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शराब बिक्री: हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु की दुकानों में शराब बेचने पर मद्रास उच्च न्यायालय की रोक के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर शुक्रवार को स्थगनादेश जारी किया, साथ ही संबंधित पक्षों से जवाब तलब भी किया।

तमिलनाडु स्टेट मार्केटिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड के जरिये राज्य सरकार द्वारा दायर याचिका न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ के समक्ष आज सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थी।

न्यायालय ने संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी। उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में दुकानों में शराब की बिक्री पर रोक का आदेश जारी किया था।
शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाले बी. रामकुमार आदित्यन एवं अन्य को नोटिस जारी करके चार सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा है।

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश से दलित जातियों को धीरे से लगा जोर का झटका, नहीं मिलेगा पदोन्नति में आरक्षण

सरकारी महकमों में हजारों खाली पदों पर भर्ती नहीं हो पाने की समस्या से जूझ रहे देश के दलित समुदाय को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से तगड़ा झटका लगा है। उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण न तो मौलिक अधिकार है, न ही राज्‍य सरकारें इसे लागू करने के लिए बाध्‍य है।

 

 

पदोन्नति में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने अपने एक निर्णय में कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं है और इसके लिए राज्य सरकारों को बाध्य नहीं किया जा सकता। Reservation in promotion: न्‍यायालय भी सरकार को इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्‍छेद 16(4) तथा (4ए) में जो प्रावधान हैं, उसके तहत राज्‍य सरकार अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के अभ्‍यर्थियों को पदोन्‍नति में आरक्षण दे सकती हैं, लेकिन यह फैसला राज्‍य सरकारों का ही होगा। Reservation in promotion: अगर कोई राज्‍य सरकार ऐसा करना चाहती है तो उसे सार्वजनिक सेवाओं में उस वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी के संबंध में डाटा इकट्ठा करना होगा, क्योंकि आरक्षण के खिलाफ मामला उठने पर ऐसे आंकड़े अदालत में रखने होंगे, ताकि इसकी सही मंशा का पता चल सके, लेकिन सरकारों को इसके लिए बाध्‍य नहीं किया जा सकता।

प्रमोशन में आरक्षण नहीं देगी उत्तराखंड सरकार

पीठ का यह आदेश उत्‍तराखंड उच्च न्यायालय के 15 नवंबर 2019 के उस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई के दौरान आया है जिसमें उसने राज्‍य सरकार को सेवा कानून, 1994 की धारा 3(7) के तहत एससी-एसटी कर्मचारियों को पदोन्‍नति में आरक्षण देने के लिए कहा गया था, जबकि उत्‍तराखंड सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था।
यह मामला उत्‍तराखंड में लोक निर्माण विभाग में सहायक इंजीनियर (सिविल) के पदों पर पदोन्नति में एससी/एसटी के कर्मचारियों को आरक्षण देने के मामले में आया है, जिसमें सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था, जबकि उच्च न्यायालय ने सरकार से इन कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने को कहा था। राज्य सरकार ने इस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी। Reservation in promotion: उच्च न्यायालय ने कहा था कि सहायक अभियंता के पदों पर पदोन्नति के जरिये भविष्य में सभी रिक्त पद केवल एससी और एसटी के सदस्यों से भरे जाने चाहिए। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के दोनों फैसलों को अनुचित करार देते हुए निरस्त कर दिया है।

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अब तो लटकना ही होगा फांसी पर क्योंकि सुप्रीम कोर्ट नहीं सुनना चाहता याचिका

नयी दिल्ली. निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले के गुनहगार मुकेश की फांसी से बचने की आखिरी कोशिश बुधवार को उस वक्त नाकाम हो गई, जब उच्चतम न्यायालय ने दया याचिका खारिज किए जाने के खिलाफ उसकी विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) निरस्त कर दी।
इधर निर्भया कांड के एक अन्य गुनहगार अक्षय कुमार ने उच्चतम न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन (सुधारात्मक याचिका) दायर कर फांसी को टलवाने की कोशिश की है।

न्यायमूर्ति आर भानुमति, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की विशेष खंडपीठ ने मुकेश की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि उसकी याचिका में कोई आधार नहीं दिखता। न्यायालय ने निर्भया कांड के गुनहगार मुकेश की दया याचिका राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने को चुनौती देने वाली अपील पर मंगलवार को फैसला सुरक्षित रख लिया था। खंडपीठ ने मुकेश की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश और दिल्ली सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
देश को दहला देने वाले निर्भया कांड के एक अन्य गुनहगार अक्षय कुमार ने अब उच्चतम न्यायालय में क्यूरेटिव पिटीशन (सुधारात्मक याचिका) दायर किया है।

यह याचिका मंगलवार की देर शाम दाखिल की गई थी। इस बारे में हालांकि आज न्यायालय परिसर में वकील ए. पी. सिंह ने पत्रकारों को जानकारी दी। सिंह ने ही अक्षय की ओर से याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने सजा कम करने की मांग की है। अक्षय के पास हालांकि अभी राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाने का संवैधानिक अधिकार मौजूद है। इस मामले में अभी चौथे दोषी पवन की ओर से क्यूरेटिव याचिका दाखिल नहीं की गई है। इधर निर्भया मामले के दोषियों द्वारा लगातर कानून का सहारा लेकर फांसी टालने के मामले में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज कहा कि वे इस मामले में संसद से अनुरोध करेंगे कि कानून में जरुरी बदलाव कर ऐसे अपराधियों की फांसी की सजा पर तुरंत क्रियान्वयन किया जाये।
चौहान ने ट्वीट कर कहा ‘ मासूम बिटियाओं के साथ बलात्कार जैसे घिनौने अपराध करने वालों का सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। मैं संसद से अनुरोध करता हूँ कि क़ानून में ज़रूरी बदलाव कर ऐसा किया जाए कि ऐसे अपराधियों को बिना कोई देरी किए मिली हुई फाँसी की सजा का क्रियान्वयन तुरंत हो।’ पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा ‘जैसा कि कहा गया है कि न्याय मिलने में हुई देरी, न्याय न मिलने के बराबर है। यही सब क़ानूनी दाँवपेंच के चलते जनता हैदराबाद में हुए एनकाउंटर पर ख़ुशियाँ मनाती है। उसको त्वरित न्याय और उचित सजा मानती है। जनता का ये आक्रोश समाज में अराजकता पैदा कर सकता है।

 

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भाजपा सरकार पिछड़ा वर्ग ओबीसी के लोगों के लिये कर रही इतना बड़ा काम

लातेहार। केंद्रीय गृह मंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने आज दावा किया कि केंद्र की भाजपा सरकार अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लोगों को और आरक्षण देने की स्कीम पर काम कर रही है।

शाह ने यहां मनिका के उच्च विद्यालय मैदान में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले 70 सालों में कांग्रेस ने कभी भी ओबीसी का सम्मान नहीं किया। यह तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार है, जिसने ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया है।

भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि भाजपा सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 एवं 35 (ए) को समाप्त कर देश में आतंकवादियों का प्रवेश द्वार को हमेशा के लिए बंद कर दिया है। उन्होंने राम जन्मभूमि का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सभी चाहते थे कि भगवान राम का मंदिर अयोध्या में बने। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय के हाल ही में आये फैसले ने मंदिर निर्माण का रास्ता खोल दिया है।

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चिदम्बरम की जमानत याचिका पर ईडी को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने आईएनएक्स मीडिया धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम की जमानत याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को बुधवार को नोटिस जारी किए।

न्यायमूर्ति आर भानुमति की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने चिदम्बरम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुनने के बाद ईडी को नोटिस जारी करके जवाब तलब किया।न्यायलय ने मामले की सुनवाई के लिए 26 नवंबर की तारीख मुकर्रर की है और ईडी को उससे पहले तक जवाब सौंपने को कहा है।

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राफेल पर झूठ के लिये पूरे देश से माफी मांगे राहुल ,योगी आदित्यनाथ

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद राफेल विमान खरीद में झूठ बोलने के लिये आज कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी से माफी मांगने को कहा ।

मुख्यमंत्री ने यहां संवाददताओं से कहा कि राफेल विमान खरीद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाते हुये लगातार झूठ बोला और देश की जनता को गुमराह करने की कोशिश की । उन्होंने अपने झूठ में उस देश के प्रधानमंत्री का भी जिक्र कर दिया जहां से विमान खरीदा गया है।

उन्होंनें सवाल उठाया कि इस तरह पूरे देश से झूठ बोलने वाला व्यक्ति क्या जनप्रतिनिधि होने लायक है । उन्होंने कहा कि अपने झूठ के लिये राहुल गांधी को पूरे देश से माफी मांगनी चाहिये ।

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अयोध्या के इस पेड़ पर रोजाना उगता है राम का नाम, भक्त दिन रात करते हैं पेड़ की पूजा

श्रीराम की नगरी अयोध्या में कण कण में राम बसते हैं, यहां तक कि पेड़ भी इससे अछूते नहीं हैं। ऐसा ही एक पेड़ अयोध्या गोरखपुर मार्ग पर तकपुरा गांव के एक खेत में है जिसकी टहनियों, छालियों और तने पर राम नाम लिखा है। इसे किसी ने पेड़ पर कुरेदा या लिख नहीं है बल्कि नाम खुद ही उग आये हैं।

जैसे जैसे लोगों को इसकी जानकारी हुई लोग यहां पूजा करने लगे और ये आस्था का केंद्र बन गया। पेड़ कब उगा या लगाया गया, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार दशकों पहले पेड़ पर राम नाम लिखा देखा गया।

पहले तो लोगों ने सोचा कि शायद किसी ने ऐसा कर दिया हो लेकिन जब हर तने पर राम नाम लिखा देखा गया तो लोगों को इस पर विश्वास हुआ। उसके बाद यहां रोज पूजा होने लगी। साल में एक बार यहां मेला भी लगता है। मान्यता है कि यहां पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है।

इधर श्रीरामजन्मभूमि पर विराजमान रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येन्द्र दास ने कहा है कि अब रामलला का मंदिर बनने से कोई रोक नहीं सकता है। यह ऐतिहासिक फैसला आज आया है। रामजन्मभूमि पर विराजमान रामलला के भव्य मंदिर के निर्माण को कोई ताकत रोक नहीं सकती है। उच्चतम न्यायालय के पांच एकड जमीन मुस्लिम पक्ष के फैसले पर अमल कराना सरकार का काम है।
यह हार जीत का मामला नहीं है। इस फैसले ने मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है। सत्य की जीत हुयी है और सामाजिक समरसता के लिये इसे सभी समुदायों को स्वीकार करना होगा तभी देश की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा। राममंदिर का शिलान्यास हो चुका है। अब बस शिलायें रखने की देर है। यह फैसला संतो और मार्गदर्शक मंडल की बैठक के बाद ले लिया जायेगा। फैजाबाद के सांसद लल्लू सिंह ने कहा कि यह पूरे देश की जीत है।

उधर बाबरी मस्जिद के मुद्दई इकबाल अंसारी ने अयोध्या में विवादित रामजन्मभूमि मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का इस्तकबाल करते हुये कहा कि राम मंदिर निर्माण में सहयोग की दरकार पर वह सबसे पहले आगे आयेंगे। अंसारी ने कहा कि राम पर किसी का जातीय हक नहीं है। वह सबके हैं। अगर मंदिर निर्माण के लिये कोई उनसे मदद की मांग करता है तो वह उस पर जरूर विचार करेंगे।

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रामलला की जीत का आधार बना पुरातत्व विज्ञान, आसान नहीं था पुरातत्व विज्ञानियों की खोज को नकार देना

अयोध्या पर फ़ैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि पुरातत्व विज्ञान को नकारा नहीं जा सकता। बाबरी मस्जिद के नीचे एक संरचना पाई गई है जो मूलतः इस्लामिक नहीं थी। जहां पर बाबरी मस्जिद के गुंबद थे वो जगह हिन्दू पक्ष को मिली।
अदालत ने कहा कि सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ अलग उपयुक्त ज़मीन दी जाए। ज़मीन पर हिंदुओं का दावा उचित है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर अयोध्या पर एक कार्ययोजना तैयार करने का कहा है। कोर्ट ने कहा है कि बनायी गई ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को शामिल करना है या नहीं ये फ़ैसला केंद्र सरकार करेगी।

 

निर्मोही अखाड़ा का दावा खारिज। आस्था के आधार पर मालिकाना हक़ नहीं दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब ज़िलानी ने कहा कि वो फ़ैसले से असंतुष्ट हैं लेकिन साथ ही उन्होंने शांति बनाए रखने की अपील भी की। बाबरी मस्जिद के नीचे एक संरचना पाई गई है जो मूलतः इस्लामिक नहीं थी। विवादित भूमि पर अपने फ़ैसले में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि पुरातत्व विज्ञान को नकारा नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर फ़ैसला सुना दिया है। अदालत ने बाबरी मस्जिद के गुंबद की जगह हिन्दू पक्ष को देने का फ़ैसला किया है। जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने 40 दिनों तक इस पर सुनवाई की थी। पाँच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से फ़ैसला सुनाया।
जस्टिस रंजन गोगोई ने शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के शीर्ष के अधिकारियों को बुलाकर मुलाक़ात की थी और फ़ैसले के दिन क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर निर्देश दिया था। अयोध्या में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए हैं।

अंदर के चबूतरे पर कब्ज़े को लेकर गंभीर विवाद रहा है। 1528 से 1556 के बीच मुसलमानों ने वहां नमाज़ पढ़ जाने का कोई सबूत पेश नहीं किया। बाहरी चबूतरे पर मुसलमानों का क़ब्ज़ा कभी नहीं रहा। 6 दिसंबर की घटना से यथास्थिति टूट गई। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड इस स्थान के इस्तेमाल का सबूत नहीं दे पाया। बाहरी चबूतरे पर हमेशा से हिन्दुओं का क़ब्ज़ा रहा। ऐतिहासिक यात्रा वृतांतों को भी ध्यान में रखा गया है। ऐतिहासिक यात्रा वृतांत बताते हैं कि सदियों से मान्यता रही है कि अयोध्या ही राम का जन्मस्थान है। हिन्दुओं की इस आस्था को लेकर कोई विवाद नहीं है। आस्था उसे मानने वाले व्यक्ति की निजी भावना है।
वो इमारत काले रंग के स्तंभों पर खड़ी थी। ASI ने एक विशेषज्ञ संस्था के तौर पर ये नहीं कहा था कि नीचे जो ढाँचा मिला है उसे ढहाया गया था। ज़मीन के मालिकाना हक़ का फ़ैसला क़ानून के सिद्धांतो के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।

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सरयू में डुबकी के बाद गर्म जलेबियों और पकौड़ों का लुत्फ उठा रहे हैं अयोध्या आए रामभक्त

विवादित रामजन्मभूमि पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से पहले अवाम कितना भी बेचैन हो लेकिन अयोध्या में शनिवार की सुबह आम दिनों की तरह सामान्य है।
उच्चतम न्यायालय आज सुबह 1030 बजे रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला सुनायेगी। हालांकि स्थानीय लोगों में इस ऐतिहासिक फैसले को लेकर कतई हड़बड़ाहट नहीं लगती। कई लोगों को देर सुबह तक पता भी नहीं था कि फैसला आज आने वाला है। यहां के लोग शहर में अमन और शांति चाहते है और देश के लोगों से न्यायालय के फैसले को एक सुर में मानने की अपील करते हैं।

राम भक्तों को फैसला सुनने से ज्यादा पवित्र सरयू नदी में आस्था की डुबकी लगाने की जल्दी है। हाथों में कपड़ों की पोटली थामे श्रद्धालुओं की टाेलियां सरयू के घाटों की तरफ हर दिन की तरह बढ़ी चली जा रही हैं। बाजारों में रौनक आम दिनो की तरह ही है। बुधवार को चौदह कोसी परिक्रमा समाप्त होने के बाद शुक्रवार को श्रद्धालुओं ने पंचकोसी परिक्रमा भी पूरे विधिविधान से पूरी की।
परिक्रमा का सिलसिला समाप्त होने के बाद भी हजारों की तादाद में बाहर जिलों से आये श्रद्धालु विभिन्न आश्रमों पर ठहरे हैं। यहां बाजार आम दिनो की तरह खुली हैं। स्नान ध्यान के बाद लोगबाग मिष्ठान भंडारों पर लजीज जलेबियों का लुत्फ ले रहे है। गर्मागर्म पकौडियों का चटखारा ले रहे हैं। पूजन सामग्री समेत अन्य जरूरत की चीजों की दुकाने सजी हुयी हैं।

शहर में भीड़भाड़ है और दो पहिया वाहनों के लिये कोई रोकटोक नहीं है हालांकि ऐहतियात के तौर पर जिला प्रशासन ने बाहर से आने वाले चार पहिया वाहनो के प्रवेश में प्रतिबंध लगा दिया है। पुलिस के वाहन सड़कों पर गश्त कर रहे है हालांकि इससे यहां विचरण करने वाले तीर्थयात्रियों को कोई परेशानी नही है। नया घाट से हनुमान गढी तक पैदल यात्रियों और दोपहिया वाहनों के आवागमन में कोई प्रतिबंध नहीं है हालांकि विवादित स्थल को बैरीकेडिंग लगाकर सील कर दिया गया है।

न्यायालय के फैसले के मद्देनजर धर्मशालाओं और आश्रमों में ठहरे यात्रियों से घरों को लौटने की सलाह दी गयी है। इसके लिये नयाघाट में अस्थायी बस अड्डा बनाया गया है जहां विभिन्न बस डिपो की बसें यात्रियों को ले जाने के लिये तैयार खडी हैं।

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500 साल पुराने विवाद में 206 साल बाद उठा ये सवाल, मोहरहित ‘निर्मोही’ और बैरागी को जमीन से मोह क्यों?

अयोध्या में राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक को लेकर चल रहा विवाद करीब 500 साल पुराना है। माना जाता है कि इस विवाद की शुरुआत 1528 में तब हुई थी जब मुगल शासक बाबर ने राम मंदिर को गिराकर वहां मस्जिद का निर्माण कराया था। इसी वजह से इसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा था। विवादित स्थल पर हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों में मालिकाना हक का विवाद सबसे पहले 1813 में शुरू हुआ था।
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की संविधान पीठ अब से चंद समय बाद इस मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनायेगी। शीर्ष अदालत ने गत 16 अक्टूबर को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटते हुए, धार्मिक मान्यताओं एवं परम्पराओं तथा पुरातात्विक सवालों पर विचारोत्तोजक बहस के बीच अयोध्या की विवादित जमीन से संबंधित मुकदमे पर 40 दिन तक जिरह होने के बाद इस ऐतिहासिक सुनवाई का उस दिन पटाक्षेप हो गया था और पूरे देश को फैसले का इंतजार था।
भारतीय राजनीति पर तीन दशक से अधिक समय से छाये इस विवाद की सुनवाई के दौरान राम जन्मभूमि पर अपने दावे के पक्ष में जहां रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा, ऑल इंडिया हिन्दू महासभा, जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति एवं गोपाल सिंह विशारद ने दलीलें दी, वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड, हासिम अंसारी (मृत), मोहम्मद सिद्दिकी, मौलाना मेहफुजुरहमान, फारुख अहमद (मृत) और मिसबाहुद्दीन ने विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक का दावा किया।

 

इस मामले में शीर्ष अदालत की ओर से न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल की ओर से मध्यस्थता असफल रहने की बात बताये जाने के बाद संविधान पीठ ने नियमित सुनवाई की और सभी पक्षों को अपना-अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिये।
हिन्दू पक्ष की ओर से सबसे पहले ‘रामलला विराजमान’ के वकील के एस परासरण ने दलीलें शुरू की थी, जबकि सुनवाई का अंत सुन्नी वक्फ बोर्ड की जिरह से हुआ। चालीस दिन की सुनवाई के दौरान कई मौके ऐसे आये जब दोनों पक्षों के वकीलों में गर्मागर्म बहस हुई।
दरअसल उच्चतम न्यायालय में अयोध्या विवाद की सुनवाई न्यायिक इतिहास की दूसरी सबसे लंबी सुनवाई बन गयी। इससे पहले आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई 38 दिनों तक चली थी जबकि 68 दिनों की सुनवाई के साथ ही केशवानंद भारती मामला पहले पायदान पर बना हुआ है।
वर्ष 1973 में ‘केशवानंद भारती बनाम केरल’ के मामले में उच्चतम न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने संवैधानिक रुख में संशोधन करते हुए कहा था कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके माध्यम से संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। ‘केशवानंद भारती बनाम केरल’ के मामले में 68 दिन तक सुनवाई हुई, यह तर्क-वितर्क 31 अक्टूबर 1972 को शुरू होकर 23 मार्च 1973 को खत्म हुआ था।
आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शीर्ष कोर्ट में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई की थी। इस बेंच में न्यायमूर्ति ए के सीकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल थे। आधार मामले में 38 दिनों तक चली सुनवाई के बाद गत वर्ष 10 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था, जबकि इस पर गत वर्ष सितंबर में फैसला सुनाया गया था। इस मामले में विभिन्न सेवाओं में आधार की अनिवार्यता की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।
मुस्लिम पक्ष ने कहा था कि यदि मस्जिद के लिए बाबर द्वारा इमदाद देने के सबूत नहीं हैं, तो सबूत राम मंदिर के दावेदारों के पास भी नहीं है, सिवाय कहानियों के। मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वकील राजीव धवन ने दलील दी कि 1855 में एक निहंग वहां आया, उसने वहां गुरु गोविंद सिंह की पूजा की और निशान लगा दिया था। बाद में सारी चीजें हटाई गईं। उसी दौरान बैरागियों ने रातोंरात वहां बाहर एक चबूतरा बना दिया और पूजा करने लगे। उन्होंने बाबर की इमदाद के संबंध में उक्त बात तब कही थी जब संविधान पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने पूछा था कि क्या इस बात का कोई सबूत है कि बाबर ने भी मस्जिद को कोई इमदाद दी हो?

धवन ने कहा था कि ब्रिटिश हुकूमत के गवर्नर जनरल और फैज़ाबाद के डिप्टी कमिश्नर ने भी पहले बाबर के फरमान के मुताबिक मस्जिद की देखभाल और रखरखाव के लिए रेंट फ्री गांव दिए, फिर राजस्व वाले गांव दिए। आर्थिक मदद की वजह से ही दूसरे पक्ष का ‘प्रतिकूल कब्जा’ नहीं हो सका था। सन् 1934 में मस्जिद पर हमले के बाद नुकसान की भरपाई और मस्जिद की साफ-सफाई के लिए मुस्लिमों को मुआवजा भी दिया गया था।
उन्होंने दलील दी थी कि शीर्ष अदालत अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपरिहार्य शक्तियों के तहत दोनों ही पक्षों की गतिविधियों को ध्यान में रखकर इस मामले का निपटारा करें। उन्होंने कहा था कि मस्जिद पर जबरन कब्जा किया गया। लोगों को धर्म के नाम पर उकसाया गया, रथयात्रा निकाली गई, लंबित मामले में दबाव बनाया गया। उन्होंने कहा कि मस्जिद ध्वस्त की गई और तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को अवमानना के चलते एक दिन की जेल भी काटनी पड़ी थी।
मुस्लिम पक्ष के वकील ने कहा था कि कोई भी अयोध्या को राम के जन्म स्थान के रूप में अस्वीकार नहीं कर रहा है। यह विवाद बहुत पहले ही सुलझ गया होता अगर यह स्वीकार कर लिया जाता कि राम केंद्रीय गुंबद के नीचे पैदा नहीं हुए थे। हिंदुओं ने जोर देकर कहा है कि राम केंद्रीय गुंबद के नीचे पैदा हुए थे। सटीक जन्म स्थान ही मामले का मूल है।
मुस्लिम पक्ष ने हिन्दू पक्ष के इस दावे का खंडन भी किया था कि बाबरी मस्जिद इस्लाम के स्थापित नियमों के खिलाफ थी, साथ ही उसने कहा था कि मोहरहित ‘निर्मोही’ और बैरागी को जमीन से मोह क्यों? मुस्लिम पक्षकार के वकील मोहम्मद निज़ाम पाशा ने कहा कि बाबरी मस्जिद वैध मस्जिद थी या नहीं, वहां वजू करने की व्यवस्था थी या नहीं, इसे इस्लाम के सिद्धांतों पर परखने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि सिर्फ यह देखे जाने की जरूरत है कि वहां के लोग इसे मस्जिद मानते थे या नहीं।

हिन्दू पक्ष की दलील थी कि बाबरी मस्जिद में वज़ू करने की कोई जगह नहीं थी। उन्होंने जमाली कमाली मस्जिद, सिद्धि सईद मस्जिद का उदाहरण देते हुए कहा था कि उस मस्जिद में कोई गुम्बद नहीं है, पर जाली लगी हुई है जिसे ‘ट्री ऑफ लाइफ’ कहते हैं। यही नहीं वहां पर जो नक्काशी है उसमें पेड़ और फूल बने हुए हैं। हिन्दू पक्ष की यह भी दलील है कि विवादित जमीन की खुदाई में ढांचे के जो अवशेष मिले हैं उसमें पेड़ और फूल बने हैं जो मस्जिदों में नहीं होते।
एक मुस्लिम पक्ष ने कहा कि हिन्दुओं के पास केवल राम चबूतरे का अधिकार है। मोहम्मद फारुख की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नाफडे ने संविधान पक्ष के समक्ष कहा था कि हिन्दुओं के पास उस स्थान का सीमित अधिकार है।
हिन्दुओं के पास चबूतरे का अधिकार तो है, लेकिन वे स्वामित्व हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कहा था कि हिंदुओं की ओर से लगातार अतिक्रमण की कोशिश की गई।
इससे पहले मुस्लिम पक्ष की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि एएसआई रिपोर्ट ऑपिनियन और अनुमान पर आधारित है। पुरातत्व विज्ञान, भौतिकी और रसायन विज्ञान की तरह विज्ञान नहीं है। प्रत्येक पुरातत्व विज्ञानी अपने अनुमान और ओपिनियन के आधार पर नतीजा निकलता है।