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सिन्हा के पैंतरों से पतली हो गई है इस बाहुबली की हालत, जीते तो मोदी ही बनेंगे प्रधानमंत्री

आज़ादी के बाद से देश की राजनीति में पहली बार पूर्वी उत्तर प्रदेश की गाजीपुर सीट एक ऐसी प्रयोगशाला के रूप में देखी जा रही है जहां जातिवाद एवं बाहुबल का सीधा विकासवाद से कड़ा मुकाबला है तथा इसका नतीजा आने वाले समय की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डालेगा।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के यह क्षेत्र राजनीति के पंडितों के कई मायनों में महत्वपूर्ण है। वर्षो से पूर्वांचल का यह इलाका राजनीतिक भटकाव का शिकार रहा। इस दौरान भय और जातिवाद का ऐसा चक्रव्यूह बनाया गया जिसमें इस लोकसभा सीट का निर्णायक यादव, दलित और मुस्लिम बन गया।

इस बार एक तरफ समाजवादी पार्टी -बहुजन समाज पार्टी गठबंधन उम्मीदवार बाहुबली अफजाल अंसारी हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा से केन्द्रीय राज्यमंत्री मनोज सिन्हा मैदान में हैं। पिछले दो दशक से इस राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश से 2014 के चुनाव में जातिवाद एवं अपराध के शिकंजा चटक गया और विकास की आशा आकांक्षा मामूली अंतर से जीत गयी। लेकिन इस बार जहां जातिवाद और बाहुबल ज़्यादा मजबूत गठजोड़ के साथ मैदान में उतरा है तो पांच साल में द्रुत गति से हुआ विकास गाज़ीपुर के लोगों को रोमांचित कर रहा है। घोर जातिवाद में फंसे लोग भी अब खुलकर मान रहे हैं कि सिन्हा ने जो काम किये हैं, उनके बारे में पहले सोचा तक नहीं गया था।

सामाजिक ढांचे में असरदार दिखने वाले यादवों और दलितों के प्रौढ़ पुरुषों का झुकाव जाति की ओर है लेकिन नौजवान और महिलाओं में वैचारिक बिखराव दिखाई दे रहा है। मुस्लिम समुदाय विशेष रूप से महिलाओं में भी कुछ अंश में भाजपा के प्रति झुकाव है। जातिगत तिकड़ी में दिख रहा बिखराव और अन्य जातियों की लामबंदी बाहुबली के हौसले पस्त किए हुए है। गाजीपुर में बाहुबली मुख्तार अंसारी का दबदबा है। उनके खिलाफ ढाई सौ से ज्यादा हत्या सहित कई अपराधों के मामले चल रहे हैं। गाजीपुर से बसपा प्रत्याशी मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी का भी जीवन आपराधिक पृष्ठभूमि वाला है। वो यहां से एक बार सांसद और दो बार विधायक बन चुके हैं। गाजीपुर में अंसारी को टक्कर किसी ने दी है तो वह मनोज सिन्हा हैं।

हालांकि इसकी उन्हें कीमत भी बहुत चुकानी पड़ी है। इस राजनीतिक टकराव के चलते उनके कई समर्थकों की हत्या हुई और भतीजे को भी मार दिया गया, लेकिन इसके बाद भी श्री सिन्हा पीछे नहीं हटे और उसी का नतीजा है कि गाजीपुर क्षेत्र में बाहुबली के भय का वातावरण छटा। गाजीपुर में सिन्हा के भूमिहार समाज की संख्या केवल 75 हजार है। वह जातिवाद की राजनीति नहीं करते। हालांकि भाजपा की तरफ से उन्हें किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का भी प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि चुनाव लड़ेंगे तो गाजीपुर से अन्यथा नहीं लड़ेंगे। गाजीपुर में दलित साढ़े तीन लाख, मुस्लिम दो लाख, यादव समाज साढ़े तीन लाख है. ब्राह्मण एक लाख, भूमिहार 75 हजार, वैश्य 75 हजार, राजपूत डेढ़ लाख, राजभर 75 हजार, कुशवाहा डेढ़ लाख तथा अन्य जातियां एक लाख के आसपास हैं।

करीब 18 लाख मतदाताओं वाली इस सीट में आठ लाख मतदाता (यादव, मुस्लिम, दलित) निर्णायक रहते हैं, दस लाख मतदाता भय या नाराजगी के चलते मतदान से खुद को दूर रखते थे लेकिन इस चुनाव में दस लाख मतदाताओं की सक्रियता और आठ लाख मतदाताओं में अंदरखाने का बिखराव ने बाहुबल की चूलें हिला दी हैं। वाराणसी से गाज़ीपुर के रास्ते में गोमती नदी पार करते ही वाराणसी की सीमा खत्म हो जाती है और गाजीपुर शुरू हो जाता है. इतनी करीबी के बाद भी गाजीपुर सीट का मिजाज वाराणसी से बिलकुल अलग है। सिधौना के पास गोमती और गंगा का संगम स्थल है। लेकिन गाजीपुर और वाराणसी में वैचारिक संगम नहीं हो पाया। नदी के इस पार सिधौना जो गाजीपुर में आता है, वहां जातिवाद सिर चढ़कर बोलता है। नदी के उस पार यह गौण है।

सिधौना क्षेत्र यादव और मुस्लिम बहुल इलाका है। यहां से सपा-बसपा के अलावा किसी पार्टी को वोट नहीं जाता लेकिन पहली बार यादव समाज के युवा मतदाताओं का झुकाव साफ़ तौर पर भाजपा की तरफ है। वे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उठाए गए कदम से वह प्रभावित हैं, तो भाजपा मनोज सिन्हा की तरफ से बिना भेदभाव किए विकास कार्य का भी असर है। इस इलाके में भीड़ से बात करने पर बाहुबल के पैरोकार अफजाल अंसारी की जीत का दावा करते हैं, लेकिन मतदाताओं से अकेले बात करने पर पता चलता है कि अंदरखाने भाजपा की घुसपैठ हो चुकी है। यादव समाज के कुछ ऐसे परिवार भी मिले, जो खामोशी से भाजपा की जीत के सहभागी बनना चाहते हैं।

गाजीपुर सीट का सैदपुर इलाका दलित बहुल है। यह क्षेत्र बसपा का गढ़ माना जाता है. इस बार सैदपुर का दलित भी बंटा हुआ है। सैदपुर के पास दलितों की बस्तियों में भी शौचालय एवं रसोई गैस सिलेंडर के कारण भाजपा की ओर नरम रुख दिखाई दे रहा है। सैदपुर कस्बे में घूमने पर पाया गया कि दलितों का पढ़ा-लिखा तबका भाजपा के साथ जा सकता है। मनोज सिन्हा के काम करने के तरीके ने इनको प्रभावित किया है। चौराहे पर चाय की दुकान में चुनाव पर चर्चा में लोगों ने खुलकर कहा कि क्षेत्र के लिए सिन्हा और देश के लिए मोदी जरूरी हैं। गाजीपुर का नंदगंज इलाका दलित और यादव समाज वाला क्षेत्र है। किसी समय में यहां चीनी मिल हुआ करती थी, लेकिन आपराधिक घटनाओं के बढ़ने से व्यापारिक गतिविधियां सिमटती चली गईं। इस इलाके में भी अंसारी कमजोर दिख रहे हैं। इलाके के लोगों की सोच अब जातिवाद से राष्ट्रवाद की तरफ हुई है।

गाजीपुर के जातिवादी चक्रव्यूह में फंसे क्षेत्र के लोगों खास तौर पर युवाओं में पहली बार इससे बाहर निकलने की छटपटाहट दिख रही है। सिन्हा भी अपने प्रचार अभियान में इसे हवा देने के लिए गाज़ीपुर प्राइड का विचार रख रहे हैं और अपराधियों को जिले से सदा के लिए बाहर करने का भरोसा दिला रहे हैं। मुंबई के रेलवे स्टेशन पर गाज़ीपुर के लिए नियमित ट्रेन चलने और शहर के नाम की उद्घोषणा की बात भी लोगों को गर्व की अनुभूति करा रही है। सिन्हा अगले 5 वर्षों में गाज़ीपुर को वाराणसी के साथ ट्विन सिटी के माॅडल पर विकसित करने और कृषि संबंधी उद्योग धंधों को बढ़ावा देकर किसानों की आमदनी और नौजवानों के लिए रोजगार बढ़ाने का वादा कर रहे हैं।

खासकर युवा मतदाताओं का झुकाव बता रहा है कि जिस सीट पर यादव, मुस्लिम और दलित की तिकड़ी निर्णय किया करती थी, इस बार सर्व समाज का युवा मतदाता निर्णायक की भूमिका निभाने के लिए आगे आया है। नतीजे चाहे जो हों लेकिन जिस तरह का माहौल है,उससे साफ लग रहा है कि मतदाताओं को डराकर जीत हासिल करने वाला बाहुबल इस बार खुद डरा हुआ है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि गाज़ीपुर एक अनूठी राजनीतिक प्रयोगशाला बन गया है। भाजपा इस सीट पर केवल और केवल विकास के नाम पर वोट मांग रही है। पांच साल का विकास और अगले पांच साल की विकास की तस्वीर। यहां हिन्दुत्व का मुद्दा नहीं है। इसके नतीजे का समूची राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। अगर भाजपा का विकासवाद जीता तो देश में सभी दल जाति संप्रदाय की राजनीति से परे सोचना शुरू करेंगे। भाजपा को भी कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति को छोड़कर आगे बढ़ने होगा।

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