, प्रतापगढ़, जौनपुर, वाराणसी, पडोसी राज्य मध्य प्रदेश के रींवा, कोलकत्ता और छत्तीसगढ़ तक महक भेजी जाती है। महामारी के कारण घोषित लॉकडाउन से इन्हें खरीदने वाला कोई नहीं है। फूलों की तरह खिला रहने वाला किसानों का चेहरा कारोबार ठप होने से मुरझा गया है। छोटे से लेकर बड़े मंदिर, देवालय और तीर्थस्थल तक, सब बंद पड़े हैं।

बर्बाद हो गया यह सीजन 

हर तरह के आयोजनों पर पूरी तरह रोक है। ऐसे में फूल किसानों और कारोबारियों का यह सीजन बर्बाद हो गया है। नवरात्रि के दिनों में फूलों की डिमांड ज्यादा होती है। लेकिन, इस बार सब ठप्प होने से काफी नुकसान हुआ है। फूलों की बिक्री बंद होने से किसानों के सामने रोजी-रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। पौधों पर सूखते फूलों को देखकर कोरोना के कारण किस्मत को कोसने को मजबूर हैं। उन्होने बताया कि किसानों को पौधों को बचाने के लिए फूलों को तोड़कर खेत में गिराना पड़ रहा है।