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कारगिल युद्ध के वक्त इस प्रधानमंत्री ने फेर दिया था रॉ की मेहनत पर पानी, नवाज शरीफ को सुनवा दिए थे मुशर्रफ के टेप – Mobile Pe News

कारगिल युद्ध के वक्त इस प्रधानमंत्री ने फेर दिया था रॉ की मेहनत पर पानी, नवाज शरीफ को सुनवा दिए थे मुशर्रफ के टेप

कारगिल युद्ध के वक्त भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने जनरल मुशर्रफ और उनके एक सहयोगी के बीच पेइचिंग से टेलीफोन पर हुई बातचीत को रिकार्ड कर पूरे षडयंत्र का पता लगा लिया था लेकिन कारगिल से घबराए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन टेपों को इस्लामाबाद भेजकर तब के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सुनवाकर रॉ की मेहनत पर पानी फेर दिया क्योंकि ऐसा करते ही पाकिस्तान को उन सेटेलाइट लिंक का पता चला गया जिनके जरिए रॉ ने उनके फोन टेप किए थे। इसके साथ ही उन्होंने उन लिंक को निष्प्रभावी बनाकर टेलीफोन टेपिंग को असम्भव बना दिया था। इससे भारत की फौज को पाकिस्तानी षडयंत्र की जानकारी मिलना बंद हो गई थी और उसका खामियाजा भारतीय जवानों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ा।

भारत ने इस टेप को नवाज़ शरीफ़ को सुनाने के लिए विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव विवेक काटजू को इस्लामाबाद भेजा था। इन टेपों के नवाज़ शरीफ़ द्वारा सुन लिए जाने के करीब एक हफ़्ते बाद 11 जून, 1999 को विदेश मंत्री सरताज अज़ीज़ की भारत यात्रा से कुछ पहले भारत ने एक संवाददाता सम्मेलन कर इन टेपों को सार्वजनिक कर दिया। इन टेपों की सैकड़ों कापियाँ बनवाई गई और दिल्ली स्थित हर विदेशी दूतावास को भेजी गईं।

पाकिस्तानियों का मानना है कि इस काम में या तो सीआईए या फिर मोसाद ने भारत की मदद की। जिन्होंने इन टेपों को सुना है उनका मानना है कि इस्लामाबाद की तरफ़ की आवाज़ ज्यादा साफ़ थी, इसलिए संभवत: इसका स्रोत इस्लामाबाद रहा होगा।
इस बातचीत ने सार्वजनिक रूप से ये सिद्ध कर दिया कि कारगिल ऑप्रेशन में पाकिस्तान के चोटी के नेतृत्व का किस हद तक हाथ है। दिलचस्प बात ये है कि अपनी बेबाक आत्मकथा ‘इन द लाइन ऑफ़ फ़ायर’ में परवेज़ मुशर्रफ़ इस घटना से साफ़ कन्नी काट गए और इस बातचीत का कोई ज़िक्र ही नहीं किया हाँलाकि बाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में भारतीय पत्रकार एम जे अकबर को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने इन टेपों की असलियत को स्वीकार किया।

रॉ के अतिरिक्त सचिव रहे मेजर जनरल वी के सिंह के अनुसार ‘ये पता नहीं है कि इन टेपों को सार्वजनिक कर भारत को अमरीका और संयुक्त राष्ट्र से कितने ‘ब्राउनी प्वाएंटस’ मिले, लेकिन ये ज़रूर है कि पाकिस्तान को इसके बाद इस्लामाबाद और बीजिंग के उस ख़ास उपग्रह लिंक का पता चल गया, जिसको रॉ ने इंटरसेप्ट किया था। इसको उसने तुरंत बंद कर दिया।

शायद रॉ या प्रधानमंत्री कार्यालय के उस समय के लोगों ने 1974 में प्रकाशित एफ़ डब्लू विंटरबॉथम की किताब अल्ट्रा सीक्रेट नहीं पढ़ी थी जिसमें पहली बार दूसरे विश्व युद्ध के एक महत्वपूर्ण ख़ुफ़िया स्रोत का ज़िक्र किया गया था। महायुद्ध की बहुत शुरुआत में ब्रिटेन ने जर्मनी के इंनसाइफ़रिंग डिवाइस एनिगमा के कोड को तोड़ लिया था। इस जानकारी को अंत तक छुपा कर रखा गया और जर्मनों ने पूरे युद्ध के दौरान ‘एनिगमा’ का इस्तेमाल जारी रखा जिससे ब्रिटिश ख़ुफ़िया विभाग तक बेशकीमती जानकारियाँ पहुंचती रहीं। एक बार तो ब्रिटेन को यहां तक पता चल गया कि अगली सुबह ‘लोफ़्तवाफ़े’ यानि जर्मन वायु सेना कॉवेंट्री पर बमबारी करने वाली है। उस शहर के लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया कर उनकी जान बचाई जा सकती थी। लेकिन चर्चिल ने ऐसा न करने का फ़ैसला लिया, क्योंकि इससे जर्मनी को शक हो जाता और वो ‘एनिगमा’ का इस्तेमाल करना बंद कर देते।