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ब्लॉग बम के बाद आडवाणी कैंप का एक और धमाका, अब मोदी शाह को इन पैंतरों का डर

भाजपा के संस्थापक रहे लालकृष्ण आडवाणी के लिखे ब्लॉग बम से पैदा हुए शोले अभी ठंडे भी नहीं हुए थे कि आडवाणी की कट्टर समर्थक रही लोकसभा की निवर्तमान अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उन पर अपनी उम्मीदवारी वापसी का घी डाल दिया। इससे शोले और भड़क गए हैं।

महाजन ने टिकट नहीं दिए जाने से उपजी नाराजगी का हवाला देते हुए सवाल किया कि आखिर उनके टिकट पर इतना असमंजस क्यों हैं।
राजनीतिक जानकार महाजन की उम्मीदवारी को आडवाणी के समर्थक रहे उन तमाम नेताओं की चुनाव नहीं लड़ने की रणनीति से जोड़ रहे हैं जिन्होंने एक एक कर लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया। सबसे पहले सुषमा स्वराज ने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए चुनाव लड़ने से इनकार किया तो पीछे से उमा भारती भी उनकी राह पर चल पड़ी। इसके अलावा आडवाणी कैम्प के अन्य नेताओं को मोदी शाह की जोड़ी ने टिकट नहीं दिया। ऐसे नेताओं में कलराज मिश्र जैसे नेता भी शामिल हैं।

माना जा रहा है कि आडवाणी ने ब्लॉग लिखने का समय बेहद सोच समझकर चुना है। उन्होंने चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद जब पीछे हटने का समय बीत गया तब मोदी पर परोक्ष रूप से तानाशाह होने का आरोप लगाया। उम्मीद के मुताबिक विपक्ष ने इसे हाथों हाथ लिया और वे बहस को अभिव्यक्ति की आजादी के केन्द्र में ले आए। इससे पहले तक राष्ट्रवाद और देश भक्ति के नाम पर दनदनाते फिर रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष यह माहौल बना चुके थे कि विपक्ष देशद्रोही है। लेकिन राजनीति के चतुर खिलाड़ी ने सही समय पर ब्लॉग लिखकर मोदी और शाह के बनाए इस नेरेटिव को तोड़ दिया और विपक्ष को यह तमगा दे दिया कि वह देशद्रोही नहीं है।

राजनीति के पंडितों का कहना है कि आडवाणी के समर्थक सुषमा, उमा भारतीय जैसों ने चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर यह संकेत ​दे दिए थे कि मोदी शाह की राह को कंटकाकीर्ण करने की तैयारी है। अब मोदी और शाह चाह कर भी विपक्ष को देशद्रोही नहीं कह पाएंगे और यही उनकी पहली रणनीतिक हार होगी क्योंकि काम के दम पर वोट मांगने लायक उपलब्धियां उनके पास नहीं है। यह भी माना जा रहा है कि आडवाणी ने पिछले पांच साल में हुए अपमान का बदला लेने का यह अंतिम समय माना है, इसलिए अगर चुनावी हवा का रुख मोदी ने फिर से अपने पक्ष में मोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली तो आडवाणी दूसरे पैंतरे इस्तेमाल करेंगे। वे हार अथवा जीत के इरादे से मैदान में आए हैं, इसलिए मोदी, शाह के साथ ही आरएसएस के कान भी खड़े हुए हैं।

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